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मौन भी अभिव्यक्ति है

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  मौन भी अभिव्यक्ति है अत्यधिक मुखर होना अनिवार्यत : अच्छे व्यक्तित्व की निशानी नहीं है और प्राय : शांत रहना दब्बू होने का प्रमाण नहीं है। अगर मुखरता वाचालता के स्तर को छूती हो और चिंतन की गहराई से वंचित हो , तो वह व्यक्तित्व का सकारात्मक पक्ष न होकर एक वैयक्तिक व सामाजिक समस्या बन जाती है। दूसरी ओर , अगर किसी व्यक्ति का मौन आत्मविश्वास के अभाव से नहीं , बल्कि चिंतन की गहराई से पैदा हुआ हो , तो वह चिंता की नहीं , समाज के लिए फ़ायदे की बात है। हमें इस भयानक सरलीकरण से बचना चाहिए कि मुखर या बहिर्मुखी व्यक्ति अनिवार्यत : शांत या अंतर्मुखी व्यक्ति से बेहतर होता है। कई ऐसी स्थितियां होती हैं , जहां मौन ही सबसे अच्छी अभिव्यक्ति बन सामने आता है। प्रसिद्ध कवि ‘ अज्ञेय ’ ने लिखा है - मौन भी अभिव्यंजना है / जितना तुम्हारा सच है / उतना ही कहो।   किन संदर्भों में मौन हमारी ताकत बन जाता है , अगर यह समझ जाएंगे , तो हमारे परिपक्व होने की प्रक्रिया ज्...