हर किसी का अपना सावन

हर किसी का अपना सावन, अपना-अपना गान,
मन-वीणा पर छेड़ रहा है स्मृतियों का मधु-तान। 

 किस नभ से उतर आया यह हरित स्वप्न-अभिसार,
मन-वन में मधु-मेघ रचें, नव जीवन का विस्तार।

पल्लव-पल्लव फूट उठी है स्मृतियों की मृदु तान,
झर-झर झरती सुधि-सरिता में भीग रहा अवसान।

किसी नयन में नील गगन का नीरव मधु-आलोक,
किसी उर में विरह-वेदना का गहरा मौन अशोक।

कहीं कदंब की श्याम छवि पर मलय-पवन मुस्काए,
कहीं प्रतीक्षा की संध्या में दीपक स्वयं जल जाए।

किसी कृषक की थकी हथेली हरियाली का गीत,
किसी तपस्वी के अंतर में जागे शाश्वत प्रीत।

किसी शिशु की कागज़-नैया हँसती बहे अपार,
किसी वृद्ध की स्मृति-पगडंडी लौटे फिर उस पार।

सावन केवल मेघ नहीं है, अंतस का उच्छ्वास,
सूखे प्राणों पर बरसाता आशा का मधुमास।

जिसने प्रकृति के स्पंदन में अपना स्वर पहचान,
उसके द्वारे उतर पड़ा है नव जीवन का गान।

कोई भीगे प्रेम-नीर में, कोई ध्यान-अग्नि में,
एक ही ऋतु खिलती देखो, कितने-कितने मन में।

हर मन अपना वन-विहंगम, हर उर अपनी धुन,
हर किसी का अपना सावन, अपना मधुर gaaन।


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