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मत स्वीकारो जाल

 मत स्वीकारो जाल॥ बंधन चाहे लाख हों, मत खोना विश्वास। हिम्मत की तलवार से, लिख अपना इतिहास॥ झुकना यदि मजबूर हो, टूटे नहीं कमाल— लंगड़ाकर चलना भला, मत स्वीकारो जाल॥ पैर कटे तो क्या हुआ, जीवित रहे उड़ान। मन के पंखों से बड़ा, नहीं कोई वरदान॥ हिम्मत ही इंसान की, होती सौरभ ढाल— लंगड़ाकर चलना भला, मत स्वीकारो जाल॥ सोने के पिंजरे भले, लगते हों आराम। छीन स्वतंत्रता अगर, किस कामों के धाम॥ स्वाभिमान के सामने, फीका वैभव-भाल— लंगड़ाकर चलना भला, मत स्वीकारो जाल॥ जो पराधीन हो गया, खो बैठा अधिकार। अपनी इच्छा भी लगे, जैसे कोई भार॥ स्वतंत्रता का मूल्य है, जीवन का मंगल-पाल— लंगड़ाकर चलना भला, मत स्वीकारो जाल॥ 'सौरभ' सिर ऊँचा रहे, चाहे कठिन हो दौर। स्वतंत्रता से बढ़ नहीं, कोई दूसरा और॥ जीवन की हर हार से, बेहतर ऊँचा भाल— लंगड़ाकर चलना भला, मत स्वीकारो जाल॥

खुद ही अपनी शक्ति बन

 मत करना इंतज़ार तू, कोई आए साथ। खुद ही अपनी शक्ति बन, खुद लिख अपनी बात॥ पिता, बंधु या संगिनी, दें चाहे आशीष। संकट में संबल बने, अपना ही मन-शीश॥ हिम्मत का दीपक जला, भर अपनी औकात— खुद ही अपनी शक्ति बन, खुद लिख अपनी बात॥ शिक्षा सबसे श्रेष्ठ धन, देती नई उड़ान। इसके बल पर जीत ले, जीवन का मैदान॥ ज्ञान बने जब सारथी, खुल जाएँ सब पाट— खुद ही अपनी शक्ति बन, खुद लिख अपनी बात॥ नारी केवल नाम नहीं, साहस की पहचान। अंतर की दृढ़ चेतना, उसका है सम्मान॥ स्वाभिमान की ज्योति से, जगमग हो हर रात— खुद ही अपनी शक्ति बन, खुद लिख अपनी बात॥ जो खुद अपने पथ चले, रोके किसकी रीत। संघर्षों की धूप में, खिलती जीवन-प्रीत॥ मेहनत ही तक़दीर है, कर्मों की सौगात— खुद ही अपनी शक्ति बन, खुद लिख अपनी बात॥ आँधी चाहे लाख हो, मत होना लाचार। दृढ़ संकल्पों के बल पर, जीत मिले हर बार॥ हौसलों के पंख ले, छू ले नभ की छात— खुद ही अपनी शक्ति बन, खुद लिख अपनी बात॥ खुद को इतना गढ़ सखी, बढ़े अटल विश्वास। अपने हक़ की लड़ सके, यही सफलता-आस॥ 'सौरभ' नारी शक्ति से, उज्ज्वल हो हर प्रात— खुद ही अपनी शक्ति बन, खुद लिख अपनी बात॥

साइकिल की पहली सवारी

 साइकिल की पहली सवारी बचपन बोला—"चल, उड़ते हैं!", मन ने भी हुंकार भरी, दो पहियों पर सपने बैठे, किस्मत ने किलकारी भरी। नई-नवेली साइकिल आई, जैसे आई हो बरसात, घंटी बोली—"ट्रिंग-ट्रिंग-ट्रिंग!", मन बोला—"अब मेरी बात!" पापा बोले—"धीरे चलना, जल्दी  तू मत वीर बने", मैं बोली —"अब देखिए पापा, कैसे सारे तीर छने!" पहला पैडल... पहला झटका... पहला ही इतिहास हुआ, साइकिल ऊपर, मैं नीचे थी ... धरती से परिचय कुछ ख़ास हुआ। घुटने छिलकर लाल हुए तो, आँखों ने भी शोर मचाया, माँ ने फूँक मारी, माथा चूमा, दर्द ने झट बस्ता उठाया। मित्र खड़े थे ठहाके लेकर—"वाह! क्या चालक निकला है!" मैंने हँसकर धूल झाड़ी—"अभी तो खेल शुरू हुआ है!" रोज़ गिरी , फिर रोज़ उठी  मैं, हार कभी स्वीकार न की, ठोकर को शिक्षक मान लिया, हिम्मत से तकरार न की। एक दिवस जब पापा ने चुपके, पीछे से वह हाथ हटाया, मैंने समझा साथ खड़े हैं... मुड़कर देखा... कोई न पाया! डर भी भागा, मन भी जागा, विश्वासों ने ली अंगड़ाई, उस दिन मुझे  समझ में आई, अपनी ही असली तरुणाई। फिर तो ऐसी रफ़्तार पकड़ी, ...

मुखर हुआ विश्वास।

मौन अधर पर था कभी, नयनों में थी पीर। अब स्वर बने बोलती, बदली खुद तक़दीर॥ बंधन जितने बाँधते, उतनी बढ़ती शान। अंतर की ज्वाला बनी, साहस की पहचान॥ आँसू अब दुर्बल नहीं, बनते हैं शमशीर— अब स्वर बने बोलती, बदली खुद तक़दीर॥ आँसू से इतिहास ने, लिखे अनेक बयान। अब संघर्षों की कलम, रचती नव अभियान॥ हर बाधा को जीतकर, हुई स्वयं जागीर— अब स्वर बने बोलती, बदली खुद तक़दीर॥ घर-आँगन की धूप भी, वह जीवन की छाँव। उसके श्रम से महकता, हर मौसम, हर गाँव॥ ममता उसकी शक्ति है, साहस बना लकीर— अब स्वर बने बोलती, बदली खुद तक़दीर॥ शिक्षा ने दी रोशनी, खोले नूतन द्वार। ज्ञान बना अब साथ में, सपनों का आधार॥ चूल्हे से संसद तलक, गूँजा उसका धीर— अब स्वर बने बोलती, बदली खुद तक़दीर॥ अन्यायों के सम्मुख वह, बन जाती तूफ़ान। सत्य, साहस, स्वाभिमान, उसकी नई पहचान॥ अब  ना रोकेगी उसे, कोई भी ज़ंजीर— अब स्वर बने बोलती, बदली खुद तक़दीर॥ मौन नहीं अब नियति है, मुखर हुआ विश्वास। स्त्री स्वर से गूँजता, नवयुग का आकाश॥ नर-नारी जब सँग चले, लेकर सम-अधिकार। तब ही सच्चे अर्थ में, होगा जग साकार॥

कामकाजी महिलाओं के लिए नारी सशक्तिकरण के मायने

  “ कामकाजी महिलाओं के लिए नारी सशक्तिकरण के मायने ” आदरणीय मंचासीन अतिथिगण , सम्मानित सहकर्मी एवं उपस्थित सभी श्रोता गण , सादर नमस्कार। मैंने उसको जब-जब देखा , लोहा देखा , लोहे जैसा-- तपते देखा , गलते देखा , ढलते देखा , मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा! आज जिस विषय पर मैं अपना संभाषण प्रस्तुत करने जा रही हूँ, वह है —“ कामकाजी महिलाओं के लिए नारी सशक्तिकरण के मायने ” । नारी सशक्तिकरण केवल एक नारा नहीं , बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया है, जो महिलाओं को आत्मनिर्भर , आत्मविश्वासी और निर्णय लेने में सक्षम बनाती है। जब कोई महिला घर की चौखट से बाहर निकलकर अपने कौशल और परिश्रम से समाज और अर्थव्यवस्था में योगदान देती है , तब सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ सामने आता है। मैं अपने विचारों को कुछ प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से प्रस्तुत करना चाहूँगी — 1. आर्थिक आत्मनिर्भरता कामकाजी महिलाओं के लिए सशक्तिकरण का पहला और सबसे महत्वपूर्ण अर्थ है आर्थिक स्वतंत्रता। जब महिला स्वयं कमाती ...