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Showing posts from June, 2020

डैडी के नाम एक पाती

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डैडी , कई बार मन घुटता है , अंतर में आँखों से आँसू नहीं बहते , परन्तु मन में उमड़ आती है , कई यादों की धाराएँ एक साथ..... बचपन से अब तक के सफ़र की हर बात.... कैसे हैं आप ? आशा करती हूं कि आप जहाँ भी होंगे , स्वस्थ और प्रसन्न होंगे।आपके प्रति सदा ही सम्मान और प्रेम का भाव रहा , वैसे यह कहने की बात नहीं । संकोच की सीमाओं के बीच कभी शब्दों के ज़रिए जता या बता नहीं पाई , लेकिन आज जब सोच रही थी कि फ़ादर्स-डे पर आपको उपहार क्या दूं ? तो सोचा कि जिस पिता ने मुझे काबिल बनाने और हमेशा खुश रखने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया , उनके लिए शायद किसी उपहार से   ज़्यादा अपनी बेटी की उनके प्रति प्रेम और भावनाओं की अभिव्यक्ति अनमोल होगी। आज फादर्स डे है , कैसा फादर्स डे ? पहले मैंने सोचा , अब जब आप हमारे पास नहीं रहे , तो कैसा फादर्स डे ? लेकिन आप भौतिक रूप से न होकर भी हमारे साथ में ही हैं , लेकिन सिर्फ़ मेरी भावनाओं में । मेरे अस्तित्व में , मेरे वजूद के कण-कण में आप हम समाए हैं । मैंने आप ही से कर्तव्यों को निभाना , काम को पूजा समझना , अनुशासन , समय बद्धता , किसी काम को...

जीवन संघर्ष से बचना ही क्या?

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डैडी की मृत्यु के बाद से ही दिल के भीतर ही भीतर द्वंद्व चल रहा है । सोचती हूं, उस पीड़ा को दबाकर आगे बढ़ूँ, पर न जाने क्यों कदम रुक जाते हैं । ऐसा लगता है, मानो युद्ध हो रहा है, दिल के अंदर, हृदय के भीतर, अंतर में बसी हुई भावनाएं बार-बार उमड़ना चाहती हैं । दुख तो कभी कम हो नहीं सकता किंतु फिर भी कोशिश कर रही हूं कि आगे बढ़ूँ। प्रस्तुत कविता के माध्यम से उसी अंतर्द्वंद्व को उसी युद्ध को दर्शाने का प्रयास कर रही हूं- प्रारंभ हुआ है युद्ध , आरंभ हुआ है युद्ध , युद्ध कि जिसने खड़ा किया मुझे , अपने अंतर के विरुद्ध , भावनाओं के विरुद्ध , मेरे रूदन के विरुद्ध। हे प्रभु! कैसे समझाऊँ मैं मन को ? मन दुविधा में है , कण-कण को , ना! ये युद्ध ना अब लड़ पाऊँगी मैं , रखती हूँ धरा पे धनुष और बाण , ये है मेरे युद्ध का पूर्णविराम ! उत्तर आया : काया क्या है ? ,   केवल है माया , धरती चाहे जो ऐसी है छाया। अग्नि , पाषाण , वायु , जल , वसुधा , बस पाँच तत्व का पिंजरा है काया।। इस पिंजरे में एक है हंस , जो अजर अमर आत्मा कहलाया। मृत्यु क्या है ? केवल है माया , केवल ...