कृतज्ञ हूँ मैं

 

कृतज्ञ हूँ मैं उस प्रभात की
, जो मौन द्वार खटखटाए,
अधूरी नींद, थकी आँखों में, फिर सपने बो जाए।
 
कृतज्ञ हूँ मैं उस श्वास की , जो हर पल साथ निभाती,
अनकहे बोझों के नीचे भी, जीवन-लय सिखाती।
 
कृतज्ञ हूँ मैं उस धूप की , जो छाँव बनकर ठहरी,
कठोर समय की तपती छाती पर, करुणा बनकर उतरी।
 
कृतज्ञ हूँ मैं उन आँसुओं की , जो चुपके बह जाते हैं,
भीतर जमी घनीभूत पीड़ा को, हल्का कर जाते हैं।
 
कृतज्ञ हूँ मैं उन रिश्तों की , जो टूटकर भी जुड़ गए,
खामोशी की दरारों में, विश्वास की ओर मुड़ गए।
 
कृतज्ञ हूँ मैं उन शब्दों की , जो कहे नहीं जा पाए,
पर आँखों की भाषा में, अर्थ बनकर मन पर छाए।
 
कृतज्ञ हूँ मैं उन रातों की , जिनमें खुद से मुलाकात हुई,
अकेलेपन के पलों में, आत्मा से की गहरी बात हुई।
 
कृतज्ञ हूँ मैं उन राहों की , जिन पर हौसला साथ-साथ चला,
कदम-कदम पर गिरते हुए भी, साहस दीपक जलता चला।
 
कृतज्ञ हूँ मैं उस समय की , जो छीनकर भी दे जाता है,
अहंकार का भार उतारकर, कृतज्ञता सिखलाता है।
 
कृतज्ञ हूँ मैं उन प्रश्नों की , जिनके उत्तर देर से आए,
प्रतीक्षा की तपिश में ही सही, वे अर्थों के अर्थ समझाए।
 
कृतज्ञ हूँ मैं इस नव वर्ष की , जो ठहरी साँसों में गान भरे,
टूटे विश्वास, थके इरादों में भी , नव स्फूर्ति,नव प्राण भरे।
 
कृतज्ञ हूँ मैं उस भविष्य की , जो आशा बनकर मुस्काए,
हर बीता क्षण आशीष बने, हर आने वाला पल सजाए।

Comments

Popular posts from this blog

यूँ ही कोई मिल गया सीज़न-2

पल पल दिल के पास, वो रहता है...

जनरेशन अल्फ़ा और सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम