वो तीन दिन..
वो तीन दिन..
पहला दिन बेचैनी और अकेलेपन से भरा था| सुबह होते ही मोबाइल पर नए मैसेज या नोटिफिकेशन की उम्मीद में आँख खुली, लेकिन फोन बिल्कुल शांत रहा। अचानक ऐसा लगा कि जैसे मेरी साँस रुक गई हो। तीन दिन इंटरनेट न चलने के अनुभव ने पहले दिन मुझे बेचैन और अकेला कर दिया। सोशल मीडिया की आदत के कारण चारों तरफ एक खालीपन छा गया था। इस अनजाने खालीपन में बेचैनी का अनुभव हो रहा था। मैं हाथ में फोन लिए बैठी थी, लेकिन स्क्रीन पर एक भी संदेश नहीं दिख रहा था। जैसे ही एहसास हुआ कि मैं वेब जगत से दूर हो गई हूँ, दिल की धड़कन तेज हो गई। हर पल कहीं से कोई सूचना मिल जाएगी, इसी उम्मीद में लगातार फोन चेक करने की आदत के बावजूद आज कुछ भी नहीं मिला। धीरे-धीरे घबराहट और ‘फ़ोमो’ (FOMO - Fear of Missing Out) की भावना मुझ पर हावी हो गई थी। खिड़की से बाहर घूरते हुए मैंने पेड़ों और आसमान में अपना अजनबीपन तलाशा। मन बार-बार यही सवाल करता रहा – तीन दिन बिना इंटरनेट कैसे कटेंगे? कैसे नया संगीत सुनूंगी, कैसे दुनिया की खबरें जानूंगी, या मित्रों से जुड़ूंगी?
पहली शाम अपने चरम पर थी। मैं हाथ में चाय का कप
लिए न जाने किस सोच में डूबी रही, कि चाय पर ध्यान ही नहीं दे पाई। हर शाम फेसबुक
या व्हाट्सएप की स्टोरीज़ चेक करने की आदत रही थी, पर आज सिर्फ खाली यादें ही साथ थीं। बेचैनी भरी उस रात ने पहली सीख
दी कि सूचना की लगातार बौछार कितनी अप्राकृतिक भी हो सकती है।
दूसरा दिन, नए अनुभवों की खोज का दिन रहा| दूसरी सुबह कुछ रंगीन होकर आई। जब सूरज
की किरणें खिड़की में घुसीं, तो
मैं पहली बार राहत महसूस कर रही थी। रात की बेचैनी थम गई थी, और दिल की धड़कन अब सामान्य चल रही थी। मैंने
देखा कि बिना सूचना की हलचल के भी दिन निखरता है। दिन की शुरुआत मैंने अखबार पढ़कर की, हिंदी अखबार से खबरें जानने पर दिल को अजीब
शांति मिली। पिछले कुछ दिनों से किताब पढ़ने को समय नहीं मिल रहा था, आज बिना इंटरनेट मैंने अपनी अधूरे किताब, ‘तबेला’
निकाली| लगभग पंद्रह दिनों से पढ़ ही नहीं पा रही थी| किताब के पन्नों में न जाने
कितनी बातें छुपी थीं, मुझे लगा कि मैंने उन विचारों को लंबे
समय बाद फिर से जीया है। चाय का प्याला लेकर मैंने अपने पति के साथ
बैठकर पुस्तक पर बातचीत
शुरू की। बिना मोबाइल के हम दोनों ने पुरानी यादों को ताज़ा किया और अपनी-अपनी पुस्तक
की कहानियों को साझा किया| यह संवाद बहुत ही सुखद रहा, शायद वर्षों बाद।
दोपहर को मैं कुछ लिखने बैठ गई| बचपन में लिखी
कविताएँ पढ़ी और नई कुछ पन्नों पर दर्ज कीं। इस प्रक्रिया ने सुकून दिया कि बिना
किसी डिस्टर्बेंस के मैं अपने विचारों के साथ अकेले समय बिता रही हूँ। मैंने महसूस
किया कि विचारों को शब्दों में पिरोते हुए खुद से बातचीत कितनी आरामदायक होती है।
शाम को एहसास हुआ कि इंटरनेट के बिना भी
मनोरंजन के कई साधन हैं। मैंने घर की एक अलमारी से पुराना उपन्यास निकाला और बगीचे
की कुर्सी पर बैठकर पढ़ा। बगीचे की मिट्टी को अपने हाथों से छूने में भी एक अलग ही
तृप्ति थी। खाली दिमाग में ये बुनियादी अनुभव रंग भर रहे थे।
पुराने रेडियो पर लोक संगीत बजाया, तो मन गदगद
हो गया। बिना सोशल प्लेटफ़ॉर्म के भी संगीत की धुनें सीधे दिल को छू गईं। दिन ढलते-ढलते सोचा कि चलो कहीं घूम
आते हैं, बाज़ार गए, ज़रूरी सामान खरीदा, ब्लिंकिट नहीं किया| इसमें अपना ही मज़ा था|
तीसरा दिन सीख और आत्मचिंतन का दिन रहा| तीसरे दिन सुबह मैंने मोबाइल की बजाय घड़ी
का अलार्म देखा और उठ गया। नज़रें दर्पण पर पड़ीं, खुद की मुस्कान देखी। महसूस हुआ कि डिजिटल दुनिया में जितना खोया था, शायद उतना ही मैंने खुद में पाया है। दिल में
एक अजीब संतुलन बन चुका था और नींद भी पहले से अच्छी आई थी। फिर भी, इंटरनेट की वापसी की लालसा कहीं गहरी थी। लेकिन यह लालसा ज्ञान की, सीखने की, रचनात्मक
बातें सृजन की थी, न कि सिर्फ खाली समय काटने की। मैंने
महसूस किया कि तीन दिनों की दूरी ने मुझे फिर से मुझ से जोड़ा है। इंटरनेट ज़रूरी ज़रूर
है, पर इसे ज़िंदगी का गुलाम नहीं बनने
देना चाहिए। आज मैंने तकनीक में संतुलन तलाश लिया।
इन तीन दिनों में मुझे धैर्य, मौन की कद्र और अपने पास मौजूद रिश्तों का
महत्व समझ आया। जब हम लगातार सूचना के पीछे भागते हैं, तो अक्सर अपनी जड़ों से कटे रह जाते हैं। इसलिए
कभी-कभी खुद को सूचनाओं से दूर रखकर वक्त देना सीखना चाहिए।
जैसे ही तीन दिन पूरे हुए, इंटरनेट की वापसी को लेकर मैं तैयार महसूस कर रही
थी। पर अब मैंने ठान लिया था कि इसे
परिमित रूप में ही चलाऊंगा। इससे मुझे एहसास हुआ कि सीमित होकर उपयोग करना ही
तकनीक के फायदे दिलाएगा, वरना समय बेकार चला जाता है। इस निर्णय
ने मुझे पहले की तुलना में अधिक शांति दी। हर पल फोन हाथ में लेने की बजाय मैंने एक
टाइम-टेबल बना लिया कि कब सोशल मीडिया देखूंगा। इस नई आदत ने सिखाया कि तकनीक
इस्तेमाल करने का तरीका बदल कर भी हम अपने संतुलन को बरकरार रख सकते हैं।
इन तीन दिनों की डिजिटल डिटॉक्स यात्रा ने
साबित किया कि तकनीक हम पर हावी हो तो समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। साधारण जीवन की
ख़ुशी भी अद्भुत होती है,
अगर हम इसके लिए समय निकालें। इसलिए अब
मैं जानती हूँ कि तकनीक जीवन का हिस्सा है, लेकिन
ज़िंदगी नहीं।
डॉ मीता गुप्ता
साहित्यकार, विचारक

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