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Showing posts from December, 2025

कृतज्ञ हूँ मैं

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  कृतज्ञ हूँ मैं उस प्रभात की , जो मौन द्वार खटखटाए , अधूरी नींद , थकी आँखों में , फिर सपने बो जाए।   कृतज्ञ हूँ मैं उस श्वास की , जो हर पल साथ निभाती , अनकहे बोझों के नीचे भी , जीवन-लय सिखाती।   कृतज्ञ हूँ मैं उस धूप की , जो छाँव बनकर ठहरी , कठोर समय की तपती छाती पर , करुणा बनकर उतरी।   कृतज्ञ हूँ मैं उन आँसुओं की , जो चुपके बह जाते हैं , भीतर जमी घनीभूत पीड़ा को , हल्का कर जाते हैं।   कृतज्ञ हूँ मैं उन रिश्तों की , जो टूटकर भी जुड़ गए , खामोशी की दरारों में , विश्वास की ओर मुड़ गए।   कृतज्ञ हूँ मैं उन शब्दों की , जो कहे नहीं जा पाए , पर आँखों की भाषा में , अर्थ बनकर मन पर छाए।   कृतज्ञ हूँ मैं उन रातों की , जिनमें खुद से मुलाकात हुई , अकेलेपन के पलों में , आत्मा से की गहरी बात हुई।   कृतज्ञ हूँ मैं उन राहों की , जिन पर हौसला साथ-साथ चला , कदम-कदम पर गिरते हुए भी , साहस दीपक जलता चला।   कृतज्ञ हूँ मैं उस समय की , जो छीनकर भी दे जाता है , अहंकार का भार उतारकर , कृतज्ञता सिखलाता है।   कृतज्ञ हूँ मैं उन प्रश्नों की , जिनके उत्तर देर से आए ,...

नमस्ते, मैं साड़ी हूँ

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  नमस्ते, मैं साड़ी हूँ   भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में साड़ी केवल एक वस्त्र नहीं , बल्कि सभ्यता , सौंदर्य और स्त्री अस्मिता की जीवंत प्रतीक है। हजारों वर्षों से भारतीय नारी साड़ी को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाए हुए है। समय बदला , पहनावे के ढंग बदले , फैशन की परिभाषाएँ बदलीं , किंतु साड़ी आज भी अपनी गरिमा और लोकप्रियता बनाए हुए है। यह वस्त्र इतिहास , कला , संस्कृति और परंपरा का ऐसा संगम है , जिसने पीढ़ियों को जोड़े रखा है। विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में गिनी जाने वाली सिंधु घाटी सभ्यता में भी साड़ी जैसे वस्त्र के प्रमाण मिलते हैं। खुदाई में मिली एक महिला की मूर्ति में धोती-सदृश कपड़ा लपेटे हुए देखा जा सकता है , जिसे साड़ी का पूर्वज माना जाता है। साड़ी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ' सट्टिका ' शब्द से हुई है , जिसका अर्थ कपड़े की पट्टी होता है। ऋग्वेद , अथर्ववेद और उपनिषदों में भी स्त्रियों के वस्त्रों का उल्लेख मिलता है। उस समय बिना सिले वस्त्र पहनने की परंपरा थी और साड़ी उसी परंपरा का विकसित रूप मानी जाती है। महाभारत के ' चीर हरण ' प्रसंग में द्रौपदी के अंतही...

EPISODE 24.भेद ये गहरा, बात ज़रा-सी! 04/12/26

  EPISODE 24. भेद ये गहरा , बात ज़रा-सी! 04/12/26 INTRO MUSIC नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता ,  एक आवाज़ ,  एक दोस्त ,  किस्से- कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत।   जी हाँ , आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट , ‘ यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला और अंतिम एपिसोड ...जिसमें हैं ,  नए जज़्बात ,  नए किस्से ,  और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...।   जी हाँ दोस्तों ,  आज हम बात करने जा रहे हैं, प्रेम की..आपको याद है न दोस्तों, कि मैंने पॉडकास्ट की शुरुआत ही प्रेम-रसायन की बात से की थी, क्योंकि प्रेम है, तो हम हैं। प्रेम-रसायन पर बात करते-करते मैंने यह जाना कि प्रेम का सीधा-सच्चा संबंध सुंदरता से होता है, और यह आँखों में समाया होता है और आपके आयी, आज के एपिसोड में इस भेद को जानने की कोशिश करते हैं.. Music   पिछली रात बहुत कोहरा था , ओस भी थी। ऐसा तो होना लाज़मी है, क्योंकि सर्दियों का मौसम है। पर इस ठिठुरती ठंड में कितने लोग देख पाते हैं कि पिछली रात चुपके से आसमान ने धरती को एक प्रेम-पत्र लिख भेजा है। ओस की बूँदों से...