निर्भयाएं कब तक हैवानियत का शिकार होती रहेंगी?
निर्भयाएं कब तक हैवानियत का शिकार होती रहेंगी ? महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा में संस्थागत कारकों में अपर्याप्त संसाधन वाले पुलिस बल और अप्रभावी कानून प्रवर्तन सहित संस्थागत विफलताएं , महिलाओं के खिलाफ हिंसा के जारी रहने में योगदान करती हैं। अक्सर , मामले या तो दर्ज नहीं किए जाते हैं या पूरी तरह से जांच नहीं की जाती है , जिससे सज़ा की दर कम होती है। 2012 में निर्भया मामले में हुई कथित देरी ने पुलिस प्रक्रियाओं और कानून प्रवर्तन में महत्वपूर्ण खामियों को उजागर किया , जिससे व्यापक सार्वजनिक आक्रोश हुआ। धीमी न्यायिक प्रक्रिया और लंबित मामले महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों की प्रभावशीलता को कमज़ोर करते हैं। विलंबित न्याय अक्सर पीड़ितों को कानूनी मदद लेने से हतोत्साहित करता है और अपराधियों को सज़ा से बचने का मौक़ा देता है। 2012 के निर्भया मामले में अभियुक्तों के मुक़दमे में लगभग आठ साल लग गए , जो महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मामलों में न्याय की सुस्त गति को दर्शाता है। कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम ( 2013) जैसे प्रगतिशील कानूनों के अस्तित्व...