विश्व शांति लाने के लिए सहिष्णुता का महत्व

 

विश्व शांति लाने के लिए सहिष्णुता का महत्व

मानव सभ्यता की यात्रा जितनी प्राचीन है, उतनी ही संघर्षों और युद्धों की भी। किंतु इन संघर्षों की धूल के बीच जब-जब सहिष्णुता का दीप प्रज्वलित हुआ है, तब-तब मानवता ने अपनी सबसे उजली शक्ल देखी है। सहिष्णुता केवल एक नैतिक गुण नहीं, बल्कि विश्व शांति की वह आधारशिला है, जिस पर एक समरस और सौहार्दपूर्ण समाज का निर्माण संभव है।

सहिष्णुता शब्द संस्कृत धातु ‘सह’ और ‘ष्णु’ से मिलकर बना है, जिसका आशय है—दूसरों के मत, विचार, धर्म, आचरण या व्यवहार को स्वीकार करना, उन्हें सम्मान देना। यह केवल सहने का भाव नहीं, बल्कि हृदय की विशालता का प्रतीक है। सहिष्णु व्यक्ति दूसरों की भिन्नताओं में भी एकता का सौंदर्य देखता है। महाकवि रहीम ने कहा था— 

“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय। 

टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए॥” 

यह “गांठ” असहिष्णुता की प्रतीक है, जो मानव संबंधों को जकड़ लेती है। सहिष्णुता उस गांठ को खोलने की प्रक्रिया है।

 इतिहास साक्षी है कि जहां-जहां सहिष्णुता की भावना प्रबल रही, वहां शांति, ज्ञान और प्रगति का युग आया। सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद जब अहिंसा और सहिष्णुता का मार्ग अपनाया, तब भारत ही नहीं, संपूर्ण एशिया बौद्ध करुणा के आलोक से जगमगा उठा। अकबर का ‘सुलह-ए-कुल’ सिद्धांत धार्मिक सहिष्णुता का अप्रतिम उदाहरण था। वहीं, महात्मा गांधी ने ‘सत्य’ और ‘अहिंसा’ को जीवन का मूलमंत्र बनाकर विश्व को यह सिखाया कि मतभेद हिंसा से नहीं, बल्कि सहिष्णुता से मिटते हैं।

असहिष्णुता की जड़ें मनुष्य के भीतर अहंकार और भय से उपजती हैं। जब मनुष्य अपने मत या विश्वास को ही सर्वोच्च मान लेता है, तो वह दूसरों को अपमानित या नष्ट करने की प्रवृत्ति पाल लेता है। यही प्रवृत्ति धर्मयुद्धों, जातीय संघर्षों, आतंकवाद और नस्लीय घृणा के रूप में उभरती है। आज के वैश्विक परिदृश्य में जब तकनीक ने सीमाओं को लांघ दिया है, तब विचारों और संस्कृतियों का टकराव बढ़ गया है। ऐसे में असहिष्णुता केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गई है।

सहिष्णुता मनुष्य को ‘मैं’ से ‘हम’ तक ले जाती है। यह वह मानसिक अवस्था है जो विभाजन नहीं, संवाद की प्रेरणा देती है। जब कोई राष्ट्र, समुदाय या व्यक्ति दूसरों के विश्वासों और अस्तित्व को स्वीकार करता है, तभी शांति की नींव रखी जा सकती है। संयुक्त राष्ट्र संगठन ने 1995 को “अंतरराष्ट्रीय सहिष्णुता वर्ष” घोषित कर यह संदेश दिया कि सहिष्णुता वैश्विक सहयोग और स्थायी शांति का अनिवार्य तत्व है। भारत की संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत पर आधारित है—“संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार है।” इस भावना के मूल में ही सहिष्णुता का बीज निहित है। 

श्रीमद्भगवत गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—

“समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।” अर्थात् जो सुख-दुःख, हानि-लाभ, मित्र-शत्रु में समान भाव रखता है, वही सच्चा ज्ञानी है। यही भाव सहिष्णुता का सार है। इस्लाम में ‘सब्र’ और ईसाई धर्म में ‘फॉरगिवनेस’ यानी क्षमा की भावना, बौद्ध धर्म में ‘करुणा’ तथा जैन धर्म में ‘अहिंसा’ – ये सभी सहिष्णुता की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। प्रत्येक धर्म अपने मूल में शांति और सह-अस्तित्व की शिक्षा देता है, परंतु जब मनुष्य धर्म को संकीर्ण स्वार्थों से बाँध देता है, तब असहिष्णुता जन्म लेती है। 

आज का विश्व वैश्वीकरण, सूचना क्रांति और प्रवास के कारण पहले से अधिक जुड़ा हुआ है। एक राष्ट्र की समस्या अब दूसरे राष्ट्र को भी प्रभावित करती है। सांस्कृतिक विविधता और विचारों की बहुलता के इस युग में सहिष्णुता न केवल नैतिक आवश्यकता है, बल्कि सामाजिक अनिवार्यता भी। स्कूलों, विश्वविद्यालयों और मीडिया को इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए कि भिन्नता कोई कमजोरी नहीं, बल्कि मानवता की सुंदरता है। संवाद, सहानुभूति और परस्पर सम्मान की शिक्षा ही स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

सहिष्णुता केवल राजनीतिक या धार्मिक विमर्श नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत साधना भी है। जब हम अपने भीतर के क्रोध, ईर्ष्या और पूर्वाग्रहों पर नियंत्रण रखते हैं, तभी हम बाहरी स्तर पर शांति फैला सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यवहार, वाणी और दृष्टिकोण से शांति का वाहक बन सकता है। यदि एक व्यक्ति भी अपने आसपास सहिष्णुता का वातावरण रचता है, तो वह समाज में सद्भाव का एक दीप जलाता है—और ऐसे लाखों दीप ही मिलकर विश्व को आलोकित करते हैं।

विश्व शांति का मार्ग न तो शक्ति से होकर जाता है, न भय से, बल्कि करुणा और सहिष्णुता से। जब तक मनुष्य दूसरों की भिन्नता को स्वीकार करना नहीं सीखेगा, तब तक विश्व में शांति केवल स्वप्न बनी रहेगी। सहिष्णुता वह सेतु है जो द्वेष और प्रेम, विभाजन और एकता, हिंसा और अहिंसा के बीच पुल का कार्य करता है। यदि प्रत्येक राष्ट्र, समाज और व्यक्ति इस मूल्य को अपने आचरण में उतार ले, तो न केवल युद्ध समाप्त होंगे, बल्कि मानवता एक नए युग में प्रवेश करेगी—जहां शांति केवल नारा नहीं, बल्कि जीवन का स्वभाव होगी। यथा-

“जहाँ सहिष्णुता का सूरज उगता है,  वहाँ मानवता का आकाश स्वर्णिम हो उठता है।”

डॉ मीता गुप्ता

विचारक, साहित्यकार, शिक्षाविद

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