नमस्ते, मैं साड़ी हूँ

 

नमस्ते, मैं साड़ी हूँ





 

भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में साड़ी केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि सभ्यता, सौंदर्य और स्त्री अस्मिता की जीवंत प्रतीक है। हजारों वर्षों से भारतीय नारी साड़ी को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाए हुए है। समय बदला, पहनावे के ढंग बदले, फैशन की परिभाषाएँ बदलीं, किंतु साड़ी आज भी अपनी गरिमा और लोकप्रियता बनाए हुए है। यह वस्त्र इतिहास, कला, संस्कृति और परंपरा का ऐसा संगम है, जिसने पीढ़ियों को जोड़े रखा है।

विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में गिनी जाने वाली सिंधु घाटी सभ्यता में भी साड़ी जैसे वस्त्र के प्रमाण मिलते हैं। खुदाई में मिली एक महिला की मूर्ति में धोती-सदृश कपड़ा लपेटे हुए देखा जा सकता है, जिसे साड़ी का पूर्वज माना जाता है। साड़ी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'सट्टिका' शब्द से हुई है, जिसका अर्थ कपड़े की पट्टी होता है। ऋग्वेद, अथर्ववेद और उपनिषदों में भी स्त्रियों के वस्त्रों का उल्लेख मिलता है। उस समय बिना सिले वस्त्र पहनने की परंपरा थी और साड़ी उसी परंपरा का विकसित रूप मानी जाती है। महाभारत के 'चीर हरण' प्रसंग में द्रौपदी के अंतहीन वस्त्र को साड़ी की रक्षात्मक शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

मौर्य और गुप्त काल में साड़ी पहनने की शैली अधिक परिष्कृत हुई। मध्यकाल में मुगल प्रभाव से साड़ी में बारीक कढ़ाई, ज़री और रेशमी कपड़ों का प्रचलन बढ़ा। ब्रिटिश काल में भी साड़ी ने अपनी पहचान बनाए रखी और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गई। महात्मा गांधी द्वारा खादी को बढ़ावा देने से साड़ी जनआंदोलन का हिस्सा बनी।

भारत विविधताओं का देश है और यह विविधता साड़ियों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। लगभग हर राज्य की अपनी विशिष्ट साड़ी है, जो वहां की जलवायु, संस्कृति और परंपरा को दर्शाती है।

उत्तर भारत में बनारसी साड़ी विशेष स्थान रखती है। बनारस की रेशमी साड़ियों पर सोने-चाँदी की ज़री का काम भारतीय बुनकरी कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। उत्तर प्रदेश की चिकनकारी साड़ियाँ अपनी सादगी और नफ़ासत के लिए जानी जाती हैं। पूर्वी भारत में पश्चिम बंगाल की तांत और बालूचरी साड़ियाँ प्रसिद्ध हैं। ओडिशा की संबलपुरी और बोमकाई साड़ियाँ अपनी ज्यामितीय आकृतियों और प्राकृतिक रंगों के लिए जानी जाती हैं। असम की मेखला-चादर, यद्यपि साड़ी नहीं है, फिर भी पारंपरिक स्त्री परिधान के रूप में उल्लेखनीय है।

दक्षिण भारत की कांजीवरम साड़ी विश्वविख्यात है। तमिलनाडु की ये साड़ियाँ मोटे रेशम और चौड़ी ज़रीदार किनारों के लिए जानी जाती हैं। केरल की कसावु साड़ी अपनी सादगी और सुनहरे बॉर्डर के कारण विशिष्ट पहचान रखती है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की पोचमपल्ली व उप्पाड़ा साड़ियाँ भी अत्यंत लोकप्रिय हैं।पश्चिम भारत में महाराष्ट्र की पैठणी, गुजरात की पटोला और राजस्थान की बांधनी साड़ियाँ अपनी रंगीनता और कलात्मकता के लिए जानी जाती हैं। पैठणी साड़ी को “रेशम की रानी” कहा जाता है, जबकि पटोला की बुनाई अत्यंत जटिल और बहुमूल्य मानी जाती है।

साड़ी भारतीय संस्कृति में स्त्री के जीवन के हर महत्वपूर्ण पड़ाव से जुड़ी होती है। विवाह में लाल या गहरे रंग की साड़ी शुभ मानी जाती है। त्योहारों पर विशेष पारंपरिक साड़ियाँ पहनी जाती हैं। दक्षिण भारत में कन्यादान के समय कांजीवरम साड़ी, साड़ी हर महत्वपूर्ण संस्कार – जन्म, विवाह, त्योहार से जुड़ी है। बंगाल में दुर्गा पूजा पर लाल-सफेद गरद साड़ी और दक्षिण में पोंगल व ओणम पर पारंपरिक साड़ियाँ पहनने की परंपरा है।

साड़ी स्त्री के सम्मान, मर्यादा और सौंदर्य का प्रतीक रही है। यह पहनने वाली की उम्र, सामाजिक स्थिति और अवसर के अनुसार अपना स्वरूप बदल लेती है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। साड़ी भारतीय संस्कृति में केवल एक फैशन स्टेटमेंट नहीं, बल्कि एक गहन सांस्कृतिक प्रतीक है। यह बुजुर्गों और पारिवारिक मूल्यों के प्रति सम्मान का प्रतीक मानी जाती है। इसे पहनने से व्यक्तित्व में गरिमा और शालीनता आती है। इतिहास में साड़ी ने राजनीतिक अभिव्यक्ति का माध्यम भी बनी है। स्वतंत्रता सेनानी कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने 1929 में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत का झंडा न होने पर अपनी साड़ियों से ही झंडा बनाया था। यह घटना साड़ी को स्वतंत्रता और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती है।

साड़ी भारतीय हस्तकला और कारीगरी का जीवंत दस्तावेज है। बुनकरों की पीढ़ियाँ इस कला को आगे बढ़ाती आई हैं। हर साड़ी के पीछे श्रम, धैर्य और सृजनशीलता की कहानी छिपी होती है। साड़ी पर बने बूटे, आकृतियाँ और रंग प्रकृति, धर्म और लोककथाओं से प्रेरित होते हैं।

आज साड़ी केवल पारंपरिक परिधान नहीं रही, बल्कि फैशन की दुनिया में भी उसने अपना स्थान बनाए रखा है। डिज़ाइनर साड़ियाँ, प्रिंटेड साड़ियाँ और हल्के फैब्रिक की साड़ियाँ युवा पीढ़ी में भी लोकप्रिय हो रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारतीय साड़ी अपनी अलग पहचान बना चुकी है। समय के साथ साड़ी ने नए रूप और अर्थ ग्रहण किए हैं। वर्ष 2025 के कुछ प्रमुख ट्रेंड्स में हल्की ऑर्गेंजा साड़ियाँ, पहनने में आसान प्री-ड्रेप्ड साड़ियाँ, और टिकाऊ हैंडलूम व कॉटन साड़ियाँ शामिल रहीं। आज की पीढ़ी सॉलिड साड़ी के साथ स्टेटमेंट ब्लाउज पहनकर पारंपरिक और आधुनिक का अनूठा मेल प्रस्तुत कर रही है। बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक, अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मी पर्दों और रेड कार्पेट पर भी साड़ी ने भारतीय सौंदर्यबोध की धाक जमाई है।

साड़ी भारतीय संस्कृति की वह धरोहर है, जो समय के साथ बदलती जरूर रही, पर अपनी आत्मा नहीं खोई। साड़ी केवल नौ गज का कपड़ा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का जीवंत दस्तावेज है। यह वस्त्र नहीं, बल्कि भावनाओं, परंपराओं और पहचान का प्रतीक है। जब तक भारतीय संस्कृति जीवित है, तब तक साड़ी भी अपनी गरिमा और गौरव के साथ भारतीय नारी के जीवन में बनी रहेगी। साड़ी वास्तव में भारत की आत्मा को ओढ़े हुए एक अमर परंपरा है। यह प्राचीन सभ्यता से निकलकर आज के ग्लोबल फैशन का हिस्सा बन चुकी है। यह हमारी विरासत, हमारी कलात्मकता और हमारी पहचान का प्रतिनिधित्व करती है। साड़ी का यह सफ़र हमें यही संदेश देता है कि जो परंपरा को संजोए रखते हुए नवाचार करता है, वही सदा प्रासंगिक रहता है।

 डॉ मीता गुप्ता 

साहित्यकार 

 

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