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CCTV cameras intrude into privacy of classroom

The more controversial use of cameras comprises observing and assessing teachers’ performance and students’ discipline. The CBSE and other boards require the installation of CCTV cameras in all schools, including corridors and classrooms. The rising rate of crime involving students justifies, even necessitates, this. Its aim is to keep students and staff safe and help identify those who commit crimes or show anti-social behaviour. Surveillance technology is common in public places and is lawful. But the use of cameras in schools raises some questions. Are classrooms public or private spaces? Do students and teachers expect privacy within school precincts? Schools have restricted access: they are not fully public, like parks. When entering a school, students and staff join a community where individual rights are shaped by the broader needs of the school. Individual rights must be balanced with the community's right to a safe, orderly environment. Usually, school activities are more ...

व्यूज, सब्सक्राइबर्स और फ़ॉलोअर्स की बढ़ती भूख

 व्यूज, सब्सक्राइबर्स और फ़ॉलोअर्स की बढ़ती भूख डिजिटल युग ने संचार और अभिव्यक्ति की दुनिया को नई दिशा दी है। आज सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं रहा, बल्कि पहचान, प्रसिद्धि और प्रभाव का पैमाना बन गया है। किसी व्यक्ति की लोकप्रियता अब उसके विचारों की गहराई से नहीं, बल्कि उसके व्यूज, सब्सक्राइबर्स और फ़ॉलोअर्स की संख्या से आँकी जाने लगी है। यही कारण है कि आज की डिजिटल संस्कृति में इन संख्याओं की बढ़ती भूख स्पष्ट दिखाई देती है। कुछ वर्ष पहले तक लेखन, कला, संगीत या ज्ञान की दुनिया में पहचान बनाने के लिए वर्षों की मेहनत और साधना की आवश्यकता होती थी। परंतु आज मोबाइल फोन और इंटरनेट ने मंच को लोकतांत्रिक बना दिया है। कोई भी व्यक्ति कुछ ही क्षणों में अपनी बात लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है। यह परिवर्तन सकारात्मक भी है, क्योंकि इससे प्रतिभाओं को अवसर मिला है। लेकिन इसके साथ एक नई समस्या भी जन्मी है—लोकप्रियता की अंधी दौड़। आज कई लोग अपने काम की गुणवत्ता से अधिक उसकी दिखावट और वायरल होने की संभावना पर ध्यान देने लगे हैं। कंटेंट बनाने का उद्देश्य ज्ञान, संवेदना या रचनात्मकता नहीं, बल्कि अ...

विश्व शांति लाने के लिए सहिष्णुता का महत्व

  विश्व शांति लाने के लिए सहिष्णुता का महत्व मानव सभ्यता की यात्रा जितनी प्राचीन है , उतनी ही संघर्षों और युद्धों की भी। किंतु इन संघर्षों की धूल के बीच जब-जब सहिष्णुता का दीप प्रज्वलित हुआ है , तब-तब मानवता ने अपनी सबसे उजली शक्ल देखी है। सहिष्णुता केवल एक नैतिक गुण नहीं , बल्कि विश्व शांति की वह आधारशिला है , जिस पर एक समरस और सौहार्दपूर्ण समाज का निर्माण संभव है। सहिष्णुता शब्द संस्कृत धातु ‘सह’ और ‘ष्णु’ से मिलकर बना है , जिसका आशय है—दूसरों के मत , विचार , धर्म , आचरण या व्यवहार को स्वीकार करना , उन्हें सम्मान देना। यह केवल सहने का भाव नहीं , बल्कि हृदय की विशालता का प्रतीक है। सहिष्णु व्यक्ति दूसरों की भिन्नताओं में भी एकता का सौंदर्य देखता है। महा कवि रहीम ने कहा था—   “रहिमन धागा प्रेम का , मत तोरो चटकाय।   टूटे से फिर ना जुड़े , जुड़े गांठ पड़ जाए॥”   यह “गांठ” असहिष्णुता की प्रतीक है , जो मानव संबंधों को जकड़ लेती है। सहिष्णुता उस गांठ को खोलने की प्रक्रिया है।   इतिहास साक्षी है कि जहां-जहां सहिष्णुता की भावना प्रबल रही , वहां शांति , ज्ञ...

कृतज्ञ हूँ मैं

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  कृतज्ञ हूँ मैं उस प्रभात की , जो मौन द्वार खटखटाए , अधूरी नींद , थकी आँखों में , फिर सपने बो जाए।   कृतज्ञ हूँ मैं उस श्वास की , जो हर पल साथ निभाती , अनकहे बोझों के नीचे भी , जीवन-लय सिखाती।   कृतज्ञ हूँ मैं उस धूप की , जो छाँव बनकर ठहरी , कठोर समय की तपती छाती पर , करुणा बनकर उतरी।   कृतज्ञ हूँ मैं उन आँसुओं की , जो चुपके बह जाते हैं , भीतर जमी घनीभूत पीड़ा को , हल्का कर जाते हैं।   कृतज्ञ हूँ मैं उन रिश्तों की , जो टूटकर भी जुड़ गए , खामोशी की दरारों में , विश्वास की ओर मुड़ गए।   कृतज्ञ हूँ मैं उन शब्दों की , जो कहे नहीं जा पाए , पर आँखों की भाषा में , अर्थ बनकर मन पर छाए।   कृतज्ञ हूँ मैं उन रातों की , जिनमें खुद से मुलाकात हुई , अकेलेपन के पलों में , आत्मा से की गहरी बात हुई।   कृतज्ञ हूँ मैं उन राहों की , जिन पर हौसला साथ-साथ चला , कदम-कदम पर गिरते हुए भी , साहस दीपक जलता चला।   कृतज्ञ हूँ मैं उस समय की , जो छीनकर भी दे जाता है , अहंकार का भार उतारकर , कृतज्ञता सिखलाता है।   कृतज्ञ हूँ मैं उन प्रश्नों की , जिनके उत्तर देर से आए ,...

नमस्ते, मैं साड़ी हूँ

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  नमस्ते, मैं साड़ी हूँ   भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में साड़ी केवल एक वस्त्र नहीं , बल्कि सभ्यता , सौंदर्य और स्त्री अस्मिता की जीवंत प्रतीक है। हजारों वर्षों से भारतीय नारी साड़ी को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाए हुए है। समय बदला , पहनावे के ढंग बदले , फैशन की परिभाषाएँ बदलीं , किंतु साड़ी आज भी अपनी गरिमा और लोकप्रियता बनाए हुए है। यह वस्त्र इतिहास , कला , संस्कृति और परंपरा का ऐसा संगम है , जिसने पीढ़ियों को जोड़े रखा है। विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में गिनी जाने वाली सिंधु घाटी सभ्यता में भी साड़ी जैसे वस्त्र के प्रमाण मिलते हैं। खुदाई में मिली एक महिला की मूर्ति में धोती-सदृश कपड़ा लपेटे हुए देखा जा सकता है , जिसे साड़ी का पूर्वज माना जाता है। साड़ी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ' सट्टिका ' शब्द से हुई है , जिसका अर्थ कपड़े की पट्टी होता है। ऋग्वेद , अथर्ववेद और उपनिषदों में भी स्त्रियों के वस्त्रों का उल्लेख मिलता है। उस समय बिना सिले वस्त्र पहनने की परंपरा थी और साड़ी उसी परंपरा का विकसित रूप मानी जाती है। महाभारत के ' चीर हरण ' प्रसंग में द्रौपदी के अंतही...

EPISODE 24.भेद ये गहरा, बात ज़रा-सी! 04/12/26

  EPISODE 24. भेद ये गहरा , बात ज़रा-सी! 04/12/26 INTRO MUSIC नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता ,  एक आवाज़ ,  एक दोस्त ,  किस्से- कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत।   जी हाँ , आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट , ‘ यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला और अंतिम एपिसोड ...जिसमें हैं ,  नए जज़्बात ,  नए किस्से ,  और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...।   जी हाँ दोस्तों ,  आज हम बात करने जा रहे हैं, प्रेम की..आपको याद है न दोस्तों, कि मैंने पॉडकास्ट की शुरुआत ही प्रेम-रसायन की बात से की थी, क्योंकि प्रेम है, तो हम हैं। प्रेम-रसायन पर बात करते-करते मैंने यह जाना कि प्रेम का सीधा-सच्चा संबंध सुंदरता से होता है, और यह आँखों में समाया होता है और आपके आयी, आज के एपिसोड में इस भेद को जानने की कोशिश करते हैं.. Music   पिछली रात बहुत कोहरा था , ओस भी थी। ऐसा तो होना लाज़मी है, क्योंकि सर्दियों का मौसम है। पर इस ठिठुरती ठंड में कितने लोग देख पाते हैं कि पिछली रात चुपके से आसमान ने धरती को एक प्रेम-पत्र लिख भेजा है। ओस की बूँदों से...