यूँ ही कोई मिल गया सीज़न-2

यूँ ही कोई मिल गया

 

विषय-सूची

 

  • EPISODE-0-प्रस्तावना- यूँ ही कोई मिल गया सीज़न-2  02/01/26
  • EPISODE-1 ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी 16/01/26
  • EPISODE-2 कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन... 30/01/26
  • EPISODE-3 प्यार को प्यार ही रहने दो 13/02/26
  • EPISODE-4 दोइ नैना मत खाइयो  27/02/26
  • EPISODE-5 गंगा तेरा पानी अमृत 13/03/26
  • EPISODE-6 जा, जी ले अपनी ज़िंदगी 27/03/26,
  • EPISODE 7 यूँ ही कोई दिल लुभाता नहीं 10/04/26
  • EPISODE 8 हर मुस्कराहट मुस्कान नहीं होती…24/04/26
  • EPISODE 9 राँझा राँझा करदी हुण मैं आपे राँझा होई 08/05/26
  • EPISODE 10 कोई ये कैसे बताए के, वो तनहा क्यों है?  22/05/26  
  • EPISODE 11 आप मुझे अच्छे लगने लगे… 05/06/26 
  • EPISODE 12  मत कर अभिमान रे बंदे! 19/06/26 
  • EPISODE 13  क्या कभी खुद से प्रेम किया? 03/07/26
  • EPISODE 14 किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी...17/07/26  
  • EPISODE 15 लव.. यू ज़िंदगी! 31/07/26
  • EPISODE 16 लब हिलें तो… 14/08/26
  • EPISODE 17 आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या है? 28/08/26
  • EPISODE 18 पल पल दिल के पास…11/09/26  
  • EPISODE 19 ये कौन चित्रकार है? 25/09/26
  • EPISODE 20 बहती हवा-सा था वो…09/10/26  
  • EPISODE 21 इश्क वाला लव…23/10/26 
  • EPISODE 22  टूटे पै फिर न जुरै 06/11/26
  • EPISODE 23 दिल चाहता है…20/11/26 
  • EPISODE 24 भेद यह गहरा बात ज़रा सी  04/12/26
  • REFLECTIONS     18/12/26 
  • CLOSING  01/01/27

 

*************************************************************EPISODE-0

INTRODUCTION-

यूँ ही कोई मिल गया सीज़न-प्रस्तावना 01/01/26

एक विहंगम दृष्टि

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीतसबसे पहले आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ | नए साल में मैं लेकर आ रही हूँअपने पॉडकास्ट ‘यूँ ही कोई मिल गया’ का दूसरा सीज़न... जिसमें होंगे नए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...|

दोस्तों! माँ भगवती के आशीर्वाद स्वरुप अपनी वाचिक प्रस्तुतिअपने पॉडकास्ट 'यूँ ही कोई मिल गयाके दूसरे सीज़न  को लेकर आप सभी के सामने उपस्थित हूँहर ज़िंदगी की कोई न कोई कहानी ज़रूर होती हैहै न.. हमारे ज़हन में छिपी रहती है हमारी ज़िंदगीऔर छिपी रहती हैं हमारी यादेंमैं ले चलूँगी आपको एक ऐसी दुनिया मेंजहां हर किसी की कहानी हैमेरे और आपके जज़बातों कीऔर वह भी हिंदी मेंहिंदीजो हमारी अपनी भाषा हैहमारे सपनों की भाषाहमारे अपनों की भाषा...सच कहूँ तो कुछ कहानियाँ जीवन के साथ-साथ चलती हैंतो कुछ यूँ ही मिल जाती हैंसमय सरिता के अजस्र प्रवाह में बहता जीवन अनुभवों और अनुभूतियों की पोटली होता हैइन्हीं अनुभवों और अनुभूतियों में से कुछ कहानियाँमैं अपने पॉडकास्ट 'यूँ ही कोई मिल गयाके दूसरे सीज़न  में समेटने का प्रयास कर रही हूँ | आपके प्यार और आदर ने मुझे पॉडकास्ट का दूसरा सीज़न  बनाने की ताकत दीहिम्मत दीजज़्बा दियादरअसल मैं ऐसा मानती हूँ  कि प्रेम ही हमें ताकत देता हैहिम्मत देता हैजज़्बा देता हैऔर यह प्रेम हमारे खून मेंहमारे लहू में रचा-बसा होता हैयह हमारे लहू के साथ साथ हमारी रगों में बहता है और लहू का लाल रंग दरअसल प्रेम का ही लाल रंग हैमेरे शब्दों के स्पर्श कोउसकी ऊष्मा को पाकर प्रेम का रंग कैसा हो जाता हैयह जानना होतो पॉडकास्ट के इस सुहाने सफर पर आपको मेरे कदमों से कदम मिलाकर चलना होगा|

MUSIC

प्रकृति से मेरा अटूट रिश्ता रहा हैबचपन से ही असम की हसीन वादियों और ब्रह्मपुत्र के अथाह जल से मैंने प्रेरणा ली हैयुवावस्था में नैनीताल की हवाओं की नमी और सर्पाकार सड़कों को महसूस किया हैइसलिए मेरी कहानियों में आपको पेड़ पौधेझील झरनेबर्फ बारिशसमुद्र नदियाँबेल वल्लरियाँपत्थर पहाड़ इत्यादि प्रकृति के रूपों में संवेदना मिलेगी और उसी संवेदना को मैं मानव समाज और मानव जीवन के परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास करूंगी|

दोस्तों! पॉडकास्ट हैतो आप ही से बातें कर रही हूँ | बीच बीच में आपसे कुछ प्रश्न भी करूंगीये प्रश्न न केवल आपको सोचने का अवसर देंगेबल्कि मेरे द्वारा कही गई मूल बात को नए आयामों से जोड़ने का भी काम करेंगेमानव मन से जुड़े सभी आयामों पर आपसे बातें भी करूंगीलेकिन मेरे पॉडकास्ट का एक बड़ा हिस्सा नारी जीवन की संवेदनाओं और वेदनाओं को विशेष रूप से उजागर करेगाहमारे समाज में नारी की दशाउसके सपनोंप्रार्थनाओंकल्पनाओंसंवेदनाओं और इच्छाओं को उभारने जा रही हूँ |

पहले सीज़न की भांति ही मैंने सभी एपिसोडस के शीर्षक रोचक रखने का प्रयास किया है और अधिकतर शीर्षक किसी न किसी गीत या ग़ज़ल के मुखड़े हैंआप उन गीतों या गज़लों को गुनगुनाते-गुनगुनाते भी पॉडकास्ट को सुन सकते हैंजब मैं छोटी थीतो हिरोशिमा नागासाकी पर बम गिराए जाने के बारे में पढ़ती थीसुनती थीतब भी यह थोड़ा थोड़ा समझ आता था कि इन ज़हरीले रसायनों की वजह से वहां धरती बंजर हो गई है और अब वह हरी नहीं होतीतब से धरती के उस बंजर टुकड़े के लिए मेरा मन करुणा से भर-भर जाता थाफिर ज़िंदगी ने समझाया कि बंजर सिर्फ़ धरती के टुकड़े ही नहीं होतेमन की धरती के हिस्से भी बंजर हो जाते हैंफिर मैं सोचने लगती कि क्या कोई ऐसा रसायन भी हैजो इसे उर्वर कर दे?  अपने आप से पूछा था यह सवालतो जवाब हृदय की अतल गहराइयों से आया कि हांएक रसायन हैजो मन को मरने से बचा सकता हैऔर वह है-प्रेम रसायनऔर इसी की बात करने जा रही हूँअपने पॉडकास्ट में....|

MUSIC

मैंने अपने पॉडकास्ट की भाषा को सरल और सहज रखा है|  मैंने भाषा के साथ कोई प्रयोग नहीं कियाकोई सजावट नहीं कीकोई कृत्रिम श्रृंगार नहीं कियामैं भाषा को लेकर अत्यधिक सजग और सचेत भी नहीं रहीलेकिन यह प्रयास ज़रूर किया कि भाषा सही भावों से संप्रेषित होभाषा सहूलियत से बरती जाएचाहे साहित्यिक हो या सरलपर तरलता से भरपूर होबहती-सी रहेहर एपीसोड में यही प्रयास किया कि मेरे शब्द आपके मन को छू लेंआपको संवेदना से भर देंनम कर देंऔर उर्वर भी कर दें|

कभी कभी मैं ऐसा भी सोचती हूँ  दोस्तों! कि प्रेम तो हम सभी के भीतर बहता हैफिर भी न जाने क्योंहम इससे अंजान बने रहते हैंचाहे जड़ होचेतन होरेत होबूंद होकिनारें होंलहरें होंबारिश हो या मिट्टी होसभी तो प्रेम को अपनी-अपनी तरह अभिव्यक्त करते हैंवृक्ष पर लिपटी लतासाहिल से सटकर बहता दरियामिट्टी की सोंधी खुशबू और पत्तों पर जमी शबनम की बूंदेंये सब भी तो प्रेम के ही प्रतीक हैंसदियों से केवल प्रेम ने इस दुनिया को थाम रखा हैयह शाश्वत हैयह कभी नष्ट नहीं होतायही तो हैजो आसमान को झुकाता हैपृथ्वी को महकाता हैकहीं पहाड़तो कहीं वृक्ष बन जाता हैकहीं बूंद बनकर बहता हैकहीं रेत बनकर सिमटता हैकहीं गीत बनकर बज उठता हैकहीं गीतकहीं प्रीतकहीं हार और कहीं जीत बनकर ढलता रहा हैढलता रहेगाकृष्ण की बाँसुरी ने किसी को आवाज़ देकर नहीं पुकारालेकिन यकीनन उस बांसुरी में प्रेम ही सूर्य बनकर उदित हुआ होगाराम के पवित्र पैरों से कोई पत्थर क्या यूँ ही स्त्री बन गया होगाशिव की जटाओं में गंगा किस वजह से थमी होगीजी हां! प्रेम दिखता नहीं हैयकीनन महसूस होता हैयह नसों में बहता है लहू बनकरआसमानों से बरसता है बूंद बनकरआँखों  से टपकता है अश्रु बनकरगालों पर चिपकेतो खारा लगता हैहोठों पर सजेतो मीठा साइस प्रेम को महसूस किया जाएयही प्रयास है मेरायही प्रयास है मेरे पॉडकास्ट 'यूँ ही कोई मिल गयाके दूसरे सीज़न  का|

MUSIC

'यूँ ही कोई मिल गयापॉडकास्ट के दूसरे सीज़न कोमैं उन सब लोगों को समर्पित करती हूँजिन्हें मैं पसंद करती हूँउन पलों कोउन रिश्तों कोउन नातों कोउन लंबी लंबी सी बातों कोउन छोटी छोटी सी मुलाकातों कोजिन्होंने मेरे मन में प्रेम का मान बढ़ाया और मुझे प्रेम को पॉडकास्ट का विषय बनाने के लिए प्रेरित किया|

जी हाँ! चलते चलते यह भी कहना चाहती हूँ कि मैं आभारी हूँ  इस माला के उस धागे कीजो अदृश्य हैपर हर मोती को जिसने सहेजा हैजो दिखता नहींलेकिन उसके बिना यह माला कभी बन ही नहीं सकती थीवे सब लोगजिनमें मेरे बच्चेअपूर्वआशी और अक्षर शामिल हैंमेरे पति श्री अंबरीश गुप्ता जी शामिल हैं और शामिल हैं ध्वनि निर्देशक और वीडियो संपादक सुशांत पांडे | उम्र में भले ही ये छोटे होंकिंतु इनकी खुशबू हर एपीसोड में हैइनका ज़िक्र उस इत्र की तरह हैजो हम सबके मन को महकाता हैबहकाता हैकभी हँसाता है और कभी-कभी रुलाता भी हैविश्वास कीजिए प्रेम की एक बूंद भी यदि आपने ग्रहण कर लीतो यह प्रेम आपके मन को कभी बंजर नहीं होने देगायह वादा है मेरा|

तो आइए! इस धरती को प्रेममय बनाएँप्रेम में डूब जाएँप्रेम की बातें करेंप्रेम से बातें करें और प्रेम के सागर में गोते लगाएँइसमें अडूब डूबेंयानी डूबें नहींबस गोते लगाएँलहरों का आनंद लें|

तो चलिएमेरे साथ चलिएइंतज़ार किसका हैचलिएउस इंद्रधनुषी जहां में मेरे साथजहां सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम हैसुनिएगा ज़रूर… हो सकता हैइस बारकहानी आपकी हो! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों....वही प्रीत...वही किस्से-कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE-1 

ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी 16/01/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तएक किस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत  लीजिए हाज़िर हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर कुछ पुरानी यादेंउसी मखमली आवाज़ के साथ...आज हम बात करने जा रहे हैं प्रेम की..जी हाँ! ऐसा प्रेम जो अलौकिक हैदैविक हैअमर हैअजर है और शाश्वत है। जब भी हम प्रेम की बात करते हैं नतो एक ओर हमें श्रीकृष्ण की याद आती हैतो दूसरी ओर कृष्ण के साथ-साथ राधा का नाम बरबस ही याद आ जाता हैलेकिन आज मैं राधा की नहींमीरा की बात करूँगी। जी हाँप्रेम दीवानी मीराजिसका दरद कोई नहीं समझ सकाऐसी मीरा को हम सभी जानते हैंपरिचित हैंहम सभी ने वह कहानी सुन भी रखी होगीऐसी कहानीजो हम सब को प्रिय है। आज प्रसंगवश इस कहानी से बात शुरू करती हूँ। चित्तौड़राजस्थान की मीरा जब छोटी थींतो उनके घर एक साधु आएजो कृष्ण भक्त थे। साधु अपने साथ श्रीकृष्ण की मूर्ति भी लेकर आएजिसे वे बरसों से पूज रहे थे। बालिका मीरा उस मूर्ति को देखकर मचल उठी और साधु से मूर्ति की माँग कर बैठी। साधु ने साफ़  मना कर दिया कि वे बरसों से इस मूर्ति को पूज रहे हैं। कहने लगेयह कोई साधारण मूर्ति नहींइसमें साक्षात श्री कृष्ण विराजते हैं। यह कोई खेलने की वस्तु नहींजो मैं तुम्हें दे दूँ। मीरा रोती रही और साधु चले गए।

MUSIC

दोस्तों! संभवतः रोदन के साथ मीरा का रिश्ता यहीं से बन गया था। किवदंती के अनुसार रात को साधु के सपने में श्रीकृष्ण आए और कहने लगे, तुम मेरी मूर्ति मीरा को दे दो। साधु ने कहाहे कान्हा! मैंने जन्म भर आपकी पूजा की हैपरंतु आपने दर्शन नहीं दिए और आज आप आए हैंतो उस नादान लड़की को मूर्ति देने के लिए कह रहे हैंक्या लीला है प्रभुश्री कृष्ण ने कहाहे साधु! मेरी मूर्ति बस उसी की होगीजो मेरे के लिए दिन रात रोती है।

चलिएअब मैं अपनी बात को इसी छोर से शुरू करती हूँ। क्या सचमुच हे कृष्णतुम आए थे साधु के सपने में या यह भी तुम्हारा कोई छल थाबोलो न छलिया

आज तुमसे कुछ प्रश्न पूछना चाहती हूँ कान्हाजब से इस धरती से गए हो , क्या एक बार भी इस धरती की सुध ली है तुमनेक्या तुम्हें इस धरती की याद भी आती हैक्या यह याद कभी सताती भी हैतुम तो वचन देकर गए थे कि मैं लौटूँगाफिर भी लौट कर नहीं आएतुमने अपनी मोहक मुस्कान से सबको खूब छला। गोपियों को अपनी बंसी की मधुर लहरी सुनाकर बेसुध कर दिया। राधा को अपने प्रेम का दीवाना बना दिया। राधा के प्रेम में तो तुम भी बावरे हो गए थे नाबोलो ना कान्हा?

तुमने राधा संगगोपियों संगखूब होली खेली। तुम्हारे और राधा के प्रेम गीत आज भी ब्रज की गलियों में गूंजते हैं। मधुबन में महारास में तुमने हर गोपी के साथ तुमने रास रचाया। हर गोपी यही समझती रही कि तुम सिर्फ़ उसके साथ होलेकिन कृष्ण तुम वहाँ थे ही नहींतुम सिर्फ़ राधा के पास थेराधा के प्रेम में आसक्त हो कर तुमने जो छल किया नकभी चूड़ी वाले बनेकभी स्त्री स्वांग रचायाऔर न जाने क्या-क्याहे कान्हा!

MUSIC

एक बात बताओ ना कान्हाब्रज की गलियों में राधा संगमहलों में रुक्मणी संगसत्यभामा संग अनगिनत रानियोंपटरानियों के बीच क्या कभी तुम्हें उस विरहिणी की याद आती थीजो तुम्हारे नाम की वीणा लिए रेगिस्तान की तपती धूप में खुद को जलाती रहीजिसने सिर्फ़ तुम्हारे कारण अपने महलों की सुख सुविधाएँ त्याग दींऔर तपती रेत पर अपने आँसुओं के प्रेम की इबारत लिख दीप्रेम को इबादत मान बैठीउसके दिन तुम्हारे वियोग में झुलस गए और उसकी रातें तुम्हारी याद में बंजर हो गईंउसके जीवन में कभी मिलन के फूल नहीं खिला पाए तुम कृष्ण?

हे गिरिधर! आज सच्ची-सच्ची बताओअब बता भी दो न....कि मीरा तुम्हें इतना प्रेम क्यों करती थीक्या चाहती थी वो तुमसेतुम तो त्रिकालदर्शी हो नक्या बता सकोगे कि मीरा ने ऐसा क्यों कहा, 'आवन कह गएअजहूँ ना आए।’ क्या तुमने मीरा से कोई वादा किया थाबोलो न गिरिधर! क्या दुनिया से छिपाकरहे छलिया! तुमने अपनी मोहक मुस्कान से उसे भी दीवानी बनाया थाबोलो ना कान्हा! मीरा तो राधा की तरह तुमसे प्रेम की माँग भी नहीं करती थीना रासना मिलन की आसना कोई योगना ही कोई भोगफिर वह क्या चाहती थीऔर क्योंक्या तुमने कभी यह जानावह मंदिरों मेंसंतों के डेरों परजा-जाकर तुम्हारा पता पूछती थी कान्हावह बादलों की तरह मीलों चलती थीहे कृष्ण! क्या तुम मीरा के लिए दो कदम भी साथ चले थेअच्छाएक बात बताओ मोहन! क्या कभी रेत के संग पानी मिल कर चला हैक्या कभी रात के सन्नाटों में जब सारी दुनिया सो रही होतीक्या उस वीराने में तुम्हें मीरा की सिसकियाँ सुनाई देती थींमीरा के मन में तुम्हारे प्रेम की जो लौ जल रही थी कान्हाक्या कभी उसकी ऊष्मा को तुमने महसूस कियाक्या मीरा के प्रेम की अगन से तुम कभी विचलित हुएहे कृष्ण! बताओ ना..क्या तुमने जानबूझकर उसे वियोग के दावानल में छोड़ दिया थाकहीं ऐसा तो नहीं....कान्हा! कि तुम उसके तप से घबराते थेउसकी सच्चीनिष्पापनिष्कलंकित भक्ति से घबराते थेसुनो ना.. मोहन! तुम कभी भी उसके पास नहीं गए। अपने नियमों में बंधे तुम कभी नियम तोड़ न सकेफिर चाहे मीरा सभी नियमोंपरंपराओं को त्याग कर कभी बावरी और कभी कुलनाशिनी कहलाती रही। सारे नियमसारे दर्शनसारे आदर्शसारे सिद्धांतमीरा के ही हिस्से में क्यों आएवंशीधर! उत्तर दो ना..सारे सही-गलत के गणित केवल मीरा के लिए ही क्यों थे?

MUSIC

किसका प्रेम बड़ा हैबोलो न कान्हा! राधा का या मीरा काबोलो! आज तो तुम्हें बताना ही होगाकिसका पलड़ा भारी थातुमने आने का वचन दिया था नफिर भी नहीं लौटेअब जब कभी भी तुम आओगे न कृष्णमीरा की रूहउसकी आत्मा आज भी तुम्हें विरहिणी बनकर भटकती मिलेगी और गाती मिलेगी- मेरे तो गिरधर गोपालदूसरों न कोई।

तो क्या मीरा का प्रेम निरर्थक रह गयाजी नहींमीरा का प्रेम व्यष्टि से समष्टि बन गया और मीरा का प्रेमहर एक प्रेम करने वाले के दिल में समा गया और उसका दरद रेगिस्तान की रेत के कण-कण में व्याप्त हो गया। मीरा के आँसुओं ने सागर की हर बूँद में समा कर उसे खारा बना दिया। मेरे मन में अक्सर यह प्रश्न भी कौंधता है कि कैसे समेट लिया सागर ने इतने विस्तृत विरह को?

कभी यदि कान्हातुम हमें भटकते हुए गलियों में मिल गए नतो मैं पूछूँगी ज़रूरचलोबोलोआज तो सच बोल ही दोआज मैं तुम्हारी मोहक मुस्कान में उलझ कर हमेशा की तरह अपने प्रश्न नहीं भूलूँगी। देखो कान्हामैंने आँखें बंद कर ली हैंअब बताओहे कान्हा! मीरा तुमसे इतना प्रेम क्यों करती थीआज भी उसकी रूह भटकती रहती है...तुम्हें तलाशती हुईतुम्हें खोजती हुई।

MUSIC

मेरे ये सवाल ऐसे खत्म नहीं होंगे कान्हामीरा की तरह हम सभी को इंतज़ार रहेगा जवाबों कासही है न वंशीधर?

क्यों दोस्तों! आप ही बताइएआप भी तो कान्हा से जवाब माँगते हैं न....मैसेज बॉक्स मे लिखकर बताइए, अपनी बातों को मुझे बताइए..|

सुनिएगा ज़रूर… हो सकता हैमीरा की अमर कहानी आपकी ही कहानी हो! आपके विरह की कहानी होआपके प्रेम की कहानी हो।

मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों....वही प्रीत...वही किस्से-कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE  2

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन....30/01/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तएक किस्से कहानियाँ सुनाने वालीआपकी मीत। लीजिए हाज़िर हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर कुछ पुरानी यादेंउसी मखमली आवाज़ के साथ...आज हम बात करने जा रहे हैं बचपन की.... आप सोच रहे होंगे....उम्र पचपन कीऔर बातें बचपन की....सच कहूँ दोस्तों! यही तो वह समय है जब बचपन की वीथियों में फिर से विचरण करके जीवन पीयूष का रसपान किया जा सकता है......बात यह हुई कि पिछले दिनों मैं लंदन गई थीपिक्काडली सरकस की रंगीन सडकों पर घूमते हुए ऐसा लगा कि....सहसा ठंडी हवा का कोई झोंका आया। झोंका थाखुशबू थीया खुशी का ज्वार था...हुआ यह.... कि अचानक अलका जो दिख गई। अलकामेरे बचपन की सबसे प्रिय दोस्त.... फिर क्या था....शुरु हो गया बातों का सिलसिलायह हिसाब लगाने में घंटों लगे कि कितने सालों बाद मिल रहे हैंतू कितनी मोटी पतली हो गईबच्चेपतिऔर फिर शुरू हुई लंदन की कड़कड़ातीजमा देने वाली सर्दी में आइसक्रीम डेट.....जी हाँ दोस्तोंआइसक्रीम डेटफोटो शेयर करते हुए उसने कैप्शन में लिखा , 'लाइफ के हर फेज़  में हर किसी के दोस्त होते हैंलेकिन बचपन के कुछ दोस्त जीवन के सभी फेज़ में आइसक्रीम शेयर करने के लिए साथ रहते हैं। उसने आगे जो लिखावह तो और भी मज़ेदार था, 'एक साल के लिए आइसक्रीम का कोटा पूरा हो गया.. जब तक हम दोबारा नहीं मिलते।ऐसी होती है बचपन की दोस्ती....ऐसी ही अनेक इंद्रधनुषी यादों की संदूकची को आज हम खोलेंगे.....हम बीते दिनों की यादों में खो जाएँगे.....कभी डूबेंगे...कभी उबरेंगे....कभी अडूब डूबे रहेंगे....।

MUSIC

तो दोस्तों! चलिए आज बात करते हैंबीते हुए दिनों की....ऐसे दिन जब न दौलतन शोहरत की चिंता थीमुझे बस याद है झुर्रियों से भरे चेहरे वाली वह नानीजो परियों की कहानियाँ सुनाया करतीरेत में घरोंदे बनानाबना बना कर मिटानाअपने खिलौनों को अपनी जागीर समझनाअपनी टूटी फूटी गुड़िया को भी सबसे सुंदर माननान दुनिया का ग़म थान रिश्तों के बंधनबस बचपन का वह सावन थावो कागज़ की कश्ती और वो बारिश का पानी था। कभी लहरों के करीब जाकर उन्हें छूने की बेताबीकभी उनके पास आने पर चिल्लाकर दूर भाग जानाकभी घोष दादा की बंहगी से ‘रोशोगुल्ला’ निकालकर खाने ज़िद करनाकभी खोमचेवाले से गुब्बारेकभी फेरीवाले से बुलबुले खरीदने थेफिर बुलबुलों और गुब्बारों के साथ पूरे घर में धमाचौकड़ी मचानामाँ  की डांट से बचने के लिए साईकिल ले गलियों में घुमानाऔर गिर पड़े,और गिर पड़े तो रोकर उसी के आँचल में छुप जानादोस्त से लड़कर मुँह फुलाकर बैठ जानापर अगले ही दिन उसी के साथ खेलनाबड़े बड़े आँसू टपका कर कुल्फी के लिए शोर मचानाऔर फिर एक मासूम सी मुस्कान के साथ छुपकर मज़े से उसे खानादेर रात तक डैडी के साथ पिक्चरों के आनंद उठानाऔर जब नींद आ जाएतो उन्हीं की गोद में सिर रखकरसपनों की दुनिया में कहीं गुम हो जानाएक बुरा सपना देखकरपलंग के नीचे छुप जानाकोई जब फुसलाने आएतो उसी के आगोश में खो जानाहर घड़ीहर पलआज़ाद पंछी की तरहज़िंदगी को जीते जाना और ठोकर लग जाएतो ज़ख्म पोंछकर आगे बढ़ जाना।

हर किसी को अपना बचपन याद आता है,आता है न। हम सबने अपने बचपन को जीया है। शायद ही कोई होगाजिसे अपना बचपन याद न आता हो। बचपन की मधुर यादों में माता पिताभाई बहिनयार दोस्तस्कूल के दिनआम के पेड़ पर चढ़कर 'चोरी सेआम खानाखेत से गन्ने उखाड़कर चूसना और ‍खेत के मालिक के आने पर 'नौ दो ग्यारहहो जानाहर किसी को याद है। जिसने 'चोरी सेआम नहीं खाए और गन्ना नहीं चूसाउसने अपने बचपन को क्या खाक जियाचोरी और ‍चिरौरी तथा पकड़े जाने पर साफ़ झूठ बोलनाफ़र्श पर बिस्कुट की रेल बनानाबचपन की यादों में शुमार है। बचपन से पचपन तक यादों का अनोखा संसार है। सच में

रोने की वजह भी ना थीना हँसने का बहाना था

क्यों हो गए हम इतने बड़ेइससे अच्छा तो बचपन का ज़माना था 

(साभार मशहूर उर्दू शायर जौन एलिया) 

music 

दोस्तों! छुटपन में धूल गारे में खेलनामिट्टी मुंह पर लगानामिट्टी खाना किसे नहीं याद हैऔर किसे यह याद नहीं है कि इसके बाद माँ  की प्यार भरी डांट फटकार व रुंआसे होने पर माँ  का प्यार भरा स्पर्श! इन शैतानीभरी बातों से लबरेज़ है सारा बचपन।

सच कहूँ तो दोस्तों! जो न ट ख ट नहीं थाउसने बचपन क्या जियाजिस किसी ने भी अपने बचपन में शरारत नहीं कीउसने भी अपने बचपन को क्या खाक जियाक्योंकि बचपन का दूसरा नामही ‘न ट ख ट पन’ है। शोर व ऊधम मचातेचिल्लाते बच्चे सबको लुभाते हैं और हम सभी को भी अपने बचपन की सहसा याद हो दिला जाती हैं।फिल्म 'दूर की आवाज़में जानी वॉकर पर फिल्माए गए गीत की पंक्तियाँ कुछ यूँ ही बयान करती हैं  

हम भी अगर बच्चे होते,

नाम हमारा होता गबलू बबलू,

इस गीत में नायक की भी यही चाहत है कि काश! हम भी अगर बच्चे होतेतो बचपन को बेफ़िक्री से जीते और मनपसंद चीज़ें खाने को मिलतीं। हम में से अधिकतर का बचपन गिल्ली डंडा,पोशमंपा,खो खोधप्पा,पकड़न पकड़ाईछुपन छुपाई खेलते तथा पतंग उड़ाते बीता है। इन खेलों में जो मानसिक व शारीरिक आनंद आता हैवह कंप्यूटरजनित खेलों में कहाँ?

वह रेलगाड़ी को 'लेलगालीव गाड़ी को 'दालीया 'दाड़ीकहना......हमारी तोतली व भोली भाषा ने सबको लुभाया है। वह नानी दादी का हमारे साथ साथ हमारी तोतली बोली को हँसकर दोहराना....शायद बड़ों को भी इसमें मज़ा आता था और हमारी तोतली बोली सुनकर उनका मन भी चहक उठता था।

MUSIC

जी हाँ दोस्तों! अपने बचपन में डैडी द्वारा साइकिल पर घुमाया जाना कभी नहीं भूल सकते। जैसे ही डैडी ऑफ़िस के लिए निकलते थेवैसे ही हम भी डैडी के साथ जाने के लिए मचल उठते थेचड्डू खाने के लिएतब डैडी भी लाड़ में आकर हमें साइकिल पर घुमा ही देते थे। बाइक व कार के ज़माने में वो 'साइकिल वालीयादों का झरोखा अब कहाँ?

दोस्तों! बचपन में हम पट्टी पर लिख लिखकर याद करते और मिटाते थे। न जाने कितनी बार मिटा मिटा कर सुधारा होगा। पर स्लेट की सहजता व सरलता ने पढ़ना लिखना सिखा दियावाह! क्या आनंद था ?

जब बच्चे थेतब बड़े होने बड़ी जल्दी थीपर बड़े होकर क्या पाया? हर समय दिन भर कितने ही चेहरे देखती हूँ सड़कों परकार्यस्थल परहर जगह बहुत से चेहरेपर इनमें से कोई भी चेहरा ना हँसता दिखाई देता हैना ही खुशनुमा। अक्सर लोग हैरान परेशान से दिखते हैंखुश होते भी हैंतो ज़रा देर के लिएमानो हँसने या खुश होने में भी उनके पैसे खर्च हो रहे हों। आज लगता है कि बच्चों का 'बचपनभोलापनमासूमियतनिश्छलता, 'पचपनके चक्कर में कहीं खो सी गई है!

इंसान का बचपन उसकी प्रेरणा होता है। बचपन में की गई गलतियाँनादानियाँ व शैतानियाँ बड़े होकर जब याद आती है न दोस्तों! तो हमें हँसी आ जाती हैहै न दोस्तों! उसकी सुखद मधुर यादें हमारे दिल ओ ज़हन में मृत्युपर्यंत बनी रहेंगी। नहीं जाने वाली हैं।है न दोस्तों!

MUSIC

दोस्तों! अब उलझनें बहुत बढ़ गई हैं ज़िंदगी मेंउन्हें कोई जिगसॉ पज़ल की तरह मिनटों में कैसे सुलझाएँचलो चलें! खिलौनों और चॉकलेट्स की उसी दुनिया में वापस चलें। ऐसे जहाँ की ओर चलेंजहाँ न हो किसी से ईर्ष्या होकिसी से जलनजहाँ छोटी छोटी चीज़ों में ही हमारे सब सपने सच हो जाएँ। कागज़ के पंखों पर सपने सजाकरगेंदे के पत्तों से कोई धुन बजाकरख़ाली थैलियों की पतंगें उड़ाएँरातों को टॉर्च से आसमाँ चमकाएँमम्मी से बेमतलब लाड़ जताकरडैडी से रेत के घर बनवाकरभैया की साइकिल के पैडल घुमाकर दीदी की गुड़िया को भूत बनाकरभरी दुपहरी में हर घर की घंटी बजाकर भाग जाएँबागों में छुप छुपकर आम चुराएँ और मधुर मिष्टी यादों को फिर से सहलाएँ। है न दोस्तों!

music 

बातें बचपन की हैंयूँ ही ख़त्म करने का मन नहीं करतापर.....क्या करें.....समय की बाध्यता है! मेरी इन सब शैतानियों में आपकी वाली शैतानी कौन सी थीअपने बचपन के किस्से कहानियाँ मुझे मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनिएगा ज़रूर… हो सकता है,मेरे बचपन की कहानी में आपके भी किस्से छिपे हों...! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ लिए....आपकी मीत....मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE  3

प्यार को प्यार ही रहने दो 13/02/2026 

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तएक किस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत  लीजिए हाज़िर हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर कुछ पुरानी यादेंउसी मखमली आवाज़ के साथ...आज हम बात करने जा रहे हैं, ‘प्रेम दिवस’ यानी ‘वैलेंस्टाइंस डे’ की। बस मनाने ही तो जा रहे हैं हमप्रेम का यह दिवसप्रेम का एक ही दिवस? खैर ‘वैलेंस्टाइंस डे’ के मौके पर बाज़ार गिफ़्ट्सबहुत से सुर्ख गुलाबों और ग्रीटिंग कार्ड्स से अटे रहते हैंबाज़ारीकरणउदारवाद और ग्लोबलाइज़ेशन का सही रूप स्वरूप इन मौकों पर ही तो उजागर होता है। मैंने सोचाचलोबाज़ार की रौनक देखी जाएकुछ अपने वैलंटाइन के लिए भी गिफ़्ट ले लिया जाए। बदलते दौर में उम्र या अवस्था थोड़े ही मायने रखती हैसो आर्चीज़ गैलरी पहुँचीवास्तव में गिफ्ट्स की सुंदरताउन पर लिखे संदेशों ने मन मोह लिया। रंग  बिरंगेबड़े ही क्रिएटिव गिफ्ट्स वहाँ दिखाई दिए। अभी गिफ्ट्स की सुंदरता को निहार ही रही थी कि एक लड़की की आवाज़ सुनाई दीभैयाये सारे कार्ड्स और गिफ़्ट्स पैक कर दीजिए अलग  अलग! उस लड़की के साथ एक और लड़की थीजो उसके कानों में कुछ फुसफुसाई......दोनों ठहाका मार कर हँसने लगीं....!!!

मैं सोचने लगी.....कितने वैलंटाइन होंगेवैलनटाइंस डे’ क्या सचमुच ‘प्रेम दिवस’ को कहते हैं? क्या प्यार प्यार रह गया हैया व्यापार बन कर रह गया हैक्या फिर मौज मस्ती को प्यार का नाम दिया जा रहा हैप्यार तो एब्सट्रैक्ट होता हैसूक्ष्म होता है दोस्तों! प्रेम कोई भावना नहीं होतीप्रेम तो आपका अस्तित्व होता है। व्यक्त्तित्व बदलता हैशरीरमन और व्यवहार बदलते रहते हैंकिंतु हर व्यक्त्तित्व से परे जो अपरिवर्तनशील हैजो कभी नहीं बदलतावही प्रेम हैवही तो प्यार है! शायर की मानेंतो वह दिल को दुखाने के लिए ही सहीफिर से उसे छोड़ के जाने के लिए ही सहीअपने प्रेमी को पुकारता हैक्योंकि उसका मानना है कि प्रेममुहब्बत की होश वालों को ख़बर ही नहीं होतीवे तो जानते ही नहीं कि बे  ख़ुदी किसे कहते हैंइसे तो केवल वही समझ सकता हैजिसने कभी इश्क़ किया होप्रेम का अनुभव किया हो।

MUSIC 

दोस्तों! प्यारमुहब्बत या प्रेम एक एहसास हैजो दिमाग से नहीं दिल में रहता है। यह एक मज़बूत आकर्षण और निजी जुड़ाव हैजो सब कुछ भूलकर उसके साथ जाने को प्रेरित करता हैजिससे आप प्रेम करते हैं। सच्चा प्यार वह होता हैजो सभी हालातों में आप के साथ होयानी आपके दुख को अपना दुख और आप की खुशियों को अपनी खुशियाँ माने। कहते हैं कि अगर प्यार होता हैतो हमारी ज़िंदगी बदल जाती है। पर ज़िंदगी बदलती है या नहींयह इंसान पर निर्भर करता है। पर प्यार इंसान को ज़रूर बदल देता है। प्यार का मतलब सिर्फ़ यह नहीं है कि हम हमेशा उसके साथ रहेप्यार तो एक  दूसरे से दूर रहने पर भी खत्म नहीं होतादूर कितने भी होअहसास हमेशा पास होता है।

प्यार को अक्सर वासना के साथ जोड़कर देखा जाता है। भला ऐसा प्यार भी कैसा प्यार हैजिसमें केवल भौतिक देह का ही महत्व होभगवान कृष्ण और राधा के बीच भी तो प्रेम का रिश्ता थापर यह शारीरिक नहीं थाबल्कि भक्ति का एक विशुद्ध रूप थानिःस्वार्थ प्रेम थाआत्मिक प्रेम था। प्रेम व्यक्ति के जीवन की पराकाष्ठा होती हैजो समर्पण भाव की अंतरिम घटना हैजबकि वासना व्यक्ति के खोखले जीवन में पूर्ति  पिपासा की तृप्ति की घटना हैजो आजकल के तथाकथित प्यार में निहित है। वासना के सतह पर उलझा मनुष्य प्रेम की नहींदेह की माँग करता है। वासना से भरा पुरुष हमेशा स्त्री को पूज्या नहीं भोग्या ही समझता है। है न दोस्तों!

MUSIC

चलिए दोस्तों! अब बात करते हैं उस उदात्त प्रेम की..जिसके लिए अनेक फ़कीरों नेभक्तों ने तड़प  तड़प के प्राण त्याग दिए....वे अपने रब कोअपने खुदा को मैदानों मेंरेगिस्तानों मेंपर्वतों परदरिया में ढूँढते  ढूँढते अपना जीवन ही गवाँ बैठे....पर वे दीवाने मर कर भी अमर हो गए...उनका नाम फ़िज़ाओं में घुल गया हमेशा के लिए...खुशबू बन कर बस गया फूलों में सदा के लिए…रंग बन कर समा गया है इंद्रधनुष के रंगों में......क्षितिज के उस पार से झाँक कर मुस्कराता है वह....साँसारिक प्रेम सागर के जैसा हैपरंतु सागर की भी सीमा होती है। दिव्य प्रेम आकाश के जैसा हैजिसकी कोई सीमा नहीं होती। उस चांद को जानेंउसे समझेंजिसकी चाह में चातक पक्षी जान दिए रहता है......टकटकी बांधे....निःस्वार्थ भाव से...मगन होकर बस निहारता है|

 

MUSIC

 

दोस्तों! पिछले दिनों "विवाह" फिल्म देखी। वाह! क्या फिल्म हैयह एक पारिवारिक प्रेम कहानी है और एक पारंपरिक भारतीय विवाह के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैजिसमें कई महत्वपूर्ण संदेश छिपे हुए हैं। कहानी एक छोटे शहर की लड़की पूनम और प्रेम की हैजो एक बड़े उद्योगपति का बेटा है। दोनों के परिवारों की सहमति से उनका रिश्ता तय होता है। विवाह की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। विवाह से ठीक पहलेएक दुर्घटना में पूनम का चेहरा और हाथ बुरी तरह जल जाते हैं। परिवार और समाज के दबाव के बावजूदप्रेम पूनम का साथ नहीं छोड़ता और अपने प्रेम और वचन को निभाने का फैसला करता है। प्रेम का यह निर्णय सच्चे प्रेम और समर्पण का प्रतीक बन जाता हैवह पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों को उच्चतम महत्व देता हैवह पूनम की आंतरिक सुंदरता से प्रेम करता हैन कि उसके बाहरी रूप से। आपने देखी है यह फिल्म

 

MUSIC

 

जी दोस्तोंहमने बात शुरू की थी "प्रेम  दिवस" से.... ‘वैलेंस्टाइंस डे’ सेपर सवाल वही है, प्रेम के लिए एक़ ही दिन क्योंजैसे ही ऐसा सोचावैसे ही बादल का एक टुकड़ा चुपके से धरती को भिगो गया और मैं.... मैं मिट्टी में मिल कर महकने लगी। जिस पल कली फूल बन रही थीकोई उसमें  रंग और खुशबू भर रहा थाउस पल मैं ही तो साँस ले रही थीजब गुलाब धीरे धीरे सुर्ख हो रहे थे और दिल धड़कना सीख रहा थाउस पल से मैं साथ हूँ सबकेक्योंकि मैं ही तो प्रेम हूँ। इतनी बड़ी दुनिया में हज़ारों चेहरों के बीच कोई एक चेहरा जब हमें भाने लगेजिसके ख्याल से हमारा दिल धड़कने लगेजिसकी हर बात हमें हमसे जुदा करने लगेजिसके लिए हमारे मन में अहसासों का कलश भरने लगे और ये अहसास आँखों के रास्ते छलकने लगेंआँसू गालों पे आ  आकर ढलकने लगेंकोई तस्वीर दिल में खिंचने लगेजिसे हम जितना भुलाएँ और वो उतना ही करीब महसूस होने लगेहवाओं में उसके होने की खुशबू आने लगेआँखों में नमी रहने लगेमन की दहलीज़ पे आहट होने लगेहोंठ चुप हो जाएँमगर आखें बोलने लगेकोई सर्दी में धूप  सा और गर्मी में शाम  सा लगने लगेबिन बरसात हम भीगने लगें   उस पल समझ लेना कि हमें किसी से मोहब्बत हो गई है।

 

है न दोस्तों!.....

 

MUSIC

 

कोई एक दिन नहीं होता प्यार का... ना एक साल... ना एक जनम...और तो और मौत पर भी यह कहानी ख़त्म नहीं होती। यह सदियों से है और सदियों तक रहेगा। हाँ... लेकिन जब हम इसे छू कर देखना चाहते हैंअपनी मुठ्ठी में इसे कैद कर लेना चाहते हैंतब यह चुपचाप उड़ जाता हैहै न अजीब  सी शयआज तक इसका रहस्य कोई नहीं जान पाया। लेकिन यह जानता है कि कौन  सा हिस्सा किस का हैकौन  सा टुकड़ा कहाँ जोड़ा जाएगाकिस बंद दरवाज़े पे दस्तक देनी है और किस मकान से चुपचाप निकल जाना है। ये सारी कायनात प्यार के दम से चलती हैकिस को किसके लिए ज़मीं पे बुलाया गया हैइसके लिए देशसीमाकालसरहदेंउम्रकुछ भी मायने नहीं रखती। यह सागर को रेगिस्तान में बदल कर रेत के कणों में मुस्काता हैरेगिस्तानों में मरूद्यान खिलाता है...और....बदले में कुछ नहीं माँगतायह रुकता नहीं कहीं...ठहरता भी नहीं कभी।

 

प्यार पत्तियों में हरापन बन करहमारी देह में लहू बन कर बहता हैइसे डालियों से तोड़े गए गुलाबों मेंग्रीटिंग कार्डों या मंहगे तोहफ़ों में मत खोजनासिर्फ़ महसूस करना आँखें बंद करके। जिस पल कोई तुमसे से होकर गुज़रने लगेतुम उसे सोचो और वो झट से पास आ बैठेचाहे ख्यालों में ही सहीउसका ना होना भी होना लगेभरी दुनिया में कोई तुम्हें तनहा करने लगेउस पल समझ लेनातुम्हें मोहब्बत हो गई हैप्यार हो गया है। फिर प्यार तो प्यार हैइसे हम कोई नाम देंऐसा ज़रूरी तो नहीं….. यह तो प्यार हैबस प्यार है...बस प्यार है....!! यही तो शाश्वत हैयही तो चिरस्थाई हैहै न दोस्तों!

 

MUSIC

 

ये प्यार की बातें हैं दोस्तों! यूँ ही ख़त्म करने का मन नहीं करतापर.....हाँआपके प्यार के किस्से सुनाने हैं मुझे! अपने प्रेम की कहानी  मैसेज बॉक्स में लिखाकर भेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

 

सुनिएगा ज़रूर… हो सकता हैमेरे प्यार की कहानी में आपके भी किस्से छिपे हों.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

 

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से  कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

 

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE  4

दोइ नैना मत खाइयो 27/02/2026

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से  कहानियां सुनाने वाली आपकी मीत|जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...जी हाँ दोस्तोंआज मैं बात करूंगी कुछ रूहानीप्रेम की उस पराकाष्ठा की जहाँ विरहिणी कह उठती है 

कागा सब तन खाइयो मेरा चुन चुन खाइयो माँस,

दो नैना मत खाइयो मोहे पिया मिलन की आस…।

MUSIC

दोस्तों! आखिर क्या अर्थ हैक्या मायने हैं बाबा फ़रीद की इन पंक्तियों केजिन्हें मैं बचपन से सुनती आई हूँपहले इनका अर्थ समझ ही नहीं आता था। कागा यानी ‘कौए’ से कोई ऐसा क्यों कहेगा?
कि चाहे मेरे तन को तुम नष्ट कर दोपर मेरी दो आँखों को नष्ट मत करनाक्योकि उनमें पिया से मिलने की आस भरी हुई हैजैसे  जैसे ज़िंदगी बहती गई और रंग दिखाती गईइन पंक्तियों के अर्थ समझ आने लगे। एक दिन ध्यान में बैठे बाबा फ़रीद को एक गहन अनुभूति हुई और वे कह उठे   कि पिया की राह तकते  तकते वियोगी स्त्री वृद्धा हो गई हैअब मौत की कगार पर खड़ी है और उस मुक़ाम पर वह कहती है कि ‘अरे कागा! अरे कौवे! इस शरीर की मुझे बहुत परवाह नहीं। अब मर तो मैं जाऊँगी हीतुझे जहाँ  जहाँ से माँस नोचना होगानोच लेनाचुग  चुग कर खा लेनापर.. पर आँखें छोड़ देना मेरी। नैनों पर चोंच मत मारना।’ क्योंक्योंकि इनमें पिया मिलन की प्यास हैपिया मिलन की आस हैपिया मिलन का विश्वास है।
समझे न दोस्तों?
MUSIC
दोस्तों! हमारी पूरी हस्ती मेंदेह मेंसिर्फ़ वह अंग सबसे महत्वपूर्ण हैजो प्रियतम से जुड़ा हैजिसमें प्रियतम बसे हुए हैंबाक़ी सब निरर्थक है। बाक़ी सब चाहे नष्ट हो जाएकोई बात नहींपर जो कुछ ऐसा हैजो जुड़ गया प्रीतम सेवो नष्ट नहीं होना चाहिए।
कई बार सोचती हूँ दोस्तों! बहुत कुछ हैं हमऔर बहुत सी दिशाओं में भागते रहते हैं हम। हमारे सारे उपक्रमों मेंहमारी सारी दिशाओं मेंसिर्फ़ वो काम और वो दिशा क़ीमती हैजो उस पिया की ओर जाती है। चौबीस घंटे का दिन हैं नबहुत कुछ किया दिन भरवो सब कचरा था। उसमें से क़ीमती क्या थाबस वोजिसकी दिशा प्रीतम की ओर जाती हो। और संत वोजिसकी धड़कन भी आँख बन जाएजो नख  शिख नैन हो जाएजिसका रोंया  रोंयाजिसकी हर कोशिका सिर्फ़ प्रीतम की ओर देख रही होवो साँस ले रहा होतो किसके लिएजी हाँ दोस्तों! उसी प्रीतम के लिए।
कभी  कभी सोचती हूँ दोस्तों! कि क्या कागा का मतलब दुनिया के वे तमाम रिश्तेजो स्वार्थज़रुरतईर्ष्या और ठगी पर टिके हैंजो सदैव आपसे कुछ ना कुछ लेने की बाट जोहते हैंकभी बहिन बनकरकभी भाई बनकरकभी पतिकभी पत्नीकभी दोस्त या कभी संतान बनकर हमें ठगते हैंक्या उनके मुखौटों के पीछे एक कागा ही होता हैजो अपनी नुकीली चोंच से हमारे वजूद कोहमारे अस्तित्व कोहमारे व्यक्तित्व कोहमारे स्व कोहमारे निज को खाता रहता है? हम लाख छुड़ाना चाहें खुद कोवो हमें नहीं छोड़ता। वो हमारी देह कोहमारे तन को खाता रहता हैचुन  चुन कर माँस का भक्षण करता रहता है। वो कई बार अलग  अलग नामों सेअलग  अलग रूपों में हमसे जुड़ता है और धीरे  धीरे हमें खत्म किए जाता है। ये तो हुआ कागा पर......हम कौन हैं?
क्या सिर्फ़ देह?
सिर्फ़ भोगने की वस्तु?
किसी की ज़रूरत का डिमाँड ड्राफ्ट?
और पिया कौन है?
क्या पिया वो परमात्मा हैजिससे मिलने की चाह में हम ज़िंदा हैंबताइए न दोस्तों!
MUSIC
कागा के द्वारा संपूर्ण रूप से तन को खाए जाने का भी हमें ग़म नहींबल्कि हम तो निवेदन करते हैं कि “दो नैना मत खाइयोमोहे पिया मिलन की आस”      तो कौन है ये पियायक़ीनन वो परमात्मा ही होगाजिसकी तलाश में ये दो नैना टकटकी लगाए हैं कि बस अब बहुत हुआअब आ भी जाओ और सांसों के बंधन से देह को मुक्त कर दो। कितना दर्द..... कितना गहरा अर्थ है इन पंक्तियों में.....और कागा क्या करता है?
वो अपना काम बखूबी करता है। अपनी ज़रूरतअपने अवसर और अपने सुख के लिए वो माँ स का भक्षण किए जाता है…किए जाता है। उसे विरहिणी की आँखों मेंया मन में झाँकने की फुर्सत ही नहीं है। वो तो देह का सौदागर है न...और सौदागरों ने हमेशा अपने लाभ देखे हैंअपने स्वार्थ ही साधे हैं,किसी की आँखों में बहते दर्दवे तो उन्हें दिखते ही नहीं....और ना ही दिखती है पराई पीर । इसीलिए वो विरहिणी कह उठी होगी कि “कागा सब तन खाइयो...”
MUSIC
इसी लिए कहती हूँ दोस्तों! अगर हमारा हाथ उठ रहा हैतो किसके लिएदिल धड़क रहा हैतो किसके लिएआहार ले रहे हैंतो किसके लिएगति भी कर रहे हैंतो किसके लिएउस पिया के लिए न...और पिया...पियातो कहीं ओट में छिपा बैठा है...कहीं दूर...झील के उस पार...उस पार है पिया.....दूर झील के उस पार है पिया....पिया जो बुलाता तो है उस पार से,पर दिखता नहीं...दिखता नहींतो क्या हुआ...यकीनन वह हैहै और विरहिणी की पीड़ा से वाकिफ़ भी हैतभी तो बसा है नैनों मेंयाद है न मीरा क्या कहती थींबसो मेरे नैनन में नंदलाल...|
जी हाँ दोस्तों! जिएँ तो ऐसे जिएँकि हर आसहर प्यास , बस उसके दर पर जाकर ठहर जाए। वरना तोसमय काटने के बहाने और तरीक़े हज़ारों हैं दुनिया में।
आँखें बचाने लायक सिर्फ़ तब हैजब हम ‘उसको’ तलाशें। हमारी आँखों की छवि में उसका तस्सवुरउसका नूर होइसलिए दोस्तों! यह समझना होगा कि शरीर तो नश्वर है और यह नष्ट हो जाएगालेकिन आत्मा और उसकी ईश्वर से मिलने की आकांक्षा अमर है। शरीर चाहे नष्ट हो जाएलेकिन आत्मा की परमात्मा से मिलने की इच्छा हमेशा जीवित रहती है। यह एक विशेष निवेदन है कि "दोइ नैना मत खाइयो" यानी मेरे दोनों नेत्रों को मत खानाक्योंकि इन नेत्रों में मेरे प्रिय से मिलने की आस बसी हुई हैपरमात्मा से मिलने की अभिलाषा बसी हुई हैजो मेरे जीवन का अंतिम लक्ष्य है। है न दोस्तों!
MUSIC
बातों के सिलसिले को यूँ ही ख़त्म करने का मन नहीं करता दोस्तोंपर.....क्या करें.....पिया तो अपरंपार हैउसकी बातें भी अपरंपार हैंअपने पिया के किस्से  कहानियाँ मुझे मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!
सुनिएगा ज़रूर… हो सकता है,बाबा फ़रीद की विरहिणी की कहानी में आपके भी किस्से छिपे हों.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...
नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से  कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...
END MUSIC


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EPISODE-5

गंगा तेरा पानी अमृत 13/03/2026
INTRO MUSIC
नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से- कहानियां सुनाने वाली आपकी मीत| जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...| जी हाँ दोस्तों, आज मैं बात करूंगी उस अमृत-धारा की, उस पीयूष-स्रोत की, जिसने न केवल भारत के वक्षस्थल पर सभ्यता और संस्कृति के फूल खिलाए, बल्कि समस्त मानवता में सद्गुणों का आह्वान किया| जी हाँ, मैं बात कर रही हूँ, भागीरथी की, मंदाकिनी की, माँ गंगा की....
MUSIC
हुआ यूँ,पिछले दिनों ऋषिकेश जाना हुआ| गंगा के जल की कल-कल ध्वनि में जैसे कोई राग बहता है| हर लहर में जैसे कोई मंत्र छुपा रहता है, हर घाट पर ध्यान-सा लगा रहता है, नीले आकाश की छाँव तले हरियाली की चादर ओढ़े पर्वत गौरवशाली लगते हैं, जहाँ हवा भी जपती है नाम और सूरज भी करता है आरती हरदम| लक्ष्मण झूले की डोर में बंधा प्राचीनता और आधुनिकता का संगम, संतों की वाणी, योगियों की साधना, यह सब हर मोड़ पर मिलते हैं| लगता है जैसे आत्माओं का समागम हो रहा हो,संगम हो रहा हो| ऋषिकेश की सुंदरता केवल दृश्य नहीं है, एक अद्भुत व अविस्मरणीय अनुभव है|
इसी खुमारी में सारा दिन बीत गया, और फिर आई रात| ऐसा लगा कि कुछ अजीब-सी आवाज़ें सुनाई दे रही हैं| ऐसा लगा जैसे दो लोग आपस में बातें कर रहे हैं| ध्यान से सुना, तो पता चला कि ये आवाज़ें गंगा-तट से आ रही थीं| पास जाकर सुना, तो दोस्तों! ये तो गंगा जी के दो किनारे थे, जो आपस में बतिया रहे थे| फिर क्या था..मैं ध्यान से सुनने लगी|
MUSIC
एक किनारा बड़ी ही बेबाकी से बोला, हे मित्र! गंगा के किनारे बने-बने मैं तो उकता गया हूँ | ये चंचल लहरें दिन-भर मुझे परेशान करती हैं| मैं शांति से यहाँ रहना चाहता हूँ , ये मुझे अशांत करती रहती हैं| बिना पूछे छूती रहती हैं| मैं नहीं चाहता, फिर भी ये भिगो देती हैं| दिन हो या रात, यूँ ही कितना शोर किया करती हैं, मानो इन्होंने कसम खा रखी हो कि सदियों तक ये मेरा पीछा नहीं छोड़ेंगी | अपने साथी की बात सुनकर दूसरा किनारा मुस्करा दिया और हँस कर जवाब देने लगा, हे मित्र! तुम कुछ ज्यादा ही सोचते हो| हम पत्थर के किनारे हैं, जड़ हैं, हमारे पास कुछ भी ऐसा नहीं है, जो हमारे जीवन में खुशियां लाए| हमें तो इन लहरों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि ये रोज़ हमसे मिलने चली आती हैं, सोचो, मिलने तो आती हैं, वरना हम यूँ ही अकेले-अकेले सूखे-सूखे से रह जाते| लहरें हैं, तभी तो हमारा जीवन गतिमान है| दूसरे किनारे ने फिर बात संभाली और कहा, मत भूलो भाई, हमारा अस्तित्व गंगा की इन्हीं लहरों की वजह से है| किनारे कितनी भी टूटे-फूटे हों, लहरें फिर भी उनसे प्रेम करती हैं और गंगा के तट पर आने वाले कभी भी किनारों के खुरदुरेपन को नहीं देखतेवे प्रेम से हमारे समीप बैठते हैं, प्रतीक्षा करते हैं,किसकी? जी हाँ, लहरों की|
MUSIC
उन किनारों को कभी देखा है मित्र, जिनके पास लहरें नहीं आतीं| उन उदास किनारों के पास कोई नहीं जाता.. ना रात को कोई दीपक जलाने जाता है, ना सुबह को सिर झुकाने| वे सब सदियों से लहरों की प्रतीक्षा में हैं, पर लहरों का सान्निध्य उन्हें नहीं मिलता| दूर-दूर तक सिर्फ़ सन्नाटा है, ना कोई जीव,ना कोई जीवन..तुम तो यूँ ही उदास रहते हो|
पहला किनारा कहाँ कम था अपनी बात रखने में, कहने लगा, तुम मानो या ना मानो मित्र, यह गंगा ज़रूर स्वर्ग से भी इसी चंचलता की वजह से निष्कासित की गई होगी| यहाँ धरती पर आकर भी यह चैन नहीं लेने देती हमेंआखिर क्यों बहती है गंगा?
दूसरे किनारे ने फिर अपनी बात रखी, हो सकता है मित्र, तुम सही हो, लेकिन यह भी हो सकता है कि गंगा लोगों को तृप्त करने के लिए बहती हो, लोगों की अशुद्धियां और कलंक खुद में समेटना इसे रुचिकर लगता हो, सभी को अपने प्रेम का अमृत देना चाहती हो, यह भी वजह हो सकती है ना.. !
तभी एक सुरीली सी आवाज़ सुनाई दी, आवाज़ थी या कोकिला का स्वर, अरे जड़ किनारों! बहुत देर से मैं तुम लोगों की बातें सुन रही हूँ, मैं गंगा हूँ, गंगा माँ| गंगा सदियों से बहती आई है| स्वर्ग में भी शिव के शीश पर थी और इस धरती पर भी मुझे हमेशा सम्मान से स्वीकारा गया| मुझे मान और अपमान का कतई भय नहीं है| किसी को देने या किसी से कुछ पाने की भी मेरी कोई चाह नहीं है| मेरा कोई स्वार्थ नहीं है, मैं पवित्र, निश्छल, निःशब्द बहती रही हूँ , और बहती रहूँगी| मुझे छूकर लोग सौगंध दिखाएँ, दिए जलाएँ या अपनी अशुद्धियां मुझ में छोड़ जाएँ, मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता| मानो तो मैं गंगा माँ हूँ, ना मानो तो बहता पानी| हे किनारों, तुमसे टकरा-टकराकर मेरी लहरें बिखर-बिखर जाती हैं| तुम उनसे कुछ सीखो, जब तक तुम अपने झूठे अहम से अकड़े रहोगे, तब तक जड़ ही बने रहोगे| तुम्हारे कांधों पर मेरी लहरों ने कुछ पल यदि विश्राम कर लिया, तो तुममें गुरूर आ गया, मेरे बहने पर ही सवाल उठाने लगे, मेरे बहने की गति पर ही प्रश्न करने लगे| यही तो दुर्भाग्य है नदी और नारी, दोनों का, दोनों का खूब दोहन, खूब शोषण किया जाता है| यदि कोई नदी या नारी चुपचाप बहती चलती है, तो उसकी इस खामोशी पर भी संदेह किए जाते हैं और जो वह वाचाल हो जाए, तो फिर कहना ही क्या? वह सदियों से आरोपी बनाई जाती रही है| सदियों से दूसरों के लिए बहना, सहना और फिर भी प्रेम करते जाना, यह हम ही कर सकती हैं, एक नारी कर सकती है, या मैं कर सकती हूँ क्योंकि मैं गंगा हूँ | पर तुम सोचो कि तुम कर लोगे यह सब? तो यह तुमसे ना हो पाएगा|
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क्यों ना हो पाएगा? क्योंकि तुम पत्थर हो, तुम में कोई संवेदन नहीं, संवेदना नहीं, स्पंदन नहीं, देखना, जब तुम टूटोगे एक दिन, कयामत के उस दिन, मेरे प्रेम से भी तुम नहीं पिघल पाओगे, मेरे साथ नहीं बच पाओगे, पर मैं तुम्हारे लिए ठहरूंगी नहीं ,आगे चल दूंगी क्योंकि चलने का नाम ही जीवन है| साहस है यदि तो, तुम मुझ में डूब जाओ, पिघल जाओ, तरल बन जाओ| तुम सोच रहे होंगे, कि ऐसा क्यों कह रही हूँ तुमसे, क्योंकि मैं तरल हूँ, तभी मैं प्रेम कर पाती हूँ| तुम जड़ हो, इसलिए मुझ तक कभी नहीं पहुँच पाए| तुमने जीवन में झूमना, झुकना और लहराना तो सीखा ही नहीं| इसीलिए मुझे ही आना पड़ता है तुम तक, तुम तो कभी नहीं आए मेरे पास| आज तुम्हारी बातों से मेरा मन व्यथित हुआ है|
हे जड़ किनारों, तुम यूँ ही पत्थर बनकर तरसते रहो, सदियों तक कोई लहर तुम्हें अपना ना समझे, तुम्हें छुए और दूर चली जाए और तुम..तुम उसे आवाज़ भी ना दे सको| मैं गंगा हूँ, मैं असीम से आई हूँ, एक दिन उसी असीम में ही मिल जाऊंगी मैं| मैं अपनी अनंत यात्रा पर हूँ, समझे, अब कभी ना कहना कि गंगा बहती क्यों है? और मेरी एक सलाह भी है तुम्हें, क्यों ना तुम भी तरल बन जाओ? क्यों ना तुम भी बहना सीखो? क्यों ना तुम भी संवेदनशील हो जाओ? क्यों न तुम भी प्रेममय हो जाओ, बहो ना मेरे साथ, बहो न.. !
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दोस्तों! माँ गंगा के प्रति हम सभी की भावनाएं जुड़ी हैं, इसीलिए बहुत से अनुभव, किस्से-कहानियाँ भी होंगे| मुझे मैसेज बॉक्स में अपनी भावनाएं लिखकर प्रेषित कीजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....मेरे अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!
सुनते रहिए, हो सकता है, जाह्नवी की कहानी में आपके भी किस्से छिपे हों.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...
नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से-कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

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*************************************************************EPISODE  6

जाजी ले अपनी ज़िंदगी 27/03/2026

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नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तएक किस्से  कहानियां सुनाने वाली आपकी मीत  लीजिए हाज़िर हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर कुछ पुरानी यादेंउसी मखमली आवाज़ के साथ...आज हम बात करने जा रहे हैं सिमरन की..और सिमरन की ज़िंदगी की.. सिमरन के रिश्तों की..आपको सिमरन तो याद है ना.. दोस्तों..

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      कल टीवी के चैनल बदलते हुए एक डायलॉग कानों में पड़ा, ‘जा सिमरन जाजी ले अपनी ज़िंदगी’…..मैं सोचने लगी कि कहने को तो ये एक फिल्मी डायलॉग हैपर असल में गहरा अर्थ छिपा है इसमें....वैसे सोचा जाए तो हम में से कितने लोग अपनी ज़िंदगी जी पाते हैं?....कुछ लोग कहते हैं कि वे तो बस काट रहे हैं....कुछ कहते हैं कि बस कट रही है ज़िंदगी....बहुत कम लोग ऐसे होते हैंजो अपने भीतर झाँकते हैं और ज़िंदगी जीने की कोशिश करते हैं यानी अपने सपनों को परवाज़ देते हैं ..

"जा सिमरन जाजी ले अपनी ज़िंदगी" का आखिर अर्थ क्या हैभाव क्या हैमुझे तो यही समझ आता है कि किसी व्यक्ति को उसकी ज़िंदगी उसकी अपनी शर्तों पर जीने की आज़ादी। जीवन को अपनी मर्जी से जीना चाहिए और अपने सपनों को पूरा करने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहिए। यह डायलॉग स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय का प्रतीक है। इस वाक्य में सिमरन के पिता उसे स्वतंत्रता और अपनी इच्छाओं के अनुरूप जीवन जीने की अनुमति दे रहे हैं। यह एक महत्वपूर्ण और भावनात्मक क्षण हैजहाँ एक पिता अपनी बेटी को उसकी खुशियों और सपनों की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहा हैभले ही इसका मतलब हो कि इसके लिए उसे अपनी परंपराओं से परे जाना होगा । यह संवाद आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी है। इसका अर्थ यह भी है कि खुद को पहचानो। समाज की सड़ी  गली मान्यताओं को तोड़ अपने लिए अपनी पसंद के रास्ते चुनो। जो जीर्ण  शीर्ण हो गया होउस प्रासाद को तो ध्वस्त होना ही होगानहीं तो नवनिर्माण के नए अंकुर कैसे खिलेंगे?, है न दोस्तों! बेबी स्टेप्स ही सहीस्टेप्स तो लेने होंगे न । कोई भी प्राणी होसब उन्मुक्तता चाहते हैंकोई बंधन नहीं चाहताचाहे वे सोने के ही बंधंन क्यों न होंहम इस धरती पर आए हैं किसी निमित्त के साथ....उस निमित्त को पूरा करने के लिए जीना ज़रूरी हैऔर केवल जीना ही नहींआनंद के साथ जीनाखुद को और दूसरों को प्रेरित करनाजीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनानाछोटी  छोटी खुशियों का महत्व समझना। है न दोस्तों!

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पिछले दिनों एक मित्र का संदेश मिलाजिसमें उन्होंने अपनी एक समस्या साझा की थी। मित्र की समस्या को जानकर मुझे लगा कि ना जाने कितने लोग इस तरह की समस्या से गुज़र रहे होंगे और ज़िंदगी को निराशा में डुबा चुके होंगे। उन्होंने अपनी  ज़िंदगी के सुंदर सपनों के बारे में लिखा थापर यह भी लिखा था कि जिसके साथ ये सपने देखे थेवो अब उनकी ज़िंदगी से दूर चली गई हैकभी वापस न आने के लिए। ज़िंदगी में बहुत कुछ ऐसा घटता हैजिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती है। लोग मिलते हैअलग हो जाते हैंबिछड़ जाते हैंपुराने साथी छूटते हैंसदा  सदा के लिए.. लेकिन कुछ समय बाद नए मिल जाते हैंज़िंदगी यूँ ही चलती रहती है। यह सामान्य  सी बात हैलेकिन असामान्य बात यह हुई कि मेरे मित्र अभी तक उस रिश्ते से खुद को अलग नहीं कर पा रहे हैं। जो चला गयाउसकी याद में ज़िंदगी तबाह करना और अब उसकी ख़ुशी के लिए हर वो काम करनाजो वो चाहता था। उसके सिवा किसी और को मन में न बसाना क्योंकि प्रेम तो एक बार ही होता है आदि आदि... हज़ारों बातें... अक्सर ऐसी बातें हमें अपने आसपास सुनने को मिल ही जाती हैं और ऐसे लोग भी दिख जाते हैंजिन्होंने किसी व्यक्ति विशेष के कारण अपनी ज़िंदगी को बरबाद कर लिया हो। प्रेम जिससे थावो मिला नहींतो विवाह ही नहीं किया या समाज के दबाव में आकरकर भी लियातो ज़िंदगी भर अतीत से चिपके रहे और वर्तमान को दरकिनार कर दिया। सुनने मेंपढ़ने में ये बातें साधारण लगती हैंलेकिन बिलकुल भी साधारण नहीं हैं। कितने लोग हैंजो अपने साथी के बिछड़ने के गम में या तो खुद को चोट पहुँचाते हैं या अपने साथी को चोट पहुँचाते हैं या फिर नशे के अंधेरों में खो जाते हैं। ऐसी असामान्यता पढ़े  लिखे मेच्योर लोग में भी दिखती है। अरे भईआप बंदरिया की तरह मरे हुए बच्चे से क्यों चिपके हुए हैंमरे हुए बच्चे यानी मरे हुए रिश्ते.... वे संबंध जिनका आपके जीवन में अब कोई अस्तित्व ही नहीं है।

दोस्तों! यहाँ एक बात और जोड़ना चाहती हूँ कि अक्सर महिलाओं को अति भावुक और अति संवेदनशील समझा जाता है तथा दलीलें दी जाती हैं कि प्रेम और रिश्तों के मामलों में महिलाएँ ज़्यादा सच्चाई के साथ जुड़ती हैं या कि महिलाएँ शिद्दत से प्रेम करती हैं और पुरुष प्रेम को यूँ ही हलके तौर पर लेता है। लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि पुरुष जब किसी के साथ खुद को जोड़ते हैंतो वे आसानी से अपने साथी को भुला नहीं पातेवे शिद्दत से उससे जुड़े ही रहते हैं। महिलाएँ जहाँ विवाह के बाद अपनी नई दुनिया में रम जाती हैंवहीं पुरुष ज़िंदगी भर अपने दिल पे बोझ लिए घूमते रहते हैं। एक और फिल्म की बात करते हैं, ‘वो सात दिन’। कुछ याद आया दोस्तों?

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अब सवाल यह है कि क्या सच में प्रेम इतनी बड़ी चीज़ है कि आप खुद को मिटा देंया जिसे प्रेम करते हैंउसे ही मिटा देया फिर अपनी पूरी ज़िंदगी को ही तबाह कर डालेंया फिर उसकी ज़िंदगी को ही तबाह कर डालेंक्या खुदा नेईश्वर ने प्रेम इसीलिए बनाया है?

प्रेम तो एक प्रबल सकारात्मक संवेग हैजो एक बार अपने लक्ष्य को तय कर लेता हैतो दूसरे सभी लक्ष्य गौण हो जाते हैं। मनुष्य अपने उस लक्ष्य को ज़िंदगी की ज़रूरत और हितों का केंद्र बना लेता है। जैसे देश से प्रेम करनामाँ का बच्चों के प्रति स्नेहसंगीत या किसी कला के प्रति प्रेम आदि  आदि। कुछ लोग अपने प्रिय पात्र के अलावा किसी और से प्रेम नहीं कर पाते। कोई व्यक्ति  विशेष उनके लिए सबसे अहम हो जाता हैअपने प्रिय पात्र को हासिल करने के अलावा उनके जीवन का कोई लक्ष्य रहता ही नहीं। इस राह में जो भी बाधाएँ आती हैंउन्हें वो हटा देना चाहते हैंचाहे समाज के नियम हों या परिवार की मर्यादा। आए दिन होने वाले विवाहेतर संबंधोंएक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के मूल में भी यही मंशा काम करती है। परिणाम चाहे जो भी होलेकिन प्रेम के नाम पर ये अपराध बखूबी हो रहे हैं। है न दोस्तों!

आप जहाँ हैजिसके साथ हैउसे ही प्रेम कीजिए। यह नहीं हो सकतातो खुद से प्रेम कीजिए। याद रखिएप्रेम एक गहरी समझ हैएक घटना हैजो किसी भी क्षण आपकी ज़िंदगी में घट सकती है। आपके रोकने से या तर्कों से वो रुकने वाली नहीं है। वो झरने के वेग की भांति निर्बाध गति से बहती है।  हम अपने ज़िंदगी में कई बारकई तरह का और बार  बार प्रेम करते हैं क्योंकि प्रेम हमारी ज़रूरत हैहमारे अस्तित्व की पहचान हैवह ज़मीन हैजिस पर हम पैर जमा कर खड़े होते हैंयह हमारा विश्वास भी हैउम्मीद भी है और सपना भी।

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दोस्तों! हम ना तो समाज के बिना और ना ही प्रेम के बिना जीवित रह सकते हैं। जो लोग प्रेम की पवित्र भावना और समाज के बीच संतुलन बना लेते हैंजो प्रेम को व्यापकता देते हैंप्रेम के सही अर्थों को खोजने की कोशिश करते हैंइसे एक व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी के रूप में लेते हैंवे अंतर्द्वंद्वों और कुंठाओं से भी जूझ लेते हैं और अपनी व्यक्तिगत ज़रूरतों और सामाजिक सरोकारों के बीच तारतम्यता बिठा ही लेते हैं। दरअसलसुगंध भी तो संतुलन में ही है। है न..प्रेम को व्यापक किया जाएमन की खिड़कियों को ज़रा खोल दिया जाएसंशयभयशंकाओं के परदे को हटाया जाएजो इस पल हैउसे याद रखेंजो जा रहा हैउसे जाने दें। जो दरवाज़े पर हैउसका स्वागत करें। यह ज़िंदगी आपकी और सिर्फ़ आपकी हैऔर आपको अधिकार है जीने काखुश रहने कामुस्काने का। किसी की इतनी बिसात नहीं कि वो आपकी खुशियाँआपके सपनेआपकी हँसीआपकी मुस्कान आपसे छीन सकेआप जहाँ हैज़िंदगी वहीं है...खुशियाँ भी वहीं हैं। आप खुश रहीआप खुश होइए क्योंकि आप खुश होने के लिए ही बने हैं। आप प्रेम कीजिए क्योंकि आप प्रेम के लिए ही बने हैं। आप मुस्काइए क्योंकि आप मुस्काते हुए बहुत अच्छे लगते हैं। ज़िंदगी के हर पल को जी लीजिएहँस लीजिए। ये सारा आसमान आपका हैक्यों न क्षितिज के उस पार घूम आइए। किसी से भी मिलिएउससे प्यार कीजिएखुद से प्यार कीजिए... अपने काम से भी... अपने नाम से भी... बस ज़रा  सा ही सही पर... जा सिमरन जाजी ले अपनी ज़िंदगी.. सिर्फ़ सिमरन ही क्योंआप  हम सभी..आइएजी लें अपनी ज़िंदगी.. 

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मेरी ये बातें यहाँ खत्म नहीं होंगीहों भी कैसे?आपका अधिकार है खुश होनामुँह क्यों लटकाया है भईएक बार मुस्करा कर इधर तो देखिए.. देखेंगे न ! सुनिएगा ज़रूर… हो सकता हैसिमरन की इस कहानी में आपकी भी कहानी छुपी हो! अपनी कहानी को मेरे साथ साझा कीजिए.. मैसेज बॉक्स में अपनी कहानी लिखिए.. मुस्कराइए.. और मुस्करा कर मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों....वही प्रीत...वही किस्से  कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

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*************************************************************EPISODE  7

यूँ ही कोई दिल लुभाता नहीं 10/04/2026

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नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से  कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज मैं बात करूंगी किसी ऐसे चेहरे कीकिसी ऐसी शख्सियत कीजिसकी सुंदरता को हमारा मन खोज ही लेता हैऔर हम कह पाते हैं कि यूँ ही नहीं दिल लुभाता कोई..

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 दोस्तोंबात किस्से  कहानियों की हो रही हैतो चलिएआज एक सुप्रसिद्ध कहानी की बात करते हैं.. क्या आपने महान कहानीकार चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी की कहानी ‘उसने कहा था’ पढ़ी हैचलिएमैं बताती हूँइस मार्मिक कहानी के बारे मेंजिसकी मूल संवेदना यह है कि संसार में कुछ ऐसे निःस्वार्थी लोग होते हैंजो किसी के कहे को पूरा करने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे देते हैं क्योंकि वह उन्हें अपनी जान से बढ़करप्राण से बढ़कर लगता है और क्योंकि.. क्योंकिउसने कहा था..। कहानी लहना सिंह की हैजो अपने प्राण देकर बोधा सिंह और हजारा सिंह के प्राणों की रक्षा करता हैकेवल इसलिए कि लहना सिंह सूबेदारनी के ब्रह्म मंत्र, ‘उसने कहा था’ को याद रखता है।रघुकुल रीत सदा चली आईप्राण जाई पर वचन न जाई’,कुछ ऐसा ही उद्घोष है इस कहानी का। लहना सिंह हमारे हृदय पटल पर हमेशा के लिए अंकित हो जाता है। वह प्रेमत्यागबलिदानविनोद  वृत्तिबुद्धिमत्ता और सतर्कता आदि विविध गुणों का स्वामी है। ‘अपने लिए तो सभी जीते हैंलेकिन जो दूसरों के लिए मरते हैंऐसे व्यक्ति विरले ही होते हैंलेकिन होते अवश्य हैं।

ऐसा कोई कैसे सोच सकता है भलाऐसा कोई तभी सोच सकता हैजब उसे महसूस हो कि दूसरे व्यक्ति से उसका जन्म  जन्मांतर का प्रगाढ़ रिश्ता हैकुछ जाना  साकुछ अनजाना  सा..जी हाँ दोस्तों! वैसे भी यूँ ही तो कोई दिल लुभाता नहीं|

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अक्सर लोगों को कहते सुना है कि फलां  फलां व्यक्ति से उनका कोई पुराना रिश्ता हैपुराना नाता हैपिछले जन्म काया जन्म  जन्मांतर का , वरना कोई यूँ ही कैसे दिल को लुभाने लगता है। चंद हसीन मुलाकातों में रिश्ता इतना गहरा हो गया कि लगने लगा जैसे सदियों से एक  दूसरे को जानते हों। 

पिछले दिनों मेरे एक मित्र ने बताया कि उनकी ज़िंदगी में एक नया  नया रिश्ता बना हैलेकिन ऐसा लगता है कि जैसे सदियों से वे एक  दूजे को जानते हों। पहली मुलाक़ात में रूह का नाता हो गया आपस में... क्या यह संभव हैलोग तर्क देते हैं कि इतनी बड़ी दुनिया में कोई एक चेहरा ही हमें क्यों लुभाता हैज़रुर उससे हमारा कोई पुराना नाता है। वरना कोई एक ही खास क्यों लगताक्या है उस चेहरे में कुछ ऐसा हैजो किसी और में नहीं दिखता। कोई किसी की मुस्कान को अतुलनीय मुस्कान कहता हैकोई किसी के अंदाज़ पर फ़िदा हैकोई किसी की आँखों की गहराई में खो गया हैतो कोई किसी के गोरे रंग या सुंदर देह का दीवाना हो गया हैकिसी को किसी की हँसी में सिक्कों की खनखनाहट सुनाई देती हैकोई किसी की आवाज़ में गुनगुनाहट सुनता हैतो कोई किसी की खुशबू में मदहोश हुआ जाता है... इस ख़ास किस्म की पसंद के पीछे आखिर है क्यायानी किसी को कोई क्यों लुभाता हैऔर क्या यह आकर्षण रूह का संबंध या कोई रहस्यया कोई जादू या कोई अदृश्य प्रेरणा हैकौन जाने?

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जी हाँ दोस्तोंयह भी सच है कि हम कुछ ख़ास आवाज़ोंखास चेहरों और खास रंगों के प्रति आकर्षित होते हैं। लेकिन फिर वही बात कि सौ सुंदर व्यक्तियों के बीच कोई एक ही प्रेमपात्र क्यों बन जाता हैक्यों दुनिया की भीड़ में कोई एक चेहरा ही हमें लुभाता है?  क्या कारणक्या वजह हो सकती हैयानी सौ व्यक्तियों को अपने सामने खड़ा करके किसी एक का चुनाव किया जाएतो सवाल उठता है कि वही क्यों?

इस के पीछे आखिर क्या रहस्य हैचलिए चर्चा करते हैं..

इस के पीछे चुनने वाले के सौंदर्यबोध के अपने मानदंड और अंतर्संबंधों के बारे में उसकी मान्यताएँ जाने  अनजाने महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सुंदरता के अपने  अपने मानदंड बन जाते हैं और वह व्यक्ति उन्हीं से मिलते जुलते रूप को पसंद करता है। किसी को हरमनप्रीत कौर लुभाती हैतो किसी को सरोजिनी नायडू। कोई मधुबाला की सुंदरता देख मुग्ध होता हैतो किसी को सुधा मूर्ति प्रभावित करती हैं। यही वजह है कि किसी को किसी की मुस्कान लुभाती हैकिसी को किसी का चेहराकिसी को किसी की बुद्धिमत्ता आकर्षित करती हैतो किसी को किसी का सेन्स ऑफ़ हयूमरकई पुरुष या महिलाएँ गोरे रंग के प्रति आकर्षित होते हैंतो कुछ साँवले रंग के प्रतिया सुंदर देह के प्रतितो कोई किसी में बुद्धिविवेक और चतुराई खोजता है। लेकिन यहाँ यह भी समझना होगा कि क्या कोई एक विशेषता हमें उसकी ओर आकर्षित करती हैजी नहीं दोस्तों! आकर्षण हमें समग्र रूप सेसमग्र व्यक्तित्व से होता है। प्रेम टुकड़ों में नहीं किया जा सकता। प्रेम की पूर्णता तभी हैजब वह समग्र रूप से किया जाए।

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यानी दोस्तोंउसका चुनाव कुछ बातों पर निर्भर होता हैना कि एकदम साँयोगिक और किसी दैवीय या रहस्यमयी प्रेरणा पर। अक्सर लोग इस आकर्षण को रूह का नातापिछले जन्म का संबंध या कोई रहस्य मान बैठते हैं। शुरूआती आकर्षण और चुनाव में शारीरिक गुणों की महती भूमिका होती हैपर असली परीक्षा तो आपसी अंतःक्रियाओं यानी व्यक्तित्व के आँतरिक व्यावहारिक गुणों के परीक्षण में होती है। यह सच भी है दोस्तोंजब हमारे संबंध बनते हैंविशेष तौर पर स्त्री और पुरुष के बीच के संबंधों मेंआरंभ में शायद कहीं दैहिक आकर्षण होता होक्योंकि बाहरी आवरण से ही आप अंतस तक पहुँच पाते हैंपरंतु रिश्ता वही कायम रहता हैजो शारीरिक और दैहिक सुंदरता से होता हुआ मन की सुंदरता को खोज लेता है। ठीक वैसे ही जैसे प्यासा हिरण मरुभूमि में भी जलाशय ढूंढ ही लेता हैप्यासी धरती की पुकार पर मेघ बरस ही पड़ते है और सारे बंधंनों को तोड़ते हुए एक झरना सागर में मिल ही जाता है। जब रिश्ते कुछ दूर तक चल पड़ते हैंतो उन रिश्तो में आपसी समझव्यवहार का संतुलन और बिना कहे एक दूसरे को समझ लेने की प्रवृत्ति पैदा होने लगती है। और यहीं हम कह पाते हैं कि यूँ ही नहीं दिल लुभाता कोई।

सार यह है कि कोई चेहरा आपको लुभा रहा हैपसंद आ रहा हैआप किसी व्यक्ति विशेष के आकर्षण में बंधे जा रहे हैंतो आप इसे कोई नशा या जादू समझने की भूल ना करें। किसी का मिलनाआपके ज़िंदगी में उसका आना और छा जानाआपको आकर्षित कर देनाये महज़ संयोग मात्र हो सकता है। आप को कोई यूँ ही नहीं लुभा रहा। उस लुभाने के पीछे कोई सदियों का नाता नहीं,ना कोई रहस्मयी प्रेरणाना पूर्व जन्म का कोई संबंध ही है। बल्किउसके पीछे आपके सौंदर्य  बोध के मानदंडआपकी अंतर्संबंधों के बारे में मान्यता और कुछ जैव रसायन। वह सौ चांदनियों की चमकशीतलता और सुकून लेकर आपकी ज़िंदगी में आया हैऔर मैंने उसे सहेजा हैपसंद किया हैमुहब्बत की हैतो वे मेरी ही आँखें हैंजिन्हें वह सुंदर दिखता हैहमें शेक्सपीयर की कही गई बात भी भूलनी नहीं चाहिए कि सुंदरता देखने वाले की आँखों में ही बसी होती है। इसलिए अब अगर कोई आपको लुभाएतो सौ बार सोचें कि यूँ ही नहीं लुभाता कोईआप ही ने तो उसे चुना है! है न दोस्तों! 

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बातें उसकी हो रही हैंजिसने यूँ ही आपको नहीं लुभाया हैकुछ तो बात है उसमेंतो ऐसी बातेंऔर उसकी बातें तो अनंत होंगी.. कैसे विराम दूँआपके पास भी तो उसके किस्से होंगेकहानियां होंगी,जो आपके दिल को भाता होआपको लुभाता होहै न दोस्तों! मुझे मैसेज बॉक्स में अपनी भावनाएँ लिखकर प्रेषित कीजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएहो सकता हैमेरी इस कहानी में आपके भी किस्से छिपे हों.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

 नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से  कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

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*************************************************************EPISODE  8

हर मुस्कराहट मुस्कान नहीं होती 24/04/2026

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नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से  कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंजीवन के रास्ते पर चलते  चलते हमें न जाने कितनी कहानियाँकितने किस्से मिल जाते हैंइनमें से कुछ हमें हमेशा याद रह जाते हैंहै न दोस्तों! आज हम बात करेंगे मुस्कराहट कीमुस्कराहट जो सभी को प्यारी लगती हैऔर भोली  सी मुस्कराहट के सामने कठोर हृदय वाला व्यक्ति भी झुक जाता है। लेकिन क्या हर मुस्कराहट मुस्कान होती हैवो भी सच्ची वाली!

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हर मुस्कराहट मुस्कान नहीं होती’ ये एक मशहूर गीत की पंक्तियाँ हैंजिनका संबंध हमारी भावनाओं सेसंवेदनाओं सेहमारे मनुष्य होने या यूँ कहूँमनुष्य बने रहने से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति का मुस्कराना यह नहीं बताता कि वह वास्तव में खुश हैहो सकता है कि उसकी मुस्कराहट के पीछे कोई ऐसा दर्द या ऐसा दुख छुपा होजिसे दुनिया देख ही नहीं पाती।

कुछ साल पहले मैंने एक खबर पढ़ी थीआज उसी के हवाले से बात को शुरू करती हूँ। एक भारतीय अभिनेता अचानक अमेरिका के एक शहर के रिहैबिलिटेशन सेंटर में मिलेपिछले 10 सालों से उनका कोई अता  पता नहीं थालेकिन उनके सच्चे दोस्तों ने उन्हें ढूंढ ही निकाला और उनका इलाज करवाया। सबसे पहले तो ऐसी दोस्ती को सलाम! अगर कुछ सच्चे दोस्तों ने उनके साथ ना दिया होतातो स्थिति और भी भयानक हो सकती थीकोई हँसता खिलखिलाता  मुस्कराता व्यक्ति अचानक हमारे बीच से गायब हो जाता और हमें पता भी नहीं चलता। अपना देश छोड़कर वह परदेस में रिहैबिलिटेशन सेंटर में पाया जाता हैजहाँ उसके पास कोई अपना नहीं होता है । आप ही बताइए दोस्तों! क्या रिहैबिलिटेशन सेंटर के डॉक्टरमनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक किसी के मन की अतल गहराइयों में जाकर दर्द की तलहटी को छू सकते हैंमान लिया कि वे इलाज करते हैं और मरीजों को ठीक भी करते हैंकिंतु ऐसे में सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती हैउन अपनों कीजो अपनत्व दे सकेंउस भावना कीजिसमें प्यार की कोमल छुअन होजो केवल एक प्यार करने वाला ही दूसरे को दे सकता है। डॉक्टर अपने मरीज़ के इलाज पर ध्यान देते हैंउसी पर फोकस करते हैंलेकिन वह प्यारवह अपनापनजो किसी के दिल को छू लेदरअसल वह तो कोई अपना ही कर सकता है। जिनके बारे में मैं बात कर रही हूँउनको आप सभी जानते हैं। एक बहुत प्यारा  सा मुस्कराता  सा चेहराजिस पर भोलापन और मासूमियत छलकती थी। अरे! अभी भी याद नहीं आयायाद कीजिए ‘अर्थ’ फिल्म का कैफ़ी आज़मी का लिखा वह गीत जिसे जगजीत सिंह ने बड़ी ही सुंदरता से गाया थाकिस पर फिल्माया गया था?

तुम इतना जो मुस्करा रहे हो?

क्या गम है जिसको छुपा रहे हो?

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दोस्तों! एक बात मेरी समझ नहीं आती कि क्यों लोग अपने चेहरे पर झूठी मुस्कराहट चिपकाए घूमते हैंअंदर  अंदर रो लेनाबाहर  बाहर हँस लेनाक्या यह तरीका ठीक है? अरे भाई! दुख हैतो भाईदुखी हो लोइसमें क्या शर्मानाइसमें क्या संकोच करनारोने का मन कर रहा हैतो रो लो जी भर केक्या यह ज़रूरी है कि दुनिया के सामने एक प्लास्टिक की हँसी चिपकाई जाएदर्द हैतो उसे महसूस किया जाएना कि उसे पाला जाएप्रेम हैतो उसे भी महसूस किया जाएउसे अनदेखा ना किया जाए। हम दर्द को भी छुपाते हैं और प्रेम को भी। 

क्या दुनिया से डर कर...?

पर हम डरते क्यों है?

आप ही बताइए दोस्तों! अपने गम को छुपा कर मुस्काएँक्यों?

ऐसा करके हम प्रकृति के विपरीत चलते हैंहम दर्द में मुस्काते हैं और खुश होने पर भी खुशी को दबा लेते हैं। खुलकर हँसते नहींखुलकर रोते भी नहींहाय! लोग क्या कहेंगेइसलिए मन की बात कभी मन से निकलती ही नहीं और फिर एक दिनजब यह आँसू बनकर निकलती हैतब उस एक दिन ये आँसू जहर बन जाते हैंसुनामी ले आती हैहमें भिगो  भिगो डालते हैंहमें सराबोर कर डालते हैं।

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क्या आपका मन नहीं करता पूछने काकि भाई तुम इतना क्यों मुस्करा दिएकि दर्द अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया और तुम्हें इस सुंदर दुनिया से बेखबर कर दिया। नैनों ने अब मुस्कराना बंद कर दिया। तुम्हारी मुस्कराहट वह निश्छल  मुस्कान नहीं रही। यह एक चेतावनी भी है कि सुनोयदि तुमने सच्ची सहज मुस्कान अपने होठों पर नहीं खिलाई और गम छुपा कर मुस्काते रहेतो यह प्लास्टिक की हँसीएक दिन बीमारी बन जाएगी।

दोस्तों! ‘प्लास्टिक की हँसी’ यानी वह हँसीजो दिखावे के लिए या किसी दबाव के कारण होती हैजहाँ असली भावनाएँ ओट मेंपरदे में छिपी होती हैं। जबकि  सच्ची हँसी दिल की गहराइयों से निकलती है—बिना किसी प्रतिबंध केबिना किसी नकाब केबिना किसी मुखौटे केऐसी हँसीजिसमें मन की खुशी छलक  छलक जाती है।

हालांकियह भी सोचने की बात है कि कभी  कभी जो हँसी शुरुआत में नकली लगती हैसमय के साथ उसमें कुछ सच्चाई भी समा जाती है। कई बार जब हम किसी कठिन परिस्थिति में भी हँसते हैंतो यह शुरुआत में सिर्फ़ एक तरह का ठट्ठा  मसखरा व्यवहार हो सकता हैलेकिन धीरे  धीरे वही हँसी मानसिक शांति और सामंजस्य का प्रतीक बन जाती है। दरअसलहँसी का स्वरूप बहुत जटिल होता है—वह बाहरी भावनाओं का ही नहींबल्कि हमारे भीतरी संघर्षों और आत्म  विकास की कहानी बयाँ करती है।

सच्ची हँसी में वह सहजता और वह आत्मीयता होती हैजो न सिर्फ चेहरे पर बल्कि पूरे अस्तित्व में झलकती हैजबकि प्लास्टिक की हँसी में अक्सर वह गहराई नहीं होती। दरअसल जीवन में वास्तविक आनंद का आना भी एक आंतरिक प्रक्रिया हैजिसे समाज या बाहरी परिस्थितियाँ अक्सर नकाब में छुपा देती हैं।

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क्या आपने कभी महसूस किया है कि कभी  कभी हम सब के अंदर एक तरह का 'नकलीहँसने का दबाव होता हैजो कि वास्तव में हमारे भीतर के संघर्ष या अनकहे दर्द को ढकने के लिए होता हैइस विषय को और भी गहराई से समझने के लिएयह तो बताइए कि आप किस बात को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं—वास्तविक आनंद की वह सहजताया फिर सामाजिक अपेक्षाओं के अनुकूल हँसना?"सच्ची हँसी और प्लास्टिक हँसी में मूल अंतर उनके जन्म और अनुभव के अंदर छिपा होता है।

सच्ची हँसी दिल से निकलती है। यह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया हैजिसमें हम खुशीराहत या गहरे आनंद के क्षण अनुभव करते हैं। हमारी आतंरिक अवस्थाभावनाओं का उजागर होना और शरीर में उत्पन्न होने वाले हार्मोन्स—जैसे एँडोर्फिन—इस हँसी के साथ जुड़ जाते हैं। यही वजह है कि सच्ची हँसी न केवल मन को ताज़गी और मानसिक शांति देती हैबल्कि दूसरों में भी एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। यह हँसी अनायासबिना किसी दबाव केऔर पूरी तरह से प्रामाणिक होती है।  जबकि प्लास्टिक हँसी अक्सर सामाजिक परिस्थितियों या दबाव के कारण उत्पन्न होती है। यह दिखावे की हँसी होती हैजो कभी  कभी परिस्थितियों को सहज दिखाने या किसी अनुचित स्थिति से उबरने के लिए उपयोग की जाती है। इसमें वह स्वाभाविक गर्मजोशी कहाँजो सच्ची हँसी में होती है।

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सच कहूँ तो दोस्तों! सच्ची हँसी हमारे दिल की गहराइयों से निकलती है और आत्मा के आनंद का प्रमाण होती हैजबकि प्लास्टिक हँसी सामाजिक अपेक्षाओं या आँतरिक भय से प्रेरित एक प्रकार का मुखौटा होती है या यूँ कह सकते हैं कि ऐसे में हम एक चेहरे पर दूसरा चेहरा लगा लेते हैं। क्या आपके जीवन में ऐसे क्षण आए हैंजब आपने महसूस किया हो कि आपकी हँसी में सच्चाई के साथ  साथ आड़ में कुछ और भी छिपा हैहाँहँसी सामाजिक संबंधों पर गहरा असर डालती है। इस हँसी से निकलने वाली स्वाभाविक गर्मजोशी और आत्मीयता तुरंत ही लोगों को आपके करीब लाती है। जब हम दोस्तों या परिवार के साथ दिल खोलकर हँसते हैंतो यह एक प्रकार का गैर  मौखिक संदेश होता है कि हम में सहानुभूति और समझदारी हैजो आपसी संबंधों को और गहरा करती है।  हँसी एक सार्वभौमिक भाषा हैजो लोगों के बीच की दीवारों को गिराती है और एक दूसरे के प्रति विश्वास की भावना को बढ़ावा देती है। तो आइए न मेरे साथऔर किसी की सच्ची मुस्कराहटों पर निसार हो जाएँताकि किसी का दर्द मिटा सकेंकिसी के वास्ते दिल में प्यार की गंगा बहा सकेंक्योंकि जीना इसी का तो नाम हैसही कहा न दोस्तों!

MUSIC

सच  सच बताइएगा दोस्तों! आप भी तो सच्ची मुस्कान पर ही निसार होते हैं न..। ऐसे बहुत से किस्से  कहानियाँ आपके पास भी होंगी। मेरी यादों के सफ़र में मेरे हमराही बनिए। मैसेज बॉक्स में अपने विचारअपनी भावनाएँ लिखकर भेजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएसुनाते रहिए..हो सकता हैसच्ची मुस्कान की इस कहानी में आपकी भी सच्ची हँसी छिपी हो.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से  कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

 

 

*************************************************************EPISODE   9

राँझा राँझा करदी.. 08/05/2026

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से   कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज मैं बात करूंगी सच्चे प्रेम की सबसे मार्मिक कहानी कीजो संवेदनाओंविद्रोहआत्म   त्याग और आध्यात्मिक प्रेम की गहराइयों को छूती है। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगेहीर और राँझा की..

MUSIC  

 राँझा राँझा करदी हुण मैं आपे राँझा होई

सद्दो मैनूं धीदो राँझा हीर ना आखो कोई।

दोस्तों! बुल्ले शाह ने आखिर यह क्या कह दियाउनके शब्दों में हीर कहती है कि राँझा   राँझा करती हुई मैं खुद ही राँझा हो गई हूँअब सब मुझे राँझण धीदो पुकारा करेंकोई मुझे हीर कहकर न पुकारे। कहानी में एक था राँझाजो प्रेम का देवता थाऔर एक थी हीरजो सुंदरता की देवी थी। पंजाब की धरती पर दोनों का जन्म हुआ। उस समय विदेशी घोड़ों की टापों से देश की धरती उखड़ रही थी। इतिहास का ध्यान लगा था राजनीतिक उथल   पुथल की ओरकिसी का ध्यान इस ओर जाता तो जाता कैसे कि हीर को भी इतिहास के पन्नों में दर्ज कर दें। क्या हीर सचमुच थीझंग में हीर की समाधिजिस पर प्रति वर्ष हज़ारों श्रद्धालुओं का एकत्रित होनाइस बात की घोषणा करता है कि हीर सचमुच में थीजी हाँहीर थीइसी धरती परतभी तो आज भी उसके किस्से मशहूर हैं।

MUSIC

झंगजहाँ हीर का जन्म हुआरांझे के जन्मस्थान तख़्त हज़ारे से अस्सी मील की दूरी पर है। पास से चनाब गुज़रती है। 'चनाबयानी 'झनां'। झनां तो आज भी हीर को याद करती होगीउसकी लहरों के सम्मुख ही तो पहले   पहल उसने राँझा के लिए अपने हृदय के द्वार खोले थे। सोचती हूँकि पहली बार जब किसी लोकगीत में हीर की कथा का ज़िक्र आया होगातब क्या अकेली हीर को ही अमर पदवी दी गई थीझनां नदी भी तो इसमें आई होगी। और हीर संबंधी पहला गाना अब हम कहाँ ढूँढ़ेंयह हीर की ही खासियत रही होगी कि ‘हीर’ एक गीत बनकर पंजाब की लोकधारा में बहने लगाजैसे चनाब की लहरेंझनां की लहरें। इन गीतों में हीर को लोकमाता की पदवी दी गईजो प्रेमसौंदर्य और साहस की प्रतीक बनकर उभरती है। कई गीतों में तो चनाब यानी झनां को प्रेम की नदी कहा गया—

"इश्क झनां वगदीकिते डुब्ब न मरी अणजानां"

यानी “इश्क की झनां बह रही हैअरे ओ अनजानकहीं डूब न जाना”।

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कभी झनां के तीर पर बैठकर उसके जल को निहारिएतो शायद वह आपके कान में कुछ कह जाएनिराश होकर एक दिन रांझे ने किस तरह आँसू गिराए थेआँसू बहाए थेशायद झनां ही आपको बतला सके। जिस झनां ने रांझे की बंझली का गान सुना थादिन   रातलगातारजिसने उसे हीर के पिता की भैंसें चराते देखा थाजिसने हीर को रांझे के लिए पकवान लाते देखा थावह क्या आज बोल न उठेगी?

हीर और राँझा की प्रेमकथा के बार में क्या कहूँराँझा का असल नाम ‘धीदो’ थाउसे पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था। एक दिन उसकी भावजों ने ताना मारा कि वह काम   काज में विशेष हाथ नहीं बंटाता हैछैला बना घूमता हैजैसे उसे 'हीरसे ब्याह करना हो। बसफिर क्या थाबस घर छोड़कर चल पड़ा वह झंग की ओर। झनां के तीर पर पहुँचाअब किश्ती से झंग जाने का प्रश्न था। पैसा पास में था नहीं। बिना पैसे के 'लुढ्ढननाविक उसे ले जाने को तैयार न था। रांझे ने बंझली बजाईलुढ्ढन की पत्नी को उस पर तरस आ गयाउसने सिफ़ारिश कीऔर लुढ्ढन ने रांझे को नदी के उस पारजहाँ हीर रहती थीपहुँचा दिया। और फिर शुरू हो गया हीर और राँझा के प्रेम का सिलसिला.. शादी तय भी हुईपर फिर विघ्न आ गया और हीर का विवाह सैदा से कर दिया गया। हीर की विद्रोही आत्मा ने सामाजिक बंधनों को चुनौती दे डालीदोनों के प्रेम का सैलाब देखिएकि वह राँझा के लिए अपने परिवारजाति और परंपरा से टकराईपरंतु उसकी एक न चल पाई। तब हीर ने प्रण कर लिया कि वह अपने ‘सत’ को कायम रखेगी। कहते हैंहीर की सच्ची मुहब्बत को जानकार राजा के आदेश पर पिता राँझा से उसके विवाह को मान गएपर..पर भीतर ही भीतर कपट का साँप फुंकार रहा था। राँझा बारात जुटाकर लायापर हीर को ज़हर दे दिया गया। ज्यों ही रांझे को यह ख़बर लगीवह ग़श खाकर गिर गया—एक दीपक पहले ही बुझ चुका थादूसरा भी बुझ गया। इसीलिए ‘हीर’ के कण   कण में राँझा की बंझलीउसका जोगऔर “अलख निरंजन” का जाप अपनी पूरी शिद्दत के साथ समय गयालगता है कि यह प्रेमआध्यात्मिक प्रेम  है—जो साँसारिक नहींआत्मिक है।

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दोस्तों! प्रश्न यह है कि क्या किसी को यह अधिकार था कि वह हीर और राँझा के प्रेम को किसी चारदीवारी में कैद कर सकेआखिर समाज को यह अधिकार किसने दिया? भक्त गुरुदास कहते हैं—

राँझा हीर बखानिये,ओह पिरम पिराती।‘

यानी 'आओ हीर और राँझा का बखान करें,वे महान प्रेमी थे!'

रांझे के पास जो बंझली थीहीर उसके राग पर मुग्ध हो उठी थीकई लोग बंझली की प्रशंसा भी करते दिखाई देते हैं। राँझा जो कुछ भी बोलता थाजैसे वह बंझली में से होकर हीर के हृदय में उतर जाता था। बंझली से एक बार जो शब्द गुज़र जाता थावह कविता बन जाता थाआकाश भी बंझली से थाप से नरम पड़ जाता था|

राँझा बजावे बंझलीसुक्का अम्बर छड्डे नरमाइयाँ।’

यानी देखो! राँझा मुरली बजा रहा हैसूखे आकाश पर नमी आती जा रही है।'

दरअसल दोस्तों! हीर और राँझा केवल दो प्रेमी नहींबल्कि वे प्रेमबलिदान और सामाजिक बंधनों के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीक हैं। इन दोनों की कहानी सिर्फ एक रोमांटिक कहानी नहीं है—यह उस दौर की सामाजिक बाधाओंजातिगत भेदभावऔर पारिवारिक दबावों के बीच सच्चे प्रेम की जीत या हारइसका फ़ैसला मैं आप पर छोड़ती हूँका मार्मिक चित्रण है।

यदि यह हार है भी दोस्तोंतो भी ऐसी हार के किस्से अक्सर प्रेरणा बन जाते हैंजो हमें बेहतरमजबूतऔर समझदार इंसान बना देते हैं। हार हमें खुद से सवाल करने पर मजबूर करती है—हम क्या कर सकते थेक्या नहीं कियाऔर आगे कैसे सुधारेंगिरकर उठने से हमारा जज़्बा ही हमारे भीतर सहनशीलता बढ़ाता है। ये पाठ किसी किताब से नहीं मिलते। तो दोस्तों! जब हम हीर   राँझा की प्रेम कथा सुनते हैंतो हार जाने के डर से जीना नहीं छोड़तेसामाजिक बंधनों पर सवाल करना सीखते हैंऔर हम अपने रास्ते या सोच को फिर से परिभाषित करते हैं। यही है हीर   राँझा की कहानी    मेरी जुबानी।

MUSIC

दोस्तों! हीर   राँझासोहनी   महिवालऐसे न जाने कितनी प्रेमगाथाएँ हमारे सामाजिक ताने   बाने में धूप   छाँव की तरह बुनी हुई हैंगुँथी हुई है। ये हमारी भावनाओं की अभिव्यक्ति ही नहींबल्कि साँस्कृतिक स्मृति और सामाजिक चेतना का दस्तावेज़ भी हैं। हम सभी की भावनाओं में सबसे प्रभावशाली संवेग होता है   प्रेमप्रेम के ऐसे बहुत से अनुभवबहुत से किस्से   कहानियाँ आपके पास भी होंगी। मुझे मैसेज बॉक्स में अपने प्रेम से भरे किस्से प्रेषित कीजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएहो सकता हैहीर   राँझा की कहानी में आपके भी किस्से छिपे हों.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...फिर एक नए किस्से के साथ.. 

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE  10

कोई ये कैसे बताए.. 22/05/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से  कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगेतनहाई कीअकेलेपन कीएकाकीपन की! अरे भई! दुनिया लोगों की भीड़ से भरी हुई हैफिर भी तुम तनहा क्यों होआखिर क्या वजहें हो सकती हैं हमारे तनहा होने कीया फिर उस बेबसी कीकि बताया भी न पाएँ कि तनहा क्यों हैं?

MUSIC  

 

दोस्तों! आज मुझे कैफ़ी साहब की वह मशहूर ग़ज़ल याद आ रही हैजिसके बोल हैं   कोई ये कैसे बताए केवो तनहा क्यों हैसच मेंजब  जब यह ग़ज़ल सुनती हूँसोचने पर मजबूर हो जाती हूँ कि वो जो अपना थावो ही आज किसी और का क्यों हैया फिर कि यही दुनिया है तो फिरऐसी ये दुनिया क्यों है?

यही होता है तो आख़िरयही होता क्यों है?

चलिएआज चर्चा करते हैंमेरे एक मित्र कीजो एक दिन बड़े परेशान  हैरान से होकर मेरे पास आए और कहने लगे कि आजकल बहुत दुखी हूँ। ज़िंदगी में कुछ रास ही नहीं आ रहाकोई रस ही नहीं रह गया। कइयों से प्रेम कियापर  हमेशा नाकामी ही मिली। मैंने मन ही मन सोचाकइयों से प्रेम किया!  यह क्या हैवे कहने लगे कि दर्द और दुख जैसे मेरे जीवन के हिस्से बन गए हैंप्रेम खोजने गया था,  पर देखो न..दुख ही मिला। मैंने कहा कि अब की बार दर्द खोजने जानातो यकीनन प्रेम मिल जाएगा। सच ही है न दोस्तोंआप हमेशा प्रेम और खुशी ही खोजते हैंइसलिए दर्द पीछे पड़ा रहता हैइस बार दर्द की खोज करेंगेतो यकीननप्रेम मिलेगा। आप किसी का प्रेमकिसी का दर्द महसूस तो कीजिएप्रेम खुद ब खुद खिंचा चला आएगा। दोनों मानो एक ही गाँव मेंएक ही बरगद की छाँव में रहते हैं। एक को आवाज़ दोतो दूजा संग आ जाता है। खुशी और गमदर्द और चैनदोनों एक दूसरे के ही हिस्से हैंमानो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आप खुशी को अपनाने जाएँगेतो गम खुद ही बिना बुलाए चला आएगाजैसे दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हों। दरअसलहम सभी सिर्फ़ खुशी चाहते हैंखुश होना चाहते हैंहँसना चाहते हैं। कोई भी नहीं चाहता कि उसका वास्ता आँसुओं से पड़े। हम ताउम्र खुश होने की तीव्र इच्छा में न जाने कितनों को दुखी किए जाते हैंलेकिन यदि हम सभी के हिस्से में खुशियाँ आ गईंतो बेचारा गम कहाँ जाएगावह तो एक कोने में पड़ा  पड़ा दुखी होता रहेगा न..। वह कहाँ जाकरकिस गाँव में अपना बसेरा बनाएगाउसे भी तो अपने होने का एहसास होना चाहिएहो सकता है यह बात आपको अनोखी लग रही हो दोस्तों! पर है तो यही सचयकीनन यही सच है।

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दोस्तों! हम सभी दिल की बगिया में खुशियों के बीज होते हैंदिल की ज़मीन पर सपनों के पौधे रोंपते हैंफिर क्यों कर उनमें दुख के कांटे निकल आते हैंहमने तो सिर्फ़ सुखखुशी और आनंद को ही न्योता दिया था ना....ये बिन बुलाए मेहमान कहाँ से आ गएयह ग़मयह दर्दयह दुखइन्हें तो नहीं बुलाया था मैंनेफिर यह कहाँ से मेरे जीवन में चले आएहम इन्हें देखकर दिल का दरवाजा बंद करना चाहते हैंजबकि हमें तो इन्हें गले लगाना चाहिए। ये हमारे अतिथि हैंमेहमान हैंपाहुन हैंजो एक बार ये हमारे हो गएतो जन्मों तक हमारा साथ निभाते हैं। खुशियाँ...खुशियाँ तो हमसे फ्लर्ट करती हैं और दर्द हमसे सच्ची मोहब्बत। ये हमारे साथ चलते हैंमीलों तक। हमारे अकेलेपन के साथी होते हैं ये आँसूहमारी तनहाइयों को रोशन करती हैं ये यादें। बताइएफिर कौन अपना हुआऔर कौन परायाबेशक...यकीनन...गम ही अपना है। ज़िंदगी इतनी लंबी है कि यहाँ मीलों तक हमारा साथ निभाने धूप ही आएगीछाँव आएगी भी तो पल दो पलचांदनी दिखेगी तो भी क्षण भर के लिएइसलिए आप गम से ना घबराएँऔर हाँहर व्यक्ति अपने जीवन में खुशियों के ही बीज होता हैकोई भी जानबूझकर दर्द उगाना नहीं चाहतालेकिन यह खरपतवार हैजो स्वयं ही उग जाती है। है न दोस्तों!

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और हाँ दोस्तों! जब हम दूसरों के दर्द से अंजान बने रहते हैंतब भी हम अकेले होते हैंतनहा होते हैंपर इतने बेखबरइतने बेकदरइतने बेपरवाह कैसे हो सकते हैं हमहम देह से दूसरे को जानते हैंपर मन से कभी जान ही नहीं पाते। हम मन की दूरी कभी तय नहीं कर पाते और हमारे आसपास के रिश्ते बिखरते जाते हैं और हम तनहा होते जाते हैं..होते जाते हैं।

 

हम तनहा इसलिए भी होते जा रहे हैं दोस्तों! क्योंकि वक्त बदल रहा हैपरिस्थितियों बदल रही हैंहम बदल रहे हैंसब बदल रहे हैंलेकिन जो नहीं बदला हैवह है मानव समाज और उसमें बसा हुआ प्रेमवे संस्कार जो हमें भारतीय होने के नाते अपने पूर्वजों से मिले हैं। हमारे परिवारजो हमारी थाती हैंहमारी पूँजी हैंहमारी पहचान हैंफिर भी उन्हें छोड़कर हम आभासी दुनिया में जीना चाहते हैंएक मायावी दुनिया मेंजिसमें एक नशा हैयहाँ कोई बंदिशें नहींकोई शर्तें नहींयहाँ लोग खुद को चाहे जैसा प्रस्तुत कर सकते हैंअपनी कमज़ोरी को छुपा सकते हैंस्त्री हैं तो पुरुष बनकरपुरुष हैंतो स्त्री बनकरउम्र दराज़ हैंतो युवा बनकरखुद को सिंगल बता कर लोग ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का साथ पाने का प्रयास करते हैं। यहाँ सब कुछ चलता हैझूठी फोटोझूठी प्रोफाइलझूठी बातेंझूठे वादेखुद के अवगुणों को छुपा करअपने गुणों का बखान...और न जाने क्या  क्याअसली दुनिया के खुरदुरेपन में हमारे साथ कौन हैइसकी पहचान न करते हुए हम आभासी संसार में हर पलहर क्षणहर लम्हा किसी न किसी अपने को खोजते हैं।

सवाल यह बिल्कुल भी नहीं है कि रिश्ते कितने सच्चे या कितने झूठे हैंसवाल यह है कि आखिर लोग तलाशते क्या है रिश्तों मेंसच्चा प्यारसच्ची दोस्तीअपनापन या अकेलेपन को दूर करने के लिए सिर्फ़ टाइमपासया खुद की तलाश? वास्तविक दुनिया से इतर आकंठ निराशा में डूबेअवसाद और विषाद से घिरे लोगों का समूह है ये सोशल मीडिया साइट्स। रिश्ते चाहे जो भी बनाए जाएँऑनलाइन या ऑफलाइनमिट्टी तो दिल की ही लगती है न... और आँसुओं के पानी के बिना कभी कोई मूरत बन पाई हैसंवेदना की मज़बूत कड़ी से ही कोई रिश्ता जन्म लेता हैउसे स्क्रॉल करके या माउस पकड़कर बनाने की कोशिश ना करें और न ही उसे मिटाने की।

याद रखिएगा दोस्तों! कि रिश्ते जीवन की रौनक होते हैंवे हमें जीवन देते हैंदुखों से लड़ने का हौसला देते हैंहमें मज़बूत बनाते हैंहमारे जीने की वजह बनते हैं। उन रिश्तों पर हम बंधन नहीं लगा सकतेहमें उन्हें सिर्फ़ खिलने देना हैताकि वे महक सकें। हम अपना आँचल उनके लिए फैला सकते हैंऐसा आँचल जिसमें सिर्फ़ अपनापन होमुहब्बत हो,  मुरव्वत होइंसानियत हो। इस आँचल में यदि चिंगारियाँ दिखेंगीतो रिश्ते कहीं बाहर छाँव की तलाश मेंशांति की तलाश में भटकने लगेंगे। और हाँ दोस्तों! हम तनहा इसलिए भी होते जा रहे हैं कि हमारे जीवन में पैसों के पीछे भागा  दौड़ीआपा  धापी बहुत अधिक है। संतोष  धन तो आज धूरि समान लगता है। इसने हमें अवसादविषादनिराशा और न जाने कौन  कौन सी नकारात्मक भावनाओं से के अलावा हमें दिया ही क्या है?

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तो चलें आजऐसी सभी दीवारों को आज गिरा देंकब तक यूँ ही खामोश रहेंऔर सहें हमदिल कहता है कि आज दुनिया के हर ऐसे रिवाज़ को ख़त्म कर देंजो दीवारें खड़ी हैंउन्हें आज गिरा देंक्यों दिल ही दिल में सुलागेंजो मेरे लिए अच्छा हैजो तेरे लिए अच्छा हैउसे गले लगा लेंमेरे सीने में तेरी धड़कन समा जाएऔर तेरी धड़कन में मेरी...हम दोनों में जब इतनी कूवत हैइतना माद्दा हैतो आओये सारे फ़ासले मिटाएँचलो आज हर लुटे हुए घर में एक चिराग जलाएँटूटे  जर्जर दरवाज़ों पर दस्तक देंजिस किसी की आस कराह रही हैउसकी मलहम  पट्टी करेंऔर अगर प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्तातो उसे बदलने से बचाएँ......आप क्या कहते हैं न दोस्तों!

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बात जब तनहाई की होअकेलेपन की होएकाकीपन की होतो बातें ख़त्म कैसे होंगीआप तनहा हैंतो मैं हूँ न दोस्तों! आखिर दोस्त ही तो दोस्त के काम आता है।मुझे बताइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में भेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएहो सकता हैतनहाई की बातों के सफ़र में साथ  साथ चलते  बतियाते आपको कोई हमसफ़र मिल जाए! और फिर वही एक किस्सा बन जाए.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से  कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

*************************************************************EPISODE   11 

आप मुझे अच्छे लगने लगे 05/06/2026

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से   कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगेउस आप कीजो हमें जब अच्छा लगने लगता हैतो सौ   सौ आसमानों का रंग बदल जाता हैनदियों में लहरें हिल्लोल करने लगती हैपक्षी चहचहाने लगते हैभौंरें गुंजायमान होने लगते हैंऔर हम भी हवाओं के साथ   साथ बहने लगते हैं और कह उठते हैं कि आप मुझे अच्छे लगने लगे हैंऔर इसीलिए मुझे अपने सारे सपने भी सच्चे लगने लगे हैं!

MUSIC  

जी हाँ , दोस्तों! बहुत ही प्यारा गीत हैफिल्म है    ‘जीने की राह’जिसमें नायिका बड़े ही प्यार से नायक से इस बात का मनुहार करती है कि नायक उसे अच्छा लगने लगा हैअच्छा ही नहींबहुत अच्छा लगने लगा है। जब नायक अच्छा लगने लगा हैतो और क्या   क्या अच्छा लगने लगा हैसबसे पहले उसने जो सपने देखे थेजीवनसंगी को लेकरवे सब सपने सच्चे लगने लगे हैंऔर उसे अच्छे भी लगने लगे हैंसाथ ही साथ यह धरतीयह नदियाये किनारेये रातेंये दिनयह सुबहयह शामउसे सब अच्छे लगने लगे हैं। अक्सर सोचती हूँ कि क्या ये नदियाँकिनारेधरतीपहाड़आसमानहमेशा से ही सबको अच्छे लगते हैंयदि हाँतो क्योंकौन है वह जिसके कारण ये सब अच्छे लगाने लगे हैंमुझे लगता है कि जीवन का सारा अच्छापन और सारा सच्चापन इसी ‘आप’ की वजह से है। आखिर सोचिएये नदियाँपहाड़किनारेपंछीफूलतारेसितारेये तो शाश्वत हैंफिर इस दुनिया के सभी लोगों को ये बड़े अच्छे क्यों नहीं लगतेया यूँ कहूँ कि सबसे अच्छे क्यों नहीं लगतेमुझे तो लगता है यह दुनियाइसकी सारी चीज़ेंतभी खूबसूरत लगती हैंजब कोई ‘आप’ हमारी ज़िंदगी में आता है। मेरे   आपकेहम सबके जीवन में उस ‘आप’ की वजह से ही ज़िंदगी पूरी होती है और अच्छी लगने लगती है।

music 

दोस्तों! तभी तो मन झूम   झूमकर गाने लगता है कि आप मुझे अच्छे लगने लगे हैंआप मुझे बड़े ही अच्छे लगने लगे हैं। जब जीवन में ‘आप’ होतो फूलों में महक बसती हैकलियों में खुशबू महकती हैपानी कल   कल करती नदियों जैसा लगता हैखुरदुरी   पथरीली धरती भी सोंधी महक देने लगती हैपेड़ों पर बैठे पंछियों की भाषा समझ में आने लगती हैमन पंछी की तरह आकाश में उड़   उड़कर क्षितिज के कोने   कोने को छूना चाहता है और फिरअनायास आसपास पल रहे सभी रिश्ते सच्चे लगने लगते हैं। आखिर ऐसा होता क्यों हैऔर अचानक हमने ऐसा सोचा क्योंहमारे मन की दहलीज़ पर जब कोई आहट होती हैजब कोई अपने कदमों के गहरे निशान बनाने लगता है दिल की ज़मीन परतब हमें समझ आता है कि खारा सागर भी मीठे पानी का सोता बन गया हैहै न दोस्तों?

Music

दोस्तों! रात के सन्नाटों में लहरें जड़ किनारों के कानों में जा   जाकर यही फुसफुसाती होंगी ना...अरे किनारों! तुम कितने जड़ होबहते क्यों नहीं मेरे साथक्यों अभिमान से भरे होक्यों नहीं तरल हो जाते मेरी तरहक्यों नहीं सरल हो जाते मेरी तरहक्यों अहंकार में अकड़े से दिखाई देते हो हर समयकभी झुको भीझूमो भीलहराओ भी! और..और फिर किसी दिन कोई किनारा चुपके से लहरों के साथ बह जाता होगायह कहकर कि आप मुझे अच्छे लगने लगे। किसी बड़े वृक्ष के तने से लिपटी हुई कोमल वल्लरीकोमल लता भी तो हौले   हौले यही कहती होगी ना.. कि आप मुझे अच्छे लगने लगे। सुबह   सुबह पेड़ों की पत्तियों पर जो अनगिनत ओस की बूँदे दिखती हैं नाकभी उन्हें ध्यान से देखिएगावह रात को बड़े प्रेम से लिखा गया प्रेम   पत्र लगेगा आपको..। सुबह सूरज की गर्मी के स्पर्श से ये ओस की बूँदें पिघल   पिघल कर कहती होंगी कि आप मुझे अच्छे लगने लगे।

Music

दोस्तों! ज़िंदगी की धूप हमारे जीवन में प्रेमस्नेहआत्मीयता को पिघलाकरहमारे सूखेपन भर देती हैक्योंकि यह सूखापन ही हमें खुरदरा बनाता हैमार डालता है और भीतर का गीलापनभीतर की नमी हमें ज़िंदा रखती है। जब तक हमारे मन में गीलापन नहीं होगातरलता नहीं होगीसरलता नहीं होगीमुहब्बत नहीं होगीमुरव्वत नहीं होगीपरवाह नहीं होगीहम किसी से जुड़ ही नहीं पाएंगेऔर ना ही हमें कोई अच्छा ही लगेगा। दोस्तों! इसके लिए अहम् को गलाना पड़ेगा। अगर अहम् रहेगातो हम कभी भी सुंदरता को महसूस नहीं कर पाएँगे और ना ही हम कभी कह पाएँगे कि आप मुझे अच्छे लगने लगे।

इस प्यार कोस्नेह कोगीलेपन को बचा लिया यदितो दुनिया में इतने संदेहइतने शकइतने फरेबइतना अविश्वास और इतने आतंक नहीं होंगे। हर किसी को नदियाँधरतीआसमानपर्वतफूलपत्तेबूटेसभीबड़े सुहानेबड़े अच्छे लगने लगेंगे। इस सुंदर दुनिया को देखने के लिए सुंदर आँखें और सुंदर मन चाहिए। कहा भी गया है कि सुंदरता देखने वाले की दृष्टि में समाहित होती है। लेकिन सबसे ज़रूरी बातएक ‘आप’ भी तो होना चाहिए। वह ‘आप’ जो हममेंआप मेंआपके ज़िंदा होने का एहसास करवाए। आपके अंदर वीणा की स्वर   लहरी को जन्म देजिसे आप अपनी ज़िंदगी के गीत में शामिल कर सकेंजिसके आने से आपको सूरज की तपन जाड़े की गुनगुनी धूप लगे और जिसके समीप आने पर बर्फ़ भी सुलगती   पिघलती सी महसूस होजिसे सोचने के बाद आपकी सोच बदल जाएमन बदल जाए। उसके होने से आपकी आँखों में चमक और होठों पर मुस्कान खिल जाए। वह ‘आप’ हम सबके पास ही हैआसपास ही हैलेकिन बात यह भी है कि क्या हमने कभी उस ‘आप’ से कहा कि दुनिया की सारी उलझनोंपरेशानियोंज़िम्मेदारियोंमजबूरियोंदुश्वारियोंदूरियों के बावजूद मुझे ज़िंदगी हसीन लगती हैसिर्फ़ इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि मुझे आप अच्छे लगने लगे हो। और हाँ..यह दौलतयह शोहरतये गाड़ियाँये बंगलेयह बैंक अकाउंटसब ये दरअसल कितने झूठे हैंसब कितने फेक हैंसब कितने बड़े छलावा हैंतो सच्चा क्या हैसच्ची हैं वे आँखेंवे बातेंवे शिकायतेंवे झगड़ेऔर...और जी हाँ...अगर आप अभी तक नहीं कह पाए हैंतो आज कह भी दीजिएअच्छा लगता है यह कहना भीऔर सुनना भी... कि आप मुझे अच्छे लगने लगे....!

जब कोई अच्छा लगने लगता हैतो मन में एक अजीब सी हलचल होने लगती हैदिल कुछ कहने लगता हैमन बेमौसम सावन   सा भीगने लगता हैगीत बिना सुर के भी सच्चे लगने लगते हैंदिल जैसे किसी मीठे से राज़ छुपाने लगता है। दिल बार   बार उसी इंसान की ओर खिंचने लगता हैउसकी बातेंउसकी हँसीउसकी मौजूदगी सब कुछ खास लगने लगती है। मन में उत्सुकताउम्मीद और थोड़ी   सी घबराहट की तरंगें उठने लगती हैं। कभी   कभी बिना किसी वजह के चेहरे पर मुस्कान आ जाती हैऔर दिल यह सोचकर धड़कने लगता है कि अगली बार उससे कब मुलाकात होगीजब मुलाकात होगीतब कैसा होगाक्या ऐसाक्या वैसाजब कोई अच्छा लगने लगता है...तो एक अजीब सी बात होती है—ना कोई शोरना कोई एलान—बस चुपचापकिसी शाम की तरह उतर आता है वह दिल में। उसकी हँसी जैसे किसी पुराने गाने की धुन होजो कानों में नहींसीधे दिल में सुनाई देती है। उसके आने से जैसे हवा में कुछ बदल   सा जाता है—हल्की   सी ठंडकमीठा   सा सुकून। मन पूछता है, "क्या उसे भी ऐसा ही महसूस होता होगा?" और जवाब में चेहरे पर बस एक स्मित मुस्कान होती हैजो खुद      खुद होंठों से झलकने लगती है। कभी उसके नाम से दिल धड़क उठता हैऔर कभी उसकी एक झलक से दिन सँवर जाता है। ये एहसास... शायद प्यार नहींपर प्यार का पहला खत तो ज़रूर होता हैचलो खत न भी सहीखत का मज़मून तो ज़रूर हैहै न दोस्तों!

MUSIC

बात जब उस ‘आप’ की होउसके अहसास की होदिल की धड़कन की होतो बातें ख़त्म कैसे होंगीजिसकी वजह से आपके चेहरे पर मुस्कान आती हैआपका दिल धड़कने लगता हैउस ‘आप’ के किस्से हमें भी सुनाइए.. सुनाइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में भेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएहो सकता हैउस ‘आप’ की बातें करते   करते जीवन का सफ़र बीत जाए और फिर वे बातें ही एक किस्सा बन जाएँ.....! इसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE   12 

मत कर अभिमान रे बंदे! 19/06/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से   कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगेउस अहम कीउस अहंकार कीजो हमें उद्विग्न करता हैहम जिसे जानते   समझते तो हैंपर जान और समझ कर भी मानने को तैयार नहीं होतेजब अति हो जाती है और उसके दुष्परिणाम सामने आने लगते हैंतब हम सोचते तो हैंकि क्या गलत हुआपर तब भी हम कभी   कभी अपनी आँखों पर पट्टी चढ़ाए बैठे रहते हैं।

MUSIC  

तेरे जैसे लाखों आएलाखों इस माटी ने खाए

मत कर तू अभिमान रे बंदे!

झूठी तेरी शान रे!

मत कर तू अभिमान रे बंदे!

इन पंक्तियों को मैं अक्सर गुनगुनाती रहती हूँक्योंकि ये मुझे धरातल से जोड़े रखती हैंयाद दिलाती रहती हैंइस खूबसूरत कायनात का मैं एक छोटा   सा जुज़ हूँहिस्सा हूँअंश हूँपूरी कायनात नहीं। आज फिर ये पंक्तियाँ याद आईंक्योंकि वाकया ही कुछ ऐसा हो गया। दरअसल हुआ यह कि पिछले दिनों ट्रेन के सफ़र के दौरान एक सज्जन से मुलाकात हुईउनसे थोड़ी बातचीत होने लगी। उन्होंने बताया कि वे उम्र का लंबा सफ़र तनहा ही काट रहे हैंवे पेशे से लेखक हैंऐसा जानकर बातों में मेरी रूचि बढ़ी। बात निकल पड़ीउनकी शिकायत थी कि प्रेम   संबंध तो बहुत बनेलेकिन वे किसी भी महिला पर भरोसा नहीं कर पाए। उन्हें कोई भी अपने योग्य लगी ही नहीं। कोई उनके शब्दों से प्रेम करती थीकोई उनके रंग   रूप पर फ़िदा थीतो कोई उनकी शोहरत से प्रभावित थीउनसे प्रेम किसी ने नहीं किया। बहरहालवे एक महिला के साथ कुछ वर्ष रहे भीपर फिर अलग हो गए। वे कहने लगे कि आप ही बताइए कैसे मैं इन चतुर   चालाक महिलाओं पर भरोसा कर लेता और अपनी ज़िंदगी नरक बना लेतावे बोलेक्या आप मेरी इस दुख भरी कहानी पर भरोसा करेंगी?

मैं मुस्करा दी और मैंने कहा कि देखिएमैं एक महिला हूँ और आप मेरे लिए अजनबी भी हैंलेकिन मैं आपकी हर बात पर एतबार कर सकती हूँपर आप मुझे यह बताइए कि अपनी महिला   मित्रों और प्रेमिकाओं के साथ रहकर भी आप उन पर संदेह क्यों करते रहेएतबार क्यों नहीं कर पाएबोलिएपर उनके पास इसका जवाब नहीं था। ज़ाहिर   सी बात थी कि उनका अभिमानउनका ईगोउनसे बहुत बड़ा था। अभिमान हमेशा आपको अकेला करता हैजबकि प्रेम और विश्वास आपके चारों ओर बस्ती बसाते हैंफूलों की क्यारियाँ खिलाते हैंदिल के सुराखों में गारा   मिट्टी भरकर उन्हें गढ़ते हैंवे सज्जन तो केवल एक उदाहरण हैंआपके   हमारे आसपास बहुत से लोग हैंजिनमें किसी को अपने ज्ञान का अभिमान हैकिसी को रूप काकिसी को दौलत कातो किसी को शोहरत का।

क्या है यह अभिमान?

चलिएआज इसी पर बात करते हैंदोस्तों!

Music

दोस्तों! अभिमान हमें भीतर से हमें डराता हैवह हमें संवेदनशील नहीं होने देताहमें पिघलने नहीं देताहमें बरसने नहीं देता। क्या आपने कभी सोचा हैक्योंइसलिए कि संवेदनशील होने के लिए आपको सारे आवरण हटाने होते हैंबनावटीपन से दूर होना होता है और खुद को परत   दर   परत खोलना होता हैलेकिन अभिमानअभिमान यह ऐसा कभी होने नहीं देतावह हमें रोकता हैव्यक्त करने सेखुलने सेइंसान होने सेकिसी के सामने अपने आप को ज़ाहिर करने से। हम हमेशा सतर्क रहते हैंहमेशा उलझनों में घिरे रहते हैंकोई देखने न लेकोई जान न लेकोई पहचान न लेकोई चीज़ मेरे भीतर प्रवेश न कर जाएकोई भावना छू न जाएकोई भीतर न आ जाए। कहीं ऐसा ना हो कि कोई मेरे भीतर आकर मुझको नष्ट कर देमेरा वजूद खत्म कर देखुद को छुपाने का हुनर खूब आता है अभिमान को। अभिमानी व्यक्ति हमेशा कमज़ोर होता हैवह खतरों से घबराता हैवह जानता है कि किसी को करीब आने देने से सौ मुसीबतें आएँगी। न तो वह किसी के हृदय में प्रवेश करता है और न ही किसी को अपने हृदय के भीतर आने की अनुमति देता है। आपका क्या ख्याल है दोस्तोंऐसा ही होता है न.. इतिहास ऐसे अभिमानी व्यक्तियों के किस्सों से अटा पड़ा हैभरा पड़ा हैहै न दोस्तों!

अभिमानी व्यक्ति हमेशा एक किले के भीतर बंदी की तरह रहता है। इस किलेबंदी से उसे सुकून मिलता हैसुरक्षा का आभास होता हैवह अपने आसपास के लोगों के साथ संवाद बंद कर देता है या फिर कम कर देता है। बड़ी ताज्जुब की बात यह भी है दोस्तोंकि वह बात करना बंद करता हैउन खास लोगों सेजिन्हें वह प्रेम करता है। जैसे ही उसे प्रेम के होने का अहसास होने लगता हैवह तुरंत अपने किले में लापता हो जाता हैगुम हो जाता हैबड़े   बड़े दरवाज़ों पर बड़ी   बड़ी साँकल चढ़ाकरवह इत्मिनान से बैठ जाता है। उसे लगता है अब बाहर की कोई भावना उस पर प्रहार नहीं कर पाएगी। यह अहंकार उसका कवच बन जाता है और वह बंदी। वह कारागृह में कैद हो जाता हैकारागृहजिससे हम दिल कहते हैं।

Music

मुश्किल उस पल आती है दोस्तोंजब उन दरवाज़ों की की   होल से प्रेम झाँकने लगता है, जी हाँदोस्तों! प्रेम तो झाँक ही लेता है नचाहे कितने भी पहरे होंप्रेम अंदर प्रवेश कर ही जाता है। उषा   किरण की तरहहौले   सेचुपके   से अपनी लालिमा लिए अपने पैर पसारने लगता हैफूट पड़ता है हॉट   स्प्रिंग की तरहसूरज की रोशनी की तरहएक पतली रेखा के आकार मेंउस समय अभिमान घबराने लगता हैथर्राने लगता हैकुलबुलाने लगता हैअपनी सुरक्षा में इस सेंध को देखकर वह परेशान होने लगता है। आखिर मेरी सुरक्षा में सेंध लगीतो लगी कैसे?

दोस्तों! आपको ‘अभिमान’ फिल्म याद होगीकिस प्रकार अपने झूठे अभिमान के चलते नायक नायिका को परित्यक्त करने का निर्णय ले लेता हैक्योंकि वह उसकी कला कोउसके टैलेंट को स्वीकार नहीं कर पातावह उसे कंट्रोल करना चाहता हैकेवल अभिमान के कारण। अभिमान इतना भयभीत रहता है कि वह अपने मन रूपी सीता कोअपनी ईगो की जानकी कोलक्ष्मण   रेखा के अंदर ही रखना चाहता है। अभिमान हमेशा अकेला ही जीता हैखुद को छुपाने का करतब जानता है वहखुद को ढकना अच्छी तरह जानता है वह। उसे प्रेम अपनी मृत्यु जैसे लगने लगती हैइसलिए अहंकारी व्यक्ति कभी प्रेमी नहीं बन पाता।

एक बड़ी सुंदर बात पढ़ी थी कहींकि जीवन की गहराई में उतरना हैतो असुरक्षित अनुभव करने के लिए तैयार करना होगातैयार रहना होगाखतरे उठाने ही होंगेअज्ञात में जीना ही होगा क्योंकि सुरक्षा जीवन नहीं होती। असुरक्षा में जब हम होते हैंतो हम सदैव चुनौतियों से जूझने के लिए तैयार रहते हैंलेकिन जब हम सुरक्षित होते हैंअपने कंफर्ट ज़ोन में होते हैंतो हम अपने ही दायरे में फंस कर नष्ट होते जाते हैं और अपने कंफर्ट ज़ोन से बाहर हम झाँक तक नहीं पाते। अभिमानी होकर हम अपने द्वार   दरवाज़े   खिड़कियाँ   रोशनदान   झरोखेसब बंद कर लेते हैंजिससे हवा   खुशबू   रोशनी   मलयानिल कभी प्रवेश ही नहीं कर पाते।

Music

मेरे ख्याल से ऐसा जीना भी क्या जीना हैदोस्तों! इसे तो जीना नहीं कहेंगेहै न...बल्कि इसे तो कब्र में रहना कहेंगे। समंदर इसलिए खारे होते हैं क्योंकि वे रहस्य छुपाते हैंऔर  नदियाँ? नदियों के भीतर भाव बहते हैंइसलिए वे मीठी होती हैउनके जल में मिठास होती हैवे तृप्ति देती हैंसंतुष्ट करती हैं। लेकिन समुद्र की एक बूँद भी तृप्त नहीं कर पाती। अभिमानी का समंदर एक दिन खुद ही अपनी पीड़ा के साथ खुद में डूब जाता हैघुट   घुट के मरता है वह पल   पल।

सब मेरे जैसे हैंऔर मैं सभी के जैसाबस यही भाव तो मन में रखना हैसबसे पहले हवा की खुशबू को महसूस करना होगाउसे खुद के भीतर आने देना होगाउसके बाद प्रेम को भीतर प्रवेश देना होगादरवाज़े खोल कर रखने होंगेखिड़कियाँ खोलनी होंगीगवाक्षों पर पड़े परदे हटाने होंगे.. फिर.. फिर देखना एक दिन प्रेम की ऊष्मा अहंकार के ग्लेशियर को धीरे   धीरे पिघला देगीयकीनन पिघला देगी।

कितनी मीठी नदियों ने समंदर में समा जाने से ठीक पहले यही पूछा होगारेत ने किनारे से तड़प कर पूछा होगासमंदर से बाहर कूद पड़ी मछली ने किसी मछुआरे से पूछा होगाकिसी ज्ञानीकिसी योगी सेकिसी पगली ने पूछा होगामन्नत के धागों ने देव   मंदिर के देवता सेतो किसी दस्तक ने बंद दरवाज़े से पूछा होगा कि क्यों करता तू अभिमान रे बंदेक्यों करता तू अभिमान!

MUSIC

बात जब मीठी नदियों से लेकर खारे समंदर तक की होअपने मन के दरवाजों   खिड़कियों को खोलने की होदिल पर जमे ग्लेशियर को पिघलाने की होखुशबू को महसूस करने की होमन्नत के धागों से देव   मंदिर के देवता तक की होतो बातें होंगी अनंतहै न दोस्तों! ऐसी बातें ख़त्म कैसे होंगीअपने कुछ किस्से हमें भी सुनाइए.. सुनाइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में भेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएहो सकता हैये बातें करते   करते आप भी सोचने पर मजबूर जाएँ कि क्यों करता मैं अभिमानकिस पर करता मैं अभिमानइसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE  13  

क्या कभी खुद से प्रेम किया? 03/07/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से  कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगेप्रेम कीऔर वह भी खुद से प्रेम की.. भला यह भी क्या बात हुईहम तो इससे प्रेम करते हैंउससे प्रेम करते हैंभला अपने सेखुद से प्रेम का क्या औचित्यआखिर क्या है आत्ममुग्ध होनाक्या यह आत्मकेंद्रित होना हैखुद से प्रेम करना.. आखिर इसका अर्थ क्या है? क्या आत्ममुग्ध या आत्मकेंद्रित होकर भी हम दूसरोंं से प्रेम कर सकते हैंआइएइन्हीं सब बातों पर करते हैं आज चर्चा..

MUSIC  

दोस्तों! वह गीत तो आपने ज़रूर सुना होगा..सजना है मुझे.. ज़रा उलझी लटें सँवार लूँहर अंग का रंग निखार लूँकि सजना है मुझे.. सच कहूँतो अपने को सजाने  सँवारने में संकोच कैसाअक्सर लोग जब रिश्तों और संबंधों पर चर्चा करते हैंतो खूब शिकायत करते हैं कि फलां व्यक्ति से उन्होंने बहुत प्रेम कियाउसके साथ समय नष्ट कियामंहगे तोहफ़े दिएपर.. पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। गोया कि किसी फायदे के लिए प्रेम किया होया कि ये सब बेकार की बातें हैंकभी किसी से प्रेम करना ही नहीं चाहिएसब धोखेबाज होते हैंकोई किसी का नहींआदि  आदि। कुछेक महिलाएँ खुद से ही प्रेम करने की सलाह देती दिखाई देती हैंकि दुनिया के सभी पुरुष बहुत बुरे हैंइसलिए खुद से प्रेम करो और खुश रहो। तो कहीं पुरुष कहते हैंकि महिलाएं बहुत चालाक और फ़रेबी हैंइनसे बचोइनसे दूर रहोखुद में खुश रहो।

क्या सिर्फ़ खुद से प्रेम किया जा सकता हैआत्मकेंद्रित या आत्ममुग्ध होकर भी क्या आप खुश रह सकते हैंमेरे ख्याल से सबसे ज़्यादा कुंठित तो वे ही लोग होते हैंजो आत्ममुग्ध होते हैं और एक दिन अपनी ही कुंठाओं में डूब जाते हैं। ये आत्ममुग्ध कभी किसी से प्रेम नहीं कर पातेवे अपनी ही चाहत के घेरे में कैद होकर रह जाते हैंखुद तो मरते ही हैं साथ ही प्रेम को भी नष्ट कर देते हैं। मेरी एक मित्र हैंउनसे जब मिलीतो उन्होंने बड़ी शान से मुझे कुछ तोहफ़े दिखाएजो उनके नए प्रेमी ने उन्हें दिए थे और वे तोहफे भी दिखाएजो उन्होंने पिछले प्रेमी से रिश्ता टूटने के बाद वापस माँग लिए थे। यह तो वस्तुओं के लेन  देन का रिश्ता हुआव्यापार हुआप्रेम कहाँ हुआहै न दोस्तों! अगर प्रेम थातो वो खत्म कैसे हो गयाकोई आपके बनाए साँचे में नहीं ढलातो रिश्ता खत्मप्रेम खत्मकोई आपके जैसा नहीं हो सकातो तुम कौन?

एक और उदाहरण देती हूँएक पुरुष मित्र हैंजो अक्सर कहते हैं कि वे प्रेम तो कर लेंलेकिन उससे क्या ही लाभक्या ही फ़ायदाहम तो खुद से प्रेम करते हैंखुद के लिए जीते हैं। मैंने पूछा फिर भी इतने दुखी क्यों होजब खुद से प्रेम हैतो खुश रहो न भईचेहरे पर मुस्कान क्यों नहींआँखों में से प्रेम झाँकता क्यों नहींहमेशा डरे  डरे से क्यों रहते होअशांत क्यों है मनआनंद क्यों नहीं है जीवन मेंऔर प्रेम  मदिरा की वह खुमारी कहाँ हैमित्र चुप थेकोई जबाव नहीं था उनके पास। जब खुद ही रीते हो अंदर सेतो दूसरे को क्या देंगे आपफिर लोग मंहगी वस्तुओं का लेन  देन करके प्रेम की कमी को पूरा करने लगते हैंखुश होते हैं और वस्तुओं में प्रेम खोजने लगते हैं और कहते हैं देखोहम कितना प्रेम करते हैं एक दूजे सेकोई किसी को कार या बंगला गिफ्ट करता हैकोई किसी को हीरे  मोतीलेकिन हीरा तो बना हैसदा के लिए.. लेकिन प्रेम..प्रेम का कहीं अता पता नहीं...फिर सदा  सदा के लिए वाली बात तो हवा में काफ़ूर हो गई|

Music

सच्ची बात तो यह है दोस्तोंकि लोग जानते ही नहीं कि खुद से प्रेम करने का क्या मतलब हैखुद से प्रेम करना यानी खुद को समझ लेनाखुद को जान लेनाखुद को बतला देना कि मुझे ये पसंद हैया मुझे इसकी चाह है और मैं इसे चाह कर खुश हूँ। हम जब किसी को दुःख देते हैं नतो उससे ज़्यादा खुद दुखी होते हैं। इसके उलट हम जब किसी से प्रेम करते हैं नतो उससे ज़्यादा खुद सुखी होते हैं। हम प्रेम अपने लिए करते हैंहमें कोई पसंद हैहमें कोई भाता हैहम किसी को सोचते हैंयाद करते हैं और खुश हो लेते है। हमने प्रेम कर लियातो कर लियाये है हमारा प्रेम संपूर्ण रूप से।

अब दूसरा करें या न करेंप्रतिदान दे या न देयह उसकी समस्या हैहमारी नहीं। हमारे मन को ख़ुशी मिलीकिसी को चाह करयाद करकेतो हम डूबेंगे आनंद मेंदूसरा न डूबेतो यह  उसकी सोच है। प्रेम हमारे दिल में खिलाचंदन हमारे मन में महकाबेला हमारे हृदय में आधी रात को महकीहम उसे महसूस करेंगे नहम सुगंध से भर जाएँना कि इस चिंता में कुंठित हो जाएँ कि वो अभी कहाँ होगाकिसके साथ होगामुझे याद करता है या नहींप्यार करता है या नहीं। इन बेकार के सवालों के जवाब नहीं मिलते कभी। उलटे इनसे आपके रिश्ते खराब होते हैंप्रेम को समझने से पहले खुद को समझना होगा कि आखिर हम चाहते क्या हैं?

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हाँप्रेम एक व्यक्ति करता हैदूसरा तो उसकी चमक से चमकता है बस। चंपा कहीं ओर खिलती हैलेकिन उसकी खुशबू से कहीं दूरबहुत दूर कोई बौरा  बौरा कर झूमने लगता हैप्रेम के अपने रहस्य हैंयही तो शक्ति है प्रेम कीइसे ही तो समझना है बस। हम जब खुद को प्रेम से भर लेते हैंतो हम प्रेम  पुंज हो जाते हैंप्रेम के चुंबक हो जाते हैं। निःस्वार्थ भाव से जब साँसों की माला पे किसी का नाम सिमरा जाता है तोइस हौले  हौले चलने वाले मनकों की गति से दूर..बहुत दूर कोई चिड़िया पंख फड़फड़ाने लगती हैयक़ीनन ये सब खुद से प्रेम के ही नतीजे हैंहैं न दोस्तों!

Music

हमें अपने भीतर जो सबसे अच्छा गुण लगता हैहमें उस गुण से प्रेम करें। यदि हमें लोगों से प्रेम से बातें करना पसंद हैंउनकी मदद करना या उनके दुःख  दर्द सुननातो गर्व कीजिएअपने इस गुण परअपने किए पर कभी अफ़सोस मत कीजिए। हमारे पास जो थाहमने दे दियाकोई नहीं लौटाएतो ये उसकी समस्या हैहमारी नहीं। हमें हमारा प्रेम  कलश हमेशा भरते रहना चाहिएजब भर जाएतो उसे मुस्काते हुए छलकाते जाना चाहिए। आईने में खुद को देख मुस्काना सीखना होगा दोस्तोंवैसे बताइएकभी मुस्काए हैं आप खुद को आईने में देखकर?

दोस्तोंजब तक खुद के प्रति प्रेम से नहीं भरेंगेतब तक दूसरों से कभी प्रेम नहीं कर सकेंगे। भीतर.. बहुत भीतर से झरने फूटेंगेतभी बाहर हरियाली होगी। शुरुआत बूँद जैसी छोटी ही क्यों न होलेकिन हो तो सही...। सच ही तो है भईमेंहदी लगे हाथों से आप मेंहदी ही तो बाँटेंगे.. है न दोस्तों!

यहाँ एक और ज़िक्र भी ज़रूरी है.. अमेजन दुनिया की सबसे बड़ी नदी हैलेकिन जहाँ से वह निकलती हैवहाँ जल की एक  एक बूँद टपकती है। दो बूँदों के बीच लगभग बीस सेकंड का फ़ासला होता हैलेकिन एक  एक बूँद गिर  गिर कर अमेजन जैसी विशाल नदी बन जाती हैइतनी विशाल कि जब सागर में समाने के लिए सागर  तट पर पहुँचती हैतो सागर भी हैरान हो जाता हैपरेशान हो जाता है,  उसे देख कर कि यह नदी है या मेरी तरह एक सागर?"

सच ही तो है दोस्तोंप्रेम भी तो ऐसे ही शुरू होता है बूँद  बूँद सेऔर कैसे अथाह होता जाता है सागर  सा... व्यक्ति  व्यक्ति से और एक दिन व्यक्ति "समस्त" से प्रेम करने लगता है। प्रेम अनंत है इसलिए एक व्यक्ति इसे संभाल ही नहीं सकताघबरा जाता हैभय खाने लगता हैडूब जाता है और प्रेम उसे डुबो कर फिर आगे बढ़ जाता है। अब वो प्रेम नहींप्रार्थना बन जाता है। प्रेम कभी किसी एक व्यक्ति पर नहीं टिकतावो फैलता जाता हैमरता नहीं हैं वहबल्कि अपने रूप बदलता रहता है। जो प्रेम कर रहा हैवो रहे न रहेजिसे प्रेम किया जा रहा हैवो भी रहे न रहेलेकिन प्रेम फिर भी रहता है हमेशा...एक शाश्वती की तरहहर परिस्थिति मेंहर हाल मेंहमेशा। यही तो कोशिश होनी चाहिए हमारी कि प्रेम बना रहे।

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दोस्तों! ऐसा ही होता है प्रेम! आप प्रेमवश होकर कष्ट भी उठा लेते हैंखुद दुःख में भी डूब जाने के लिए तैयार हो जाते हैंलेकिन प्रेम को होने देते हैं। प्रेम को खोजने आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं होतीआपको खुद के भीतर ही तो झाँकना होता है बस..। हम सभी के भीतर हमेशा प्रेम  कलश भरा रहता हैउसे बस प्रेम से छूने भर की देर होती हैवो स्वतः ही छलकने लगता है। जब भी कोई प्रेम से पुकारता हैमन को छूता है हमारेतो प्रेम  कलश भर  भर जाता है। आप जितना उँड़ेलते हैंवह मीठे पानी का सोताअमृत  सदृश झरनाफिर  फिर भर आता है। पर.. परअक्सर हम उस कलश के ऊपर भय,शंकाओं पूर्वाग्रहों और संदेहों की साँकल चढ़ा देते हैंताले जड़ देते हैंजैसे उन्मुक्त झरने के ऊपर भारी पत्थर रख दिया हो... लेकिन भीतरबहुत भीतर फिर भी प्रेम बहता रहता है चुप  चापमंथर गति सेबिना कोई आवाज़ किए..। उसे बहने दीजिए न..ऊपर आने दीजिए न..रोकिए मत...टोकिए मत...छलकने दीजिए उसेकुछ भी हो जाएप्रेम हर हाल में जीवित रहना चाहिए। लेकिन पहली शर्त है कि पहला प्रेम खुद से होखुद से हो प्रेमखुद को प्रेम से भर लीजिए फिर दूसरे से प्रेम कीजिए। व्यष्टि से समष्टि की ओर बढ़िएफिर पूछिए खुद सेक्या कभी खुद से प्रेम किया है?

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बात जब खुद से प्रेम करने की होप्रेम  कलश की होस्नेह  निर्झर की होमीठे पाने के सोते की होखुद के भीतर झाँकने की होमीठी नदियों से लेकर खारे समंदर तक की होअपने मन के दरवाजों  खिड़कियों को खोलने की होप्रेम नहींप्रार्थना की होखुशबू को महसूस करने की होतो बातें हैं बहुत सारीतो यूँही ख़त्म कैसे हो जाएँगीअपने कुछ किस्से  कहानियाँ हमें भी सुनाइए.. सुनाइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में भेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएहो सकता हैये बातें करते  करते आप खुद से प्रेम करने के सच्चे मायने जान जाएँऔर खुद से प्रेम करने लगेंहै न दोस्तोंइसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से  कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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EPISODE   14 

किताबें बहुत सी पढ़ी होगीं 17/07/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से    कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगेकिताबों कीआप कहेंगेकुछ बोरिंग हो रहा हैक्या पढ़ने   पढ़ाने की बातें लेकर बैठ गईंपर दोस्तोंमैं आपसे यह पूछना चाहती हूँ कि क्या किताबें केवल कागज़ पर छपे अक्षरों से ही बनती हैक्या ज़िंदगी की भी कोई किताब होती हैजिसे हम पढ़ते हैंगुनते हैंएक शेर में शायर कहता भी तो कहता है  

किताब      दिल का कोई भी पन्ना सादा नहीं होता,

निगाह उस को भी पढ़ लेती हैजो लिखा नहीं होता।

(मोहन त्रिपाठी जी)

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जी हाँ दोस्तों! हम ज़िंदगी भर अनगिनत किताबें पढ़ते हैं और इन किताबों में मन के प्रश्नों के उत्तर खोजते हैंना जाने कितनी किताबें पढ़ डाली होंगी अभी तक मैंने भीकितनी ही किताबें पढ़ी होंगीआपने भीकुछ थोड़ी   थोड़ी याद रह गईंकितनी ही पढ़ कर भूल गए। लेकिन कुछ किताबें ऐसी भी होती हैंजो हमें ताउम्र याद रहती हैं। दोस्तों! हम सभी अपनी   अपनी ज़िंदगी जीते हैंकोई अपने लिए जीता हैतो कोई किसी और के लिए अपना पूरा जीवन गुज़ार देता है। यह जीवन भी तो एक किताब ही है नाजिसे हम जन्म के दिन से लिख रहे हैं और अंतिम दिन तक लिखते रहेंगे। कितने हज़ारों   लाखों शब्दों से अपने जीवन की किताब को लिख डालाकौन जानेकैसे लिखाअधूरा लिखा या पूराखुशी लिखी या गम? कभी सोचा ही नहींबस लिखते ही चले गए। कभी इस किताब को पढ़ने की सोची ही नहींऔर जिस दिन पढ़ने बैठेउस दिन किताब ही रूठ गईबोलीअब बहुत देर हो चुकी हैअब सो जाओ तुम।

क्यों समय रहते जीवन की किताब नहीं पढ़ी हमनेभूल गए क्याया फिर हम आलस से भर गएअंतिम नींद से पहले हमें सारी किताब पढ़ लेनी चाहिए थी। हम रोज़ नए   नए पन्नों पर हर पल का हिसाब लिखते चले गएबही खाते लिख   लिख कर खुश होते चले गएलेकिन उन खातों कोइन पोथियों को कभी गलती से भी उलट   पलट कर देखा नहीं। क्या बहुत बिजी रहेकिसी दिन फ़ुरसत मिली भी तो...फिर बड़ी कोशिशों के बादमशक्कत के बादकिसी दिन फुर्सत से अगर देखने बैठेकुछ पन्ने पलटेतो पाया कि हमारी ज़िंदगी का पहला पन्ना हमारे जन्म से शुरू हुआ है। 

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रोज़ एक नई इबारतरोज़ एक नई इमारतबचपन की वो कागज़ की कश्तीवो बारिश का पानीगुड्डे   गुड़िया के ब्याह और इन्हीं में रंगे   रंगे से कुछ पन्नेकभी आम के पेड़ से कच्चे आम चुराने के आनंद से सराबोर कुछ पन्नेकुछ आगे बढ़ेंतो युवावस्था के इंद्रधनुषी पन्ने हैंजिनमें कहीं प्रेम का सुर्ख गुलाब हैतो कहीं पीले   नारंगी एहसासात...इंद्रधनुषी रंगऐसे रंग जो हमारी जवानी के रंग में रंगे थे। कहीं फागुन के रंग हैंतो कहीं सावन की रिमझिम फुहार से भीगे पन्ने। इस किताब में कुछ पन्ने गुलाबी और थोड़े सुर्ख भी हैंजिन पर लिखी हैं प्रेम कीइज़हार कीमिलन की इबारतये पन्ने इस किताब के सबसे चमकीले पन्ने हैंजो पूरी ज़िंदगी हमें रोमांचित करते रहेहम इन्हें बार   बार पढ़ना चाहते हैं क्योंकि प्रेम के ये पन्ने कभी बदरंग नहीं होतेये उम्र के हर मोड़ पर हमें लुभाते हैं। इन पन्नों पे हमने अपनी सबसे सुंदर भावनाएँ दर्ज की हैं। लेकिन..लेकिन देखो तो ज़रा इस किताब की कुछ पन्ने स्याह क्यों हैंकाले   नीले   सलेटी और थोड़े बदरंग...राख जैसे धूसर...ज़रूर ये दर्द   दुःख और पीड़ा के पन्ने होंगेतनहाइयों के पन्नेइंतज़ार के पन्नेजो आँसुओं से भीग   भीग कर गल गए हैं। ज़रा ध्यान से....इन्हें ज़रा आराम से उलटना   पलटनावरना ये चूर   चूर हो जाएँगे और चिंदी   चिंदी हो कर चारों ओर फैल जाएँगे। ये दर्द के पन्नेहम दोबारा कभी पढ़ना नहीं चाहते। इन्हें पढ़ने से हमारा अंतर्मन दुखी होता हैहम दुख के सागर में डूब जाते हैं। ये काले   धूसर पन्ने हमें बिल्कुल नहीं सुहाते।

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चलिएआगे बढ़ते हैंआगे इस किताब में कुछ सतरंगी पन्ने जगमगा रहे हैं। इनमे दर्ज हैकिसी की मुस्कराहटजो कभी उसके होठों पर हमने सजाई थीया किसी ने रख दी थी हमारे होंठों पर। ये हँसी   ख़ुशी के पन्ने....मुहब्बत के पन्ने...मुरव्वत के पन्ने...इंसानियत के पन्ने....सतरंगी   इंद्रधनुषी पन्ने......सब झूम   झूम कर मुझे बुलाते हैं...देखो न...कितने मासूम..कितने कोमल हैं ये पन्ने।

अरे यह क्या?...हमने किताब में ये कुछ पन्नेमोड़ कर क्यों रखे हैंये तो शायद बिल्कुल निजी हैंमेरे अपने पन्ने हैंशायद इनमें मैने अपने निजी पलों को छिपा कर रखा है। ये पन्नेमेरे गिर कर उठने का हिसाब रखते हैंफ़र्श से अर्श की हमारी सीढ़ी की ऊँचाई पर नज़र रखते हैंमेरे आँसू कब मेरी शक्ति बन गएइसका ब्योरा रखते हैंज़िंदगी की किताब के ये पन्ने हमें जीने का हौसला देते हैं। तनहाइयों में जब कोई पास नहीं होतातो ये हमें प्यार से थपकी देते हैं। कभी हमारे कांधे पर हाथ रख देते हैंहमें सहारा देते हैंकहीं जब हम फिसलने लगते हैंगिरने लगते हैंतो एक छोटी   सी ऊँगली का सहारा देकर ये हमें उठा लेते हैंहमारा संबल बनते हैं और फिर हमारी आँखों से आँसुओं की गर्म धारा बहने लगती है। पर इन्हें छूना नहींये बहुत ही कोमल हैंदुनिया केवल ऊंचाई देखती हैमंज़िल देखती हैउस मंज़िल तक का सफ़रपथरीला सफ़र किसी को दिखाई नहीं देताउसी का हिसाब   किताब है इन पन्नों मेंये पन्ने मुझे अहंकार करने से भी रोकते हैंमुझे जमीन पर रखने का काम भी करते हैं ये..।

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चलिए दोस्तों! अब अगले पन्ने पलट कर देखते हैंपर इन पर तो कुछ लिखा ही नहीं हैंबिल्कुल कोरे...आखिर क्योंइन पन्नों में शायद कुछ ख़ास है.....ये पन्ने उन भावनाओंउन ख्वाहिशों के नाम के पन्ने हैंजिन्हें कभी व्यक्त नहीं किया जा सकाबहुत   सी अनकही बातें छुपी हैं यहाँबहुत   सी अनकही बातें लिखी जाएँगी यहाँकुछ नहीं लिखी गई हैं और कुछ लिखी हैंपर दिखती नहीं हैं....ऐसी हैं ये बातें। इसलिए ये पन्ने आज खाली दिखाई देते हैं....संवेदनाओं के नाम लिखे गए ये पन्ने हैं...छोड़े गए हैं ये पन्ने। वैसे शब्दों में इतना सामर्थ्य है भी कहाँ कि वे किसी की भावनाओं कोसंवेदनाओं कोइच्छाओं को पूरी तरह व्यक्त कर देसारा अनकहा इन्हीं पन्नों पर लिखा है। चाहे वे टूटी   फूटी ख्वाहिशें होंआधे   अधूरे अरमान होंकुछ रिश्ते होंकुछ प्रेम भरे ख़त होंजो कभी लिखे ही नहीं गए और अगर लिखे भी गएतो कभी भेजे नहीं गए। कुछ आँसूजो गालों पर ही सूख गएकुछ अनकही बातेंजो होंठो के किनारे पर ही चिपककर रह गईं। दोस्तों! इन पन्नों को पढ़ने की नहींमहसूसने की ज़रुरत है। इन्हें छूना मना हैआप छुए नहींबहुत कोमल हैंइनके मुरझाने का डर है।

Music

दोस्तों!

ज़िंदगी की किताब कई पन्नों से पूरी है,

पर कुछ कहानियाँ हैंजो लफ़्ज़ों में भी अधूरी हैं।

(साभार    फ़ेसबुक)

अरे! इस किताब के आख़िरी कुछ पन्ने फटे हुए से क्यों दिखते हैंज़रुर ये वो पन्ने होंगेजो ज़िंदगी की किताब से हमेशा के लिए दूर हो गए होंगे। मगर उनसे अलग होने के निशान किताब पर बखूबी देखे जा सकते हैं। बहुत से रिश्तेबहुत से नातेबहुत से प्रियबहुत से अपने...जो हमसे छूट गएजो हमसे रूठकर सदा   सदा के लिए चले गएजिनके लिए मन आज भी तड़पता है और कहता हैकहाँ गया उसे ढूंढो....ऐसे रिश्तों के निशान अमिट होते हैंहम इन्हें भूलना भी चाहेंतो भी दिल इन्हें भूलने नहीं देता। क्योंकि यही तो हैं वे पन्नेजिनमें उनकी यादें बसी हुई हैंउनके प्यार की यादेंउनके साथ की यादेंउनके रिश्तों की यादें.. यादें.. जो हमेशा तड़पाती हैं।

तो दोस्तोंये है ज़िंदगी की किताब...हर एक की अपनी किताब होती है...अब हमें तय यह करना है कि हम इसे किस तरह संजोते हैंपढ़ते हैंलिखते हैंया फिर पन्नों को फाड़ डालते हैंहमारे दुनिया से जाने के बाद हमारे इन पन्नों को कोई प्रेम से क्यों पढ़ना चाहेगाकुछ तो करना ही होगा। क्यों न ऐसी किताब बन जाएँजिसमें सूखे हुई गुलाब के फूल सदियों   सदियों तक महका करें और कहते रहें कि रहें न रहें हममहका करेंगे बनके कलीबनके सबा बागे वफ़ा में.... है न दोस्तों..!

Music

तो देखा आपनेज़िंदगी की इस किताब में असंख्य पन्ने हैंपृष्ठ पलटते जाइएदेखिएज़िंदगी क्या   क्या रंग दिखाती हैसारे रंग समाए हैं इसमें। जब असंख्य रंग हैं इस किताब मेंअसंख्य पृष्ठ हैं इसमेंअसंख्य कही   अनकही बातेंअसंख्य जज़्बातअसंख्य भावनाएंतो बातों का सिलसिला भी लंबा ही होगा नइसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइएअपनी कहानीअपने किस्से। अपनी ज़िंदगी के किस्से   कहानियाँ हमें सुनाइए.. सुनाइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएसुनाते रहिएहो सकता हैयूँ ही बातें करते   करते आप अपनी ज़िंदगी की किताब के कुछ शब्द पढ़ सकेंउसे पढ़ने की फ़ुरसत निकाल सकेंक्योंकि यह बेहद ज़रूरी हैहै न दोस्तोंइसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE   15 

लव.. यू ज़िंदगी!  31/07/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से   कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगेसकारात्मकता कीपॉज़िटिविटी कीअदम्य साहस कीजिजीविषा कीक्योंकि इन्हीं के कारण हम कह पाते हैं   लव.. यू ज़िंदगी!है न दोस्तों?

music

दोस्तों! यूँ तो ज़िंदगी में अनेक लोग मिलते हैंकुछ याद रह जाते हैंकुछ को हम भूल जाते हैंपर कुछ ऐसे भी होते हैंजो हमेशा के लिए हम में समा जाते हैंहमारे व्यक्तित्व का अंग बन जाते हैंगाहे   बगाहे हम उन्हें याद करते रहते हैंअक्सर उनका ज़िक्र करते हैंऔर वे हमारी ज़िंदगी मेंज़िंदगी को देखने के नज़रिए में सकारात्मकपॉज़िटिव बदलाव लाते हैं।

जी हाँ दोस्तों! आज मैं बात कर रही हूँएक ऐसी ही शख्सियत कीजिन्होंने सच में दुनिया को समझाया कि ज़िंदगी को प्यार कैसे किया जाता है। बात है अरुणिमा सिन्हा कीएक राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी....ट्रेन एक्सीडेंट में एक पैर गवां देने के बाद.....माउंट एवरेस्ट सम्मिट करने का संकल्प लेना...उसे पूरा करने की जद्दोजहद....क्यों?..आखिर क्योंकेवल इसलिए कि लव.. यू ज़िंदगी! यानी जीने की चाह...अदम्य साहस के साथ जिजीविषा...अहा ज़िंदगी....!! लव..यू ज़िंदगी!

आखिर क्या है यह ज़िंदगी?

क्या खेल हैआनंद हैपहेली हैनदी है या झरना है या बस..साँसों की डोर थामे उम्र के सफ़र पर बढ़ते जाना है ज़िंदगी?

यह साधना है या यातना?

सुख है या उलझाव?

आज तक ज़िंदगी का अर्थ कोई भी पूरी तरह कभी समझ ही नहीं पाया है। आप अपनी ज़िंदगी किस तरह जीना चाहते हैंयह तय करना ज़रूरी है। आखिरकार ज़िंदगी आपकी है। यकीननआप जवाब देंगे    क्या ज़िंदगी को अच्छी तरह से जीने की तमन्ना हैदरअसलज़िंदगी एक व्यवस्था हैऐसी व्यवस्थाजो जड़ नहीं चेतन हैस्थिर नहींगतिमान है। इसमें लगातार बदलाव भी होने हैं। जीवन की अर्थवत्ता हमारी जड़ों में हैं। जीवन के मंत्र ऋचाओं से लेकर संगीत के नाद तक समाहित हैं। हम इन्हें कई बार समझ लेते हैंग्रहण कर पाते हैं ,तो कहीं   कहीं भटक भी जाते हैं और जब   जब ऐसा होता हैज़िंदगी की खूबसूरती गुमशुदा हो जाती है। हम केवल घर को ही देखते रहेंगेतो बहुत पिछड़ जाएँगे और केवल बाहर को ही देखते रहेंगेतो भी टूट जाएँगे। मकान की नींव देखे बगैरकई मंज़िलें बना लेना खतरनाक हैपर अगर नींव मजबूत है और फिर मंज़िल नहीं बनातेतो अकर्मण्यता हैआलस हैकामचोरी है। है न दोस्तों! केवल अपना उपकार ही नहींपरोपकार के लिए भी जीना है। अपने लिए ही नहींदूसरों के लिए भी जीना है। यह हमारी ज़िम्मेदारी भी है और ऋण भीजो हमें समाज और अपनी मातृभूमि को चुकाना होता है।

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महर्षि परशुराम जी ने यही बात भगवान कृष्ण को सुदर्शन चक्र देते हुए कही थी कि वासुदेव कृष्णतुम बहुत माखन खा चुकेबहुत लीलाएँ कर चुकेबहुत बांसुरी बजा चुकेअब वह करोजिसके लिए तुम धरती पर आए हो। परशुराम के ये शब्द जीवन की अपेक्षा को न केवल उद्घाटित करते हैंबल्कि जीवन की सच्चाइयों को परत   दर   परत खोलकर रख देते हैं। हम चिंतन के हर मोड़ पर कई भ्रम पाल लेते हैं। प्रतिक्षण और हर अवसर का महत्व जिसने भी नज़रअंदाज़ कियाउसने उपलब्धि से स्वयं को दूर कर किया है। नियति एक बार एक ही मौका देती है। याद रखेंवर्तमान भविष्य से नहींअतीत से बनता है। सही कहा न दोस्तों!

कोई कहता है कि ज़िंदगी एक आईना हैसच   झूठ काग़म   ख़ुशी कानफ़रत   प्यार काइंसान और इंसानियत का... क्या सचमुच?

कोई कहता है कि ज़िंदगी एक कश्ती हैडूबती   उबरती लहरों के ऊपरइठलाती   बलखाती   सी हवा से बातें करती। कोई कहता है कि ज़िंदगी एक फ़लसफ़ा हैसुख   दुख इसके दामन में खिलते   मुरझाते हैंकभी हँसी   ठिठोली करतेकभी आँखें नम कर जातेना कोई तय पैमाना है इसकाना कोई सिद्ध   सूत्र इस प्रमेय काये तो उतना ही हैजितना जिसने जानाजितना जिसने पहचाना हैना कोई इसका ओर हैना कोई छोरलगे ऐसे जैसे नीले अंबर में उड़ती पतंग की डोर है I

Music

चलिए दोस्तोंएक कहानी सुनाती हूँ…. एक जंगल में शेर और कई तरह के जानवर रहते थे   भालूचीतागीदड़बाघहिरणहाथी आदि। एक बार उस जंगल में भयानक आग लग गई। चारों तरफ आग की लपटें आसमान को छूने लगीं। हिरणशेरगीदड़ सभी जान बचा कर भागने लगे। उसी जंगल में एक पेड़ पर एक चिड़िया भी रहती थीभयानक आग को देखकर वह घबराई  नहींजल्दी से उड़कर पास के तालाब पर गई और चोंच में पानी भरकर आग पर डालने लगी। चिड़िया को ऐसा करते देख कौआ उसका मज़ाक उड़ाते हुए बोला    “चिड़िया रानी,चिड़िया रानीयह क्या कर रही होतुम इतनी छोटी हो और यह तुम भी जानती हो कि तुम्हारी चोंच भरे पानी से यह आग नहीं बुझने वाली हैतो फिर क्यों बार   बार प्रयास कर रही हो?” चिड़िया बोली     “मैं जानती हूँ कि मेरे अकेले और छोटे से प्रयास से यह भयानक आग नहीं बुझने वाली हैपर जिस दिन इस जंगल का इतिहास लिखा जाएगाउस दिन तेरा नाम देखने वालों में और मेरा नाम आग बुझाने वालों में लिखा जाएगा।”

यह कहानी मैंने बचपन में पढ़ी थी और आज भी इसका एक   एक शब्द दिल में बसा है। दोस्तोंहमारी ज़िंदगी चुनौतियों का सागर है। जब तक ज़िंदगी हैछोटी   बड़ी चुनौतियाँ आती ही रहेंगी। इसलिए हमें अपने ज़िंदगी की हर चुनौती को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए क्योंकि हम सब अच्छी तरह से जानते हैं कि अगर हम ज़िंदगी   सागर में उठती   गिरती लहरों को देखकर डर गएतो हम इसे पार कैसे करेंगे?

जिन खोजा तिन पाइयागहरे पानी पैठ।

मैं बपुरा बूडन डरारहा किनारे बैठ।।

ज़िंदगी एक खूबसूरत एक सफ़र है। दोस्तोंअगर आपने कभी नाव में बैठकर यात्रा की होगीतो आपने तीन तरह के लोगों को देखा होगा। एक तरह के लोग वे होते हैंजो नदी या सागर में उठती लहरों को देखकर डर के मारे नाव में बैठते ही नहीं। दूसरी तरह के लोग वे होते हैंजो डरते   डरते नाव में तो बैठ जाते हैंपरंतु वे जैसे   तैसे थरथराते हुए सफ़र को पूरा करते हैंऔर तीसरे प्रकार के लोग वे होते हैंजो उस सफ़र को इंजॉय करते हैंजो उस सफ़र का मज़ा लेते हैं। सोचिएआप किस श्रेणी में आते हैं?

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दोस्तों! बुरा वक्त कहकर नहीं आता। बुरे वक्त में भी हौसला बनाए रखिए। अब शायद आप यही सोचेंगे कि कहने और करने में बहुत फ़र्क होता है। जिस इंसान के ऊपर मुसीबत आती हैउसका दर्द सिर्फ़ वही जानता हैतो ठीक हैमैं इस बात को मानती हूँलेकिन जब हमारे पास दो ऑप्शनस  हों, 'लड़ो या मरोतो फिर लड़कर क्यों न मरेंमरना तो है हीतो हम लड़ने से पहले ही चुनौतियों के सामने घुटने क्यों टेकेंखुद को शारीरिक और मानसिक रूप से इतना सक्षम क्यों न बनाएँ कि हम विषम परिस्थितियों में भी न टूटें। शायद हम बच जाएँ!

बेहतरी की कोई सीमा नहीं होतीदोस्तों! कोई भी इंसान अगर चाहेतो वह खुद में अपनी इच्छा के अनुसार बदलाव करने में सक्षम है। अगर आपको लगता है कि आप कमज़ोर हैंतो हानिकारक वस्तुओं का सेवन करने के बजाए पौष्टिक और शक्तिवर्धक खाद्य पदार्थों का सेवन कीजिए। रोज़ाना कसरत कीजिएयोग कीजिएदौड़ लगाइए। कुछ भी कीजिएलेकिन खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से मज़बूत बनाइए। अपने अंदर आत्मविश्वास पैदा कीजिए क्योंकि ज़िंदगी की कठिन चुनौतियों का सामना करने के लिए आपका स्वस्थ और फ़िट रहना अति आवश्यक है।

सपने अपने भी होते हैं और सपने सच्चे भी होते हैंदोस्तों! अपने सपनों को अपना बनाएँअपने सपनों को सच्चा बनाएँ। सपनों को पूरा करने में जो आनंद आता है नवह अतुलनीय है। अपने सपनों को पूरा करने में लगन और परिश्रम से जुट जाइएफिर देखिएगाकोई उन्हें पूरा होने से नहीं रोक सकता। ज़िंदगी में चाहे कितनी ही मुश्किल घड़ी क्यों न आ जाएचाहे कितना भी बुरा वक्त क्यों ना आ जाएकभी निराश न होंकभी हिम्मत मत हारें और अगर हारना भी पड़ेतो बहादुरों की‌ तरह लड़कर हारेंकायरों की तरह जान गँवा कर नहीं।

उम्मीद की लौ सारे जहान को रोशन कर सकती हैदोस्तों! कभी उम्मीद का दामन न छोड़ें। और हाँएक बात हमेशा याद रखेंअगर आपकी ज़िंदगी में कभी ऐसा वक्त आ जाए कि आपको कोई रास्ता दिखाई न देहर तरफ़ अंधेरा ही अंधेरा नज़र आएतो जल्दीबाज़ी में कोई फ़ैसला न करें। थोड़ा ठहर जाएँथोड़ा इंतज़ार करेंथोड़ा धैर्य रखेंथोड़ी साँसें लें गहराई सेडीप..डीप..और डीप..क्योंकि दुखों का कोहराचाहे कितना भी घना क्यों न होसूरज की किरणों को निकालने से नहीं रोक सकता। आप बस हौसला रखेंअपने ईश्वर और अपने बड़ों पर भरोसा करें और उनके प्रति कृतज्ञ रहें। स्वयं पर विश्वास बनाए रखें। आप देखेंगे कि उम्मीद की एक किरण अंधेरे को चीरते हुए धीरे   धीरे आपकी तरफ़ बढ़ रही है और सदैव याद रखिए कि आप हार मानने के लिए नहीं बने हैंआप नई रार ठानने के लिए बने हैंआप काल के कपाल पे लिखते और मिटाते हैं और नए गीत गाने के लिए बने हैंऔर कहने के लिए बने हैं    लव यूं ज़िंदगी। सच कहा न दोस्तों!

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जी हाँ दोस्तों! ज़िंदगी बहुत खूबसूरत हैइसका लुत्फ़ उठाइएस्वयं के लिए जीएँदूसरों के लिए जीएँलेकिन जीएँ ज़रूर।। आप इस धरती पर किसी निमित्त के लिए आए हैंयूँ ही मर जाने के लिए नहीं। आपको देख कर लोग कहें कि जीना होतो नत्थू लाल की मूंछों की तरह। हमारी बातें तो चलती ही रहेंगीइसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइए कि आप ज़िंदगी को प्यार क्यों करते हैंअपनी कहानीअपने किस्से। अपनी ज़िंदगी के किस्से   कहानियाँ हमें भी शेयर कीजिए .. कीजिएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएसुनाते रहिएहो सकता हैयूँ ही बातें करते   करते आप भी कहने लगें कि लव यू ज़िंदगी.. है न दोस्तोंइसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

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EPISODE   16   

लब हिलें तो.. 14/08/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से    कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगेप्रेम कीप्रिय की मुस्कान कीउस मुस्कान के कारण हमारे आस   पास बनी खूबसूरत दुनिया कीक्योंकि जब उसके लब हिलते हैंतब मोगरे के फूल झड़ते हैंऔर सारा वातावरण मोगरे की खुशबू से खुशनुमा हो जाता है।

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दोस्तो! यह सच है कि किसी प्रिय की बातेंउनकी मुस्कान और उनकी भावनाएँ हमारे आस   पास एक खूबसूरत दुनिया की सृष्टि करती हैं। यह एक तरह का इज़हार है कि उसके बिना सब कुछ अधूरा है और उसके होने से ही जीवन में रंग और खुशियाँ हैं क्योंकि जब   जब उसके लब हिलते हैंतो फूल खिलते हैंअमावस्या में भी चाँद निकल आता हैउसकी हँसी में सवेरा हो जाता हैउसकी आँखों में ही सारा जहाँ डूब जाता हैउसकी मुस्कान से बहारें मिल जाती हैंउसके हर लफ्ज़ में मिठास हैउसके हर ख्याल में उजास हैउसकी ख़ुशबू से सारी महफिल महक जाती हैउसकी खिलखिलाहट सारे माहौल में मिठास और खुशबू भर देती है और उसके आने पर सारा जहाँ सुगंधित और खूबसूरत हो जाता है और दिल गया उठता है    लब हिलें तो मोगरे के फूल खिलते हैं कहीं..  

पिछले दिनों  किसी काम से एक ऑफिस में जाना हुआ। जिनसे मिलना थावे एक महिला अधिकारी थीं। जैसे ही मेरी बारी आईमैं उनसे मिलने गईदेखावो तो मेंरे कॉलेज की सहेली निकली। मिलते ही हम दोनों ज़ोर   ज़ोर से हँसने लगीं। आवाज़ सुनकर कमरों में से कर्मचारी निकल कर आए। लगा कि कुछ गलत हो गया। मेरी  सहेली एकदम से चुप हो गई मानो कोई अपराध करते पकड़ी गई हो। बोलीसब सुन रहे हैंदेखोकमरों से बाहर आ गएइतने सालों की नौकरी में मेरी आवाज़ आज तक किसी ने नहीं सुनी थी। मैं हँस कर बोली, “क्या कब्र बना रखा है ऑफिस कोआज सभी मुर्दे कब्रों से बाहर निकल आए।” इस बात पे पूरा ऑफिस ठहाका मारकर हँस पड़ा।

मेरी दोस्त की आँखों में आँसू आ गए। वह बोली, “अपनी ही खनकती हँसी बहुत दिनों बाद सुन रही हूँ मैं। एक हँसी जिसमें रहती थी खनखनाहटवो सिर्फ़ हँसी नहीं थीवह एहसास थीखनक थीकई दिनों से कहीं गुम और चुप   सी थी वोदबी हुई थी वो खनक न जाने किन दिशाओं मेंआज तुम्हारे आने से मुस्कराहटों के साथ उभरी है फिर उन लबों पे।“ वह आगे बोली, “माँ के यहाँ जो हँसी छूट गई थीवो बरसों बाद आज लौट आई है। इससे पहले कब खुलकर हँसी थीयाद ही नहीं।“ वे तो बोले ही जा रही थीऔर मैं यह सुनकर अवाक।

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चलिए दोस्तोंएक और वाकया लेते हैं........एक विवाह समारोह में जाना हुआवहाँ पुरुष और महिलाएँ सभी साथ   साथ बैठे थे। सभी पुरुष समूह बना कर खूब हँसी   मज़ाक कर रहे थेलेकिन महिलाएँ चुपचाप बैठी थीं। मुझे तो यह कुछ अटपटा   सा लगाइतने में एक महिला ने आकर चुप्पी तोड़ीतो सभी महिलाओं ने उसे आँखें दिखा कर चुप करवा दियामानो वो किसी मर्यादा को तोड़ रही हो और फिर सब शांत हो गया। किसी भी बात कामज़ाक का कोई रिएक्शन ही नहीं। अक्सर महिलाएँ बातें तो खूब करती हैंलेकिन उनमें हास्यबोध नहीं दिखता।

मिसेस शर्मा बहुत स्वादिष्ट खाना बनाती हैं। उस दिन उनके पति ने कहा, “आजकल तुम्हारे हाथों में वो स्वाद नहीं रहाजो पहले था। वो झट से बोलीं    आप भी तो अब पहले जैसे नहीं रहे...। दोनों इस बात पे हँस पड़े... मिसेस शर्मा बहुत बड़ा झगड़ा कर सकती थींलेकिन उनके हास्य बोध ने बचा लिया।

यह उदहारण है ऐसी महिलाओं काजो अपनी ज़िंदगी में यहाँ   वहाँ बिखरे हास्य को समेट लेती हैं। जो हँसना जानती हैंदूसरों को हँसाना भी जानती हैंउनमें एक कॉमन सेन्स होता है। लेकिन अफ़सोस ये कि कितनी महिलाएँ हैं इन जैसीजो ठहाके लगाती हैंखिलखिलाकर हँसती हैंदिल खोल कर मुस्काती हैं और किसी उदास चेहरे पर प्यारी   सी मुस्कान सजा देती हैं।

अक्सर औरतों का हँसीठिठोलीठहाकों से कोसों दूर का नाता होता है। ये स्थिति सभी जगह दिखती हैजैसे जब वे पार्टी में होती हैंया पिकनिक मेंदोस्तों की महफ़िल मेंआफ़िस में  या घर में। वो सभी जगह अपने होंठों पे चुप का ताला लगाए रहती हैंबातें चाहे कितनी भी कर लेंलेकिन हँसते हुए कम ही दिखती हैं। बहुत ज़्यादा हुआतो धीरे से मुस्करा देंगीलेकिन वो भी प्लास्टिक वाली मुस्कान। वो खुद हँसना   हँसाना नहीं चाहती इसलिए दूसरों के हास्य   बोध को भी कम ही समझ पाती हैं। कभी   कभी तो उन्हें समझ ही नहीं आता कि सब किस बात पे हँस रहे हैं।

किसी महिला से पूछो कि आखिरी बार वो कब खिलखिलाकर हँसी थीतो उसे जवाब देने में वक्त लगेगा और सोचने में भी। क्या वजह है कि महिलाएँ पुरुषों की तरह हँसती नहीं और न ही वो मज़ाक करती हैं।

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दरअसल दोस्तों! बचपन की हिदायतें पचपन तक पीछा करती हैंबचपन से ही घुट्टी में घोल के पिलाया जाता है कि लड़कियों को धीरे   धीरे बात करनी चाहिएमीठा बोलना चाहिएकम बोलोहँसो मत ज़ोर सेरास्तों पे या बाज़ार मेंपब्लिक में तो बिल्कुल नहीं हँसना। मायके में होतो पिता और भाई के सामने मत हँसोऔर ससुराल में हो तो सास   ससुर और जेठ के सामने चुप रहोऑफ़िस में हो तो बॉस के सामने चुप रहना... उफ़! फिर महिलाएँ हँसें तो हँसें कब ?

कब्र में जाने के बाद?

शायद वहाँ भी बंधन हों.....!!

हमारे समाज ने बचपन से ही लड़कों और लड़कियों के बीच अलग   अलग मापदंड तय किए हैं। एक लड़की से हमेशा एक निश्चित व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। उसे कभी किसी के साथ कोई मज़ाक   मस्ती नहीं करनी हैहँसना   हँसाना नहीं है क्योकिं सभ्यशरीफ़भद्र और सुशील संस्कारवान लड़कियों को यह सब शोभा नहीं देता। और इस तरह हमारे समाज ने सुंदर होठों से सुंदर मुस्कान छीन ली....खिलखिलाहट पर बंदिशें लगा दींपहरे लगा दिए।

और उन आज्ञाकारी लड़कियों ने चुपचाप शराफ़त का लबादा ओढ़ कर अपनी हँसी और अनगिनत मुस्कानों की हत्या कर दी। इसी तरह बरसों   बरस से होठों के किनारों तले कई मुस्कानें दम तोड़ती आई हैं। फिर धीरे   धीरे महिलाओं ने इसे अपने स्वभाव में शामिल कर लिया। एक तो वे वैसे ही संवेदनशील स्वभाव वाली होती हैंअक्सर उन्हें रोने   धोनेसिसकने वाली ही समझा जाता हैज़रा   ज़रा सी बात पे रो देनामायके में भाइयों ने मज़ाक किया तो रो दिएससुराल में ननद   देवर ने छेड़ दियातो रो पड़े। किसी ने मोटी कह दिया या किसी ने नाटी कह दियातो आँसू छलक आए। ऐसे अनगिनत उदाहरण हम रोज़ अपने आसपास देखते हैं। वे किसी मज़ाक को सहजता से नहीं ले पातीं। महिलाएँ भावुक होती हैंकिसी भी मज़ाक को सहजता से नहीं ले पातीं और खुद पर हँसना तो उन्हें आता ही नहीं। वैसे भी खुद पर हँसने का हौसला हर किसी में होता भी नहींअक्सर पुरुष यही सोचते हैं कि भई महिलाओं से संभल कर बात करनी चाहिएन जाने किस बात का बुरा मान जाएँ या रो पड़ें।

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दोस्तों! क्या कभी आपने ऐसी किसी महिला को देखा हैजो ज़ोर   ज़ोर से हँस रही हो और आपने उसे जज न किया होन ही उसने ध्यान दिया हो कि हँसते   हँसते वो कैसी दिख रही हैउसकी आँखें छोटी और दांत बाहर दिख रहे हैंशायद ही देखा हो....महिलाएँ हमेशा अपने लुक्स को ले के सचेत रहती हैं। वो हँसते हुए भी खूबसूरत दिखना चाहती हैं। कहीं चेहरा बिगड़ न जाएदाँत न दिखेंआँखें सिकुड़ न जाए आदि.. आदि ..इतनी तैयारियों के बाद कोई क्या ख़ाक हँसेगा? ..वो तो सिर्फ़ प्लास्टिक की हँसी हँसेगाऔर फिर लोग तो बैठे ही हैंउन्हें जज करने के लिए.... है न दोस्तों!

अगर लोग किसी ज़िंदादिल महिला को हँसते हुए देखते हैंतो अजीब   सी शक्ल बनाते हैंउसे घूर    घूर के देखते हैंमानो वो कोई गुनाह कर रही हो। उसे ज़ोर   ज़ोर से हँसते देख उसे  असभ्य मान लिया जाता हैयही वजह है कि महिलाओं की मुस्कराहटें कहीं गुम हो गई हैं। सर्वेक्षणों के अनुसार पुरुषों और महिलाओं के हास्यबोध में काफ़ी अंतर होता है। महिलाओं के मुकाबले पुरुष ज्यादा हास्य उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं। यही वजह है कि हास्य कवि सम्मलेन हो या हास्य के कार्यक्रम महिलाएँ इनमें कम ही नज़र आती हैं।

तो क्या हम ये मान लें कि महिलाएँ नीरस होती हैंबोरिंग और बुद्धू टाइप की होती हैं। जी नहींकतई नहींमहिलाओं में भी हास्य की उतनी ही समझ होती हैजितनी पुरुषों में और हर महिला अपनी ज़िंदगी के साथी के रूप में ऐसे ही पुरुष की कल्पना करती हैजो हँसमुख होखुश दिल होवे भी रोते   सेचुप्पे   से साथी को कोई पसंद नहीं करतीफिर भी वो खुद गुमसुम रहती हैंक्योंमज़ाक नहीं करतीक्योंज़िंदगी को ज़िंदादिली से नहीं जीतींआखिर क्यों?

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दोस्तों! याद रखिएगाघर की महिला यदि चुप या उदास रहेगीतो उनके बच्चे भी कभी नहीं हँसेंगे। जिस घर में महिलाएँ मुस्काती नहींहँसती नहींउस घर में ख़ामोशी के साये अपना डेरा जमा लेते हैं।

हमारी ज़िंदगी में चाहे जितनी भी परेशानियाँ होंदुःख होंपीड़ा होहँसी और मुस्कान फिर भी बोई जा सकती हैउगाई जा सकती हैइसमें कोई खर्चा नहीं होतान कोई खाद   पानी देना होता है। हँसी तो एक प्रार्थना हैजिसे आलाप से लेकर स्थाई तक पहुँचने के लिए दोहराव की ज़रूरत नहीं होतीउसे तो सिर्फ़ सम्मिलित स्वरों कीसहयोग की ज़रूरत होती है और कोई उसे जज न करेइसकी ज़रूरत होती है।

दोस्तों! हँसी से बड़ी कोई नेमत नहींवरदान नहींइस पर तो कोई टैक्स भी नहींजो लोग नहीं हँसतेवो कभी ज़िंदगी का लुत्फ़ नहीं उठा पाते। हँसना   हँसाना कोई बुरी बात नहीं है ये तो एक उन्मुक्त बहता झरना हैइसे रोकना नहींटोकना नहींबहते देना है। महिलाएं सुन रही है नआप हँसेगीतो दुनिया हँसेगीआप मुस्काएँगी तो सारी दुनिया मुस्काएगी। हँसी से बैर नहींदोस्ती कीजिए। यदि आप ऐसा करेंगीतो सोसायटियों में चल रहे ‘लाफ़्टर क्लब’ बंद हो जाएँगेऔर ये लाफ्टर क्लब आपके ही भीतर समा जाएंगेक्योंक्या विचार हैदोस्तों!

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जी हाँ दोस्तों! हँसी से बढ़कर खूबसूरत कुछ नहींइसका आनंद उठाइएस्वयं भी हँसें और.. औरों को भी हँसाएंक्योंकि इससे बड़ी कोई नेमत नहींवरदान नहींयह ईश्वर का आशीर्वाद है हम मनुष्यों के लिएजानवर हँसते नहीं हैंकेवल हम हँस सकते हैंतो क्यों न हँसेंहमारी बातें तो चलती ही रहेंगीइसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइए कि आप की ज़िंदगी में हँसने के क्या मायने हैंऔर महिलाएं सुनेंबेधड़कबेखौफ़ होकर मुस्कराएंयदि लोग जज करते भी हैंतो करते रहेंक्योंकि कुछ तो लोग कहेंगेलोगों का काम है कहना! अपनी कहानीअपने किस्सेमें भी शेयर कीजिए .. कीजिइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएसुनाते रहिएहो सकता हैयूँ ही बातें करते   करते आप मुस्कराने लगेंखिलखिलाने लगेऔर जी खोल कर हँसने लगें!.. है न दोस्तोंइसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

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EPISODE17   

आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या है? 28/08/26

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नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंजीवन की राह पर चलतेचलते अनेक लोग हमें मिलते हैंकुछ को हम भूल जाते हैंकुछ याद रह जाते हैं और कुछ हमें सोचने के लिए मजबूर कर जाते हैं। जैसेमुझे याद आता हैअमित। एक दिन मेरे पास आया और बोलामैममुझे लगता है कि मैं तनाव से पीड़ित हूँडिप्रेशन में हूँ।। बसमैंने कह दियाकह दिया न आपसे..। मेरे लिए.. मेरे लिए  यह एक रहस्योद्घाटन थाक्योंक्योंकि आम तौर पर लोग ऐसी बात दूसरों के सामने ज़ोर से नहीं  कह पाते हैंकहने की बात तो दूरवे तो मानते ही नहीं कि उन्हें कोई परेशानी है भी। किसी को कह कर तो देखोतुरंत जवाब आएगा मैं पागल हूँ क्याकितनी आसानी से लोग ‘पागल’ शब्द का प्रयोग कर लेते हैं। है न दोस्तों! इसीलिएआज हम बात करेंगेतनाव कीडिप्रेशन कीइसकी वजहों कीइसे प्रबंधित करने के तरीकों की.. आज के समय में इस विषय से भाग ही नहीं सकते। मुझे तो लगता है कि तनाव न केवल आधुनिक जीवन का संकेत बन गया है, बल्कि यह आधुनिक जीवन का उपहार है, है न दोस्तों? चलिएआज इसी के बारे में बातचीत करते हैं, तो चलिए, मेरे साथ बातचीत के इस सफ़र पर..

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दरअसल दोस्तोंआज के दौर की सबसे बड़ी समस्या का नाम अगर कुछ हैतो वो है तनाव। सभी रोगों का जनकहरेक को हैरान परेशान करने वाला मर्ज़ये हर जगह मिलता हैलेकिन इसकी कोई दवा कहीं नहीं मिलती। आज इस समस्या से संसार के लगभग अस्सी प्रतिशत लोग, जी हाँ, 80 परसेंट लोग जूझ रहे हैं। हम सभी जानते हैं कि हर रोग पहले मन में जन्म लेता है और बहुत बाद में जाकर देह पर उसका असर देखने को मिलता हैं। ये तनाव भी ऐसा ही मर्ज़ है।

उपचार के बाद अमित अपनी डायरी में लिखता हैमैं अब अपने बारे में खुलकर और ईमानदारी से बात करने लगा हूँ। मैंने बड़ी कठिनाई से यह सीखा है कि लोगों से बात करना कितना ज़रूरी हैअपने हितैषियों को यह बताना कितना महत्वपूर्ण है कि आप क्या महसूस कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात जो मैंने सीखी वह यह है कि मैं अजेय नहीं हूँमैं टूट सकता हूँ औरों की तरहमैं भी औरों की तरह ही हूँ, उनसे अलग नहीं, कमज़ोरियाँ मुझमें भी हो सकती हैंपर हाँ, मैं कोशिश ज़रूर कर सकता हूँकोशिश मेरे हाथ में है न..।

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दोस्तों! तनाव एक अनुक्रिया हैजिसका असर हमारे मन और देह दोनों पर पड़ता है। हमारे शरीर में मनोवैज्ञानिक यानी साइकोलॉजिकल तथा दैहिक यानी फिजियोलॉजिकलदोनों तरह की अनुक्रियाएँ होती हैंयानी व्यक्ति जब तनाव में होता हैतो मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से क्षुब्धता यानी डिस्टर्बेंस का अनुभव करता है। जब ये अनुक्रियाएँ मनोवैज्ञानिक होंतो व्यक्ति बहुत परेशान हो जाता है। उसे व्यर्थ की चिंताएँआशंकाएँडरसंदेह घेरे रहते हैं। कभी उसे बहुत क्रोध आता हैतो कभी उसका व्यवहार आक्रामक हो जाता है। आशंकाएँचिंताएँ उसे इतना घेर लेती हैं कि वो उनसे निबटने में खुद को अक्षम पाता है। अगर ये अनुक्रियाएँ दैहिक होंतो व्यक्ति का रक्तचाप बढ़ जाता हैपेट में गड़बड़ीहृदयगति असामान्यसाँस की गति में परिवर्तन आदि लक्षण दिखाई देने लगते हैं इन अनुक्रियाओं के परिणामस्वरूप व्यक्ति के शरीर में शर्करा यानी शुगर की मात्रा बढ़ जाती हैहारमोन असंतुलित हो जाते हैं और कैंसरमधुमेह आदि कई रोग जकड़ लेते हैं। इन दैहिक अनुक्रियाओं का एकमात्र उद्देश्य होता है कि किस तरह से तनाव के साथ समायोजन बिठाया जाए। चिकित्सक इनका इलाज दवाओं द्वारा करते हैं। लेकिन मन को तनाव रहित करने के लिए मनोचिकित्सकों या थेरेपिस्ट या काउंसलर की ज़रूरत होती है।

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दोस्तोंऐसा देखा गया है कि अक्सर तनाव को नकारात्मक घटनाओं से या दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं यानी नेगेटिव इवेंट से जोड़ कर देखा जाता है जबकि सच्चाई यह हैकि तनाव सकारात्मक घटनाओं से भी होता है| उदहारण के लिएविवाह के समय होने वाला तनावअच्छे पद पर पदोन्नति के लिए तनावबहुत बड़ा पुरस्कार या इनाम पाने पर तनावकिसी लेखक को उसकी आने वाली नई पुस्तक को लेकर तनावतो किसी अभिनेता को आने वाली नई फिल्म को लेकर तनाव हो सकता है।

कभी कभी व्यक्ति को किसी व्यक्ति विशेष से तनाव होता हैऔर वो व्यक्ति सामने बना रहेतो वह उसके प्रति आक्रामक हो जाता है। लेकिन कभी कभी व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि उसकी निराशाकुंठाहताशा का आखिर कारण क्या हैवो खोजता रहता है कि उसकी कुंठा या परेशानी का सबब क्या हैस्रोत यानी सोर्स कहाँ हैकभी जो स्रोत मिल भी जाएतो व्यक्ति किसी कारणवश या परिस्थितिवश उस शक्तिशाली स्रोत के प्रति आक्रामक नहीं हो पातातो वो खुद से कमज़ोर व्यक्ति या वस्तु पर क्रोध निकालता है और तनाव कम करता है। उदहारण के लिए यदि पति पत्नी में झगड़ा होता हैतो क्रोध बच्चों पर निकाला जाता है। दफ्तर का गुस्साअपने बॉस का गुस्सा, घरवालों पर निकालता है और आखिर में वे बेकसूर बच्चे अपना गुस्सा घर की चीज़ों या बेज़ुबान खिलौनों को तोड़ करकिताबों को फाड़ कर निकालते हैं। आखिर नजला तो नीचे की ओर ही बहेगा न..।

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दोस्तों, जो लोग क्रोध को व्यक्त नहीं कर पातेवो मन में घुटते हैं और गहरे विषाद तथा भावशून्यता में चले जाते है। जब आक्रमकता दिखाने पर भी उन्हें सफलता नहीं मिलतीतो वो उस वस्तु के प्रति उदासीन हो जाते है एवं खुद को निस्सहाय सा पाते हैं और अपने में ही गुम हो जाते हैं।

कुछ लोग तनाव में आकर अपनी सबसे प्रिय चीज़ को ही चोट पहुँचाते हैं, या अपनी कोई अति प्रिय वस्तु को ही तोड़ देते हैं और बाद में फिर पछताते हैं। कुछ विशेष घटनाएँ कुछ व्यक्तियों में अधिक तनाव उत्पन्न नहीं कर पातींतो कुछ के लिए गहरे तनाव का कारण बनती हैं। जैसे किसी वैवाहिक संबंध की टूटन या प्रेम में असफल होनाकिसी प्रिय की मृत्यु आदि ऐसी घटनाएँ हैंजो कुछ व्यक्तियों पर गहरा असर डालती हैंतो कुछ पर इनका कम असर होता है। कभी कभी साधारण सी घटना भी कुछ व्यक्तियों को अधिक सांवेगिक एवं दैहिक क्षति पहुँचाती है। इनके अलावा एक और महत्वपूर्ण कारक हैजो आजकल सारी दुनिया में तनाव का कारण बना हुआ हैऔर वो है कान्फ्लिक्ट ऑफ़ मोटिव्स यानी यानी प्रेरकों का संघर्ष यानी प्रतियोगिताओं के इस दौर में एक दूजे से आगे निकल जाने की होड़। “उसकी कमीज मेरी कमीज से ज़्यादा सफ़ेद कैसे?” की चिंता में तनाव होता है। साथ ही केंकड़े की वृत्ति को गई है हमारीउसकी साफ़ सुथरी कमीज़ पर दाग कैसे लगाया जाएयह उधेड़बुन भी तनाव को बढ़ाती है।

इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण कारक तनाव का हैजिसमें व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर निर्भरता दिखाता हैया उसका सुख दुःखउसकी हँसी ख़ुशी सब दूसरे व्यक्ति पर निर्भर हो जाती हैऔर जब दूसरा व्यक्ति उसे सहयोग नहीं कर पातातो तनाव उत्पन्न होता है। ये तनाव बहुत खतरनाक भी हो सकता हैक्योंकि इसमें एक व्यक्ति की पूरी दुनिया दूसरे की हाँ और ना पर चलती हैअक्सर इस प्रकार का तनाव किसी अप्रिय घटना का कारण भी बनता है। इसके अलावा दिन प्रतिदिन की उलझनें जैसे बिजली नहीं आईपानी नहीं आयापार्किंग नहीं मिली या नेटवर्क नहीं हैजैसे छोटे छोटे तनाव भी व्यक्ति को परेशान करते हैं।

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दोस्तों, इन सब तनावों में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कारक कुंठा यानी फ्रस्ट्रेशन का होना है। जब व्यक्ति कोशिश करके भी किसी लक्ष्य पर पहुँचने में नाकाम रहता हैतो व्यक्ति में कुंठा उत्पन्न होती है। इनमें विभेदपूर्वाग्रहकार्य असंतुष्टि यानी जॉब डिससैटिसफ़क्शनप्रिय से दूरीप्रिय की मृत्यु आदि कारण हो सकते हैं। उसी तरह दैहिक विकलांगताअकेलापनअपर्याप्त आत्मनियंत्रणये सभी कुंठा के कारण बन जाते हैं।

तो दोस्तों, आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या हैइस मर्ज़ का कारण चाहे जो भी होलेकिन यह बात तय है कि यह व्यक्ति के सांवेगिक एवं दैहिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर तो ज़रुर डालता है। चिकित्सक तनाव कम करने की दवा देते हैंलेकिन मनोविज्ञान समायोजित व्यवहार की सलाह देता है। शोध बताते हैं कि जिन व्यक्तियों में मनोवैज्ञानिक कठोरता यानी साइकोलॉजिकल हार्डनेस अधिक होती हैवे परिस्थिति के तनावपूर्ण होने पर भी परेशान नहीं होते। वे संतुलित और समायोजित व्यवहार द्वारा अपने आसपास के वातावरणउसकी आंतरिक माँगों और उसके बीच के संघर्षोंअंतर्द्वंद्वों को नियंत्रित करना सीख लेते हैं। वे शारीरिक सीमाओं एवं अंतर्वैयक्तिक चुनौतियोंसभी को अपने मूल्योंप्रसाधनों आदि के साथ इस तरह से व्यवस्थित कर लेते हैं कि उनका प्रभाव कम से कम हो, या न हो।

लेकिन यह इतना आसन भी नहीं है। ये समायोजन हर व्यक्ति की गतिअनुभूतियोंबौद्धिक क्षमता तथा आत्मनियंत्रण पर निर्भर करता है। जैसे ही व्यक्ति को तनाव घेरता हैवो अपने तरीके से इसे कम करने के प्रयास करता है। कुछ व्यक्ति कुछ ख़ास तरह का व्यवहार करते हैंवो नशे में डूब जाते हैंकुछ लोग दोस्तों का समर्थन प्राप्त करना पसंद करते हैं और समर्थन मिल जाने पर उन्हें लगता है कि अरे! ये समस्या तो उतनी गंभीर भी नहीं थीजितना मैंने इसे समझा था।

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कभी कभी व्यक्ति तनाव के कारण अपनी इच्छाओं का दमन करता है। अपने मन की बात को किसी से न कहने का दुःख और अपनी इच्छाओं कोयादों को साझा न करने का दुःख उसे मन ही मन सालता है और तनाव देता हैफिर व्यक्ति उन समस्त यादों और इच्छाओं का दमन शुरू कर देता हैवो जानबूझ कर अपने चेतन सेमन सेउन सभी बातों को हटा देना चाहता हैजो उसके दुःख का कारण बन रही हैंताकि वो अपना ध्यान दूसरी तरफ लगा सकेवो विकल्प खोजता हैखुद को व्यस्त रखता है। व्यस्त रहने और अपने शौक यानी हॉबीज़ में संलग्न होने से भी तनाव कम होता है। अपने प्रियजनों के साथ समय बितानापरिवार से साथ घूमने जानादोस्तों से मिलनायोग प्राणायाम मेडिटेशन आदि तनाव को दूर करने के ट्राइड और टेस्टिड तरीके हैं। अगर कहीं और जाना संभव नहींतो सुबह सैर पर तो जा ही सकते हैं।

तनाव को दूर करने के लिए कभी कभी व्यक्ति बौद्धिकीकरण की नीति अपनाते भी देखे गए हैं|  इसमें व्यक्ति अपने चारों और एक रक्षा प्रक्रम अपनाता हैअपना रक्षा कवच बनाता है। वो अपनी एक खोल में क़ैद रहता है और बाहरी जगत से अलगाव या निर्लिप्तता विकसित करता है। पर मेरे हिसाब से यह तरीका ठीक नहीं।

बहुत से लोग सोशल साइट्स पे जाकर अपना तनाव कम करते हैंकुछ लोग संगीत सुनकरकुछ लोग खुद से ही बातें करने लगते हैं। ये सभी उपाय अपना कर भी व्यक्ति तनाव से पूर्णरूप से बच तो नहीं पाता हैउसे कोई न कोई तनाव हर समय जकड़े ही रहता है, "मर्ज़ बढ़ता ही गयाज्यों ज्यों दवा की" वाले अंदाज मेंपर तनाव कम ज़रूर हो जाता है।

तनाव फिर भी कम न होतो किसी योग्य चिकित्सक से बात करना ही श्रेयस्कर होता है। किसी भरोसेमंद साथी या मित्र से अपनी परेशानी साझा की जा सकती है। याद रखिए दोस्तोंसहजता और सरलता आपको बहुत से तनाव से बचा सकती है। झूठछलप्रपंचईर्ष्या और स्वार्थ हमेशा तनाव के कारण ही बनते हैं। इनसे खुद को दूर रखना होगाकोई भी चिकित्सक आपको सिर्फ़ परामर्श और दवा ही दे सकता है, वो आपको खुश नहीं रख सकता। ख़ुशी आपको खोजती हुई कभी नहीं आती हैआपको जाना होता है उसके पासअपने आसपास खुशियाँ तलाशनी होती हैं। इस मर्ज़ का इलाज बाहर नहीं भीतर ही मिलेगाऔर दवा भी भीतर ही मिलेगी।

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और अंत में यह याद रखिएगा दोस्तों! कि आपका जीवन अनमोल हैआप खुशियाँ बांटने के लिए इस धरती पर आए हैंऔर यह तभी कर पाएँगे जब आप स्वयं को तनाव रूपी कुहासे से मुक्त करेंगे और दीपक की भांति प्रकाशित होंगे।

जी हाँ दोस्तों! तनावमुक्त जीवन जीने के लिए तत्पर रहेंमनुष्य योनि से बढ़कर कोई योनि नहींमानव जीवन से ज़्यादा खूबसूरत कुछ भी नहींइसका आनंद उठाइएस्वयं भी खुश रहिए और लोगों में खुशियाँ बाँटिए। जीवन से जुड़ी बातें हैंये तो चलती ही रहेंगीइसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइए कि आप तनाव को दूर करने के लिए क्या करने जा रहे हैंअपनी कहानीअपने किस्से शेयर कीजिए .. कीजिइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएसुनाते रहिएहो सकता हैयूँ ही बातें करते करते आपको भी तनाव दूर करने के कुछ उपाय सूझ जाएँ और आप भी जी खोल कर जीने लग जाएँ!.. है न दोस्तोंइसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत....मैंमीता गुप्ता...

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EPISODE  18    

पल पल दिल के पास...11/09/26

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नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगे प्रेम कीप्यार कीमुहब्बत की..जी हाँ प्रेमजो पल पल दिल के पास रहता हैयदि प्रेम न होफूल किसके लिए खिलेंगेतितली किसके लिए उड़ेगीआसमान में इंद्रधनुष किसके लिए अपनी छटा बिखेरेगाआसमान से शबनम किसके लिए बरसेगीफिर तोन किसी पत्ती पे कोई ओस से प्रेम पत्र लिखा जाएगा.....न रात को चाँद को कोई चकोर ताकेगा और न ही हिरण कस्तूरी की तलाश में बन बन भटकेगा। फिर किसी चट्टान पे हरी हरी घास नहीं उगेगीन कोई लहर किनारों को आ आ कर उसे नम करेगी। है न दोस्तों!

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काफ़ी पुरानी बात हैमॉरीशस की धरती पर एक विशालकाय पक्षी की प्रजाति रहा करती थी। ये पक्षी बहुत भले थे, भोले भाले थे और इंसानों के करीब आने की और करीब रहने की चाहत रखते थे। लेकिन इंसान ने उन्हें कभी समझा ही नहीं। और धीरे धीरे उसने उन्हें दुर्लभ होने के कगार तक पहुँचा दिया। इंसान की निर्ममता तो देखिएकि उसने उस भोले पक्षी का नाम "डोडो" रख दिया.. डोडो यानी भोंदू रख दिया। डोडो पक्षी तो इस दुनिया से हमेशा के लिए चले गएतब भी तथाकथित अकलमंद इंसानों को कोई फ़र्क नहीं पड़ा| फ़र्क पड़ा, तो एक ख़ास प्रजाति के पेड़ों पर.. डोडो के जाने के बाद उन्होंने उगना कम कर दिया। ईश्वर ने डोडो को उड़ने के लिए नहींइंसानों के करीब रहने के लिए ही बनाया था और वो इंसानों का प्रेम पाने के लिए ही धरती पर आया था। लेकिन हमारी तथाकथित अक्लमंदीबेरुखी और अनदेखी से डोडो की संपूर्ण प्रजाति ही नष्ट हो गई और उसके विरह मेंउसके वियोग मेंएक ख़ास जाति के पेड़ों ने भी अपनी ज़िंदगी को नष्ट कर लिया। बात पहली नजर में साधारण सी लगती है दोस्तोंलेकिन इसमें गहरा दर्शन छिपा हुआ है... और कुछ चुभते सवाल भी। इस पूरे ब्रह्मांड की हर छोटी बड़ी चीज़ एक दूसरे से कनेक्टड हैगहराई से जुडी हुई है। बाहर से अलग अलग दिखने वाली चीज़ें भीतर से कहीं बहुत महीन तारों से जुडी होती हैं। छोटी सीसामान्य सीसाधारण सी चीज़ भी उस असाधारण से जुडी है....उस परम सत्ता का अंश है। हम सभी ये बात जानते तो हैंपर यकीन करने से गुरेज़ करते हैं।

एक छोटी सी तितली के पंख फड़फड़ाने से कहीं बहुत दूर..किसी देश में बारिश हो सकती है क्या?....कौन सी बूँद किस रेत के कण से जुड़ी है.....कौन सी कली कब किसके लिए चटकेगी….कौन जाने?

कौन किसका हिस्सा हैकौन किस कारण से जुड़ता हैकौन किस कारण से बिखरता हैटूटता हैकिस कारण से मिटता है?... कौन जानेकोई नहीं जानता! हर छोटी से छोटी घटना अपने साथ वजह लेकर, कारण लेकर जन्मती है। हमारा कोई बस नहीं है इस पर। फिर हम इसे क्यों अनदेखा करते रहते हैक्यों सहज नहीं रहते। और जो सहजसरल और निर्मल होते हैंउन्हें हम डोडो या भौंदू समझ लेते हैं। डोडो, जी नाम तो सुना ही होगा दोस्तों?

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क्या प्रेमिल हो जानाप्रेमी बन जानादोस्ती का हाथ बढ़ा देना या किसी के करीब रहने कीसंग कीसाथ की चाहत करना डोडो हो जाना हैक्या यह भोंदूपन की निशानी हैक्या प्रेम करना हमारी विशेषता हैहमारा टेलेंट हैहमारा हुनर हैक्यों कर बैठते हैं हम प्रेम किसी एक सेक्या खोजते हैं हम उसमेंउसे या खुद कोक्या वो दुनिया में सबसे ज़्यादा खूबसूरत हैइसलिएप्रसिद्ध हैइसलिएकिसी विशेष गुण के कारणकिसी ख़ास हुनर की वजह सेया हमने ही उसे पूज पूज कर देवता बना दिया हैक्या किसी घाट के गोल पत्थर को शालिग्राम कह कर पूज लिया है हमने?

प्रेम करना हमारा स्वभाव है। आत्मा की अतल गहराइयों में कहीं बहुत गहरे में सोता होगा प्रेमना जाने कब से, कितनी सदियों सेलेकिन कोई उसे अपनी नन्हीं सी कोमल सी छुअन से जगा जाता है। फिर क्या...फिर तो झरना फूट पड़ता है प्रेम का। कोई आपकी उंगली पकड़ कर आपको आत्मा के भीतरबहुत गहरे में लिए जाता हैप्रेम नगरी की सैर कराता है... आप दूसरे के माध्यम से खुद को खोजने चल पड़ते हैंगोया वो टार्च जलाता हो और हम अपना बिखरा सामान समेटने लगते होंसामान जैसे, यादेंसपनेअहसास आदि। यक़ीनन वो ख़ास होता हैया हम उसे "सबसे खास" बना देते हैं।

सिर्फ़ देह से जुड़कर आप कई बार चूक कर जाते हैं दोस्तोंजब कोई आपकी आत्मा को छूता हैतो आपको खुद की गहराई पता चलती है। किसी दूसरे के द्वारा ही आप अपने को जानते हो... अंतस में सचेत होते हो। गहन संबंध में हीकिसी के प्रेम में हीआप खुद को खोज पाते हो। उस छुअन को आप सदियों तक याद रखते हो। हर प्रेम अनोखा होता है दोस्तोंउसकी प्यास अनोखी होती हैउसके अंदाज अनोखेउसकी खोज अनोखी होती है। हम सब अपनी ही खोज में चलते जाते हैं दूर...कहीं बहुत दूर...

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सच कहूँ दोस्तों! हम खुद के लिए ही प्रेम करते हैं....खुद को खोजने के लिए। किसी को प्रेम करना हमारे हिस्से का प्रेम है। हमारा हिस्सा है और हमारा ही किस्सा भी। हमारी प्यास है और हमारा अंदाज़ भी। इसमें ईर्ष्याउम्मीद और कुछ पाने की बात तो है ही नहीं। तो अब सवाल ये कि इस तरह से बेशर्त प्रेम करना क्या डोडो यानी भोंदू हो जाना हैजी नहींकतई नहींहम अपने प्रेम की गोंद से रिश्तों को चिपकाते हैं अपने लिए। अपनी मर्ज़ी सेहम लोगों को पसंद करते हैंप्यार करते हैं।

अब आखिरी सवालजब सभी अपने प्रेम की खोज में हैंया खुद की खोज में हैंसभी को तलाश हैदरकार है प्रेम कीतो हर चेहरा उदास क्यों हैक्यों प्यासे हैं लोगजबकि सागर तो कहीं आस पास ही है। फिर भी महसूस क्यों नहीं कर पाते प्रेम कोउसके आनंद कोउसकी उर्जा कोउसकी अजस्र शक्ति कोउसके उजास को?

दरअसल हमने अपने ज्ञान काबुद्धि का कुछ ज़्यादा ही विकास कर लिया है। बहुत अक्लमंद हो गए हैं हमइसलिए छोटी बातों में अपना कीमती समय बर्बाद करना नहीं चाहते। किसी ने क्या खूब कहा है   

अक्ल के मदरसे से उठइश्क के मैकदे में आ

लेकिन हमारा अहम्हमारा अभिमान और उसका कद बहुत बड़ा हैवहाँ से प्रेमदोस्ती जैसी चीज़ें बहुत छोटी दिखती हैं। हमने अपनी अक्ल पे परदे भी लगा रखे हैं ताकि वो सुरक्षित रहेकोई छोटी सी चीज़ आकर उसे नष्ट न कर दे। हम जानते हैं कि जिस दिन भी किसी दरार से या "की होल" से प्रेम झाँक गयाउसी दिन हमारी सारी अक्लसारी अकड़ धरी की धरी रह जाएगीसारे ठाट बाट फीके पड़ जाएँगेअहंकार के ये प्रासाद ढह जाएँगेइसलिए हमने अक्ल पर मोटे मोटे परदे डाल दिए। अब हम अपनी आँखनाककान सब परदों में छिपा कर रखते हैं। हवा का कोई झोंका प्रेम संदेश न ले आएकोई प्रेम पुकार हमें विचलित न कर देकोई फूल महक न जाएकोई साँस हमारे दिल को धड़का न जाए। कितने सतर्ककितने सावधान रहने लगे हैं हम... है न दोस्तों!

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अब इतनी चौकसीइतने पहरेइतने परदोंइतने घूँघट के बाद किसी डोडोकिसी भौंदू की मजाल कि वो तनिक भी ठहर पाए। वो तो आँखों में आँसू लिएहोठों पे बेबसी की मुस्कान लिए चुपचाप एक दिन चला ही जाएगा न। कभी कभी सोचती हूँ दोस्तोंजिस तरह से प्रेम के प्रतीक पक्षीपेड़ और कई जीवजिनमें अब मधुमक्खियों की बारी हैनष्ट हो रहे हैंरूठ के जा रहे हैं बिना कुछ कहेइनके पलायन करने का कारण आज तक कोई खोज नहीं पाया हैऔर न इन घटनाओंइन नातों और संबंधों को कोई समझ ही पाया है। लेकिन एक दिन जब खोज पूरी होगीतब तक इंसान कितना नुकसान कर चुके होंगे इस धरती काप्रेम कातब इस नुकसान की भरपाई कौन करेगाकहीं ऐसा न हो जाएकि एक दिन बिना कुछ कहेख़ामोशी से हमारी अकलमंदीहमारी अनदेखीहमारे अनमनेपनबेरुखी से आहत होकर…प्रेम ही न कहीं चला जाए डोडो पक्षी की तरह दुखी होकर।

Music

पर मुझे लगता है कि शायदइंसान को उस दिन भी कोई फर्क नहीं पड़ेगाप्रेम की करुण पुकारउसका अलविदा कह जानाक्या हम कभी सुन पाएँगेहमारी अकल के परदों पे तो अब कोई दस्तक सुनाई ही नहीं देती।

लेकिन प्रेम, प्रेम तो पल पल दिल के पास रहता है| प्रेम के धारी से जाने के बाद फूल किसके लिए खिलेंगे? तितली किसके लिए उड़ेगी? आसमान में इंद्रधनुष किसके लिए दिखेगा? आसमान से शबनम किसके लिए बरसेगी? न किसी पट्टी पे कोई प्रेम पत्र लिखेगा, न रात को चाँद को कोई चकोर ताकेगा और न ही कोई हिरण कस्तूरी की तलाश में बन बन भटकेगा| फिर किसी चट्टान पे हरी हरी घास नहीं उगेगी, और न ही कोई लहर किनारों को आ आ कर छू छूकर भिगोएगी|

याद रखिएगा दोस्तोंप्रेम बहुत स्वाभिमानी होता है और तुनक मिज़ाज भी। वो खुद कभी अकल के परदे पीछे नहीं छिपतान कभी घूँघट के पट खोलता है। वो दरवाज़े पे दस्तक बन के दम तोड़ सकता हैलेकिन कभी कोई दरवाज़ा नहीं तोड़तावो परदों के घूँघट के बाहर सदियों तक इंतजार कर सकता हैलेकिन परदे नहीं खींचता। जब हमने लगाएँ हैं ये अहम् और अभिमान के परदेतो हटाने भी हमें ही होगे नभला परदों के पीछे से कभी चाँद दिखता है क्याप्रेम छूटता है क्या...जो पल पल दिल के पास रहता होवह केवल उत्सर्ग जानता हैऔर कुछ नहीं...है न दोस्तों!

Music

और चलते चलते बस यही कहूँगी दोस्तों! याद रखिएगास्वाभिमानी प्रेमतुनक मिज़ाज प्रेमजैसा भी प्रेम होवह प्रेम हैइसलिए उसे पाने के लिए हमें अकल के परदे हटाने होंगेघूँघट के पट खोलने होंगेदिल के दरवाज़े पे दस्तक देनी होगीउसे परदों के घूँघट के बाहर लाना होगाअहम् और अभिमान के परदों हो हटाना होगाऔर हटा कर उस चाँद को देखना होगा। अंत में यह याद रखिएगा दोस्तों! कि आपके लिए भी एक छोटी सी तितली कहीं पंख फड़फड़ा रही हैजिससे किसी देश में बारिश हो रही है....एक बूँद किसी रेत के कण से जुड़ रही है.....एक कली कहीं चटक रही हैकेवल आपके लिए..केवल आपके लिए! प्रेम से जुड़ी बातें हैं येयूँ ही चलती ही रहेंगीइसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइए अपने प्रेम की  कहानीअपने किस्से शेयर कीजिए .. कीजिइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएमुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार कर रहे हैं न ....अगले एपिसोड का...कर रहे हैं न दोस्तों!

सुनते रहिएसुनाते रहिएहो सकता हैयूँ ही बातें करते करते आपको आपका प्यार मिल जाए..है न दोस्तोंमेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

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EPISODE   19      

ये कौन चित्रकार है?    25/09/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से    कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगे प्रकृति की खूबसूरती कीसुंदरता की..यानी पेड़ों की फुनगी कीपत्तों पर बिछी ओस की बूँदों कीफूलों की खुशबू कीनिर्बाध झरनों के तेज़ वेग से गिरते जल कीनदियों के सर्पाकार मोड़ों की.. और उनके संग   संग ही तलाशते हैं अपनी ज़िंदगी का अर्थ की! कुदरत, प्रकृति, महज हमारे जन्म और जीने के लिए ही ज़रूरी नहीं हैसोचिएयदि हमारे आसपास प्रकृति के प्राणतत्व की उपस्थिति न हो। सोचकर देखिएगा कि आप किसी ऐसी जगह मौजूद हैंजहाँ सबकुछ अदृश्य हैआपके पैरों तले मिट्टी नहींआँख के सामने धरती नहींपीने के लिए पानी नहीं और न बातें करने के लिए परिंदे?..ऐसी ज़िंदगीक्या ज़िंदगी होगीऐसे में हम यह सोचने पर मजबूर जाते हैं कि आखिर यह चित्रकार है कौन, जिसने यह नियामत हम पर बरसाई है?

क्या कहते हैं दोस्तों!

MUSIC  

दोस्तों! आज की बात की शुरुआत उस महान शख्सियत को याद करते हुए....जो भारत के कण   कण मेंयहाँ की मिट्टी की सोंधी खुशबू मेंयहाँ की ठंडी बयार मेंफ़िज़ाओं मेंपत्ती   पत्ती मेंडाली   डाली मेंकण   कण में बसा है....आप समझ गए न...जी हाँ! मैं बात कर रही हूँबापू की....उन दिनों बापू पद यात्रा पर थे। वे अपने सामान में नहाने के लिए एक पत्थर रखा करते थे। एक दिन मनु बहन उनका वह पत्थर पिछले पड़ाव पर ही भूल गईं। जब बापू को इसका पता चला तो उन्होंने उन्हें वह पत्थर लाने को कहा।

यह सुनकर मनु कहने लगीं   बापू! यहीं आसपास कितने पत्थर पड़े हैंइन्हीं में से एक उठा लेती हूँ। वहाँ जाने   आने में तो पूरे तीन घंटे लग जाएँगे। इस पर बापू ने कहा   मनुतुम वही पत्थर लेकर आओ। यहाँ इतने पत्थर पड़े हैंतो क्या हुआये किसी      किसी काम तो आएँगे हीअभी नहींतो पांच बरस बाद। हमें इस तरह अन्य पत्थरों को बिगाड़ने का कोई हक नहीं।

मनु तीन घंटे में वह पत्थर लेकर लौटीं। बापू ने खुश होते हुए उसे लेकर अपने थैले में रख लिया और बोले,  यों तो प्रकृति की गोद में असंख्य पत्थर बिखरे पड़े हैंलेकिन हमें अपनी आवश्यकता के अनुसार ही उनका उपयोग करना चाहिए।

इस प्रसंग के बारे में विचार करने लगी, तो समझ आया कि हम ज़िंदगी भर जिन मूल्यों को तलाशते रहते हैंपरखते रहते हैंउनका अर्थ खोजने की जद्दोजहद में जुटे रहते हैंबापू ने उसे कितनी सहजता से कह दिया....कि प्रकृति से हमें अपनी आवश्यकताअपनी ज़रूरत के अनुसार ही लेना चाहिए...उससे अधिक नहीं...और उसका दोहन तो कतई नहीं। क्या एक बात आपने कभी गौर की है कि ज़िंदगी को परखने की कोशिश में हम एक महत्वपूर्ण बात भूल जाते हैं कि ज़िंदगी की विशिष्ट परिभाषाएँ दरअसलहमारे सामान्य होने में ही छुपी हैं। इनमें से ही एक अहम बात है   प्रकृति से, कुदरत से हमारा जुड़ाव। कुदरत का मतलब मिट्टीपानीपहाड़झरने ही हैं ही, हमारी देह मेंहमारे दुनियावी वजूद में शामिल पंच तत्व भी तो प्रकृति से ही मिले हैंहै न दोस्तों! और फिरदुनिया में अगर हम मौजूद हैंतो प्रकृति की नियामतों के बिना नहीं। क्या हम साँस ले पाएँगेक्या रंग बिरंगे के फूलों की खुशबुओं से मुलाकात कर पाएँगेभोजन और पानी के बगैर कैसे गुज़रेगी यह ज़िंदगी की गाड़ीयही तो वह चित्रकार पूछता है हमसे..!

Music

खैरअपने अस्तित्व से आगे निकलकर इसके अर्थ को विराट संदर्भो में तलाशेंतो हम पाएँगे कि जन्म से लेकर ज़िंदगी और फिर नश्वर संसार से अलविदा कहने तक प्रकृति हमारे साथ अलग   अलग रूपों में अपनी पूर्ण सकारात्मकता के साथ मौजूद रहती है। पहाड़ की छाती चीरकर  झरने पानी लेकर हाज़िर हैंउनकी इस सौगात को आगे बढ़ाती हैं नदियाँ...जो फिर सागर में मिल जाती हैं। समंदरों से यही पानी सूरज तक पहुँचता हैऔर फिर होती है बारिश। बारिश न होतो खेत कैसे लहलहाएँगेखुशबुएँ न होंरास्ते न होंजंगलों का नामोनिशां न होतो हमारे होने काइस ज़िंदगी का क्या ही मतलब रह जाएगाप्रकृति की हर धड़कन में कुदरत के रचयिता के श्रृंगारिक मन की खूबसूरत अभिव्यक्ति होती है। किस्म किस्म के उत्सव हैं ये भी..!

दोस्तों! मौसमों की रंगत भी कुछ कम अनूठी नहीं। जाड़े की ठिठुरन मेंबारिश में भीगने की उमंग में और गर्मी में छाँव में अनिर्वचनीय सुख है। सब के सब मौसम कुछ न कुछ बयाँ करते हैं। सच कहूँतो प्रकृति में एक अनूठे ज्ञान की पाठशाला समाई हुई है। ज़रूरत बस इस बात की है कि हम कुदरत की स्वाभाविक उड़ान कोउसके योगदान को समझेंसराहें और पहचानेंतभी हर दिन बिना कोई विलंब किए उगने वाले सूरज कोबगैर थके उसकी परिक्रमा करने वाली पृथ्वी को और उनके पारस्परिक संबंध के कारण होने वाले बदलावों को समझ पाएँगे। हम जान पाएँगे कि वृक्ष बिना कुछ लिए हमें फल और छाया देते हैं। नदियाँ कुछ भी नहीं कहतींपर पानी की सौगात देती हैं। मौसम अपने रंग बिना किसी कीमत के बिखेरते हैं। हम जब प्रकृति की ओर से मिल रही सीख समझते हैं और उसे आहत नहीं करतेउसकी तरफ से आनंद की वर्षा होती हैहम उसमें भीगते रहते हैंलेकिन जब   जब हम कारसाज़ कुदरत को आदर करना बंद कर देते हैंतब तब हमें कई तरह के विध्वंसों का, सुनामियों का सामना करना पड़ता है।

Music

सोचती हूँ दोस्तों! किस   किस को निहारूंकिस   किस की कहानी सुनाऊँमेरी ज़िंदगी में इस चित्रकार ने किस   किस तरह से ‘अहा मोमेंट’ दिए हैंये विशालकाय वृक्षफलों से लदी उनकी शाखाएँवृक्ष जो राहगीरों को आश्रय देते हैंहवाएँ  जो शीतल शांत हैसमुद्र  जिसमें अद्भुत प्रवाह है, पर जो बहता अपनी ही राह हैमानो जलमाला का महाकुंभ हैकितना विचित्र, अद्भुत, मनोहर दृश्य हैपर्वत...पर्वत तो अमर अटल हैधराशील गगनचुंबीय हैंकहता है झुके ना शीश मेराचक्रव्यूह   सा वह अभेद्य है। सच कहूँ दोस्तों! प्रकृति एक संपदा हैरंगों से भरी फुहार हैऔर इसे रचने वाला वो चित्रकार है। वो कौनआप समझ ही गए होंगेवोजिसके कारण अजर   अमर यह वसुंधरा हैबस इतनी   सी इसकी कहानी हैक्या सचमुच इसकी इतनी   सी ही कहानी हैयह तो अमूल्य   अनुपम   अतुलनीय हैंजन   जन का विश्वास है और  युगों   युगों की अमर कहानी है और यह कहानी उसे चित्रकार ने तो लिखी है!

मुझे याद आता है अपना बचपन... जब हम नानी के पास सर्दियों में जातेरात के समयसब कामों से फ़ारिग हो होकरवे सब बच्चों को रज़ाई में अपने पास लिटा लेतीं। हम सब बच्चे दिन भर रात हो होने वाली इस अनोखी पाठशाला की धमाचौकड़ी का इंतज़ार करते। सारे बच्चे नानी के सुरीले गले के साथ अपने बेसुरे गले मिलाते और कभी गाते    ‘छोटी   छोटी गइया छोटे   छोटे ग्वालछोटौ सो मेरौ मदन गोपाल।’ कभी   ‘जमुना किनारे मेरौ गाँवबंसी बजा के आ जइयो’ और  कभी   ‘ससुराल गेंदा फूलसास गारी देवेदेवर समझा लेवेससुराल गेंदा फूल’….इन  गीतों की तो न जाने कितनी ही यादें हैंयदि ये गीत न होतेतो छोटे ग्वालों की गैया बड़ी न हो जातीकन्हैया कालिंदी में कैसे खेलतेमाँ गंगा कहाँ बिराजतींचंद्रमा शिव के मस्तक की शोभा कैसे बढ़ाताबहू अपनी सास से पानी न भरने के बहाने कैसे ढूँढतीऔर तो और बुंदियों के बरसने पर गोरिया का घूंघट कैसे भीगता और ससुराल गेंदा फूल कैसे बन पातादेखा न दोस्तों! इन लोक गीतों के ज़रिए प्रकृति के अलग अलग रूपों से हमारी ज़िंदगी कितना रोमानी और दिलखुश बना दिया है....यह भी उसे चित्रकार का कमाल है दोस्तों, है न..!

कभी उषा बेला में बाल सूरज को उदित होते तो देखिएकभी अपने प्रियतम को मधुमालती से लिपटी मुंडेर पर बुला कर तो देखिए.... तुलसी के क्यारी में सिर नवाकरशीश झुका कर तो देखिएगुलाब के गमले में लगी मुस्कानों के साथ मुस्करा कर तो देखिएक्षितिज पर शाम के समय लालिमा लिए सूरज को अपनी मुट्ठी में बांधकर तो देखिए और रात्रि के समय आसमान में जुगनुओं के समान टिमटिमाते तारों को अपनी चुनरी में टाँक कर तो देखिएइससे होगा क्याहोगा यह कि आपका सारा अहमनाराज़गीमन की चटकनव्यस्तताएँनकारात्मक भावनाएँसब काफ़ूर हो जाएँगी....और आप....आप एक नटखट शरारती बच्चे के समान किलोलने लगेंगेमृदंग की तरह बजने लगेंगे.....पतंग की अदृश्य डोर से बँधकर उड़ने लगेंगे। है न दोस्तों!

Music

और चलते   चलते बस यही कहूँगी दोस्तों! कि अच्छा हो अगर हम प्रकृति का सम्मान करना सीख लें और उसके ज़रिए मानव   मात्र की होने वाली सेवा को समझ लें। यदि ऐसा हो सका तो यकीननहमारी आँखों में आशासंतोषउम्मीद, विश्वास और खुशी के कई दीपक जल उठेंगे और हम जान ही जाएँगे कि आखिर ये कौन चित्रकार हैहै न दोस्तों!.....

याद रखिएगायह कुदरत हैप्रकृति हैतो हम हैइसके बिना हमारा अस्तित्व ही गौण है। कुदरत कीप्रकृति की बातें हैं अनंतऔर ये यूँ ही चलती रहेंगीइसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइए कुदरत से अपने प्रेम की कहानीअपने किस्से शेयर कीजिए..कीजिइएगा ज़रूर..मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएसुनाते रहिएहो सकता हैयूँ ही बातें करते   करते आप मेरे साथ एक बार फिर कुदरत की मेहरबानियों के लिए शुक्रिया कहें। है न दोस्तोंमेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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EPISODE   20       

बहती हवा सा था वो...09/10/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर कुछ मन पर छप गईं यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगे संघर्ष कीप्रयत्न कीप्रयास की और धैर्य की। सब ठीक हो जाएगाऐसा ही सोचकर जो भी हालात हमारे सामने हैंजो भी वस्तुस्थितियाँ सामने आ रही हैंउनके अतीत के कारण और हिसाब हमारे पास हैंपरंतु क्या अब हम अपने अतीत को बदल सकते हैं?... नहीं ना?... तो जो बीत गयासो बात गई..  उसके बारे में क्यों सोचेंहमारे पास जो अभी बकाया हैजो खर्च नहीं हुआ वो अभी भी शेष है नावही हमारा वर्तमान है और भविष्य की संभावनाएँ भी। बात असल में दिल के बहुत करीब है। जीवन   पथ पर चलते   चलते हमें कई ऐसे लोग मिलते हैंजो अपनी अमिट छाप आपके दिल पर छोड़ जाते हैंऐसे ही थे   बाबा.. बाबा, नाम तो कभी जाना ही नहीं उनका, वे बस बाबा थे, जगत बाबा, यूनिवर्सल बाबा।  

MUSIC  

मैं अक्सर उस सड़क से गुज़रा करती थी। उस सड़क पर न जाने क्या आकर्षण थाजब   जब गुज़रतीतब   तक बाईं ओर ज़रूर देखती। वैसे तो बाईं ओर ऐसा कुछ खास नहीं थापर फिर भी वहाँ कुछ तो ऐसा था, जो मुझे आकर्षित करता। एक बड़ा   सा तंबू सड़क के किनारे लगा थाउस तंबू के बीचों   बीच सिलाई की एक पुरानी मशीन रखी थी, कुछ ज़ंक लगी, स्याह सी..और इन सबके बीच अनगिनत झुर्रियाँ लिए हुए खिचड़ी बालों वाले एक बुज़ुर्ग...एक वृद्ध, वहाँ बैठकर कुछ सिला करते, दिनभर..। तंबू के आसपास कहीं फटे हुए बैगकहीं सिले हुए कपड़ों की गठरीकहीं कुछ धागे और कहीं और ऐसा सामानजो देखने में कूड़ा   करकट लगतापड़ा रहता। साल के हर मौसम में वे बुज़ुर्ग वहीं बैठा करते सर झुकाए सिलाई मशीन की सुई में अपनी धुंधली आँखों से बड़े ही जतन से धागा डालते हुएकुछ सिलते हुए दिखाई देते। घर में अक्सर ऐसा हो ही जाता है कि कभी कोई बैग फट गयाकभी   कभी कोई कपड़ा उधड़ गयाऔर ऐसी फटी हुई चीज़ों और उधड़न को संवारने का काम करते थेवे बुज़ुर्ग। मैं अक्सर कुछ ना कुछ सिलवाने के लिए उनके पास जाया करती...वे बड़े प्यार से मुझे देखते। अक्सर टूटी हुई बेंच को दिखाकर कहतेबिटियायहाँ बैठ जाअभी करके देता हूँ। मैं सोचती चारों ओर गर्म हवाएँ चल रही हैं...मैं यहाँ बैठ गई तोतप जाऊँगी....जल जाऊँगी, पर वे, वे एक निष्काम योगी की तरह गरम हवाओं के थपेड़ों के बीच वाल्मीकि बने रहते|

मैं अक्सर बाबा को सामान देकर यह कहकर चली आतीबाबाशाम को ले लूँगी। कई बार शाम को नहीं पहुँच पाती। दो   चार दिन बाद पहुँचतीतो बड़े ही शिकायती स्वर में बाबा कहतेतुम आई नहीं बिटियामैं तो राह देख रहा था। मैंने उसे दिन रात को 8:00 बजे तक मशीन नहीं बाँधी....मशीन नहीं बढ़ाईक्योंकि मुझे लगा कि तुम आओगी।

मैं माफी मांगते हुए उनसे कहतीबाबा थोड़ा व्यस्त हो गई थी। यह सिलसिला न जाने कितने वर्षों तक चलता रहा और फिर आया वह समय....समय भी क्या कुसमय थाजिसने देश   विदेश के हर बाशिंदे को हिला कर रख दिया....कोरोना का समय। घर से बाहर निकलनाकहीं आना   जानासब कुछ रुक   सा गयाथम   सा गयाअब तो सूरज की रोशनी भी खिड़कियों से झाँक   झाँक कर देखा करतेकब दिन हो गयाकब रात आ गईकब रात बीत गई और फिर भोर हो गईये नज़ारे अब गुम हो चुके थेतो सड़कों की तो बात ही क्या की जाएबड़े दिनों बादशायद डेढ़ साल बादजब जीवन थोड़ा सामान्य हुआहमारा बाज़ार आना   जाना शुरू हुआतो मैं फिर से उस सड़क से गुज़री......

Music

तंबू वही टंगा थाकहीं कपड़ों के छोटे   मोटे टुकड़े   चिथड़े वहीं पड़े थेपर गुम थी जर्जर सिलाई की मशीन की आवाज़...गुम थे मशीन के साथ वे बुज़ुर्ग...जिनकी मद्धम आँखों में मैंने सदा जीवन देखा था....गुम थे वे बैगजो उन्होंने ग्राहकों के लिए सिलकर तैयार करके रखे थेगुम थी वह आत्मीयता...वह फिज़ांवे मनुहार भरे शब्द....बिटियातुम आई नहींमैं रात को 8:00 बजे तक राह देखता रहा...मैं दुकान नहीं बढ़ाई।

फिर क्या थाआसपास पूछासब अनजान से चेहरे थे वहाँजिनकी दुकान आसपास थीवे वहाँ नहीं थे...कुछ नए लोग थेजिन्होंने शायद बाबा को कभी देखा भी नहीं था। मुझे बदहवास देख कोई फुसफुसाया...किसी से उड़ते   उड़ते सुना था कि वे अब नहीं रहे...वे नहीं रहे!! मैं निःशब्द हो गई। एक बार उन्होंने मुझे बताया था कि वे जालंधर के पॉलिटेक्निक के पहले बैच के विद्यार्थी थेवहीं उन्होंने सिलाई का काम सीखा था और फिर लगभग 33 वर्ष जालंधर में ही बिजली विभाग में काम किया था। फिर अपने बेटे के साथ सपत्नीक वे मेरे शहर आ गए थेपर मेरे शहर ने उन्हें क्या दियालापता का तमगामैंने सोचा कहाँ ढूँढू उन्हें...! पर कहाँवे तो बहती हवा से गुम हो गए....वे जो बिना कष्ट   श्रम से गगन को सम्हाले हुए थेवे जो सभी प्राणियों को प्रेम   आसव पिलाकर जिलाए रहतेवे जो अपनी बाँहें पसारे शीत के कोमल झकोरों से नदी को शीतल कर देतेवे जो अपनी माया के बल पर आकाश नाप लिया करतेजिनकी आँखों में अनगिनत संभावनाओं के दीप जला करतेजिनकी अश्रुपूरित आँखों में ढेर सारी नमी बिखरतीआशीषें देतीं... अब वे कहाँ?

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दोस्तों! जीवन किसी के लिए भी आसान नहीं होता। अक्सर दिल और दिमाग के द्वंद्व चलते हैंकहीं नौकरी की समस्याकहीं विवाह की समस्याकहीं विवाह नहीं हो रहा ये दुखकहीं ये कि विवाह क्यों कर लियाकहीं विवाह को बचाया कैसे जाएकहीं नौकरी नहीं मिलतीतो कभी मिल गईतो कैसे बचाई जाएइसका तनावकहीं घरों में जगह नहींतो कहीं दिलों में जगह नहींकहीं घर नहींतो कहीं दिल ही नहीं...हज़ारों दुखलेकिन इन सब के बीच भी जीवन खोजना पड़ता है।

ऐसे में जब दूर   दूर तक कोई राह नज़र नहीं आतीकितनी भी कोशिश कर लेंलेकिन कोई हल नहीं निकलताऐसे कठिन समय में परेशान व्यक्ति को केवल दो ही राहें दिखती हैंया तो वो हालातों के सामने आत्मसमर्पण कर दे या परिस्थितियाँ जैसी हैंउसी में चुपचाप खुद को ढाल ले। ऐसी हालत में परिवार के सदस्य भी बात करना बंद कर देते हैंपरिवार की उपेक्षा उसे सबसे ज़्यादा तोड़ती है। व्यक्ति बाहरी दुनिया का सामना तो साहस के साथ कर लेता हैलेकिन घर के भीतर का बेगानापन उसे भीतर से तोड़ देता है। ऐसी ही भयावह स्थिति में भी बाबा ज़िंदगी का परचम उठाए रहे क्योंकि वे तो बाबा थेहम सबसे अलग.. हम सबसे इतरहम सबसे जुदाशायद इसी लिए वे भाते थे मुझे। वे जो काम कर रहे थेवो कितना भी बोरिंग क्यों ना होमशीनी क्यों ना होबोझिल क्यों ना होफिर भी वे उसी काम को करते चले गएधीरे   धीरे अपने कदम बढ़ाते रहे। और अंततः उसी काम के बीचउसी सक्रियता के कुछ "मतलब" निकलने लगेजिसके अभी तक कोई मायने नहीं थेउसमें से ही मायने निकलने लगे। उन्होंने खुद को कभी कोल्हू का बैल नहीं मानावे खुद को जानते थे कि वे कोल्हू के बैल नहींरेस के घोड़े हैं। 

वे जानते थे कि जब मानसिक उद्देलन होचिंताओं होंअनिर्णय की स्थिति होंकुछ भी समझ नहीं आ रहा होसारे रास्ते बंद हो गए से लगते होंतब भी यह याद रखना होगा कि कोई न कोई रास्ता अब भी बचा है, रास्ता नहीं तो कोई खिड़की,या फिर कोई रोशनदान, या फिर कोई झिर्री..। पारिवारिक और आर्थिक तंगी और उठापटक के दिनों में भी वे प्रयास करते रहे कि अपने बिखरे टुकड़े समेटेंजैसे वे फटे बैग्स से साथ करतेज़िंदगी के साथ बेहतर तरीके से जूझने की हिम्मत जुटाने लगेएक   एक कदम जमा कर रखने लगे। सचमुच मैंने उनसे बहुत कुछ सीखामसलनजो जीर्ण   शीर्ण हो चुका हैउसे भूलकर सब कुछ फिर से नए निर्माण में जुट जाइए। दुनिया की इस धूम में आप ही कहीं गुम ना हो जाएँइसका भी ध्यान रखना होगा। आप जो हैंउसे बाहर लाना ही होगा। जब आप खुद को खोज लेते हैंतो अपने आसपास आपको बहुत से ऐसे लोग नज़र आने लगते हैंजिन्हें आपकी ज़रूरत हैउन्हें  ढूँढ कर रोशनी में लाना होगाउन्हें जीना सिखाना होगामुस्कराना सिखाना होगाजैसा उन्होंने अपने शागिर्दों के साथ किया। शायद ऐसा ही सोचकर वे न जाने कहाँ   कहाँ के छोटे   छोटे बच्चों को अपने से जोड़ते, ‘ला यह बैग दे!’, ‘इस बैग को बराबर वाले घर में दे आ’, ‘ज़रा सुई में धागा डाल दे’ जैसे काम करवाते।

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सच कहूँ दोस्तों! वे बहती हवा से थेउनकी मौजूदगी ताज़गी और उत्साह से भरी ऊर्जा और नए सिरे से जीने का जज़्बा जगा देती थीउनकी यादें एक ठंडक सी आह छोड़ गईएक मीठी खनकलेकिन उसके बाद ख़ामोशी। उन्हें कोई बंदिश बाँध नहीं पाईसहजता और निर्मलता उनका गुण था। भले ही मेरी उनसे जान   पहचान अल्पकालीन ही रहीपर वे अपना गहरा असर छोड़ गएचले गए मेरे जीवन पर एक खूबसूरत छाप छोड़कर। जब   जब याद आते हैंएक नॉस्टैल्जिक भाव जागने लगता हैजैसे कोई पुरानी याद जो दिल को छूकर चली गई हो, कोई उड़ती पतंग आँखों के सामने से लहरा कर कहीं छुप गई हो। सोचती हूँउन्हें ढूँढूँपर कहाँ?

और चलते   चलते बस यही कहूँगी दोस्तों! ‘बहती हवा सा था वोउड़ती पतंग सा था वो ...कहाँ गया उसे  ढूँढो...

याद रखिएगाजाने वाले कभी लौटकर नहीं आतेपर जीवन चलता रहता हैऔर हम उनकी यादों में ठंडक में सुकून खोजते रह जाते हैंउनकी आवाज़ में मीठी खनक  ढूँढते रह जाते हैं। अब आप बताइए दोस्तोंकि आपकी ज़िंदगी में बहती हवा सा कौन हैकैसा हैकहाँ हैआस   पास ढूँढिए तो ज़रा! अपने प्रेम की इस कहानी कोअपने किस्से को शेयर कीजिए..कीजिइएगा ज़रूर..मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएसुनाते रहिएहो सकता हैयूँ ही बातें करते करते आपकी भी बहती हवा से ‘उस’ से मुलाकात हो जाएहै न संभव दोस्तोंमेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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ये इश्क वाला लव ... 23/10/26

EPISODE 22.06/11/26 टूटे पै फिर न जुरै

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से  कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर कुछ यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगे इश्क कीलव की और इश्क वाले लव की.. सही सुना आपनेइश्क वाला लव.. चलिए थोड़ा रोमानी हो जाते हैंऔर डूब जाते हैंइश्क वाले लव में..

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दोस्तों! न जाने इश्क आज को क्या क्या कहा जाने लगा हैइश्क सुना थालव सुना था परये इश्क वाला लव क्या हैफिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर का एक गीत भर... जी नहीं। दरअसल फेसबुकट्विटर और वॉट्सअप जैसे एप्स ने युवाओं में प्यार की परिभाषाएँ ही बदल दी हैं। क्या यह मानें कि नई जनरेशननई पीढ़ीप्यार में उठने वाले भावनाओं के ज्वार को लेकर ज़्यादा प्रैक्टिकल हैपुरानी पीढ़ी के मुकाबले ज़्यादा सजगदूरंदेशी और हर तरह की व्यावहारिकताओं को समझने वाली। इसके बावजूद वो पुराना वाला इश्क तो हो ही रहा हैजिसे यंगस्टर्स की भाषा मेंइश्क वाला लव कहा जा रहा है। अलग अलग समय के साहित्य में रोमांस को तरह तरह से पेश किया गया। कहते हैं साहित्य समाज का आईना होता है। चलिएसाहित्यकारोंशायरोंसूफी संतोंवैज्ञानिकों और दार्शनिकों के नज़रिए से इश्क को समझने की कोशिश करते हैं...शायरों और साहित्यकारों ने यूँ बयाँ किया मोहब्बत कोजैसे कैफ़ी आज़मी साहब कहते हैं

 

बस एक झिझक है यही हाले दिल सुनाने में,

कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में।

बरस पड़ी थी जो रुख से नकाब उठाने में,

वो चांदनी है अभी तक गरीबखाने में ।।

इसी में इश्क की किस्मत बदल भी सकती थी,

जो वक्त बीत गया आज़माने में,

ये कहकर टूट पड़ा शाखे गुल से आखिरी फूल,

अब और देर है कितनी बहार आने में...

(साभार कैफ़ी आज़मी साहब)

इन पंक्तियों में शायर ने प्रेयसी को लेकर आशिक की फ़िक्रमोहब्बत और तकलीफ़ को बेहद नज़ाकत के साथ पेश किया है। संवेदनशीलता तो देखिए कि आशिक अपना हाल ए दिल बयाँ करने से भी डरता है कि कहीं इस ज़िक्र से उसकी माशूका की बदनामी न हो जाए। कितनी कोमलताकितनी मुरव्वतकितनी मुहब्बततितली के पंखों सी रंग बिरंगी है यह चाह। अगर पश्चिम की खिड़की में झांकेंतो विलियम शेक्सपीयर कहते सुनाई देते हैं कि मेरी प्रेमिका की आँखें सूरज के जैसी नहीं हैंमूंगा भी उसके होठों से ज़्यादा रंगीन हैबर्फ़ भी उससे ज़्यादा सफ़ेद हैकाले बादलों का रंग भी उसके बालों से गहरा हैगुलाब भी उसके गालों से ज़्यादा कोमल हैंलेकिन फिर भी उसकी साँसों की महक मुझे इन सबसे अच्छी लगती है। मैं उसके चेहरे को पढ़ सकता हूँमुझे उसमें नज़र आता है समर्पण और प्यारजिसके लिए मैं बरसों से प्यासा था। मुझे उसकी आवाज़ में संगीत की मिठास लगती है। मैंने कभी ईश्वर को नहीं देखालेकिन मैं अपनी प्रेमिका में उसके दर्शन पाता हूँ। वो ज़मीन पर पैर रखती हैतो ऐसा लगता हैमानो स्वर्ग से उतर रही हो। हो सकता है कि यह सब मेरी कल्पना होलेकिन मैं उससे प्रेम करता हूँयह सच्चाई है।

 

अब बताइएऐसा भी इश्क होता है कहीं?

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दोस्तोंअब देखें कि गुलज़ार साहब कैसे दिले गुलज़ार करते हैं?

 

नज़्म उलझी हुई है सीने मेंमिसरे अटके हुए हैं होठों पर,

उड़ते फिरते हैं तितलियों की तरहलफ्ज़ कागजों पर बैठते ही नहीं।

कब से बैठा हुआ हूँ मैं सादे कागज पर लिखकर नाम तिरा,

बस तिरा नाम ही मुकम्मल हैइससे बेहतर भी नज़्म और क्या होगी?

(साभार गुलज़ार)

 

यह इश्क की एक और इंतहा है।

प्यार..प्रेम.. इश्क..कहने को ढाई अक्षरहै न दोस्तों! मगर इज़हार करना होतो स्याही भी पूरी न पड़े और पन्ने खत्म हो जाएँ। सब कुछ कहने के बाद भी जाने क्यों प्रेम का इज़हार अभी भी अनकहाअनबोला और अनलिखा है। फिर भी प्यार को ध्यान में रखकर रची गई कृतियाँ दिल के गिटार पर दीवानगी के सुर ज़रूर छेड़ती हैंकभी तकियों को भिगोती हैंतो कभी किसी आपबीती से जुड़कर काफी कुछ सोचने पर मजबूर कर देती हैं।

क्या प्यार अंधा होता है? प्यार करने वाले को अपनी प्रेयसी की हर बात प्यारी लगती हैइस इश्क का जादू सिर्फ़ चार मिनट में ही चल जाता है। इस आकर्षण में बड़ा योगदान हाव भाव का होता हैफिर बातचीत की गति और लहज़ा अपना असर डालता है। प्‍यार में होता है अजब सा दीवानापनअसल में जब व्यक्ति को किसी से प्यार होता हैतो उसके दिमाग में कुछ अलग ही किस्म की हलचलें होती हैं। वह सामान्य से कुछ अलग हो जाता है। इसी को शायद दीवानापन कहते हैं।

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क्या यही दीवानापन इश्क वाला लव हैमुझे तो ऐसा लगता है कि इश्क वाला लव वह हैजो हमें महकाता हैबहकाता हैफिर चाहे हमारा ‘वह’ हमारे पास होया दूरइससे अंतर नहीं पड़ताअंतर क्यों नहीं पड़ताअरे भाईवह हममें जो समाया है। उस खास का ज़िक्र होना यानी इत्र की शीशी का खुलना और फिर इत्र की शीशी के खुलने पर चारों ओर खुशबू का बिखरनाक्या यही खुशबू इश्क वाला लव हैक्या इश्क वाले लव का संबंध इत्र से हैऐसे इत्र से हैऐसी इत्र की खुशबू से हैक्या इस खुशबू के होने का कोई तर्क हैक्या कोई परमिट है इसके पासक्यों आती है यह खुशबूकहाँ से आती हैकहाँ चली जाती हैकब तक रुकेगीक्या इसकी कोई समय सीमा हैक्या इसकी कोई सरहद हैक्या इसका कोई पैमाना हैक्या इसका कोई आशियाना हैकौन जाने..

यह महसूस तो होती हैउठती हुई दिखती भी हैपर जब उठती हैतो आग लगा देती हैजब बहती हैतो समंदर बहा देती हैबड़ी ही भलीबड़ी ही मासूमबड़ी ही मीठी सी...क्या इश्क वाला लव ऐसा ही हैजैसे सपेरे की बीनजिस तरह सपेरे की बीन बजते ही घने जंगलों से साँप निकल आते हैंबौराए सेबलखाए सेइतराए सेबेखबर सेक्या इश्क वाला लव उन्हें खींचता हैक्या इश्क वाले लव की खुशबू रात की रानी की खुशबू से भी तेज़ होती हैक्या इश्क वाले लव की पुकार कृष्ण की बंसी की तरह हैजिसने कभी किसी को नहीं पुकाराउसे छलिए ने तो कभी किसी को आवाज़ भी नहीं दीपर शायद बंसी की हर लहरी में इश्क वाले लव की खुशबू बसी होगीउसमें एक पुकार होगीएक सच्ची पुकार जो गोपियों को खींचकर अपनी ओर ले जाती होगी। वैसे मैंने यह भी देखा है कि इश्क वाला लव पत्थरों में हँसता हैरेगिस्तान में चमकता हैसमंदरों में तैरता हैचंद्रमा में छुपा रहता हैफूलों से झाँकता हैरूह को सताता हैनींदों को उड़ा ले जाता हैआँखों से छलकता हैहोठों पर सिसकता हैभीड़ में भी हमें तनहा किया जाता हैपर रात के स्याह सन्नाटों में हमें आवाज़ देता हैबेचैन करता हैजब हम सो जाते हैंतो सपनों में आकर हँसता हैजाग जाते हैंतो रुलाता हैबाहर ढूँढेंगेतो रो रो कर भीतर बुलाएगाऔर भीतर खोजेंगेतो बाहर हँसती हुई आवाज आएगी।

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क्या यही है इश्क वाला लवक्यों दोस्तोंक्या यह लव किसी किताब में लिखा हैना..ना यह किसी किताब में नहीं लिखा है कि इश्क वाला लव दरअसल है कहाँइसलिए इसे मोटी मोटी किताबों में मत खोजनाना कोई मंत्र हैइसका ना कोई तंत्र है। इसका असली ज्ञानी वही है कि जो इसे खोज ले अपने भीतर। कि उसके हिस्से का इश्क वाला लव है कहाँऐसा लवजो दीवाना बना दे। और दीवानेपन में सयानेपन की ज़रूरत नहीं। बस पहचान की ज़रूरत हैउस खुशबू को पहचानने कीऔर इसके लिए किसी ग्रंथ को पढ़ना नहीं पड़ताबस आँखें बंद करके अपने मन की बात सुननी होगीमन समझते हैं न आप?

चंदन के पेड़ आग में जलाने के लिए नहीं होतेवे तो अनमोल खुशबू हैंइश्क वाले लव जैसी खुशबू। जैसे हम इश्क वाले लव को मन में समा लेते हैंवैसे ही हम चंदन की खुशबू को मन में समा लेते हैं। इश्क वाले लव का रिश्ता सच्चा रिश्ता होता है और सच्चे रिश्तों की खुशबू कभी नहीं जाती। वह आपका पीछा कभी नहीं छोड़तीपत्ती पत्ती झड़ जाती है पौधों कीपंखुड़ी पंखुड़ी झड़ जाती है फूलों कीलेकिन खुशबूयह इश्क वाले लव की खुशबू चुप नहीं होतीशांत नहीं बैठतीबशर्ते आप उसे सुन सकेंमहसूस कर सकें और कह सकें कि यही है मेरा इश्क वाला लव।

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सच कहूँ दोस्तों! इश्क वाला लव कभी आत्मा को झकझोरता हैकभी आत्मा को सहलाता है। एक ओर हम टूटते हैंतो दूसरी ओरहम बिखर कर भी मुस्कराते हैं। दोनों ही रूपों में इश्क वाला लव एक गहरा अनुभव है—जो दिल को छूता है।

और चलते चलते बस यही कहूँगी दोस्तों! कि जब आप इश्क वाले लव में होते हैं नतब टूटी हुई चाय की प्यालीधूल भरी हवेली या भीगी सड़क भी प्रेम की मस्ती जगाते हैंयादों की नाज़ुक परतों में खुशबू और आवाज़ें गूँजती हैं और अंतर्मन के संवादखामोशी के लहज़े या अधूरे लफ़्ज़ों में भी एक मुक्कमल इश्क उभर आता है।

याद रखिएगा दोस्तोंइश्क वाला लव बार बार नहीं मिलता।  अपने आस पास ढूँढिए तो ज़रा! अपने इश्क वाले लव कोअपने किस्से को शेयर कीजिए..कीजिइएगा ज़रूर..मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएसुनाते रहिएहो सकता हैयूँ ही बातें करते करते आपको भी इश्क वाला लव हो जाए! संभव है न दोस्तोंमेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

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EPISODE 22

टूटे पै फिर न जुरै 06/11/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से  कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगे शादी कीजो एक साझेदारी हैगठबंधन हैआज हम बात करेंगे कम्पैटिबिलिटी कीशादी को बचाने की जद्दोजहद की और बात करेंगे टूटते रिश्तों कीबढ़ती दूरियोंअवसादनिराशाअकेलेपन और मानसिक तनाव की..

MUSIC   

बड़े ही प्यार से नीरज ने शादी का निमंत्रण दियाबड़ा ही अनुग्रहआग्रहमनुहार और अधिकार सा लगाजब उसने कहाआपको तो आना ही हैमेरे लिए समय नहीं निकालेंगीखैरयह उसका प्यार ही था कि मैं नीरज और दीक्षा की शादी में पहुँची। प्री वेडिंग फ़ोटो सेशन से लेकर रोकाहल्दीसगाईबैचलर्स पार्टीकॉकटेलऔर न जाने क्या क्याउसने मुझे सारी फोटो भेजी थीं। हर फोटो की में फ़िज़ाओं में रोमांस का खुमार दिखा। कितने खुश होते हैं सब शादियों में। जिनकी शादी हो रही हैवे भी और जो शादियों में मेहमान बन कर आते हैंवे सब भी। खूब आनंद काजोश काडांस फ़्लोर पर ठुमकों काहँसी ठिठोली काउल्लास का माहौल रहता है। वरमाला के समय तो मानो शांत सागर में हिल्लोरें उठने लगती हैं। लगता है जीवन भर का सारा हास परिहास उसी समय संपन्न होगा। और फिर सभी वर वधू को उनके वैवाहिक जीवन के लिए शुभकामनाएँ देकर अपने अपने सब घर चले जाते हैं। जैसे हमारी हिंदी फिल्मों में भी अंत में THEY LIVED HAPPILY EVER AFTER वाली बात होती है और सभी किरदार आपस में मिल जाते हैंसभी के विवाह हो जाते है और फिल्म का ‘दी एंड’ हो जाता है। लेकिन क्या वास्तव में दी एंड हो जाता है?

लगभग डेढ़ साल बाद नीरज का फ़ोन आया। हमेशा की तरह मैंने चहक कर पूछा,

और कैसे हो नीरज?

दीक्षा कैसी है?

बड़े दिनों बाद याद आई मेरी?

नीरज काफ़ी शांत थाउसकी आवाज़ में दर्द छलक रहा थाबोलासोच रहा थाआपसे बात करूँ तो करूँ कैसेहिम्मत ही नहीं हो रही थीबात करने की।

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मैंने पूछा,

क्यों?

क्या हुआ?

सब ठीक?

वह तो मानो भरा बैठा थाफफक फफक कर रोने लगा,

बोलाहमारी शादी नहीं चलीटूट गई।

इस पर मेरी भी हिम्मत नहीं हुई कि पूछ सकूँकि क्या हुआकैसे हुआ?

इसीलिए मैं अक्सर यह सोचती हूँ कि क्या विवाह का संपन्न हो जाना या फ़िल्म का ‘दी एंड’ हो जाना ही खुशहाल जीवन की गारंटी हैयदि हाँतो फिर आए दिन विवाह टूट क्यों रहे हैंक्यों वकीलों और काउंसलरों के दरवाज़े खटखटाए जा रहे हैंपहले अपने लिए योग्य साथी की तलाशफिर विवाह का खर्चा और फिर विवाह को बचाने की जद्दोजहद। विवाह में होने वाले खर्चे से ज़्यादा महंगा है विवाह को बचाना। टूटते रिश्तेबढ़ती दूरियाँअवसादनिराशाअकेलापन और मानसिक तनाव का पर्याय बनकर रह गए हैं विवाह। आखिर क्योंदोस्तों?

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इन दिनों देश विदेश में हज़ारों महिला और पुरुष अपने विवाह को बचाने या उससे छुटकारा पाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं।  क्या वे समझते हैं कि शादी एक साझेदारी हैएक गठबंधन हैएक कम्पैटिबिलिटी है जिसमें दोनों पक्ष शामिल होने का फैसला करते हैंजिसका मतलब है कि आप दोनों एक रिश्ते में बंधे हैंअपने कार्यों के लिए आप जवाबदेह होने के साथ साथ प्रतिबद्ध भी हैं। जब चीज़ें खराब होती हैंतो पति या पत्नी को आईने में दिखने वाले अपने अक्स के बजाय किसी और पर दोष मढ़ना आसान लगता है। ज़िम्मेदारी लेना, ओनरशिप लेना, रिश्ते को बचाने का सबसे अच्छा तरीका है। जी हाँ, आपको उस रिश्ते को ओन करना ही होगाजिस क्षण आप किसी रिश्ते के लिए "हाँ" कहते हैंउस क्षण से लेकर विवाह समाप्त होने तकजो कुछ भी होता हैउसके लिए आप ज़िम्मेदार होते हैंचाहे वह अच्छा हो या बुरा। आपको खुद को कोसने की ज़रूरत नहीं हैआपको बस इतना करना है कि चीज़ों को सुधारने से पहले खुद से झूठ बोलना बंद कर देंअगर रिश्ते को बचाने की कोशिश करनी है तो.. , है न दोस्तों?

इसके लिए कभी कभी चुप रह जाना भी ज़रूरी है। मेरी माँ अक्सर कहा करती हैं कि एक चुप सौ को हरावे। है भी सच! विवाद के समयझगड़े के समय आप जितना ज़्यादा बात करेंगेवह उतना ही आग में घी का काम करेगा। घी के स्रोत को हटा देंऔर आग बुझ जाएगी या कम से कम उसकी लपट तो कुछ कम हो ही जाएगी। अब इससे क्या होगाइससे आप दोनों को संभलने और अपने विवादों को दूर करने के तरीके पर पुनर्विचार करने का समय मिलेगा। जब कोई जीवनसाथी क्रोधित या भयभीत होता हैतो उसका व्यवहार अनपेक्षित हो जाता हैऐसे में यदि दूसरा व्यक्ति चुप रह सकता हैउस जगह से हट सकता है। जब आप सीन से ही गायब हो गएतो विवाद कम हो सकता है। क्या उसी समय सारा फ़ैसला करना ज़रूरी हैपर होता क्या हैहमें तो अपना अहम शांत करना होता है न , अपने साथी को दंगल में हराना है नफिर चाहे रिश्ता टूटे तो टूटे! मानो शादी नहीं डब्ल्यू  डब्ल्यू ई का कोई मैच हो..|

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जी हाँ दोस्तों! अंधड़ के गुज़र जाने के बाद बातचीत सबसे बड़ा अस्त्र हैमसले सुलझाने के लिए... आप अपने साथी के साथ बैठेंबात करेंचाय कॉफ़ी की चुस्की लेंथोड़ा घूमने चले जाएँदूर नहींतो मॉर्निंग/ईव्निंग वॉक कर लेंएक लंबी ड्राइव कैसी रहेगीइस दौरान बात करें शांति सेसमझदारी सेरिश्तों को निभाने की मंशा अगर दोनों रखते हैंसाथ रहने की इच्छा अगर दोनों रखते हैं, तो यह कारगर होगा। कहीं मैंने पढ़ा थायहाँ ज्ञान न बाँटिएयहाँ सब ज्ञानी हैं! जी हाँआप ज्ञानी हैंइसमें क्या शकपर आप कुछ जानने के लिए गूगल या ए आई का सहारा भी तो लेते हैं नतो ये समझ लीजिए ये सलाह वहीं से आई है।

कई बार हम अपने आसपास के लोगों को समझ नहीं पाते हैं। हम जिनके साथ समय बिताते हैंदिनभर बातें करते हैंवे लोग चाहे हमारे घर के होंया फिर हमारे दफ़्तर के या हमारे मिलने जुलने वालेया हमारे रिश्तेदारइनमें से बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो या तो पूर्वाग्रही ही होते हैं या फिर नकारात्मक होते हैंजिनके द्वारा कही गईं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बातें हमें प्रभावित करती हैं और उनका असर हमारे रिश्तों पर पड़ता है। इस बात के लिए हमें सजग रहना चाहिए कि हमारे मित्रमिलने जुलने वाले और रिश्तेदारजिनके परिवार खुशहाल हैंउनके साथ हम समय बिताएँ अपने विवाहित जीवन को कैसे जीना हैइसे समझेंया इसके लिए हम अपने रोल मॉडल भी बना सकते हैंहम अपने आसपास के लोगों में सकारात्मक लोग ढूँढें। जैसी संगति होती हैवैसा ही हमारा मानसिक स्तर और मानसिक क्षितिज बन जाता हैइसे भूलना नहीं है दोस्तों! है न....।

जब विवाहित जोड़े लड़ते हैंतो यह आसानी से “हर आदमी अपने लिए” वाली स्थिति में बदल सकता है। यह एक ढलान वाला चक्र हैजो अक्सर विनाशकारी परिणाम की ओर ले जाता है। रिश्ते को टूटने से बचाने के लिएयदि आप चीज़ों को बदलना चाहते हैंतो आपको अपने समझौता कौशल में सुधार करना होगा। इसकी शुरुआत थोड़े बहुत से की जा सकती हैजैसे वेज और नॉन वेज भोजन....यदि इसी को मुद्दा बनाना थातो शादी से पहले क्यों नहीं सोचाअगर आप अपने विवाह को बचाना चाहते हैंतो आपको अपने रिश्ते को अपनी प्राथमिकता बनाना होगा। इसका मतलब है इसे अपने बच्चोंअपने करियर या किसी और एँगेजमेंट से ऊपर रखना होगा। आजकल ऐसा भी देखा जा रहा है कि पति पत्नी साथ साथ बैठे हैंपर दोनों अपने अपने फोन में लगे हुए हैं। जो सामने हैवह अदृश्य हैजो अदृश्य हैआभासी हैवर्चुअल हैवह दिल में है। आपको अपने रिश्ते को अपने जीवन के अन्य सभी रिश्तों से ऊपर रखना होगा। एक दूसरे के साथ समय बिताने और एक दूसरे की भावनाओं को साझा करने से प्रेम का धागा टूटता नहींऔर न ही उसमें गाँठ पड़ती है। अरे भई, वीकेंड पर तो अलग अलग प्रोग्राम न बनाओ, एक साथ एक जगह पर साथ रहो, साथ साथ रहने से भी कभी कभी बातें बन जाती हैं, कुछ अनकही गुत्थियाँ सुलझ जाती हैं, एक दूसरे को पैमपर करना, समय देना भी तो ज़रूरी है रिश्ते में, वह गीत याद है आपको? जाने क्या तूने काही, जाने क्या मैंने सुनी, बात कुछ बन ही गई| क्या कहते हैं दोस्तों!

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आज संतोषजनक बात ये है कि ऐसी चिकित्सा विधियाँ हैंजिनके द्वारा विवाह या टूटते रिश्तों को फिर से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। वैवाहिकी चिकित्सा एक़ तरह की समूह चिकित्सा हैजो पारिवारिक चिकित्सा के बहुत करीब है। इस चिकित्सा विधि में पति और पत्नी के बीच के पारस्परिक संबंधों को उत्तम बनाने का प्रयास किया जाता है। निस्संदेह काउंसलिंग करवाना रिश्ते को बचाने के सर्वोत्तम तरीकों में से एक है। भारत में छोटे शहरों में काउंसिलिंग के महत्व को समझने में अभी वक्त लगेगापर बड़े शहरों में लोग थेरेपी ले भी रहे हैंऔर ठीक भी हो रहे हैं। हाँविदेशों में इसका खूब चलन है और लोग इस बात को छुपाते नहींकि वे थेरेपिस्ट से मिल रहे हैं। दोस्तोंहमें भी इन कृत्रिम दीवारों को गिराना होगाक्योंकि अब ये अभेद्य दीवारें नहीं हैंइन्हें कभी भी भेदा जा सकता हैगिराया जा सकता है। है न दोस्तों!

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अरे हाँ! बातों बातों में नीरज को तो भूल ही गई....आज वह खुशहाल शादीशुदा ज़िंदगी जी रहा हैदीक्षा के साथ नहींआकांक्षा के साथ.....दोस्तों! विवाह प्रेम के धागे से बुना एक इंद्रधनुषी कपड़ा हैइसे प्रेम से ही सहेजना होगा। ये धागा है विश्वास का हैभरोसे का हैजीवन भर का हैइसे मत तोड़ो चटकाय...

सच कहूँ दोस्तों! धरती पर कहीं दूर भी अगर कोई रिश्ता टूटता है नतो बवंडर आ जाता हैकोई लैंडस्लाइड हो जाती हैसुनामी आ जाती हैतूफ़ान आ जाता है। और चलते चलते बस यही कहूँगी दोस्तों! रिश्तों को सहेज कर रखेंये हमारी ज़मीन हैंआकाश हैंहमारी पहचान हैंदिल का सुकून हैं और सबसे बड़ी बातये हमारा वजूद हैंहमारा अस्तित्व हैं।

आपने अपने रिश्तों को कैसे सहेजा हैबताइए तो ज़रा! अपने अनुभवअपने किस्से शेयर कीजिए..कीजिइएगा ज़रूर.. भूलना नहींमैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएसुनाते रहिएहो सकता हैक्या पता यूँ ही बातें करते करते कुछ रिश्ते सँवर जाएँ! संभव है न दोस्तोंमेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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EPISODE 23. 20/11/26

दिल चाहता है..

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नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगे दिल कीअरे भई इसके उसके दिल की नहींअपने दिल की। अक्सर होता क्या हैहम इसके उसके दिल की सुनते रहते हैंयह भूल जाते हैंकि एक बेचारा दिल हमारे पास भी तो हैजो चाहता है कि कोई कभी उसकी भी तो सुने। तो चलिएआज जानते हैंकि मेरा दिल क्या चाहता है?

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मेरा दिल चाहता है कि मैं अपने ‘उस’ को देखकर कहूँ कि जब भी मैं तुम्हें देखती हूँतुम्हें बिखरा बिखरा सा पाती हूँलगता है जैसे आसमान में किसी देवदूत के गले से टूट कर गिरी हुई माला के मोती हो तुमजो धरती पर आते आते बिखर गई है। तुम कुछ इस तरह से टूट कर गिरेकि माला का वह धागाउस देवदूत के गले में ही छूट गया और सभी कीमती मोती इधर उधर हो गएजिनसे अलौकिक प्रकाश और खुशबू निकल रही है। मैं उन्हें छूने जाती हूँतो वे जुगनू बन जाते हैं और दर्द के स्याह अंधेरों में लुकाछिपी खेलने लगते हैं। कभी मैंने चाहा कि तुम्हें समेट लूँ अपने दोनों हाथों मेंफिर से एक सुंदर माला बना दूँलेकिन उन्हें समेटना मेरे बस की बात नहीं। छूते ही गायब हो जाते हैं वे मोती। सुनो! ऐसा करो कि तुम खुद को समेट लोहर मोती को सहज लोमैं अपनी साँसों का अनमोल धागा तुम्हें दे रही हूँ। दरअसल जब मैं आई थी ना इस धरती परतब से यह मेरे पास बेकार ही पड़ा है। मेरे पास तो कीमती मोती भी नहींजिन्हें मैं इनमें पिरोकर माला बना सकूँ। अब तुम ऐसा करोइस धागे में अपने सभी मोतियों को आहिस्ता आहिस्ता पिरो दोयहाँ वहाँ बिखरे मोती अच्छे नहीं लगते,

देखो ज़रा आराम से,

धागे में गाँठ न पड़े

सुनो ना.... सुन रहे हो ना तुम!

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मेरा दिल चाहता है कि मैं कहूँ कि जो जोड़ता था आकाश को हवाओं सेजो जोड़ता था मन को कल्पनाओं सेजो जोड़ता था पानी को मिट्टी सेजो जोड़ देता था घास को तलहटी सेजो कच्चे रिश्तों को पकाता था वक्त के अलाव मेंजो टूट कर भी नहीं टूटावह सिर्फ़ विश्वास थाजो जोड़ता रहामगर खुद टूटता रहाजो दरारें भरता रहापर खुद भीतर से रिसता रहाजो आज भी आसमान को गिरने नहीं देताजो आज भी धरती को थमने नहीं देताजो आज भी मन के दीए को बुझाने नहीं देतावह विश्वास ही तो है। जो जोड़ता है वह भी विश्वास है और जो टूट रहा हैवह भी विश्वास है। टूटने और जोड़ने के खेल में छुपी है एक आस है। जो जोड़ता है सबकोवह भीतर से यकीनन टूटा होगा ज़रूर। जो साथ है हरदमवह एक दिन यकीनन छूटा होगा ज़रूर। दिल के भीतर देखकर भीतर ही उसका छूट जानाभीतर ही भीतर उसका टूट जानाकोई नहीं देख पाताकोई नहीं सुन पाता कि वह अब भी कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ छोड़ रहा होगाखुद के मन की मिट्टी से कोई कोना तोड़ रहा होगाक्या दिल यही चाहता है मेरा?

जब हम रिश्तों के गाँव बसाते हैं नातो एहसास की पतली गलियाँ उनके बीच खुद ब खुद बन जाती हैं। ये गाँव इन्हीं गलियों से साँस लेते हैंगाँव के जीवित रहने में और बस्तियों के तबाह हो जाने में इन पतली संकरी गलियों का बड़ा योगदान होता हैइसलिए शायद गलियों के सिरे खुले छोड़े जाते रहे योग्य इंजीनियरों द्वाराऔर बातों के सिरे खुला छोड़ देते हैं समझदार लोग। वे जुलाहे की तरह गाँठ लगाकर छुपाते नहींवे तो सिरे खुले छोड़ते हैंताकि आने जाने की सुविधा बनी रहेताकि जाने वाले अपने अहमअपने स्वार्थ और अवसरवादिता का सामान लेकर कभी भी उठकर जा सकें और आने वाले कभी भी अपने अहम को भुलाकरअहंकार को गलाकरकिसी भी सिरे से लौट सकें। सच कहूँ दोस्तों! यही तो चाहता है दिल मेरा!

जी हाँ दोस्तों! बहुत ज़रूरी है बातों के सिरे खुला रखना ताकि जीवन बचा रहेसाँसों में घुटन न होताकि समझ आ सकेजिसे सही समझ कर प्यार करते रहेवह कितना सही था और जिसे गलत समझ कर बचते रहेक्या वह सच में गलत थासड़कें खुली रहती हैंतो जीवित रहती हैं और सिरे खुले रहने से जीवित रहते हैं रिश्ते। इतना खुलापन तो ज़रूरी ही है। आज के संदर्भ मेंहम इस स्पेस कह सकते हैं। हर किसी को अपनी अपने स्पेस की तलाश है और स्पेस की ज़रूरत भी है। तो क्यों ना मिलकर एक दूसरे को स्पेस देंसब की निजता का सम्मान करें। है न दोस्तों! भईमेरा दिल तो यही चाहता है।

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दोस्तों! दो पहाड़ियों को सिर्फ़ पुल ही नहींखाइयाँ भी जोड़ती हैंनदियों को जोड़ने का काम पुल सदियों से करते आए हैंलेकिन पहाड़ों को जोड़ती खाइयों की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गयासोचती हूँ कि इन ऊँचेकठोरबदरंग और रुखेअपने ही अभिमान में अकड़े अकड़े से पहाड़ कभी भी अपनी जगह से नहीं हिलेलेकिन उनके बीच की गहरी खाई उन्हें हमेशा जोड़े रखती हैयह जोड़ बड़ी कोमलता लिए हुए हैंबहुत ही सरलता सेबहुत ही तरलता से जुड़े रहते हैं ये पहाड़। दोनों सिरों से स्थिर रहने के कारण अभिशप्त ज़रूर हैं ये पहाड़ये पर्वत, लेकिन जब जब भी ये दोनों एक दूजे को दूर से देखते होंगेउनकी धुंधलाई सी आँखों से पीड़ा के अनगिनत झरनेअसंख्य तड़पती नदियाँ बहने लगती होगीं और खाई में बिखर जाती होगीं। यह खाई ही उन्हें जोड़ती हैजितनी गहरी खाई उतना गहरा प्रेम! किसने किसने देखा है यह? कौन जाने!                                 

मेरा दिल मानता है कि एक दिन ऐसा भी आएगाजब ये ऊँचे पहाड़ अपने दुख से गल जाएँगेअपनी पीड़ा में बह जाएँगे और उनके अविरल बहते आँसू बीच की गहरी खाई को पाट देंगेपीर पर्वत सी हो जाएगीपहाड़ नदी हो जाएँगेउस दिन दो नदियाँ आपस में मिल जाएँगी और खाई पट जाएगी। इस अनोखा मिलन देखकर धरती गाएगीनाचेगीमुस्काएगीलहराएगी और... और आसमान फिर इतिहास लिखने लगेगाउस दिन दोनों पहाड़ एक दूजे का माथा चूमेंगेउस दिन खाई भी मुस्कराएगी।

दोस्तों! कुछ रिश्ते आसमान में बने होते हैंउनका धरती पर कोई आधार नहीं होताइसलिए कभी समझ ही नहीं आते और ना समझ आती है ऐसी धरतीजहाँ प्रेम लिखा तो खूब गयालेकिन कितना किया गयाकौन जानेअध्याय तो लिखे जाने चाहिए आसमानों मेंप्रेम उन्मुक्त है जहाँसुना हैआसमानों में कोई जेल नहींकोई रस्सी नहींकोई कानून नहींवहाँ ज़रूर प्रेम जीवित रहता होगाजिन्हें धरती ने नहीं संभालाआसमान ने उन्हें थामा है क्योंकि कहते हैं न कि आसमान का दिल बहुत बड़ा हैउसका न कोई ओर हैन कोई छोर।

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सुनोमेरा दिल यह भी जानता है कि सतह पर कभी कोई युद्ध नहीं लड़ा ही नहीं जा सकता। कुशल योद्धा गहरे में उतरकर ही लड़ते हैं। जो सिर्फ़ लहरों की सुंदरता निहारने का शौक रखते थेवे शाम को ही लहरों को निहार कर लौट गएजो जूझने का हुनर रखते थेउन्होंने लहरों के संग खूब कलाबाजियाँ कीं। समंदर सभी को उसकी पसंद के उपहार देता है। किसी को नमककिसी को मोतीकिसी को रेतकिसी को गरलतो किसी को पीयूष। समस्त संसार की मीठी नदियों के दर्द को खुद में समेटे वह किस कदर थमा रहता हैकौन जानेसमंदर बाहर ही नहींहमारी आँखों के अंदर भी हैइस समंदर का कभी कोई किनारा क्यों नहीं मिलताकौन जानेकौन पता देगा कि अगर मैं उसकी आँखों के गहरे समंदर में खो जाऊँतो मुझे किनारा नहीं मिलेगा या नहींऔर अगर मैं खुद दर्द के समंदर में डूब जाऊँतब भी किनारा मिलेगा या नहींकौन जानेकभी कभी मेरा दिल सोचता है कि सारी दुनिया का दर्द खुद में समेट लेने वालासभी को आसरा देने वाला समंदर अहोभाग्य हैपरंतु समंदर को समंदर के भीतर सहारा देने कौन आएगाउसे आसरा देने कौन आएगासमंदर कितना अकेला हैउसमें तो न जाने कितने डूब गएलेकिन वह कहाँ जाए कि खुद को डुबो सकेउसके किनारों पर हज़ारों को मंज़िलें मिलींलेकिन उसे शहर कौन देगाउसे बसर कौन देगाऔर वह तो हमेशा मुसाफ़िर का मुसाफ़िर रह जाएगा और कहता रहेगा  मुसाफ़िर हूँ यारों ना घर है ना ठिकानामुझे चलते जाना हैबस चलते जाना। है न दोस्तों!

Music

मेरा दिल चाहता है कि मैं तुम्हारे बिखरेपन को समेत दूँदेवदूत के गले से टूट कर गिरी हुई माला के मोतियों को अपनी साँसों के अनमोल धागे में पिरोकर एक सुंदर सी माला बना दूँअलौकिक प्रकाश और अप्रतिम खुशबू वाले जुगनुओं से रोशनी चुरा लूँपहाड़ों और खाइयों की दूरियों को पाट दूँसमंदरों को एक शहर दे दूँ और बातों के सिरे खुले छोड़कर रिश्तों के गाँव बसा लूँ।

सच कहूँ दोस्तों! मेरा दिल तो यही चाहता हैऔर आपका?

आपका दिल क्या चाहता हैबताइए तो ज़रा! अपनी चाहतअपनी बातेंअपने किस्से शेयर तो कीजिए..कीजिएगा ज़रूर.. भूलना नहींमैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएसुनाते रहिएहो सकता हैक्या पता यूँ ही बातें करते करते एक दिन रिश्तों के गाँव बस जाएँ!

है न दोस्तोंमेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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EPISODE 24.

भेद ये गहरा, बात ज़रा-सी! 04/12/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से- कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करने जा रहे हैं, प्रेम की..आपको याद है न दोस्तों, कि मैंने पॉडकास्ट की शुरुआत ही प्रेम-रसायन की बात से की थी, क्योंकि प्रेम है, तो हम हैं। प्रेम-रसायन पर बात करते-करते मैंने यह जाना कि प्रेम का सीधा-सच्चा संबंध सुंदरता से होता है, और यह आँखों में समाया होता है और आपके आयी, आज के एपिसोड में इस भेद को जानने की कोशिश करते हैं..

Music  

पिछली रात बहुत कोहरा था, ओस भी थी। ऐसा तो होना लाज़मी है, क्योंकि सर्दियों का मौसम है। पर इस ठिठुरती ठंड में कितने लोग देख पाते हैं कि पिछली रात चुपके से आसमान ने धरती को एक प्रेम-पत्र लिख भेजा है। ओस की बूँदों से लिखा हुआ, भीगा हुआ प्रेमपत्र! दोस्तों! ये जो सुबह हम पत्तियों पे ओस देखते हैं न, ध्यान से देखिए उसे, आपको एक प्रेम-कविता नज़र आएगी उसमें। क्या आसमान सिर्फ़ पानी बरसाता है? या वह धरती को कोई संदेश देता है? क्या सागर सिर्फ़ नदियों के जुड़ने से बना है? या आसमान के आँसुओं को समेट कर चुपचाप पड़ा है? हमें ऐसा क्यों नहीं लगता? क्यों नहीं दिखता हमें? अब इसका भेद क्या है? वजह क्या है? क्या हम भीतर से सूख गए हैं? अब हमारे भीतर कोई हरापन नहीं बचा, कोई गीलापन नहीं, कोई तरलता नहीं, सब बंजर कर दिया हमने, क्या ऐसे ही हो गए हैं हम? क्या भीतर से खोखले हो गए हैं हम? क्या है खुशी, असली खुशी? ऐसी खुशी, जो हमारे अंतस को सुख देती है? शांति देती है? संतुष्टि देती है? क्या यह ख़ुशी क्षणिक होती है, पानी का बुलबुला होती है, गर्म तवे पर छुन्न से गिरती और गायब होती पानी की बूँद होती है, जो टिकती नहीं। फूलों से खुशबू की तरह उड़ क्यों जाती है? इतना सब पा लेने के बाद भी वह संतुष्टि नहीं दिखती....सच्ची मुस्कराहट नहीं खिलती हमारे चेहरे पर!

MUSIC

यूँ ही चलते-चलते एक वाकया सुनाना चाहूँगी, मेरी कॉलोनी में सड़कें हमेशा साफ़-सुथरी रहती हैं। इन हवेलीनुमा घरों के नौकर रोज़ ही घरों से कचरे की बड़ी-बड़ी पन्नियाँ उठा कर पास ही बनी झोंपड़-पट्टी के सामने फेंक आते है। फिर शुरू होता है, उस बस्ती के बच्चों का खेल..वे सब उस कचरे में से अपनी-अपनी पसंद के खिलौने खोजते हैं। एक दिन ऐसा ही हुआ। बहुत-से बच्चे उस कचरे में से अपने मतलब की चीज़ें छाँट रहे थे। एक छोटे बच्चे के हिस्से कुछ भी नहीं आया। वह बड़ी देर तक रोता रहा, फिर थक-हार कर उसने उस कचरे से एक टूटी हुई गुड़िया खोज ली और बहुत ही प्यार से उससे खेलने लगा। उस बच्चे के चेहरे पर मैंने बहुत सारा प्यार देखा, उस टूटे खिलौने के लिए। वह घंटों खुद को भुला कर उस टूटे खिलौने के साथ था। कैसी शांति और कैसा प्रेम था उसके चेहरे पर? उसके गालों पर बहते आँसू की लकीरें अब इतिहास बन चुकी थीं, गालों पर खिंची आँसुओं की धार अब सूख चुकी थी और उसके होठों पर एक पवित्र-सी मुस्कान थी। उस टूटे हुए खिलौने को पाकर उसने दोनों जहान की खुशियाँ समेत ली थीं, अपनी झोली में उसने। मैं सब देख रही थी, यह मेरे लिए घटना अभूतपूर्व थी।

Music

दोस्तों! यह सच है कि खिलौने का एहसास बच्चों को सुरक्षित महसूस करने में मदद देता है, बच्चे अपनी पसंद के खिलौने को अपने साथ रखकर आश्वस्त महसूस करते हैं, खिलौने के खेल उन्हें समृद्ध करते हैं, उनके विकास में मदद करते हैं, उनकी कल्पनाशक्ति को प्रज्वलित करते हैं, संज्ञानात्मक और मोटर कौशल में सुधार की नींव रखते हैं, वे साझा करने, सहयोग करने और संचार के महत्व को सिखाने में भी मदद करते हैं, पर.....पर दोस्तों, यह प्यारा-सा, छोटा-सा बच्चा इन सबको नहीं जानता। उसने न कभी शिक्षाशास्त्र पढ़ा, न वह  मनोविज्ञान की समझ रखता है। बस वह....वह तो खुश होना जानता है, संतुष्ट होना जानता है, और अपनी पवित्र मुस्कान से सारे क्षितिज को रंगीन कर देना जानता है। उसकी भोली-सी, प्यारी-सी मुस्कान से क्षितिज रंगीन हो चला है.. वह यह भी नहीं जानता... कितना मासूम..कितना अबोध...कितना निश्छल..।

और इधर हम तथाकथित समझदार लोग, खुश होने के लिए न जाने कितने जतन करते है, रात-दिन एक करते रहते हैं, एक-दूजे को नीचा दिखाते हैं, गिराते हैं, झूठ बोलते हैं, छलते हैं, भेष बदलते हैं, मुखौटे लगाते हैं, कवच पहनते हैं, छवि गढ़ते हैं, दूसरों की ख़ुशी छीनने से नहीं हिचकिचाते..और जब इन सबसे भी बात नहीं बनती, तो भौतिक वस्तुओं में...ऐशो-आराम की चीज़ों में....और तो और शॉपिंग में ख़ुशी तलाशते हैं। कोई अपने हवेलीनुमा मकान को देख खुश होता है, कोई अपनी लंबी-सी कार देख कर। कोई बैंक बेलेंस देख कर, तो कोई फेसबुक पर अपने पांच हजार ‘फ्रेंड्स’ देख कर। कोई अपनी रील के व्यूअर्स देखकर, तो कोई यूट्यूब के सब्सक्राइब्र्स देखकर। परंतु दोस्तों! क्या यह खुशी असली खुशी है? क्या यह खुशी हमारे अंतस को सुख देती है? शांति देती है? संतुष्टि देती है? और फिर एक बात और भी है दोस्तों! यह ख़ुशी क्षणिक होती है, पानी का बुलबुला होती है, गर्म तवे पर छुन्न से गिरती और गायब होती पानी की बूँद होती है, जो टिकती नहीं। फूलों से खुशबू की तरह उड़ क्यों जाती है? इतना सब पा लेने के बाद भी वह संतुष्टि नहीं दिखती....वह मुस्कराहट नहीं खिलती, जो उस गरीब बच्चे के चेहरे पर टूटे, बेकार से खिलौने ने खिला दी थी।

Music

आखिर भेद क्या है इसका? क्या मंत्र है इसका?

दरअसल उस बच्चे ने उस खिलौने में खुद को डुबा दिया....समा लिया.....भुला दिया। जब-जब भी हम खुद को भुला कर खुश होते हैं, वह ख़ुशी स्थायी होती है। उस ख़ुशी का अहसास जीवन भर हमारे साथ चलता है। जैसे किसी बहुत सुंदर दृश्य को देख हम खुद को भूल जाते हैं या कोई लम्हा जब हमें अपने आपसे ही जुदा कर जाता है, वह लम्हा, वह पल हम कभी नहीं भूलते, और उस पल में गुम हो जाते हैं...वे पल हमेशा हमारे साथ चलते हैं....हमारे जीवन का हिस्सा बनकर। लेकिन कैसे?

एक दिन किसी नदी के किनारे जाना हुआ। वहाँ कुछ लोग अपनी मन्नतों के दीपक सिरा रहे थे, तो कुछ अपने पाप धो-धो कर नदी को मैला किए जा रहे थे। कई उस पानी का इस्तेमाल अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कर रहे थे। बड़ा शोर मचा हुआ था चारों ओर, लेकिन...लेकिन मैंने चुपके से सुना कि लहरें किनारों से बतिया रही थीं। ज़रा ध्यान दिया तो उनकी आवाज़ें और स्पष्ट सुनाई देने लगीं। कितनी सुंदर। कितनी आज़ाद थीं ये लहरें। अपनी मर्ज़ी से आतीं और अपनी मर्ज़ी से जातीं। अहंकार से अकड़े किनारे भीग-भीग जाते, लेकिन अपनी जगह से नहीं हिलते, लहरें वापस चली जातीं। उस दिन मैंने ये जाना कि नदी का इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए करते-करते हम कितने स्वार्थी हो गए हैं कि कभी भी दो घड़ी बैठ कर उसकी सुंदरता को निहारा नहीं,...उसकी बात नहीं। कितनी ही नदियों ने कहा होगा हमसे कि मैं नदिया फिर मैं भी प्यासी... भेद ये गहरा बात ज़रा-सी।

क्या सुन पाए हम?

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जब-जब हम भीतर से कंगाल होते हैं न दोस्तों, हम गरीब होते हैं, खोखले होते हैं, तभी हम उस कमी को पूरा करने के लिए बाहर भटकते हैं। अपने खालीपन को लिए लिए सौ जगह भटकते हैं, लेकिन फिर भी खाली ही रहते हैं, रीते ही रहते है। जिस दिन हम खुद प्रेम से भरे होते है, उस दिन पाने के लिए नहीं देने के लिए आतुर होते हैं। जिस तरह फूल की सुगंध उसकी पहचान है, उसी तरह प्रेम की भी एक खुशबू है। जो आप के भीतर से निकल कर चारों ओर बिखरती है, बशर्ते हमारा दिमाग चालाकियों से खाली हो और मन के भीतर सौंदर्य और प्रेम भरा हो।

ख़ुशी और प्रेम पाने का भेद गहरा है। लेकिन बात ज़रा-सी ही है, जो समझ गए उन्होंने प्रेम कलश को भर लिया… नहीं तो रह गए वे रीते के रीते।

एक और बहुत सुंदर बात- आप खुद को हमेशा प्रेम से भरे रखिए। एक दिन आपका प्रेमी खोजता हुआ आपके पास चला आएगा। तो चलिए ना... आज से खुद को भीतर से महसूस करें...खुद के भीतर महसूस करें.....सौंदर्य, प्रेम और बहुत-सा प्यार...मुहब्बत...इंसानियत...मुरव्वत..और जाने क्या-क्या? और सबको बता दें, नदिया अब यह न कह सकेगी कि मैं नदिया फिर भी मैं प्यासी .....क्योंकि अब तो हम समझ गए हैं कि भेद ये गहरा ज़रूर है, पर बात है ज़रा-सी! है न दोस्तों

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अंत में यही कहना चाहूँगी दोस्तों, आइए, प्रेम का यह भेद जानें, मिलकर प्रेम के अमृत-कलश को भरें, आप अपने किस्से शेयर कीजिए..कीजिएगा ज़रूर.. भूलना नहीं, मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, भेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न.. अबकी बार आपको अगले सीज़न का इंतजार करना पड़ेगा...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता हैक्या पता यूँ ही बातें करते-करते असली खुशी की हमारी मृगतृष्णा, हमारी प्यास एक दिन पूरी हो जाए!

है न दोस्तों? मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले सीज़न के साथ..यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न में मेरे हमराही, मेरे हमसफ़र बनने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया..बहुत-बहुत आभार, बहुत-बहुत धन्यवाद..!

फिर मिलती हूँ दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से-कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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