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जीवन संघर्षो से न घबराना मनुष्यता ही है

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जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है  तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है  जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है  जो रवि के रथ का घोड़ा है  वह जन मारे नहीं मरेगा नहीं मरेगा  जो जीवन की आग जला कर आग बना है  फ़ौलादी पंजे फैलाए नाग बना है  जिसने शोषण को तोड़ा शासन मोड़ा है  जो युग के रथ का घोड़ा है  वह जन मारे नहीं मरेगा नहीं मरेगा  कई विचारकों का मत है कि अगर हम कोई जोखिम नहीं लेते हैं, तो वह अपने-आप में सबसे बड़ा जोखिम है। यह सही भी है कि ज़्यादातर लोग जोखिम लेने से डरते हैं। इसकी कई वजहें होती हैं, लेकिन जो सबसे बड़ी वजह है, वह है संकल्प और विचार शक्ति की कमी।        कहने को तो विचार शक्ति और संकल्प का अभाव जानवरों में होता है, पर जब कोई इंसान बिना विचारे कोई ऐसा काम कर बैठता है, तो कहा जाता है कि वह तो निरा पशु हो गया है। यानी इंसान होकर भी अगर पशुओं जैसी जिंदगी जीएं, तो जीना क्या और मरना क्या ?  इसीलिए वेद में कहा गया है- "मनुर्भव, यानी मनुष्य बनो।" इसका मतलब हे कि महज इंसान के वेश में हम इंसान सही मायने में तब तक नहीं ...

रील्स के चक्कर में रियल की मौत

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  रील्स के चक्कर में रियल की मौत   रील ( Reels) एक प्रकार की छोटी , संक्षिप्त वीडियो होती है , जिसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर साझा किया जाता है। रील बनाने का प्रारंभिक इतिहास टिक्टॉक   के साथ जुड़ा हुआ है , जिसने दुनिया भर में छोटी-छोटी वीडियो बनाने का ट्रेंड शुरू किया। इस प्लेटफार्म पर उपयोगकर्ता 15-30 सेकंड की वीडियो बनाकर विभिन्न संगीत , डायलॉग्स , और प्रभावों के साथ उसे साझा कर सकते थे। टिक्टॉक    की लोकप्रियता के बाद , इंस्टाग्राम   और यू ट्यूब   ने भी अपने प्लेटफार्म पर रील्स और शॉर्ट्स   जैसे फीचर्स शुरू किए , जिससे उपयोगकर्ता छोटे वीडियो बनाकर पोस्ट कर सकें। रील्स ने निश्चित रूप से युवाओं को अपनी रचनात्मकता दिखाने का मंच दिया है , लेकिन इसके साथ ही इसके दुष्परिणामों को समझना और उनसे बचाव करना भी आवश्यक है। जिम्मेदारीपूर्वक रील्स का उपयोग करना चाहिए ताकि यह मनोरंजन के साथ-साथ सकारात्मक योगदान दे सके। सोशल मीडिया के चलते बच्चों और युवाओं में सामाजिक दिखावे की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। युवा फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए एक-दूसरे की देखा...

बुजुर्ग ना हो तो घर घर नहीं रहता

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  बुजुर्ग ना हो तो घर घर नहीं रहता छत नहीं रहती दहलीज़ नहीं रहती दीवारों दर नहीं रहता           घर में बुजुर्ग ना हो तो घर घर नहीं रहता । एक अक्टूबर को संपूर्ण विश्व में अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस मनाया जाता है। समाज और नई पीढ़ी को सही दिशा दिखाने और मार्गदर्शन के लिए वरिष्ठ नागरिकों के योगदान को सम्मान देने के लिए इस आयोजन का फैसला संयुक्त राष्ट्र ने 1990 में लिया था। इस दिन पर वरिष्ठ नागरिकों और बुज़ुर्गों का सम्मान किया जाता है। वरिष्ठों के हित के लिए चिंतन भी होता है। प्रश्न है कि दुनिया में वृद्ध दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों हुई ? क्यों वृद्धों की उपेक्षा एवं प्रताड़ना की स्थितियां बनी हुई हैं ? चिंतन का महत्वपूर्ण पक्ष है कि हम पतन के इस गलत प्रवाह को रोकें क्योंकि सोच के गलत प्रवाह ने न केवल वृद्धों का जीवन दुश्वार कर दिया है बल्कि आदमी - आदमी के बीच के भावात्मक फ़ा...