EPISODE 24.भेद ये गहरा, बात ज़रा-सी! 04/12/26
EPISODE
24.
भेद ये गहरा, बात ज़रा-सी! 04/12/26
INTRO
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नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से- कहानियाँ सुनाने वाली आपकी
मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे
पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला और अंतिम एपिसोड ...जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली
आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करने जा रहे हैं, प्रेम की..आपको याद है न दोस्तों, कि मैंने पॉडकास्ट
की शुरुआत ही प्रेम-रसायन की बात से की थी, क्योंकि प्रेम है, तो हम हैं। प्रेम-रसायन
पर बात करते-करते मैंने यह जाना कि प्रेम का सीधा-सच्चा संबंध सुंदरता से होता है,
और यह आँखों में समाया होता है और आपके आयी, आज के एपिसोड में इस भेद को जानने की
कोशिश करते हैं..
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पिछली रात बहुत कोहरा था, ओस भी थी। ऐसा तो
होना लाज़मी है, क्योंकि सर्दियों का मौसम है। पर इस ठिठुरती ठंड में कितने लोग देख
पाते हैं कि पिछली रात चुपके से आसमान ने धरती को एक प्रेम-पत्र लिख भेजा है। ओस
की बूँदों से लिखा हुआ, भीगा हुआ प्रेमपत्र! दोस्तों! ये जो सुबह हम पत्तियों पे
ओस देखते हैं न, ध्यान से देखिए उसे, आपको
एक प्रेम-कविता नज़र आएगी उसमें। क्या आसमान सिर्फ़ पानी बरसाता है? या वह धरती को कोई संदेश देता है? क्या सागर सिर्फ़
नदियों के जुड़ने से बना है? या आसमान के आँसुओं को समेट कर
चुपचाप पड़ा है? हमें ऐसा क्यों नहीं लगता? क्यों नहीं दिखता हमें? अब इसका भेद
क्या है? वजह क्या है? क्या हम भीतर से सूख गए हैं? अब हमारे
भीतर कोई हरापन नहीं बचा, कोई गीलापन नहीं, कोई तरलता नहीं, सब बंजर कर दिया हमने, क्या ऐसे ही
हो गए हैं हम? क्या भीतर से खोखले हो गए हैं हम? क्या है खुशी, असली खुशी? ऐसी खुशी, जो हमारे अंतस को सुख देती है? शांति
देती है? संतुष्टि देती है? क्या यह
ख़ुशी क्षणिक होती है, पानी का बुलबुला होती है, गर्म तवे पर छुन्न से गिरती और गायब होती पानी की बूँद होती है, जो टिकती नहीं। फूलों से खुशबू की तरह उड़ क्यों जाती है? इतना सब पा लेने के बाद भी वह संतुष्टि नहीं दिखती....सच्ची मुस्कराहट
नहीं खिलती हमारे चेहरे पर!
यूँ ही चलते-चलते एक वाकया सुनाना चाहूँगी, मेरी कॉलोनी में सड़कें
हमेशा साफ़-सुथरी रहती हैं। इन हवेलीनुमा घरों के नौकर रोज़ ही घरों से कचरे की
बड़ी-बड़ी पन्नियाँ उठा कर पास ही बनी झोंपड़-पट्टी के सामने फेंक आते है। फिर
शुरू होता है, उस बस्ती के बच्चों का खेल..वे सब उस कचरे में से अपनी-अपनी पसंद के
खिलौने खोजते हैं। एक दिन ऐसा ही हुआ। बहुत-से बच्चे उस कचरे में से अपने मतलब की
चीज़ें छाँट रहे थे। एक छोटे बच्चे के हिस्से कुछ भी नहीं आया। वह बड़ी देर तक रोता
रहा, फिर थक-हार कर उसने उस कचरे से एक टूटी हुई गुड़िया खोज ली और बहुत ही प्यार
से उससे खेलने लगा। उस बच्चे के चेहरे पर मैंने बहुत सारा प्यार देखा, उस टूटे खिलौने के लिए। वह घंटों खुद को भुला कर उस टूटे खिलौने के साथ
था। कैसी शांति और कैसा प्रेम था उसके चेहरे पर? उसके गालों
पर बहते आँसू की लकीरें अब इतिहास बन चुकी थीं, गालों पर खिंची आँसुओं की धार अब
सूख चुकी थी और उसके होठों पर एक पवित्र-सी मुस्कान थी। उस टूटे हुए खिलौने को
पाकर उसने दोनों जहान की खुशियाँ समेत ली थीं, अपनी झोली में उसने। मैं सब देख रही
थी, यह मेरे लिए घटना अभूतपूर्व थी।
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दोस्तों! यह सच है कि खिलौने का एहसास बच्चों को सुरक्षित महसूस करने
में मदद देता है, बच्चे अपनी पसंद के खिलौने को अपने साथ रखकर आश्वस्त
महसूस करते हैं, खिलौने के खेल उन्हें समृद्ध करते हैं,
उनके विकास में मदद करते हैं, उनकी
कल्पनाशक्ति को प्रज्वलित करते हैं, संज्ञानात्मक और मोटर
कौशल में सुधार की नींव रखते हैं, वे साझा करने, सहयोग करने और संचार के महत्व को सिखाने में भी मदद करते हैं, पर.....पर दोस्तों, यह प्यारा-सा, छोटा-सा बच्चा इन सबको नहीं जानता। उसने न कभी शिक्षाशास्त्र पढ़ा, न वह मनोविज्ञान की समझ रखता है। बस
वह....वह तो खुश होना जानता है, संतुष्ट होना जानता है,
और अपनी पवित्र मुस्कान से सारे क्षितिज को रंगीन कर देना जानता है।
उसकी भोली-सी, प्यारी-सी मुस्कान से क्षितिज रंगीन हो चला है.. वह यह भी नहीं जानता... कितना मासूम..कितना अबोध...कितना निश्छल..।
और इधर हम तथाकथित समझदार लोग, खुश होने के लिए न जाने कितने जतन करते
है, रात-दिन एक करते रहते हैं, एक-दूजे को नीचा दिखाते
हैं, गिराते हैं, झूठ बोलते हैं,
छलते हैं, भेष बदलते हैं, मुखौटे लगाते हैं, कवच पहनते हैं, छवि गढ़ते हैं, दूसरों की ख़ुशी छीनने से नहीं
हिचकिचाते..और जब इन सबसे भी बात नहीं बनती, तो भौतिक
वस्तुओं में...ऐशो-आराम की चीज़ों में....और तो और शॉपिंग में ख़ुशी तलाशते हैं।
कोई अपने हवेलीनुमा मकान को देख खुश होता है, कोई अपनी
लंबी-सी कार देख कर। कोई बैंक बेलेंस देख कर, तो कोई फेसबुक
पर अपने पांच हजार ‘फ्रेंड्स’ देख कर। कोई अपनी रील के व्यूअर्स देखकर, तो कोई यूट्यूब के सब्सक्राइब्र्स देखकर। परंतु दोस्तों! क्या यह खुशी
असली खुशी है? क्या यह खुशी हमारे अंतस को सुख देती है?
शांति देती है? संतुष्टि देती है? और फिर एक बात और भी है दोस्तों! यह ख़ुशी क्षणिक होती है, पानी का बुलबुला होती है, गर्म तवे पर छुन्न से
गिरती और गायब होती पानी की बूँद होती है, जो टिकती नहीं।
फूलों से खुशबू की तरह उड़ क्यों जाती है? इतना सब पा लेने
के बाद भी वह संतुष्टि नहीं दिखती....वह मुस्कराहट नहीं खिलती, जो उस गरीब बच्चे के चेहरे पर टूटे, बेकार से खिलौने
ने खिला दी थी।
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आखिर भेद क्या है इसका? क्या मंत्र है इसका?
दरअसल उस बच्चे ने उस खिलौने में खुद को डुबा दिया....समा
लिया.....भुला दिया। जब-जब भी हम खुद को भुला कर खुश होते हैं, वह ख़ुशी स्थायी होती है। उस ख़ुशी का अहसास जीवन भर हमारे साथ चलता है।
जैसे किसी बहुत सुंदर दृश्य को देख हम खुद को भूल जाते हैं या कोई लम्हा जब हमें
अपने आपसे ही जुदा कर जाता है, वह लम्हा, वह पल हम कभी नहीं भूलते, और उस पल में गुम हो जाते
हैं...वे पल हमेशा हमारे साथ चलते हैं....हमारे जीवन का हिस्सा बनकर। यूँ ही तो
नहीं कहा गया है कि सुंदरता देखने वालों की आँखों में होती है। लेकिन कैसे?
एक दिन किसी नदी के किनारे जाना हुआ। वहाँ कुछ लोग अपनी मन्नतों के
दीपक सिरा रहे थे, तो कुछ अपने पाप धो-धो कर नदी को मैला किए जा रहे थे।
कई उस पानी का इस्तेमाल अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कर रहे थे। बड़ा शोर मचा
हुआ था चारों ओर, लेकिन...लेकिन मैंने चुपके से सुना कि
लहरें किनारों से बतिया रही थीं। ज़रा ध्यान दिया तो उनकी आवाज़ें और स्पष्ट सुनाई
देने लगीं। कितनी सुंदर। कितनी आज़ाद थीं ये लहरें। अपनी मर्ज़ी से आतीं और अपनी मर्ज़ी
से जातीं। अहंकार से अकड़े किनारे भीग-भीग जाते, लेकिन अपनी
जगह से नहीं हिलते, लहरें वापस चली जातीं। उस दिन मैंने ये
जाना कि नदी का इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए करते-करते हम कितने स्वार्थी हो गए
हैं कि कभी भी दो घड़ी बैठ कर उसकी सुंदरता को निहारा नहीं,...उसकी बात नहीं।
कितनी ही नदियों ने कहा होगा हमसे कि मैं नदिया फिर मैं भी प्यासी... भेद ये गहरा
बात ज़रा-सी।
क्या सुन पाए हम?
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जब-जब हम भीतर से कंगाल होते हैं न दोस्तों,
हम गरीब होते हैं, खोखले होते हैं, तभी
हम उस कमी को पूरा करने के लिए बाहर भटकते हैं। अपने खालीपन को लिए लिए सौ जगह
भटकते हैं, लेकिन फिर भी खाली ही रहते हैं, रीते ही रहते है। जिस दिन हम खुद प्रेम से भरे होते है, उस दिन पाने के लिए नहीं देने के लिए आतुर होते हैं। जिस तरह फूल की सुगंध
उसकी पहचान है, उसी तरह प्रेम की भी एक खुशबू है। जो आप के
भीतर से निकल कर चारों ओर बिखरती है, बशर्ते हमारा दिमाग
चालाकियों से खाली हो और मन के भीतर सौंदर्य और प्रेम भरा हो।
ख़ुशी और प्रेम पाने का भेद गहरा है। लेकिन बात ज़रा-सी ही है, जो समझ गए उन्होंने प्रेम कलश को भर लिया… नहीं तो रह गए वे रीते के रीते।
एक और बहुत सुंदर बात- आप खुद को हमेशा प्रेम से भरे रखिए। एक दिन
आपका प्रेमी खोजता हुआ आपके पास चला आएगा। तो चलिए ना... आज से खुद को भीतर से
महसूस करें...खुद के भीतर महसूस करें.....सौंदर्य, प्रेम और बहुत-सा
प्यार...मुहब्बत...इंसानियत...मुरव्वत..और जाने क्या-क्या? और
सबको बता दें, नदिया अब यह न कह सकेगी कि मैं नदिया फिर भी
मैं प्यासी .....क्योंकि अब तो हम समझ गए हैं कि भेद ये गहरा ज़रूर है, पर बात है ज़रा-सी! है न दोस्तों
Music
अंत में यही कहना चाहूँगी दोस्तों, आइए, प्रेम का यह भेद जानें, मिलकर
प्रेम के अमृत-कलश को भरें, आप अपने किस्से शेयर कीजिए..कीजिएगा ज़रूर.. भूलना
नहीं, मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार
रहेगा.....
और..आप भी तो इंतजार करेंगे न.. अबकी बार आपको अगले सीज़न का इंतजार
करना पड़ेगा...करेंगे न दोस्तों!
सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, क्या
पता यूँ ही बातें करते-करते असली खुशी की हमारी मृगतृष्णा, हमारी प्यास एक दिन
पूरी हो जाए!
है न दोस्तों? मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को
सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले सीज़न के साथ..‘यूँ ही कोई मिल गया’
के दूसरे सीज़न में मेरे हमराही, मेरे हमसफ़र बनने के लिए आपका बहुत-बहुत
शुक्रिया..बहुत-बहुत आभार, बहुत-बहुत धन्यवाद..!
फिर मिलती हूँ दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से-कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...
END MUSIC
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