त्रिभाषा सूत्र की प्रासंगिकता
त्रिभाषा सूत्र की प्रासंगिकता
शिक्षा की व्यवस्था हो चाहे व्यवस्था की शिक्षा दोनों की स्थिति में भाषा का महत्व सर्वविदित है। व्यावहारिक जीवन शैली हो चाहे अध्ययनशीलता का ककहरा सीखना हो, भाषा के बिना सब व्यर्थ है। बिना भाषा के सीखें, समझें और जानने के कुछ भी सीखना असंभव है। बात जब ककहरे की हो तो मातृकुल परिवेश की भाषा यानी मातृभाषा का महत्व स्वीकारा गया हैं।
भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध, आधुनिक काल के कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने निज भाषा का महत्व बताते हुए लिखा भी है कि
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटन न हिय के सूल।
इस के साथ भारत की निज भाषा से भारतेंदु जी का तात्पर्य हिंदी सहित भारतीय भाषाओँ से रहा हैं। वे आगे लिखते भी है कि 'अंग्रेजी पढ़के जदपि, सब गुण होत प्रवीन। पै निज भाषा ज्ञान के, रहत हीन के हीन।' यानी अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषाओँ में प्राप्त शिक्षा से आप प्रवीण तो हो जाओगे किंतु सांस्कृतिक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण से हीन ही रहोगे।
उसी काल में भारतेंदु जी ने मातृभाषा में शिक्षा की अवधारणा को भी साकार करने का अनुग्रह किया हैं। वे फिर लिखते है कि
और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात,
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।
इसी तरह भारत के सांस्कृतिक और सामाजिक वैभव की स्थापना का प्रथम पायदान निज भाषा यानी मातृभाषा में शिक्षा में ही निहित हैं। बिना मातृभाषा के ज्ञान और अध्ययन के सब व्यवहार व्यर्थ ही माने गए हैं।
कुछ वर्षों पूर्व एक प्रबंधन संस्थान में एक युवा प्रशिक्षणार्थी आत्महत्या कर लेता है, वह इसका कारण लिखकर छोड़ जाता है कि कमजोर अंग्रेजी के कारण उसे हास्यास्पद स्थितियों से गुजरना पड़ रहा था, जो असहनीय हो गया था। ऐसी ही एक अन्य घटना में विद्यार्थी इसी कारण से तीन महीने तक विद्यालय नहीं जाता है। घर पर सब अनभिज्ञ हैं और जानकारी तब होती है जब वह गायब हो जाता है। ऐसी खबरें अगले दिन सामान्यत: भुला दी जाती हैं।
प्रायः एक दिन की अखबार की सुर्खियां भारत के शिक्षा नीति निर्धारकों को सोचने-समझने पर विवश कर देती है कि आखिर भारत में ही अपने राष्ट्र की प्रतिनिधि भाषा जानने, समझने के बावजूद अंग्रेजी का इतना दबाव क्यों है? जो व्यक्ति को अवसादग्रस्त तो कर ही रहा है साथ-साथ जीवन की बाजी लगाने के लिए भी विवश कर रहा हैं।
इस प्रकार का चिंतन-विश्लेषण कहीं पर भी सुनाई नहीं पड़ता है कि आज भी अंग्रेजी भाषा का दबाव किस कदर भारत की नई पीढ़ी को प्रताड़ित कर रहा है। सच तो यह है कि आज़ादी के बाद मातृभाषा हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के उत्थान का जो सपना देखा गया था अब वह सपना दस्तावेजों, कार्यक्रमों तथा संस्थाओं में दबकर रह गया है। कुछ दु:खांत घटनाएं संचार माध्यमों में जगह पा जाती हैं। समस्या का स्वरूप अनेक प्रकार से चिंताग्रस्त करने वाला है।
आज़ादी के बाद के पहले दो दशकों में पूरी आशा थी कि अंग्रेजी का वर्चस्व कम होगा। हिंदी के विरोध के कारण सरकारें सशंकित हुई जिसका खामियाज़ा दूसरी भारतीय भाषाओं को भुगतना पड़ रहा है। तीन-चार दशक तो इसी में बीते कि अंग्रेजी में प्रति वर्ष करोड़ों बच्चे हाईस्कूल परीक्षा में फेल होते रहें। किंतु वर्तमान पर नजर डालें तो ठीक विपरीत परिणामों का दर्शन होता है। हाल ही में उत्तरप्रदेश में लगभग आठ लाख बच्चें हिंदी भाषा में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं। मतलब साफ तौर पर नीति निर्धारकों द्वारा जिस तरह से अंग्रेजी की गुलामी वाला शिक्षा मसौदा बनाया, वह हिंदी के लिए ही आत्मघाती बन गया।
मातृभाषा से बच्चों का परिचय घर और परिवेश से ही शुरू हो जाता है। इस भाषा में बातचीत करने और चीजों को समझने-समझाने की क्षमता के साथ बच्चे विद्यालय में दाखिल होते हैं। अगर उनकी इस क्षमता का इस्तेमाल पढ़ाई के माध्यम के रूप में मातृभाषा का चुनाव करके किया जाएं तो इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं।
यूनेस्को द्वारा भाषाई विविधता को बढ़ावा देने और उनके संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की शुरुआत भी की गई। हम अक्सर देखते हैं कि बहुत सी बातें अवधी, भोजपुरी, ब्रजभाषा, मगही, मराठी, कोंकणी, बागड़ी और मालवी, निमाड़ी आदि भाषाओं (अथवा बोलियों) में कही जाती हैं उनका व्यापक असर होता है।
कई बार मातृभाषा को हतोत्साहित करने की प्रवृत्ति विद्यालयों में देखी जाती है। जैसे हिंदी बोलने में इंग्लिश माध्यम विद्यालयों में दंड लगने वाली घटनाओं के बारे में हमने सुना है। ऐसे ही निमाड़ी या अन्य मातृभाषाओं के गीतों को स्कूलों में गाने से बच्चों को हतोत्साहित किया जाता है, इसका अर्थ है कि हम बच्चों को उनके अपने परिवेश, संस्कृति और उनकी जड़ों से काट देना चाहते है। इससे बचने का एक ही तरीका है कि हम मातृभाषा में संवाद, चिंतन और विचार-विमर्श को अपने रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शामिल करें। इसके प्रयोग को लेकर किसी भी तरह की हीनभावना का शिकार होने की बजाय ऐसा करने को प्रोत्साहित करें।
हालांकि भारत की पहली शिक्षा नीति में भी त्रिभाषा में शिक्षा व्यवस्था की परिकल्पना कोठारी आयोग ने की थी, किंतु वर्षों की तपस्या और माँग अनुरूप वर्ष 2020 में जारी शिक्षा नीति ने प्राथमिकी शिक्षा में मातृभाषा की अनिवार्यता को अपना कर भारत भर में निज भाषा में शिक्षा के महत्व को प्रतिपादित किया है।
नई शिक्षा नीति में जिस तरह से प्राथमिक तौर पर मातृभाषा के प्रभाव को समायोजित करते हुए हिंदी भाषा के महत्व को भी सम्मिलित किया हैं वह हिंदी के प्रभुत्व को स्थापित करते हुए भविष्य में हिंदी युग की स्थापना का कारक बनेगा। हिंदी के साथ-साथ भारतीय भाषाओँ का भी महत्व बने और अंग्रेजी का आधिपत्य समाप्त हो यही मूल ध्येय है।
हिंदी युग का आरंभ तभी माना जाएगा, जब बाज़ार हिंदी भाषा सहित भारतीय भाषाओँ को अपनाएगा। भाषा को जब तक बाज़ार अपनाता नहीं, तब तक भाषा का विकास खोखला रहता है।
आधुनिकीकरण की भ्रमपूर्ण व्याख्याओं के कारण हमारी नई पीढ़ी में धुरीहीनता आ रही है। वह न तो परंपरा से पोषण पा रही है और न ही उसमें पश्चिम की सांस्कृतिक विशेषताएं नजर आ रही हैं। मातृभाषा में शिक्षण के साथ अनेक अन्य आवश्यकताएं भी हैं, जो हर भारतीय को भारत से जोड़ने और विश्व को समझने में सक्षम होने के लिए आवश्यक हैं। मातृभाषा का इसमें अप्रतिम महत्व है, इससे इनकार बेमानी होगा।
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में हिंदी का पर्याप्त प्रचार एवं बाज़ार आधारित शिक्षा व्यवस्था की अनुपालना अनिवार्यतः होना चाहिए, इसी के सहारे भारत का लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक विकास संभव हैं।राष्ट्रीय शिक्षा नीति की अनुशंसाओं के अनुसार विद्यालयीन शिक्षा के स्तर पर कम से कम कक्षा 5 तक तथा जहां संभव है, वहां कक्षा 8 तक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए। महात्मा गांधी ने भी यही कहा था।
शिक्षा नीति में ‘त्रिभाषा सूत्र’ को लागू करने पर पुन: प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है, क्योंकि देश के कुछ राज्य अभी तक इसका अमल नहीं कर रहे हैं। साथ ही त्रिभाषा नीति की जो भावना थी कि उत्तर के राज्य अर्थात हिंदी भाषी राज्य के छात्र दक्षिण या अन्य राज्यों की एक भाषा सीखेंगे और अहिंदी भाषी राज्यों के छात्र हिंदी सीखेंगे ऐसा व्यावहारिक रूप से किया नहीं गया। इस हेतु इस नीति में भारतीय भाषाओं के शिक्षण को बढ़ावा देने हेतु राज्य परस्पर अनुबंध कर भाषा शिक्षकों का आदान-प्रदान कर सकते हैं, इस प्रकार का सुझाव भी दिया गया है। त्रिभाषा सूत्र के क्रियान्वयन को लेकर और एक प्रावधान है कि छात्रों को तीन में से दो भारतीय भाषाएं चुनना अनिवार्य होगा।
हमारे पूर्व राष्ट्रपति एवं विख्यात वैज्ञानिक डॉ. अब्दुल कलाम से नागपुर के धर्मपेठ महाविद्यालय के एक कार्यक्रम में व्याख्यान के बाद एक छात्र ने प्रश्न किया कि आप सफल वैज्ञानिक कैसे बने तब डॉ. कलाम का उत्तर था कि ‘मैंने 12वीं तक विज्ञान, गणित सहित सम्पूर्ण शिक्षा मातृभाषा तमिल में ली है। इस नीति में भी गणित, विज्ञान के पाठ्यक्रम द्विभाषा में उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया है। इस शिक्षा नीति में ई-लर्निंग यानी ऑनलाइन शिक्षण को बढ़ावा देने की बात है। केन्द्रीय स्तर पर भारतीय भाषाओं में सॉफ्टवेयर तैयार करने का कार्य किया जा रहा है। विद्यालयीन शिक्षा के लिए ई-सामग्री सभी राज्यों के साथ-साथ एनसीईआरटी, सीआईईटी, सीबीएसई, एनआईओएस और अन्य निकायों व संस्थानों द्वारा भी सभी क्षेत्रीय भाषाओं में विकसित करने की प्रतिबद्धता दर्शायी गई है।’
इस नीति में भाषा शिक्षण को बढ़ावा देने हेतु तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी के प्रयोग पर बल दिया गया है। इस हेतु विकिपीडिया जैसे माध्यम के द्वारा भारतीय भाषाओं और उससे संबंधित कला, संस्कृति का संवर्धन किया जाएगा। साथ ही बालक भाषा आनंद से सीख सके इस हेतु ऐप्स एवं गेम्स आदि विकसित करने की बात भी कही गई है। भारत में भाषाओं की विविधता को ध्यान में लेकर एक अत्यंत व्यावहारिक समस्या के समाधान पर भी नीति में ध्यान दिया गया है। कई बार अनुभव आता है, विशेषकर जनजातीय, पहाड़ी क्षेत्र के छात्र उस राज्य की राजभाषा भी ठीक प्रकार से नहीं जानते, ऐसे में उनको वहां की स्थानीय भाषा में पढ़ाया जाए तब वह सही ढंग से सीख पायेंगे। इस हेतु इस नीति में शिक्षकों की नियुक्ति हेतु लिए जाने वाले साक्षात्कार में स्थानीय भाषा की सुगमता का भी परीक्षण किया जाएगा। साथ ही ग्रामीण भारत के उत्कृष्ट छात्रों, विशेषकर कन्याओं हेतु बी.एड. पाठ्यक्रम के लिए विशेष छात्रवृति की व्यवस्था की जाएगी जिससे ग्रामीण क्षेत्र में क्षेत्रीय भाषा में निपुण शिक्षकों की नियुक्ति की जा सके।
समग्र भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत का स्थान भाषाओं की दृष्टि से मां के समान है। सभी भारतीय भाषाओं का आधार संस्कृत है। इस तथ्य को वैश्विक स्तर पर भी स्वीकार किया जा रहा है कि संस्कृत वैज्ञानिक दृष्टि से सम्पूर्ण भाषा है। इस नीति में कहा गया है कि संस्कृत को पाठशालाओं तक सीमित न रखते हुए विद्यालयों में त्रिभाषा सूत्र के तहत एक विकल्प के रूप में स्थान दिया जाएगा। इसे पृथक नहीं परंतु रुचिपूर्ण एवं नवाचारी तरीकों से पढ़ाया जाएगा तथा अन्य समकालीन एवं प्रासंगिक विषयों जैसे गणित, खगोल शास्त्र, दर्शनशास्त्र, नाटक विद्या, योग आदि से भी जोड़ा जाएगा। इसके साथ ही शिक्षा एवं संस्कृत विषयों में चार वर्षीय बहुविषयक बी.एड. डिग्री के द्वारा मिशन मोड में पूरे देश के संस्कृत शिक्षकों को बड़ी संख्या में व्यावसायिक शिक्षा प्रदान की जाएगी। इस नीति में एकल विश्वविद्यालयों की संकल्पना को खारिज किया गया है। इस दृष्टि से संस्कृत विश्वविद्यालय भी बहुविषयक विश्वविद्यालय बनेंगे जिससे सभी विषयों के साथ संस्कृत का जुड़ाव सहज हो सकेगा।
हमारे देश में अनुवाद कभी प्राथमिकता का विषय नहीं बना है परंतु हमारा देश बहुत विशाल है, भाषाओं की विविधता है। धारणा बन गई है कि ज्ञान की भाषा अंग्रेजी है। हालांकि यह अर्धसत्य है। विभिन्न उत्कृष्ट ज्ञान अलग-अलग भाषाओं में उपलब्ध हैं। इस नीति में राष्ट्रीय अनुवाद संस्थान की स्थापना तथा अनुवाद के उच्च गुणवत्ता वाले पाठ्यक्रम चलाने का प्रावधान किया गया है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में विश्वविद्यालयों के संस्कृत सहित भारतीय भाषा के विभागों को सुदृढ़ करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है। देशभर में बिखरी हुई लाखों पांडुलिपियों को एकत्रित और संरक्षित करके उनके अनुवाद तथा अध्ययन करने के प्रयास की प्रतिबद्धता दर्शायी गई है। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि रचनात्मकता, सृजनात्मकता, नवाचार एवं शोध-अनुसंधान मातृभाषा में ही संभव है। इस नीति ने इस तथ्य को स्वीकार करते हुए प्रस्तावित ‘‘राष्ट्रीय शोध संस्थान’’ में भारतीय भाषाओं में शोध हेतु आवश्यक निधि का प्रावधान किया जाएगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में पालि, प्राकृत, एवं फारसी भाषा हेतु राष्ट्रीय संस्थान स्थापित करने की बात कही गई है। साथ ही आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं की अकादमी स्थापित करने का आश्वासन दिया गया है और भाषा शिक्षण में सुधार करने हेतु अनुशंसा दी गई है।
इस प्रकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन एवं विकास, विस्तार के संदर्भ में आवश्यक अधिकतर बातों का समावेश किया गया है। शिक्षा मंत्रालय ने भारतीय भाषाओं के विकास एवं विस्तार हेतु राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय भाषा परिषद का गठन किया गया है। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद द्वारा इंजीनियरिंग का पाठ्यक्रम आठ भाषाओं में तैयार किया गया है। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान एवं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान ने भारतीय भाषाओं में कार्य प्रारम्भ कर दिया है।
इस प्रकार के सारे प्रयास स्तुत्य हैं। परंतु इस दिशा में केंद्र सरकार, राज्यों की सरकारें, विभिन्न शैक्षिक संस्थाओं एवं सामाजिक स्तर पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति का भाषा की दृष्टि से क्रियान्वयन हेतु बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित विद्यालयों के पाठ्यक्रम आदि स्तर पर कक्षा 8 तक की पढ़ाई अनिवार्य रूप से मातृभाषा में होनी चाहिए। राज्य सरकारों को भी इसी दिशा में कदम बढ़ाना होगा। उच्च शिक्षा के सभी संस्थानों, विश्वविद्यालयों आदि के पाठ्यक्रमों को द्विभाषी करने की तैयारी प्रारंभ करनी होगी। इसके अलावा सरकारी विद्यालयों में जहां भी प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी माध्यम है वहां परिवर्तन करके मातृभाषा का माध्यम लागू करना चाहिए। शिक्षा के सभी स्तर के पाठ्यक्रमों में भारतीय भाषा का विकल्प एक निश्चित समय में देने हेतु योजना पर शीघ्रता से कार्य होना चाहिए।
इस हेतु सामाजिक संस्थाओं, संगठनों एवं विशेष करके शिक्षा जगत के लोगों का प्रमुख दायित्व बनता है कि इस दिशा में देशव्यापी जन जागरण अभियान चलाकर अपनी भाषाओं का स्वाभिमान जगाने हेतु संकल्पबद्ध हों। अन्यथा सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भाषा सम्बन्धित आवश्यक अधिकतर प्रावधान कर दिए गये हैं परंतु जब तक सामाजिक एवं शैक्षिक जगत में इसका स्वीकार नहीं होगा तब तक अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो सकता।

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