मत स्वीकारो जाल
मत स्वीकारो जाल॥ बंधन चाहे लाख हों, मत खोना विश्वास। हिम्मत की तलवार से, लिख अपना इतिहास॥ झुकना यदि मजबूर हो, टूटे नहीं कमाल— लंगड़ाकर चलना भला, मत स्वीकारो जाल॥ पैर कटे तो क्या हुआ, जीवित रहे उड़ान। मन के पंखों से बड़ा, नहीं कोई वरदान॥ हिम्मत ही इंसान की, होती सौरभ ढाल— लंगड़ाकर चलना भला, मत स्वीकारो जाल॥ सोने के पिंजरे भले, लगते हों आराम। छीन स्वतंत्रता अगर, किस कामों के धाम॥ स्वाभिमान के सामने, फीका वैभव-भाल— लंगड़ाकर चलना भला, मत स्वीकारो जाल॥ जो पराधीन हो गया, खो बैठा अधिकार। अपनी इच्छा भी लगे, जैसे कोई भार॥ स्वतंत्रता का मूल्य है, जीवन का मंगल-पाल— लंगड़ाकर चलना भला, मत स्वीकारो जाल॥ 'सौरभ' सिर ऊँचा रहे, चाहे कठिन हो दौर। स्वतंत्रता से बढ़ नहीं, कोई दूसरा और॥ जीवन की हर हार से, बेहतर ऊँचा भाल— लंगड़ाकर चलना भला, मत स्वीकारो जाल॥