जनरेशन अल्फ़ा और सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम
जनरेशन अल्फ़ा और सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम
भारत
और दुनिया के बदलते समाज में बच्चों के परवरिश, शिक्षा और मनोवैज्ञानिक व्यवहारों पर जो नए शब्द और विचार उभर रहे
हैं, उनमें “जनरेशन अल्फ़ा” और “सिक्स-पॉकेट
सिंड्रोम” दो शब्द ऐसे हैं, जो अब संवाद, नीतियों और परिवारों की चिंताओं का केंद्र बनते जा रहे हैं।
जनरेशन
अल्फ़ा वे बच्चे हैं जो लगभग 2010 के बाद जन्मे हैं। वे पूरी तरह से
डिजिटल-इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्मार्ट डिवाइस और इंटरनेट-उन्मुख माहौल में पले-बढ़े हैं। इस पीढ़ी
में जन्मजात डिजिटल सहजता है| टेक-उपकरणों का प्रयोग और उनसे सीखना इस पीढ़ी के लिए स्वाभाविक है।
वे त्वरित मान्यता और त्वरित फीडबैक की चाह भी रखते हैं| सोशल मीडिया, गेम रिवार्ड और ऑनलाइन रिएक्शन ने
त्वरित मान्यता की अपेक्षा बढ़ा दी है। मल्टीमीडिया उनकी उंगलियों का खेल है| वे विजुअल, वीडियो और इंटरेक्टिव माध्यमों से
सीखने को प्राथमिकता देते हैं। उनके इस आचार-व्यवहार पर वैश्विक संपर्क और
बहुसांस्कृतिक छाप भी खूब पड़ी है| ऑनलाइन कंटेंट के कारण उनके अनुभवों में वैश्विक सांस्कृतिक प्रभाव
मिश्रित हो जाता है। यह पीढ़ी तकनीक-संवर्धित, कनेक्टेड और तेज़ी से बदलते वैश्विक माहौल में पली-बढ़ी नई पीढ़ी है| इस पीढ़ी की कई सांस्कृतिक, शैक्षिक और मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ हैं, जो इन्हें पिछली पीढ़ियों से अलग बनाती
हैं। आज वे पूर्व की तुलना में शीघ्र जानकारी प्राप्त कर रहे हैं, उनके लिए विजुअल और इंटरैक्टिव माध्यम
सहज-सुलभ है, वे संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं में
मल्टीटास्किंग और तेज़ निर्णय लेने की प्रवृत्ति रखते हैं| जनरेशन अल्फ़ा के लिए जीवन की परिभाषा, उनकी सोच और सामाजिक व्यवहार की गूंज
आज हर मंच पर सुनाई दे रही है। जब यह चर्चाएँ लोकप्रिय टीवी कार्यक्रमों और
सार्वजनिक मंचों पर दिखती हैं, तो उनके प्रभाव और संकेत और भी प्रत्यक्ष हो जाते हैं। केबीसी जूनियर
में आए उस बाल प्रतिभागी ने कठिन सवालों का जवाब जिस सरलता से दिया, उसने दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया।
जब अमिताभ बच्चन ने पूछा, “इतना ज्ञान कहाँ से आता है?”, तो बच्चे ने मुस्कराकर कहा, “मैं बस दुनिया को समझने की कोशिश करता हूँ, सर।” यह उत्तर केवल एक वाक्य नहीं था, बल्कि इस पीढ़ी के सोचने के ढंग की
परिभाषा था कि वे रटने नहीं, समझने में विश्वास रखते हैं। परंतु इस एपिसोड में डायलॉग और व्यवहार
के कुछ पल, जिनमें होस्ट अमिताभ बच्चन और युवा
प्रतिभागी के बीच का संवाद शामिल था, ने जनरेशन अल्फ़ा के व्यवहार, पहचान और सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम जैसी अवधारणाओं पर एक व्यावहारिक
परिप्रेक्ष्य दिया।
सिक्स-पॉकेट
सिंड्रोम आखिर है क्या? यह
शब्द चीन में एक-बच्चा नीति के दौर में उभरा। परिवारों के आकार में कमी के साथ, हर बच्चे के पास प्रभावी रूप से छह वयस्क, दो माता-पिता और चार दादा-दादी/ नाना-नानी होते थे, जो अपने भावनात्मक और आर्थिक संसाधन उस
एक बच्चे पर केंद्रित करते थे। छह पॉकेट यानी छह लोग, सब एक छोटे के जीवन को संभालने वाले| यह शब्द हाल के वर्षों में मीडिया और
सामाजिक विमर्श में उभरा है, विशेषकर परिवार-आधारित पोषण और संतान-नीति के संदर्भ में।
सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम का प्रयोग तब किया जाता है जब कोई बच्चा या किशोर बाहरी
संकेतों, पारिवारिक संरचना या सामाजिक संदर्भों
के कारण ओवरकॉन्फिडेंट हो जाता है और उसकी वास्तविक क्षमताओं व सामाजिक विनयों के
बीच असंतुलन दिखता है|
जनरेशन
अल्फ़ा अक्सर आत्मकेंद्रित नहीं होती, परंतु उनकी अपेक्षाएँ और सामाजिक अपेक्षाएँ अधिक वैयक्तिकृत होती जा
रही हैं। ऑनलाइन सामाजिकीकरण ने मित्रता और पहचान के रूप बदल दिए हैं। इन
प्रवृत्तियों का सकारात्मक पहलू व्यापक परिप्रेक्ष्य और सहमतिशीलता है, साथ ही नकारात्मक यह कि सहनशीलता, धैर्य
और सामाजिक कौशल कमज़ोर होते जा रहे हैं।
जनरेशन
अल्फ़ा और सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम का संयोजन विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि
डिजिटल जीवन जल्दी मान्यता और उपलब्धता देता है, बच्चे तुरंत प्रशंसा, लाइक और रिवॉर्ड अनुभव कर लेते हैं।
पारिवारिक संसाधन (टाइम, पैसा)
सिक्स पॉकेट सिंड्रोम संस्कृति के चलते अक्सर बच्चे की उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर
दिखाती है। शिक्षा और करियर की तेज़ी से बदलती गतिशीलता में वास्तविक चुनौतियाँ और
असफलताएँ, बच्चों के आत्म-आकलन पर गहरा प्रभाव डालती हैं और अक्सर वे आत्म-आकलन
में असफल रहते हैं|
शिक्षा अब केवल कक्षा और पाठ्यपुस्तक
तक सीमित नहीं। जनरेशन अल्फ़ा के लिए शिक्षा गेमिफाइड लर्निंग, ऑनलाइन कोर्स और माइक्रो-लर्निंग, स्वयं-निर्देशित और परियोजना-आधारित
शिक्षण प्रभावी साबित हो रहा है| इसमें शिक्षक-विद्यार्थियों के आपसी संबंधों का महती प्रभाव रहता है
तथा वह एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है। आज शिक्षा नीतियों को तकनीक, नैतिकता और मनोविकास के संतुलन पर
ध्यान देकर पुनः परिभाषित करना होगा।
डिजिटल जीवन ने भावनात्मक अनुभवों को
भी बदला है। बेहतर कनेक्टिविटी के बावजूद अकेलापन, तुलना-आधारित असंतोष और बेचैनी बढ़ी है। इसलिए भावनात्मक बुद्धिमत्ता
(ई क्यू) के प्रशिक्षण पर ज़ोर ज़रूरी है| माता-पिता और शिक्षकों को सहानुभूतिपूर्ण से अधिक समानुभूतिपूर्ण
संवाद व सक्रिय सुनने की कला में प्रशिक्षित करना चाहिए। पारिवारिक संरचना और
पालन-पोषण शैली में परिवर्तन भी आवश्यक हैं| माता-पिता की अतिरक्षिता (ओवर प्रोटेक्शन) और अति प्रशंसा (ओवर
प्रेज़) बच्चों में असंतुलित आत्म-मूल्य का विकास कर रहे हैं। नीतिगत और सामाजिक
प्रासंगिकताओं में छोटे परिवार, एकल संतान, और
माता-पिता की केंद्रित आशाएँ बच्चों पर दबाव डालती हैं। आर्थिक-आसक्ति और भौतिक
सहूलियतों ने तो इनका दिमाग ही घुमा दिया है| भौतिक सुविधाओं की उपलब्धता और कठिनाइयों का अभाव जीवन-क्षमता और
संघर्ष-संशोधन कौशल को प्रभावित कर रहा है। परीक्षा-केंद्रित संस्कृति में जनरेशन
अल्फ़ा बच्चे या तो अतिआत्मविश्वासी बन सकते हैं (यदि बार-बार पुरस्कार मिलते हैं)
या असुरक्षित, दोनों ही स्थिति सामाजिक समायोजन में
मुश्किलें ला सकती हैं। इसकी वजह से इन बच्चों में एक तरह का सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स
आने लगता है। जब बच्चों को बहुत ज्यादा पॉकेट मनी, गिफ्ट्स या गैजेट्स मिलते हैं, तो भी यह स्थिति हो सकती है। यानी जनरेशन अल्फ़ा बच्चे की हर ज़िद्द
पूरी करने पर वह इस सिंड्रोम का शिकार हो सकता है। इस सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे
अपने सामने दूसरों को बिल्कुल अहमियत नहीं देते हैं।इनमें से कई कारण संयुक्त रूप
से कार्य करते हैं और सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम को जन्म देते हैं। सामाजिक विमर्श में
इस अवधारणा का उठना संकेत देता है कि केवल आर्थिक या शैक्षिक सफलता पर्याप्त नहीं है, बल्कि शालीनता, धैर्य, सहनशीलता और सामाजिक बुद्धिमत्ता को
समान प्राथमिकता देनी होगी|
सिक्स-पॉकेट
सिंड्रोम वाले बच्चों के लक्षणों के दीर्घकालिक परिणाम सामान्यतः सामाजिक व्यवहार, कार्यस्थल-अक्षमता और व्यक्तिगत
रिश्तों पर पड़ते हैं। यदि समय रहते हस्तक्षेप न किया जाए, तो आत्म-चित्र और
व्यावहारिक कौशलों के बीच बड़ा अंतर बन सकता है, जो किशोरावस्था और वयस्कता में चुनौतियाँ पैदा कर सकता है| यह संयोजन तब और भी जोखिमपूर्ण बन जाता
है, जब बच्चे को जीवन की कठिनाइयों के
सीमित अनुभव ही मिले हों और समस्याओं का सामना करने के आवश्यक कौशल विकसित न हुआ हो
क्योंकि हम ओवर प्रोटेक्टिव होते हैं।
सिक्स-पॉकेट
सिंड्रोम जैसी समस्याओं का समाधान केवल मनोवैज्ञानिक सत्र या माता-पिता के
निर्देशन तक सीमित नहीं हो सकता, इसे बहु-स्तरीय प्रयासों द्वारा संभाला
जाना चाहिए, जैसे परिवार और पालन-पोषण में बदलाव
करके बच्चे को छोटे-छोटे निर्णय लेने दें, ताकि वे अपनी गलतियों से सीख सकें, उसकी सकारात्मक परंतु वास्तविक प्रशंसा करें, यह याद रखें कि परिणाम से अधिक प्रयास
महत्वपूर्ण होता है, इसलिए
प्रयास की सराहना करें, न
कि केवल परिणाम की, संतुलित
फीडबैक दें, उन्हें छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियाँ सौंपें, जैसे घरेलू कार्य, समय-सीमा और टीम-गतिविधियाँ बच्चे में
सहकार्य और धैर्य सिखाती हैं।
इस
संदर्भ में शिक्षा प्रणाली में भी सुधार अति आवश्यक है| कौशल-आधारित शिक्षण बच्चे की
रचनात्मकता, आलोचनात्मक सोच और समस्या-समाधान कौशल
को प्राथमिकता देती है, जिससे
बच्चे का व्यक्तित्व एक संतुलित और समाजोपयोगी व्यक्तित्व बनाता है।
सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा (सोशल इमोशनल लर्निंग) को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना
चाहिए, जिससे बच्चा असफलता को को सहर्ष
अंगीकार करना सीखता है| पालन-पोषण
मार्गदर्शन (पेरेंटिंग काउंसलिंग) कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए , जिसमें नव-पालकों के लिए कार्यशालाएँ
और समुदाय आधारित समर्थन समूह शामिल हों। साथ ही डिजिटल साक्षरता और साइबर-हेल्थ
कार्यक्रम चलाए जाएँ, जिनमें
स्क्रीन-टाइम, ऑनलाइन व्यवहार और डिजिटल पहचान की समझ
बढ़ाए जाने पर ज़ोर दिया जाए| और हाँ, यदि
मनोवैज्ञानिक और चिकित्सकीय हस्तक्षेप की आवश्यकता है, तो लेने से न हिचकें|
बात
केवल माता-पिता और शिक्षकों तक ही सीमित नहीं, समाज के लिए भी कुछ व्यावहारिक
टिप्स होने चाहिए जैसे, जनरेशन अल्फ़ा बच्चों के लिए सीमाएँ सेट करें और कारण
समझाएँ, उन्हें “क्यों” का महत्व समझाते हुए
बताएँ कि नियमों की क्या उपयोगिता होती है, असफलता पर चर्चा का माहौल बनाएँ, अपने अनुभव साझा करें और दिखाएँ कि असफलता से कैसे स्वयं को सुधारा
जा सकता है और इट्स ओके टू फेल समटाइम्स, ऐसा कोई आसमान नहीं गिर पड़ेगा, अगर एक बार असफलता का सामना करना भी पड़ता
है, बच्चों को समझाएँ कि सभी लोग एक जैसे
नहीं होते हैं, सभी की कुछ ताकत और कुछ कमज़ोरियाँ होती हैं| बच्चे माता-पिता और समाज के व्यवहार से
सीखते हैं, इसे समझते हुए बड़े अपनी प्रतिक्रियाएँ
नियंत्रित रखें,
जहाँ
तक संभव हो, टीम गतिविधियों की ओर ध्यान दें, खेल, समूह-परियोजनाएँ और सामुदायिक सेवा बच्चे में सहयोग व सहानुभूति
विकसित करती है और सबसे ज़रूरी, तकनीक का नियंत्रित प्रयोग हो, इसके लिए गुणवत्ता-आधारित गतिविधियाँ चुनें, न कि मात्र स्क्रीन-समय
की माप पर जोर दें।
अगर
आप पैसों को प्यार का विकल्प मानते हैं, या उन्हें समय न दे पाने के गिल्ट को ढकने के लिए बच्चों को ज़्यादा पॉकेट
मनी देने में विश्वास रखते हैं, तो सावधान हो जाइए, ऐसा बिल्कुल न करें। इससे बच्चे जिद्दी बन सकते हैं। गलती हो जाने पर
उन्हें माफी मांगना भी सिखाएँ, बताएँ कि गलतियाँ सबसे होती है, बताएँ कि आपने भी गलतियाँ
की हैं, और उन गलतियों से बहुत कुछ सीखा है।
निष्कर्षतः
आप यह मान कर चलें कि पेरेंटिंग दुनिया का सबसे दुष्कर काम है, और जनरेशन अल्फ़ा की
पेरेंटिंग तो..सोने पर सुहागा! जनरेशन अल्फ़ा बच्चे अपने भीतर
ऊर्जा, आत्मविश्वास
और डिजिटल कौशल लेकर आते हैं, परंतु उस ऊर्जा को दिशा देने और वास्तविकता के साथ
जोड़ने की ज़िम्मेदारी माता-पिता, परिवार, शिक्षण संस्थान और व्यापक समाज की है। जब सार्वजनिक मंचों पर अमिताभ
बच्चन जैसे अनुभवी व्यक्तित्व सहजता और शिष्टता से मार्गदर्शन करते हैं, तो वह न केवल एक शो का हिस्सा होता है, बल्कि एक सामाजिक पाठ भी होता है।
सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम जैसी अवधारणाएँ हमें चेतावनी देती हैं कि अगर बच्चे सिर्फ़
प्रशंसा, सुविधा और त्वरित मान्यता में रह जाएँ,
तो उनके व्यवहार और व्यावहारिक क्षमता में असंतुलन आ सकता है। इसलिए शिक्षा और
पालन-पोषण को तकनीकी कौशल के साथ-साथ मानवीय कौशल और व्यवहारिक परिपक्वता पर भी ज़ोर
देना होगा।
जेनरेशन
अल्फा तकनीकी रूप से अत्यधिक सक्षम है, लेकिन भावनात्मक रूप से अभी भी अपरिपक्व है। समाज के सामने सबसे बड़ी
चुनौती केवल होशियार बच्चों को तैयार करने की नहीं है, बल्कि ऐसे ज़िम्मेदार, सहानुभूतिपूर्ण और धरातल से जुड़े
नागरिकों को गढ़ने की है, जो डिजिटल कौशल के साथ-साथ भावनात्मक बुद्धिमत्ता एवं साझा मूल्यों
के प्रति सम्मान का संतुलन बनाए रखें। जेनरेशन अल्फा के बारे में नकारात्मक चर्चा
करते समय इस बात का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है कि वह केवल और केवल 10-12 साल का
बच्चा है और वह अपनी बौद्धिक क्षमता के कारण ही एक प्रतिष्ठित शो में भाग ले रहा
है|
इस युवा
प्रतिभागी की प्रतिक्रिया और बाद में की गई माफ़ी या आत्म-प्रतिबिंब दिखाते हैं कि
बच्चे सुधरने और सीखने की क्षमता रखते हैं, यदि सही समय पर उन्हें दिशा दिखाई जाए।
यदि हम मंचों पर मिलने वाले उन छोटे-छोटे पलों से सीख लें, जैसे कि सार्वजनिक गलती
पर शिष्ट मानवीय प्रतिक्रिया, शांत स्वीकारोक्ति और सुधार का अवसर, तो जनरेशन अल्फ़ा अपनी ऊर्जा और
क्षमताओं को सकारात्मक दिशा में लगाने में सफल होगी और भविष्य में समाज को एक नई दिशा
देने में सक्षम होगी।
डॉ मीता गुप्ता
विचारक,
शिक्षाविद, साहित्यकार


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