यूँ ही कोई मिल गया सीज़न-2

यूँ ही कोई मिल गया

 

विषय-सूची

 

  • EPISODE-0-प्रस्तावना- यूँ ही कोई मिल गया सीज़न-2  02/01/26
  • EPISODE-1 ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी 16/01/26
  • EPISODE-2 कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन... 30/01/26
  • EPISODE-3 प्यार को प्यार ही रहने दो 13/02/26
  • EPISODE-4 दोइ नैना मत खाइयो  27/02/26
  • EPISODE-5 गंगा तेरा पानी अमृत 13/03/26
  • EPISODE-6 जा, जी ले अपनी ज़िंदगी 27/03/26,
  • EPISODE 7 यूँ ही कोई दिल लुभाता नहीं 10/04/26
  • EPISODE 8 हर मुस्कराहट मुस्कान नहीं होती…24/04/26
  • EPISODE 9 राँझा राँझा करदी हुण मैं आपे राँझा होई 08/05/26
  • EPISODE 10 कोई ये कैसे बताए के, वो तनहा क्यों है?  22/05/26  
  • EPISODE 11 आप मुझे अच्छे लगने लगे… 05/06/26 
  • EPISODE 12  मत कर अभिमान रे बंदे! 19/06/26 
  • EPISODE 13  क्या कभी खुद से प्रेम किया? 03/07/26
  • EPISODE 14 किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी...17/07/26  
  • EPISODE 15 लव.. यू ज़िंदगी! 31/07/26
  • EPISODE 16 लब हिलें तो… 14/08/26
  • EPISODE 17 आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या है? 28/08/26
  • EPISODE 18 पल पल दिल के पास…11/09/26  
  • EPISODE 19 ये कौन चित्रकार है? 25/09/26
  • EPISODE 20 बहती हवा-सा था वो…09/10/26  
  • EPISODE 21 इश्क वाला लव…23/10/26 
  • EPISODE 22  टूटे पै फिर न जुरै 06/11/26
  • EPISODE 23 दिल चाहता है…20/11/26 
  • EPISODE 24 भेद यह गहरा बात ज़रा सी  04/12/26
  • REFLECTIONS     18/12/26 
  • CLOSING  01/01/27

 

*************************************************************EPISODE-0

INTRODUCTION-

यूँ ही कोई मिल गया सीज़न-2 प्रस्तावना 01/01/26

एक विहंगम दृष्टि

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत| सबसे पहले आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ | नए साल में मैं लेकर आ रही हूँ, अपने पॉडकास्ट ‘यूँ ही कोई मिल गया’ का दूसरा सीज़न... जिसमें होंगे नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...|

दोस्तों! माँ भगवती के आशीर्वाद स्वरुप अपनी वाचिक प्रस्तुति, अपने पॉडकास्ट 'यूँ ही कोई मिल गया' के दूसरे सीज़न  को लेकर आप सभी के सामने उपस्थित हूँ| हर ज़िंदगी की कोई न कोई कहानी ज़रूर होती है, है न.. हमारे ज़हन में छिपी रहती है हमारी ज़िंदगी, और छिपी रहती हैं हमारी यादें, मैं ले चलूँगी आपको एक ऐसी दुनिया में, जहां हर किसी की कहानी है, मेरे और आपके जज़बातों की, और वह भी हिंदी में, हिंदी, जो हमारी अपनी भाषा है, हमारे सपनों की भाषा, हमारे अपनों की भाषा...सच कहूँ तो कुछ कहानियाँ जीवन के साथ-साथ चलती हैं, तो कुछ यूँ ही मिल जाती हैं| समय सरिता के अजस्र प्रवाह में बहता जीवन अनुभवों और अनुभूतियों की पोटली होता है| इन्हीं अनुभवों और अनुभूतियों में से कुछ कहानियाँ, मैं अपने पॉडकास्ट 'यूँ ही कोई मिल गया' के दूसरे सीज़न  में समेटने का प्रयास कर रही हूँ | आपके प्यार और आदर ने मुझे पॉडकास्ट का दूसरा सीज़न  बनाने की ताकत दी, हिम्मत दी, जज़्बा दिया| दरअसल मैं ऐसा मानती हूँ  कि प्रेम ही हमें ताकत देता है, हिम्मत देता है, जज़्बा देता है| और यह प्रेम हमारे खून में, हमारे लहू में रचा-बसा होता है, यह हमारे लहू के साथ साथ हमारी रगों में बहता है और लहू का लाल रंग दरअसल प्रेम का ही लाल रंग है| मेरे शब्दों के स्पर्श को, उसकी ऊष्मा को पाकर प्रेम का रंग कैसा हो जाता है, यह जानना हो, तो पॉडकास्ट के इस सुहाने सफर पर आपको मेरे कदमों से कदम मिलाकर चलना होगा|

MUSIC

प्रकृति से मेरा अटूट रिश्ता रहा है| बचपन से ही असम की हसीन वादियों और ब्रह्मपुत्र के अथाह जल से मैंने प्रेरणा ली है, युवावस्था में नैनीताल की हवाओं की नमी और सर्पाकार सड़कों को महसूस किया है| इसलिए मेरी कहानियों में आपको पेड़ पौधे, झील झरने, बर्फ बारिश, समुद्र नदियाँ, बेल वल्लरियाँ, पत्थर पहाड़ इत्यादि प्रकृति के रूपों में संवेदना मिलेगी और उसी संवेदना को मैं मानव समाज और मानव जीवन के परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास करूंगी|

दोस्तों! पॉडकास्ट है, तो आप ही से बातें कर रही हूँ | बीच बीच में आपसे कुछ प्रश्न भी करूंगी| ये प्रश्न न केवल आपको सोचने का अवसर देंगे, बल्कि मेरे द्वारा कही गई मूल बात को नए आयामों से जोड़ने का भी काम करेंगे| मानव मन से जुड़े सभी आयामों पर आपसे बातें भी करूंगी, लेकिन मेरे पॉडकास्ट का एक बड़ा हिस्सा नारी जीवन की संवेदनाओं और वेदनाओं को विशेष रूप से उजागर करेगा| हमारे समाज में नारी की दशा, उसके सपनों, प्रार्थनाओं, कल्पनाओं, संवेदनाओं और इच्छाओं को उभारने जा रही हूँ |

पहले सीज़न की भांति ही मैंने सभी एपिसोडस के शीर्षक रोचक रखने का प्रयास किया है और अधिकतर शीर्षक किसी न किसी गीत या ग़ज़ल के मुखड़े हैं| आप उन गीतों या गज़लों को गुनगुनाते-गुनगुनाते भी पॉडकास्ट को सुन सकते हैं| जब मैं छोटी थी, तो हिरोशिमा नागासाकी पर बम गिराए जाने के बारे में पढ़ती थी, सुनती थी, तब भी यह थोड़ा थोड़ा समझ आता था कि इन ज़हरीले रसायनों की वजह से वहां धरती बंजर हो गई है और अब वह हरी नहीं होती| तब से धरती के उस बंजर टुकड़े के लिए मेरा मन करुणा से भर-भर जाता था| फिर ज़िंदगी ने समझाया कि बंजर सिर्फ़ धरती के टुकड़े ही नहीं होते, मन की धरती के हिस्से भी बंजर हो जाते हैं| फिर मैं सोचने लगती कि क्या कोई ऐसा रसायन भी है, जो इसे उर्वर कर दे?  अपने आप से पूछा था यह सवाल, तो जवाब हृदय की अतल गहराइयों से आया कि हां, एक रसायन है, जो मन को मरने से बचा सकता है, और वह है-प्रेम रसायन| और इसी की बात करने जा रही हूँ, अपने पॉडकास्ट में....|

MUSIC

मैंने अपने पॉडकास्ट की भाषा को सरल और सहज रखा है|  मैंने भाषा के साथ कोई प्रयोग नहीं किया, कोई सजावट नहीं की, कोई कृत्रिम श्रृंगार नहीं किया| मैं भाषा को लेकर अत्यधिक सजग और सचेत भी नहीं रही, लेकिन यह प्रयास ज़रूर किया कि भाषा सही भावों से संप्रेषित हो, भाषा सहूलियत से बरती जाए, चाहे साहित्यिक हो या सरल, पर तरलता से भरपूर हो, बहती-सी रहे| हर एपीसोड में यही प्रयास किया कि मेरे शब्द आपके मन को छू लें, आपको संवेदना से भर दें, नम कर दें, और उर्वर भी कर दें|

कभी कभी मैं ऐसा भी सोचती हूँ  दोस्तों! कि प्रेम तो हम सभी के भीतर बहता है, फिर भी न जाने क्यों, हम इससे अंजान बने रहते हैं? चाहे जड़ हो, चेतन हो, रेत हो, बूंद हो, किनारें हों, लहरें हों, बारिश हो या मिट्टी हो, सभी तो प्रेम को अपनी-अपनी तरह अभिव्यक्त करते हैं| वृक्ष पर लिपटी लता, साहिल से सटकर बहता दरिया, मिट्टी की सोंधी खुशबू और पत्तों पर जमी शबनम की बूंदें, ये सब भी तो प्रेम के ही प्रतीक हैं| सदियों से केवल प्रेम ने इस दुनिया को थाम रखा है, यह शाश्वत है, यह कभी नष्ट नहीं होता| यही तो है, जो आसमान को झुकाता है, पृथ्वी को महकाता है, कहीं पहाड़, तो कहीं वृक्ष बन जाता है, कहीं बूंद बनकर बहता है, कहीं रेत बनकर सिमटता है, कहीं गीत बनकर बज उठता है, कहीं गीत, कहीं प्रीत, कहीं हार और कहीं जीत बनकर ढलता रहा है, ढलता रहेगा| कृष्ण की बाँसुरी ने किसी को आवाज़ देकर नहीं पुकारा, लेकिन यकीनन उस बांसुरी में प्रेम ही सूर्य बनकर उदित हुआ होगा| राम के पवित्र पैरों से कोई पत्थर क्या यूँ ही स्त्री बन गया होगा? शिव की जटाओं में गंगा किस वजह से थमी होगी? जी हां! प्रेम दिखता नहीं है, यकीनन महसूस होता है, यह नसों में बहता है लहू बनकर, आसमानों से बरसता है बूंद बनकर, आँखों  से टपकता है अश्रु बनकर, गालों पर चिपके, तो खारा लगता है, होठों पर सजे, तो मीठा सा, इस प्रेम को महसूस किया जाए, यही प्रयास है मेरा, यही प्रयास है मेरे पॉडकास्ट 'यूँ ही कोई मिल गया' के दूसरे सीज़न  का|

MUSIC

'यूँ ही कोई मिल गया' पॉडकास्ट के दूसरे सीज़न को, मैं उन सब लोगों को समर्पित करती हूँ, जिन्हें मैं पसंद करती हूँ, उन पलों को, उन रिश्तों को, उन नातों को, उन लंबी लंबी सी बातों को, उन छोटी छोटी सी मुलाकातों को, जिन्होंने मेरे मन में प्रेम का मान बढ़ाया और मुझे प्रेम को पॉडकास्ट का विषय बनाने के लिए प्रेरित किया|

जी हाँ! चलते चलते यह भी कहना चाहती हूँ कि मैं आभारी हूँ  इस माला के उस धागे की, जो अदृश्य है, पर हर मोती को जिसने सहेजा है, जो दिखता नहीं, लेकिन उसके बिना यह माला कभी बन ही नहीं सकती थी| वे सब लोग, जिनमें मेरे बच्चे, अपूर्व, आशी और अक्षर शामिल हैं, मेरे पति श्री अंबरीश गुप्ता जी शामिल हैं और शामिल हैं ध्वनि निर्देशक और वीडियो संपादक सुशांत पांडे | उम्र में भले ही ये छोटे हों, किंतु इनकी खुशबू हर एपीसोड में है, इनका ज़िक्र उस इत्र की तरह है, जो हम सबके मन को महकाता है, बहकाता है, कभी हँसाता है और कभी-कभी रुलाता भी है| विश्वास कीजिए प्रेम की एक बूंद भी यदि आपने ग्रहण कर ली, तो यह प्रेम आपके मन को कभी बंजर नहीं होने देगा, यह वादा है मेरा|

तो आइए! इस धरती को प्रेममय बनाएँ, प्रेम में डूब जाएँ, प्रेम की बातें करें, प्रेम से बातें करें और प्रेम के सागर में गोते लगाएँ, इसमें अडूब डूबें, यानी डूबें नहीं, बस गोते लगाएँ, लहरों का आनंद लें|

तो चलिए, मेरे साथ चलिए, इंतज़ार किसका है? चलिए, उस इंद्रधनुषी जहां में मेरे साथ, जहां सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम है| सुनिएगा ज़रूर… हो सकता है, इस बार, कहानी आपकी हो! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों....वही प्रीत...वही किस्से-कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE-1 

ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी 16/01/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, एक किस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत । लीजिए हाज़िर हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और कुछ पुरानी यादें, उसी मखमली आवाज़ के साथ...आज हम बात करने जा रहे हैं प्रेम की..जी हाँ! ऐसा प्रेम जो अलौकिक है, दैविक है, अमर है, अजर है और शाश्वत है। जब भी हम प्रेम की बात करते हैं न, तो एक ओर हमें श्रीकृष्ण की याद आती है, तो दूसरी ओर कृष्ण के साथ-साथ राधा का नाम बरबस ही याद आ जाता है, लेकिन आज मैं राधा की नहीं, मीरा की बात करूँगी। जी हाँ, प्रेम दीवानी मीरा, जिसका दरद कोई नहीं समझ सका, ऐसी मीरा को हम सभी जानते हैं, परिचित हैं, हम सभी ने वह कहानी सुन भी रखी होगी, ऐसी कहानी, जो हम सब को प्रिय है। आज प्रसंगवश इस कहानी से बात शुरू करती हूँ। चित्तौड़, राजस्थान की मीरा जब छोटी थीं, तो उनके घर एक साधु आए, जो कृष्ण भक्त थे। साधु अपने साथ श्रीकृष्ण की मूर्ति भी लेकर आए, जिसे वे बरसों से पूज रहे थे। बालिका मीरा उस मूर्ति को देखकर मचल उठी और साधु से मूर्ति की माँग कर बैठी। साधु ने साफ़  मना कर दिया कि वे बरसों से इस मूर्ति को पूज रहे हैं। कहने लगे, यह कोई साधारण मूर्ति नहीं, इसमें साक्षात श्री कृष्ण विराजते हैं। यह कोई खेलने की वस्तु नहीं, जो मैं तुम्हें दे दूँ। मीरा रोती रही और साधु चले गए।

MUSIC

दोस्तों! संभवतः रोदन के साथ मीरा का रिश्ता यहीं से बन गया था। किवदंती के अनुसार रात को साधु के सपने में श्रीकृष्ण आए और कहने लगे, तुम मेरी मूर्ति मीरा को दे दो। साधु ने कहा, हे कान्हा! मैंने जन्म भर आपकी पूजा की है, परंतु आपने दर्शन नहीं दिए और आज आप आए हैं, तो उस नादान लड़की को मूर्ति देने के लिए कह रहे हैं? क्या लीला है प्रभु? श्री कृष्ण ने कहा, हे साधु! मेरी मूर्ति बस उसी की होगी, जो मेरे के लिए दिन रात रोती है।

चलिए, अब मैं अपनी बात को इसी छोर से शुरू करती हूँ। क्या सचमुच हे कृष्ण, तुम आए थे साधु के सपने में या यह भी तुम्हारा कोई छल था, बोलो न छलिया? 

आज तुमसे कुछ प्रश्न पूछना चाहती हूँ कान्हा, जब से इस धरती से गए हो , क्या एक बार भी इस धरती की सुध ली है तुमने? क्या तुम्हें इस धरती की याद भी आती है? क्या यह याद कभी सताती भी है? तुम तो वचन देकर गए थे कि मैं लौटूँगा, फिर भी लौट कर नहीं आए? तुमने अपनी मोहक मुस्कान से सबको खूब छला। गोपियों को अपनी बंसी की मधुर लहरी सुनाकर बेसुध कर दिया। राधा को अपने प्रेम का दीवाना बना दिया। राधा के प्रेम में तो तुम भी बावरे हो गए थे ना? बोलो ना कान्हा?

तुमने राधा संग, गोपियों संग, खूब होली खेली। तुम्हारे और राधा के प्रेम गीत आज भी ब्रज की गलियों में गूंजते हैं। मधुबन में महारास में तुमने हर गोपी के साथ तुमने रास रचाया। हर गोपी यही समझती रही कि तुम सिर्फ़ उसके साथ हो, लेकिन कृष्ण तुम वहाँ थे ही नहीं, तुम सिर्फ़ राधा के पास थे, राधा के प्रेम में आसक्त हो कर तुमने जो छल किया न, कभी चूड़ी वाले बने, कभी स्त्री स्वांग रचाया, और न जाने क्या-क्या? हे कान्हा!

MUSIC

एक बात बताओ ना कान्हा, ब्रज की गलियों में राधा संग, महलों में रुक्मणी संग, सत्यभामा संग अनगिनत रानियों, पटरानियों के बीच क्या कभी तुम्हें उस विरहिणी की याद आती थी, जो तुम्हारे नाम की वीणा लिए रेगिस्तान की तपती धूप में खुद को जलाती रही, जिसने सिर्फ़ तुम्हारे कारण अपने महलों की सुख सुविधाएँ त्याग दीं, और तपती रेत पर अपने आँसुओं के प्रेम की इबारत लिख दी, प्रेम को इबादत मान बैठी, उसके दिन तुम्हारे वियोग में झुलस गए और उसकी रातें तुम्हारी याद में बंजर हो गईं, उसके जीवन में कभी मिलन के फूल नहीं खिला पाए तुम कृष्ण?

हे गिरिधर! आज सच्ची-सच्ची बताओ, अब बता भी दो न....कि मीरा तुम्हें इतना प्रेम क्यों करती थी? क्या चाहती थी वो तुमसे? तुम तो त्रिकालदर्शी हो न, क्या बता सकोगे कि मीरा ने ऐसा क्यों कहा, 'आवन कह गए, अजहूँ ना आए।’ क्या तुमने मीरा से कोई वादा किया था, बोलो न गिरिधर! क्या दुनिया से छिपाकर, हे छलिया! तुमने अपनी मोहक मुस्कान से उसे भी दीवानी बनाया था? बोलो ना कान्हा! मीरा तो राधा की तरह तुमसे प्रेम की माँग भी नहीं करती थी, ना रास, ना मिलन की आस, ना कोई योग, ना ही कोई भोग, फिर वह क्या चाहती थी? और क्यों? क्या तुमने कभी यह जाना? वह मंदिरों में, संतों के डेरों पर, जा-जाकर तुम्हारा पता पूछती थी कान्हा, वह बादलों की तरह मीलों चलती थी, हे कृष्ण! क्या तुम मीरा के लिए दो कदम भी साथ चले थे? अच्छा, एक बात बताओ मोहन! क्या कभी रेत के संग पानी मिल कर चला है? क्या कभी रात के सन्नाटों में जब सारी दुनिया सो रही होती, क्या उस वीराने में तुम्हें मीरा की सिसकियाँ सुनाई देती थीं? मीरा के मन में तुम्हारे प्रेम की जो लौ जल रही थी कान्हा, क्या कभी उसकी ऊष्मा को तुमने महसूस किया? क्या मीरा के प्रेम की अगन से तुम कभी विचलित हुए? हे कृष्ण! बताओ ना..क्या तुमने जानबूझकर उसे वियोग के दावानल में छोड़ दिया था? कहीं ऐसा तो नहीं....कान्हा! कि तुम उसके तप से घबराते थे? उसकी सच्ची, निष्पाप, निष्कलंकित भक्ति से घबराते थे? सुनो ना.. मोहन! तुम कभी भी उसके पास नहीं गए। अपने नियमों में बंधे तुम कभी नियम तोड़ न सके, फिर चाहे मीरा सभी नियमों, परंपराओं को त्याग कर कभी बावरी और कभी कुलनाशिनी कहलाती रही। सारे नियम, सारे दर्शन, सारे आदर्श, सारे सिद्धांत, मीरा के ही हिस्से में क्यों आए? वंशीधर! उत्तर दो ना..सारे सही-गलत के गणित केवल मीरा के लिए ही क्यों थे?

MUSIC

किसका प्रेम बड़ा है? बोलो न कान्हा! राधा का या मीरा का? बोलो! आज तो तुम्हें बताना ही होगा? किसका पलड़ा भारी था? तुमने आने का वचन दिया था न, फिर भी नहीं लौटे? अब जब कभी भी तुम आओगे न कृष्ण, मीरा की रूह, उसकी आत्मा आज भी तुम्हें विरहिणी बनकर भटकती मिलेगी और गाती मिलेगी- मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरों न कोई।

तो क्या मीरा का प्रेम निरर्थक रह गया? जी नहीं, मीरा का प्रेम व्यष्टि से समष्टि बन गया और मीरा का प्रेम, हर एक प्रेम करने वाले के दिल में समा गया और उसका दरद रेगिस्तान की रेत के कण-कण में व्याप्त हो गया। मीरा के आँसुओं ने सागर की हर बूँद में समा कर उसे खारा बना दिया। मेरे मन में अक्सर यह प्रश्न भी कौंधता है कि कैसे समेट लिया सागर ने इतने विस्तृत विरह को?

कभी यदि कान्हा, तुम हमें भटकते हुए गलियों में मिल गए न, तो मैं पूछूँगी ज़रूर, चलो, बोलो, आज तो सच बोल ही दो, आज मैं तुम्हारी मोहक मुस्कान में उलझ कर हमेशा की तरह अपने प्रश्न नहीं भूलूँगी। देखो कान्हा, मैंने आँखें बंद कर ली हैं, अब बताओ, हे कान्हा! मीरा तुमसे इतना प्रेम क्यों करती थी? आज भी उसकी रूह भटकती रहती है...तुम्हें तलाशती हुई, तुम्हें खोजती हुई।

MUSIC

मेरे ये सवाल ऐसे खत्म नहीं होंगे कान्हा, मीरा की तरह हम सभी को इंतज़ार रहेगा जवाबों का, सही है न वंशीधर?

क्यों दोस्तों! आप ही बताइए, आप भी तो कान्हा से जवाब माँगते हैं न....मैसेज बॉक्स मे लिखकर बताइए, अपनी बातों को मुझे बताइए..|

सुनिएगा ज़रूर… हो सकता है, मीरा की अमर कहानी आपकी ही कहानी हो! आपके विरह की कहानी हो, आपके प्रेम की कहानी हो।

मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों....वही प्रीत...वही किस्से-कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE  2

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन....30/01/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, एक किस्से कहानियाँ सुनाने वाली, आपकी मीत। लीजिए हाज़िर हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और कुछ पुरानी यादें, उसी मखमली आवाज़ के साथ...आज हम बात करने जा रहे हैं बचपन की.... आप सोच रहे होंगे....उम्र पचपन की, और बातें बचपन की....सच कहूँ दोस्तों! यही तो वह समय है जब बचपन की वीथियों में फिर से विचरण करके जीवन पीयूष का रसपान किया जा सकता है......बात यह हुई कि पिछले दिनों मैं लंदन गई थी, पिक्काडली सरकस की रंगीन सडकों पर घूमते हुए ऐसा लगा कि....सहसा ठंडी हवा का कोई झोंका आया। झोंका था, खुशबू थी, या खुशी का ज्वार था...हुआ यह.... कि अचानक अलका जो दिख गई। अलका, मेरे बचपन की सबसे प्रिय दोस्त.... फिर क्या था....शुरु हो गया बातों का सिलसिला, यह हिसाब लगाने में घंटों लगे कि कितने सालों बाद मिल रहे हैं, तू कितनी मोटी पतली हो गई, बच्चे, पति, और फिर शुरू हुई लंदन की कड़कड़ाती, जमा देने वाली सर्दी में आइसक्रीम डेट.....जी हाँ दोस्तों, आइसक्रीम डेट| फोटो शेयर करते हुए उसने कैप्शन में लिखा , 'लाइफ के हर फेज़  में हर किसी के दोस्त होते हैं, लेकिन बचपन के कुछ दोस्त जीवन के सभी फेज़ में आइसक्रीम शेयर करने के लिए साथ रहते हैं। उसने आगे जो लिखा, वह तो और भी मज़ेदार था, 'एक साल के लिए आइसक्रीम का कोटा पूरा हो गया.. जब तक हम दोबारा नहीं मिलते।' ऐसी होती है बचपन की दोस्ती....ऐसी ही अनेक इंद्रधनुषी यादों की संदूकची को आज हम खोलेंगे.....हम बीते दिनों की यादों में खो जाएँगे.....कभी डूबेंगे...कभी उबरेंगे....कभी अडूब डूबे रहेंगे....।

MUSIC

तो दोस्तों! चलिए आज बात करते हैं, बीते हुए दिनों की....ऐसे दिन जब न दौलत, न शोहरत की चिंता थी, मुझे बस याद है झुर्रियों से भरे चेहरे वाली वह नानी, जो परियों की कहानियाँ सुनाया करती, रेत में घरोंदे बनाना, बना बना कर मिटाना, अपने खिलौनों को अपनी जागीर समझना, अपनी टूटी फूटी गुड़िया को भी सबसे सुंदर मानना, न दुनिया का ग़म था, न रिश्तों के बंधन, बस बचपन का वह सावन था, वो कागज़ की कश्ती और वो बारिश का पानी था। कभी लहरों के करीब जाकर उन्हें छूने की बेताबी, कभी उनके पास आने पर चिल्लाकर दूर भाग जाना, कभी घोष दादा की बंहगी से ‘रोशोगुल्ला’ निकालकर खाने ज़िद करना, कभी खोमचेवाले से गुब्बारे, कभी फेरीवाले से बुलबुले खरीदने थे, फिर बुलबुलों और गुब्बारों के साथ पूरे घर में धमाचौकड़ी मचाना, माँ  की डांट से बचने के लिए साईकिल ले गलियों में घुमाना, और गिर पड़े,और गिर पड़े तो रोकर उसी के आँचल में छुप जाना, दोस्त से लड़कर मुँह फुलाकर बैठ जाना, पर अगले ही दिन उसी के साथ खेलना, बड़े बड़े आँसू टपका कर कुल्फी के लिए शोर मचाना, और फिर एक मासूम सी मुस्कान के साथ छुपकर मज़े से उसे खाना, देर रात तक डैडी के साथ पिक्चरों के आनंद उठाना, और जब नींद आ जाए, तो उन्हीं की गोद में सिर रखकर, सपनों की दुनिया में कहीं गुम हो जाना, एक बुरा सपना देखकर, पलंग के नीचे छुप जाना, कोई जब फुसलाने आए, तो उसी के आगोश में खो जाना, हर घड़ी, हर पल, आज़ाद पंछी की तरह, ज़िंदगी को जीते जाना और ठोकर लग जाए, तो ज़ख्म पोंछकर आगे बढ़ जाना।

हर किसी को अपना बचपन याद आता है,आता है न। हम सबने अपने बचपन को जीया है। शायद ही कोई होगा, जिसे अपना बचपन याद न आता हो। बचपन की मधुर यादों में माता पिता, भाई बहिन, यार दोस्त, स्कूल के दिन, आम के पेड़ पर चढ़कर 'चोरी से' आम खाना, खेत से गन्ने उखाड़कर चूसना और ‍खेत के मालिक के आने पर 'नौ दो ग्यारह' हो जाना, हर किसी को याद है। जिसने 'चोरी से' आम नहीं खाए और गन्ना नहीं चूसा, उसने अपने बचपन को क्या खाक जिया? चोरी और ‍चिरौरी तथा पकड़े जाने पर साफ़ झूठ बोलना, फ़र्श पर बिस्कुट की रेल बनाना, बचपन की यादों में शुमार है। बचपन से पचपन तक यादों का अनोखा संसार है। सच में

रोने की वजह भी ना थी, ना हँसने का बहाना था, 

क्यों हो गए हम इतने बड़े, इससे अच्छा तो बचपन का ज़माना था ।

(साभार मशहूर उर्दू शायर जौन एलिया) 

music 

दोस्तों! छुटपन में धूल गारे में खेलना, मिट्टी मुंह पर लगाना, मिट्टी खाना किसे नहीं याद है? और किसे यह याद नहीं है कि इसके बाद माँ  की प्यार भरी डांट फटकार व रुंआसे होने पर माँ  का प्यार भरा स्पर्श! इन शैतानीभरी बातों से लबरेज़ है सारा बचपन।

सच कहूँ तो दोस्तों! जो न ट ख ट नहीं था, उसने बचपन क्या जिया? जिस किसी ने भी अपने बचपन में शरारत नहीं की, उसने भी अपने बचपन को क्या खाक जिया, क्योंकि बचपन का दूसरा नाम' ही ‘न ट ख ट पन’ है। शोर व ऊधम मचाते, चिल्लाते बच्चे सबको लुभाते हैं और हम सभी को भी अपने बचपन की सहसा याद हो दिला जाती हैं।फिल्म 'दूर की आवाज़' में जानी वॉकर पर फिल्माए गए गीत की पंक्तियाँ कुछ यूँ ही बयान करती हैं  

हम भी अगर बच्चे होते,

नाम हमारा होता गबलू बबलू,

इस गीत में नायक की भी यही चाहत है कि काश! हम भी अगर बच्चे होते, तो बचपन को बेफ़िक्री से जीते और मनपसंद चीज़ें खाने को मिलतीं। हम में से अधिकतर का बचपन गिल्ली डंडा,पोशमंपा,खो खो, धप्पा,पकड़न पकड़ाई, छुपन छुपाई खेलते तथा पतंग उड़ाते बीता है। इन खेलों में जो मानसिक व शारीरिक आनंद आता है, वह कंप्यूटरजनित खेलों में कहाँ?

वह रेलगाड़ी को 'लेलगाली' व गाड़ी को 'दाली' या 'दाड़ी' कहना......हमारी तोतली व भोली भाषा ने सबको लुभाया है। वह नानी दादी का हमारे साथ साथ हमारी तोतली बोली को हँसकर दोहराना....शायद बड़ों को भी इसमें मज़ा आता था और हमारी तोतली बोली सुनकर उनका मन भी चहक उठता था।

MUSIC

जी हाँ दोस्तों! अपने बचपन में डैडी द्वारा साइकिल पर घुमाया जाना कभी नहीं भूल सकते। जैसे ही डैडी ऑफ़िस के लिए निकलते थे, वैसे ही हम भी डैडी के साथ जाने के लिए मचल उठते थे, चड्डू खाने के लिए, तब डैडी भी लाड़ में आकर हमें साइकिल पर घुमा ही देते थे। बाइक व कार के ज़माने में वो 'साइकिल वाली' यादों का झरोखा अब कहाँ?

दोस्तों! बचपन में हम पट्टी पर लिख लिखकर याद करते और मिटाते थे। न जाने कितनी बार मिटा मिटा कर सुधारा होगा। पर स्लेट की सहजता व सरलता ने पढ़ना लिखना सिखा दिया, वाह! क्या आनंद था ?

जब बच्चे थे, तब बड़े होने बड़ी जल्दी थी, पर बड़े होकर क्या पाया? हर समय दिन भर कितने ही चेहरे देखती हूँ सड़कों पर, कार्यस्थल पर, हर जगह बहुत से चेहरे, पर इनमें से कोई भी चेहरा ना हँसता दिखाई देता है, ना ही खुशनुमा। अक्सर लोग हैरान परेशान से दिखते हैं, खुश होते भी हैं, तो ज़रा देर के लिए, मानो हँसने या खुश होने में भी उनके पैसे खर्च हो रहे हों। आज लगता है कि बच्चों का 'बचपन' भोलापन, मासूमियत, निश्छलता, 'पचपन' के चक्कर में कहीं खो सी गई है!

इंसान का बचपन उसकी प्रेरणा होता है। बचपन में की गई गलतियाँ, नादानियाँ व शैतानियाँ बड़े होकर जब याद आती है न दोस्तों! तो हमें हँसी आ जाती है, है न दोस्तों! उसकी सुखद मधुर यादें हमारे दिल ओ ज़हन में मृत्युपर्यंत बनी रहेंगी। नहीं जाने वाली हैं।है न दोस्तों!

MUSIC

दोस्तों! अब उलझनें बहुत बढ़ गई हैं ज़िंदगी में, उन्हें कोई जिगसॉ पज़ल की तरह मिनटों में कैसे सुलझाएँ? चलो चलें! खिलौनों और चॉकलेट्स की उसी दुनिया में वापस चलें। ऐसे जहाँ की ओर चलें, जहाँ न हो किसी से ईर्ष्या हो, किसी से जलन, जहाँ छोटी छोटी चीज़ों में ही हमारे सब सपने सच हो जाएँ। कागज़ के पंखों पर सपने सजाकर, गेंदे के पत्तों से कोई धुन बजाकर, ख़ाली थैलियों की पतंगें उड़ाएँ, रातों को टॉर्च से आसमाँ चमकाएँ, मम्मी से बेमतलब लाड़ जताकर, डैडी से रेत के घर बनवाकर, भैया की साइकिल के पैडल घुमाकर दीदी की गुड़िया को भूत बनाकर, भरी दुपहरी में हर घर की घंटी बजाकर भाग जाएँ, बागों में छुप छुपकर आम चुराएँ और मधुर मिष्टी यादों को फिर से सहलाएँ। है न दोस्तों!

music 

बातें बचपन की हैं, यूँ ही ख़त्म करने का मन नहीं करता, पर.....क्या करें.....? समय की बाध्यता है! मेरी इन सब शैतानियों में आपकी वाली शैतानी कौन सी थी? अपने बचपन के किस्से कहानियाँ मुझे मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनिएगा ज़रूर… हो सकता है,मेरे बचपन की कहानी में आपके भी किस्से छिपे हों...! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ लिए....आपकी मीत....मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE  3

प्यार को प्यार ही रहने दो 13/02/2026 

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, एक किस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत । लीजिए हाज़िर हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और कुछ पुरानी यादें, उसी मखमली आवाज़ के साथ...आज हम बात करने जा रहे हैं, ‘प्रेम दिवस’ यानी ‘वैलेंस्टाइंस डे’ की। बस मनाने ही तो जा रहे हैं हम, प्रेम का यह दिवस, प्रेम का एक ही दिवस? खैर ‘वैलेंस्टाइंस डे’ के मौके पर बाज़ार गिफ़्ट्स, बहुत से सुर्ख गुलाबों और ग्रीटिंग कार्ड्स से अटे रहते हैं, बाज़ारीकरण, उदारवाद और ग्लोबलाइज़ेशन का सही रूप स्वरूप इन मौकों पर ही तो उजागर होता है। मैंने सोचा, चलो, बाज़ार की रौनक देखी जाए, कुछ अपने वैलंटाइन के लिए भी गिफ़्ट ले लिया जाए। बदलते दौर में उम्र या अवस्था थोड़े ही मायने रखती है? सो आर्चीज़ गैलरी पहुँची, वास्तव में गिफ्ट्स की सुंदरता, उन पर लिखे संदेशों ने मन मोह लिया। रंग  बिरंगे, बड़े ही क्रिएटिव गिफ्ट्स वहाँ दिखाई दिए। अभी गिफ्ट्स की सुंदरता को निहार ही रही थी कि एक लड़की की आवाज़ सुनाई दी, भैया, ये सारे कार्ड्स और गिफ़्ट्स पैक कर दीजिए अलग  अलग! उस लड़की के साथ एक और लड़की थी, जो उसके कानों में कुछ फुसफुसाई......दोनों ठहाका मार कर हँसने लगीं....!!!

मैं सोचने लगी.....कितने वैलंटाइन होंगे? ‘वैलनटाइंस डे’ क्या सचमुच ‘प्रेम दिवस’ को कहते हैं? क्या प्यार प्यार रह गया है? या व्यापार बन कर रह गया है? क्या फिर मौज मस्ती को प्यार का नाम दिया जा रहा है? प्यार तो एब्सट्रैक्ट होता है, सूक्ष्म होता है दोस्तों! प्रेम कोई भावना नहीं होती, प्रेम तो आपका अस्तित्व होता है। व्यक्त्तित्व बदलता है, शरीर, मन और व्यवहार बदलते रहते हैं, किंतु हर व्यक्त्तित्व से परे जो अपरिवर्तनशील है, जो कभी नहीं बदलता, वही प्रेम है, वही तो प्यार है! शायर की मानें, तो वह दिल को दुखाने के लिए ही सही, फिर से उसे छोड़ के जाने के लिए ही सही, अपने प्रेमी को पुकारता है, क्योंकि उसका मानना है कि प्रेम, मुहब्बत की होश वालों को ख़बर ही नहीं होती, वे तो जानते ही नहीं कि बे  ख़ुदी किसे कहते हैं, इसे तो केवल वही समझ सकता है, जिसने कभी इश्क़ किया हो, प्रेम का अनुभव किया हो।

MUSIC 

दोस्तों! प्यार, मुहब्बत या प्रेम एक एहसास है, जो दिमाग से नहीं दिल में रहता है। यह एक मज़बूत आकर्षण और निजी जुड़ाव है, जो सब कुछ भूलकर उसके साथ जाने को प्रेरित करता है, जिससे आप प्रेम करते हैं। सच्चा प्यार वह होता है, जो सभी हालातों में आप के साथ हो, यानी आपके दुख को अपना दुख और आप की खुशियों को अपनी खुशियाँ माने। कहते हैं कि अगर प्यार होता है, तो हमारी ज़िंदगी बदल जाती है। पर ज़िंदगी बदलती है या नहीं, यह इंसान पर निर्भर करता है। पर प्यार इंसान को ज़रूर बदल देता है। प्यार का मतलब सिर्फ़ यह नहीं है कि हम हमेशा उसके साथ रहे, प्यार तो एक  दूसरे से दूर रहने पर भी खत्म नहीं होता, दूर कितने भी हो, अहसास हमेशा पास होता है।

प्यार को अक्सर वासना के साथ जोड़कर देखा जाता है। भला ऐसा प्यार भी कैसा प्यार है, जिसमें केवल भौतिक देह का ही महत्व हो? भगवान कृष्ण और राधा के बीच भी तो प्रेम का रिश्ता था, पर यह शारीरिक नहीं था, बल्कि भक्ति का एक विशुद्ध रूप था, निःस्वार्थ प्रेम था, आत्मिक प्रेम था। प्रेम व्यक्ति के जीवन की पराकाष्ठा होती है, जो समर्पण भाव की अंतरिम घटना है, जबकि वासना व्यक्ति के खोखले जीवन में पूर्ति  पिपासा की तृप्ति की घटना है, जो आजकल के तथाकथित प्यार में निहित है। वासना के सतह पर उलझा मनुष्य प्रेम की नहीं, देह की माँग करता है। वासना से भरा पुरुष हमेशा स्त्री को पूज्या नहीं भोग्या ही समझता है। है न दोस्तों!

MUSIC

चलिए दोस्तों! अब बात करते हैं उस उदात्त प्रेम की..जिसके लिए अनेक फ़कीरों ने, भक्तों ने तड़प  तड़प के प्राण त्याग दिए....वे अपने रब को, अपने खुदा को मैदानों में, रेगिस्तानों में, पर्वतों पर, दरिया में ढूँढते  ढूँढते अपना जीवन ही गवाँ बैठे....पर वे दीवाने मर कर भी अमर हो गए...उनका नाम फ़िज़ाओं में घुल गया हमेशा के लिए...खुशबू बन कर बस गया फूलों में सदा के लिए…रंग बन कर समा गया है इंद्रधनुष के रंगों में......क्षितिज के उस पार से झाँक कर मुस्कराता है वह....साँसारिक प्रेम सागर के जैसा है, परंतु सागर की भी सीमा होती है। दिव्य प्रेम आकाश के जैसा है, जिसकी कोई सीमा नहीं होती। उस चांद को जानें, उसे समझें, जिसकी चाह में चातक पक्षी जान दिए रहता है......टकटकी बांधे....निःस्वार्थ भाव से...मगन होकर बस निहारता है|

 

MUSIC

 

दोस्तों! पिछले दिनों "विवाह" फिल्म देखी। वाह! क्या फिल्म है? यह एक पारिवारिक प्रेम कहानी है और एक पारंपरिक भारतीय विवाह के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती है, जिसमें कई महत्वपूर्ण संदेश छिपे हुए हैं। कहानी एक छोटे शहर की लड़की पूनम और प्रेम की है, जो एक बड़े उद्योगपति का बेटा है। दोनों के परिवारों की सहमति से उनका रिश्ता तय होता है। विवाह की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। विवाह से ठीक पहले, एक दुर्घटना में पूनम का चेहरा और हाथ बुरी तरह जल जाते हैं। परिवार और समाज के दबाव के बावजूद, प्रेम पूनम का साथ नहीं छोड़ता और अपने प्रेम और वचन को निभाने का फैसला करता है। प्रेम का यह निर्णय सच्चे प्रेम और समर्पण का प्रतीक बन जाता है, वह पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों को उच्चतम महत्व देता है, वह पूनम की आंतरिक सुंदरता से प्रेम करता है, न कि उसके बाहरी रूप से। आपने देखी है यह फिल्म? 

 

MUSIC

 

जी दोस्तों, हमने बात शुरू की थी "प्रेम  दिवस" से.... ‘वैलेंस्टाइंस डे’ से, पर सवाल वही है, प्रेम के लिए एक़ ही दिन क्यों? जैसे ही ऐसा सोचा, वैसे ही बादल का एक टुकड़ा चुपके से धरती को भिगो गया और मैं.... मैं मिट्टी में मिल कर महकने लगी। जिस पल कली फूल बन रही थी, कोई उसमें  रंग और खुशबू भर रहा था, उस पल मैं ही तो साँस ले रही थी, जब गुलाब धीरे धीरे सुर्ख हो रहे थे और दिल धड़कना सीख रहा था, उस पल से मैं साथ हूँ सबके, क्योंकि मैं ही तो प्रेम हूँ। इतनी बड़ी दुनिया में हज़ारों चेहरों के बीच कोई एक चेहरा जब हमें भाने लगे, जिसके ख्याल से हमारा दिल धड़कने लगे, जिसकी हर बात हमें हमसे जुदा करने लगे, जिसके लिए हमारे मन में अहसासों का कलश भरने लगे और ये अहसास आँखों के रास्ते छलकने लगें, आँसू गालों पे आ  आकर ढलकने लगें, कोई तस्वीर दिल में खिंचने लगे, जिसे हम जितना भुलाएँ और वो उतना ही करीब महसूस होने लगे, हवाओं में उसके होने की खुशबू आने लगे, आँखों में नमी रहने लगे, मन की दहलीज़ पे आहट होने लगे, होंठ चुप हो जाएँ, मगर आखें बोलने लगे, कोई सर्दी में धूप  सा और गर्मी में शाम  सा लगने लगे, बिन बरसात हम भीगने लगें   उस पल समझ लेना कि हमें किसी से मोहब्बत हो गई है।

 

है न दोस्तों!.....

 

MUSIC

 

कोई एक दिन नहीं होता प्यार का... ना एक साल... ना एक जनम...और तो और मौत पर भी यह कहानी ख़त्म नहीं होती। यह सदियों से है और सदियों तक रहेगा। हाँ... लेकिन जब हम इसे छू कर देखना चाहते हैं, अपनी मुठ्ठी में इसे कैद कर लेना चाहते हैं, तब यह चुपचाप उड़ जाता है, है न अजीब  सी शय, आज तक इसका रहस्य कोई नहीं जान पाया। लेकिन यह जानता है कि कौन  सा हिस्सा किस का है, कौन  सा टुकड़ा कहाँ जोड़ा जाएगा, किस बंद दरवाज़े पे दस्तक देनी है और किस मकान से चुपचाप निकल जाना है। ये सारी कायनात प्यार के दम से चलती है, किस को किसके लिए ज़मीं पे बुलाया गया है, इसके लिए देश, सीमा, काल, सरहदें, उम्र, कुछ भी मायने नहीं रखती। यह सागर को रेगिस्तान में बदल कर रेत के कणों में मुस्काता है, रेगिस्तानों में मरूद्यान खिलाता है...और....बदले में कुछ नहीं माँगता, यह रुकता नहीं कहीं...ठहरता भी नहीं कभी।

 

प्यार पत्तियों में हरापन बन कर, हमारी देह में लहू बन कर बहता है, इसे डालियों से तोड़े गए गुलाबों में, ग्रीटिंग कार्डों या मंहगे तोहफ़ों में मत खोजना, सिर्फ़ महसूस करना आँखें बंद करके। जिस पल कोई तुमसे से होकर गुज़रने लगे, तुम उसे सोचो और वो झट से पास आ बैठे, चाहे ख्यालों में ही सही, उसका ना होना भी होना लगे, भरी दुनिया में कोई तुम्हें तनहा करने लगे, उस पल समझ लेना, तुम्हें मोहब्बत हो गई है, प्यार हो गया है। फिर प्यार तो प्यार है, इसे हम कोई नाम दें, ऐसा ज़रूरी तो नहीं….. यह तो प्यार है, बस प्यार है...बस प्यार है....!! यही तो शाश्वत है, यही तो चिरस्थाई है, है न दोस्तों!

 

MUSIC

 

ये प्यार की बातें हैं दोस्तों! यूँ ही ख़त्म करने का मन नहीं करता, पर.....हाँ, आपके प्यार के किस्से सुनाने हैं मुझे! अपने प्रेम की कहानी  मैसेज बॉक्स में लिखाकर भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

 

सुनिएगा ज़रूर… हो सकता है, मेरे प्यार की कहानी में आपके भी किस्से छिपे हों.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

 

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से  कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

 

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE  4

दोइ नैना मत खाइयो 27/02/2026

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से  कहानियां सुनाने वाली आपकी मीत|जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...| जी हाँ दोस्तों, आज मैं बात करूंगी कुछ रूहानी, प्रेम की उस पराकाष्ठा की जहाँ विरहिणी कह उठती है 

कागा सब तन खाइयो मेरा चुन चुन खाइयो माँस,

दो नैना मत खाइयो मोहे पिया मिलन की आस…।

MUSIC

दोस्तों! आखिर क्या अर्थ है, क्या मायने हैं बाबा फ़रीद की इन पंक्तियों के, जिन्हें मैं बचपन से सुनती आई हूँ, पहले इनका अर्थ समझ ही नहीं आता था। कागा यानी ‘कौए’ से कोई ऐसा क्यों कहेगा?
कि चाहे मेरे तन को तुम नष्ट कर दो, पर मेरी दो आँखों को नष्ट मत करना, क्योकि उनमें पिया से मिलने की आस भरी हुई है| जैसे  जैसे ज़िंदगी बहती गई और रंग दिखाती गई, इन पंक्तियों के अर्थ समझ आने लगे। एक दिन ध्यान में बैठे बाबा फ़रीद को एक गहन अनुभूति हुई और वे कह उठे   कि पिया की राह तकते  तकते वियोगी स्त्री वृद्धा हो गई है, अब मौत की कगार पर खड़ी है और उस मुक़ाम पर वह कहती है कि ‘अरे कागा! अरे कौवे! इस शरीर की मुझे बहुत परवाह नहीं। अब मर तो मैं जाऊँगी ही; तुझे जहाँ  जहाँ से माँस नोचना होगा, नोच लेना, चुग  चुग कर खा लेना, पर.. पर आँखें छोड़ देना मेरी। नैनों पर चोंच मत मारना।’ क्यों? क्योंकि इनमें पिया मिलन की प्यास है, पिया मिलन की आस है, पिया मिलन का विश्वास है।
समझे न दोस्तों?
MUSIC
दोस्तों! हमारी पूरी हस्ती में, देह में, सिर्फ़ वह अंग सबसे महत्वपूर्ण है, जो प्रियतम से जुड़ा है, जिसमें प्रियतम बसे हुए हैं, बाक़ी सब निरर्थक है। बाक़ी सब चाहे नष्ट हो जाए, कोई बात नहीं, पर जो कुछ ऐसा है, जो जुड़ गया प्रीतम से, वो नष्ट नहीं होना चाहिए।
कई बार सोचती हूँ दोस्तों! बहुत कुछ हैं हम, और बहुत सी दिशाओं में भागते रहते हैं हम। हमारे सारे उपक्रमों में, हमारी सारी दिशाओं में, सिर्फ़ वो काम और वो दिशा क़ीमती है, जो उस पिया की ओर जाती है। चौबीस घंटे का दिन हैं न? बहुत कुछ किया दिन भर? वो सब कचरा था। उसमें से क़ीमती क्या था? बस वो, जिसकी दिशा प्रीतम की ओर जाती हो। और संत वो, जिसकी धड़कन भी आँख बन जाए, जो नख  शिख नैन हो जाए, जिसका रोंया  रोंया, जिसकी हर कोशिका सिर्फ़ प्रीतम की ओर देख रही हो, वो साँस ले रहा हो, तो किसके लिए? जी हाँ दोस्तों! उसी प्रीतम के लिए।
कभी  कभी सोचती हूँ दोस्तों! कि क्या कागा का मतलब दुनिया के वे तमाम रिश्ते, जो स्वार्थ, ज़रुरत, ईर्ष्या और ठगी पर टिके हैं, जो सदैव आपसे कुछ ना कुछ लेने की बाट जोहते हैं, कभी बहिन बनकर, कभी भाई बनकर, कभी पति, कभी पत्नी, कभी दोस्त या कभी संतान बनकर हमें ठगते हैं, क्या उनके मुखौटों के पीछे एक कागा ही होता है, जो अपनी नुकीली चोंच से हमारे वजूद को, हमारे अस्तित्व को, हमारे व्यक्तित्व को, हमारे स्व को, हमारे निज को खाता रहता है? हम लाख छुड़ाना चाहें खुद को, वो हमें नहीं छोड़ता। वो हमारी देह को, हमारे तन को खाता रहता है, चुन  चुन कर माँस का भक्षण करता रहता है। वो कई बार अलग  अलग नामों से, अलग  अलग रूपों में हमसे जुड़ता है और धीरे  धीरे हमें खत्म किए जाता है। ये तो हुआ कागा पर......हम कौन हैं?
क्या सिर्फ़ देह?
सिर्फ़ भोगने की वस्तु?
किसी की ज़रूरत का डिमाँड ड्राफ्ट?
और पिया कौन है?
क्या पिया वो परमात्मा है, जिससे मिलने की चाह में हम ज़िंदा हैं? बताइए न दोस्तों!
MUSIC
कागा के द्वारा संपूर्ण रूप से तन को खाए जाने का भी हमें ग़म नहीं, बल्कि हम तो निवेदन करते हैं कि “दो नैना मत खाइयो, मोहे पिया मिलन की आस”      तो कौन है ये पिया? यक़ीनन वो परमात्मा ही होगा, जिसकी तलाश में ये दो नैना टकटकी लगाए हैं कि बस अब बहुत हुआ, अब आ भी जाओ और सांसों के बंधन से देह को मुक्त कर दो। कितना दर्द..... कितना गहरा अर्थ है इन पंक्तियों में.....और कागा क्या करता है?
वो अपना काम बखूबी करता है। अपनी ज़रूरत, अपने अवसर और अपने सुख के लिए वो माँ स का भक्षण किए जाता है…किए जाता है। उसे विरहिणी की आँखों में, या मन में झाँकने की फुर्सत ही नहीं है। वो तो देह का सौदागर है न...और सौदागरों ने हमेशा अपने लाभ देखे हैं, अपने स्वार्थ ही साधे हैं,किसी की आँखों में बहते दर्द, वे तो उन्हें दिखते ही नहीं....और ना ही दिखती है पराई पीर । इसीलिए वो विरहिणी कह उठी होगी कि “कागा सब तन खाइयो...”
MUSIC
इसी लिए कहती हूँ दोस्तों! अगर हमारा हाथ उठ रहा है, तो किसके लिए? दिल धड़क रहा है, तो किसके लिए? आहार ले रहे हैं, तो किसके लिए? गति भी कर रहे हैं, तो किसके लिए? उस पिया के लिए न...और पिया...पिया, तो कहीं ओट में छिपा बैठा है...कहीं दूर...झील के उस पार...उस पार है पिया.....दूर झील के उस पार है पिया....पिया जो बुलाता तो है उस पार से,पर दिखता नहीं...दिखता नहीं, तो क्या हुआ...यकीनन वह है, है और विरहिणी की पीड़ा से वाकिफ़ भी है, तभी तो बसा है नैनों में, याद है न मीरा क्या कहती थीं, बसो मेरे नैनन में नंदलाल...|
जी हाँ दोस्तों! जिएँ तो ऐसे जिएँ, कि हर आस, हर प्यास , बस उसके दर पर जाकर ठहर जाए। वरना तो, समय काटने के बहाने और तरीक़े हज़ारों हैं दुनिया में।
आँखें बचाने लायक सिर्फ़ तब है, जब हम ‘उसको’ तलाशें। हमारी आँखों की छवि में उसका तस्सवुर, उसका नूर हो| इसलिए दोस्तों! यह समझना होगा कि शरीर तो नश्वर है और यह नष्ट हो जाएगा, लेकिन आत्मा और उसकी ईश्वर से मिलने की आकांक्षा अमर है। शरीर चाहे नष्ट हो जाए, लेकिन आत्मा की परमात्मा से मिलने की इच्छा हमेशा जीवित रहती है। यह एक विशेष निवेदन है कि "दोइ नैना मत खाइयो" यानी मेरे दोनों नेत्रों को मत खाना, क्योंकि इन नेत्रों में मेरे प्रिय से मिलने की आस बसी हुई है, परमात्मा से मिलने की अभिलाषा बसी हुई है, जो मेरे जीवन का अंतिम लक्ष्य है। है न दोस्तों!
MUSIC
बातों के सिलसिले को यूँ ही ख़त्म करने का मन नहीं करता दोस्तों, पर.....क्या करें.....? पिया तो अपरंपार है, उसकी बातें भी अपरंपार हैं, अपने पिया के किस्से  कहानियाँ मुझे मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!
सुनिएगा ज़रूर… हो सकता है,बाबा फ़रीद की विरहिणी की कहानी में आपके भी किस्से छिपे हों.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...
नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से  कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...
END MUSIC


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EPISODE-5

गंगा तेरा पानी अमृत 13/03/2026
INTRO MUSIC
नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से- कहानियां सुनाने वाली आपकी मीत| जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...| जी हाँ दोस्तों, आज मैं बात करूंगी उस अमृत-धारा की, उस पीयूष-स्रोत की, जिसने न केवल भारत के वक्षस्थल पर सभ्यता और संस्कृति के फूल खिलाए, बल्कि समस्त मानवता में सद्गुणों का आह्वान किया| जी हाँ, मैं बात कर रही हूँ, भागीरथी की, मंदाकिनी की, माँ गंगा की....
MUSIC
हुआ यूँ,पिछले दिनों ऋषिकेश जाना हुआ| गंगा के जल की कल-कल ध्वनि में जैसे कोई राग बहता है| हर लहर में जैसे कोई मंत्र छुपा रहता है, हर घाट पर ध्यान-सा लगा रहता है, नीले आकाश की छाँव तले हरियाली की चादर ओढ़े पर्वत गौरवशाली लगते हैं, जहाँ हवा भी जपती है नाम और सूरज भी करता है आरती हरदम| लक्ष्मण झूले की डोर में बंधा प्राचीनता और आधुनिकता का संगम, संतों की वाणी, योगियों की साधना, यह सब हर मोड़ पर मिलते हैं| लगता है जैसे आत्माओं का समागम हो रहा हो,संगम हो रहा हो| ऋषिकेश की सुंदरता केवल दृश्य नहीं है, एक अद्भुत व अविस्मरणीय अनुभव है|
इसी खुमारी में सारा दिन बीत गया, और फिर आई रात| ऐसा लगा कि कुछ अजीब-सी आवाज़ें सुनाई दे रही हैं| ऐसा लगा जैसे दो लोग आपस में बातें कर रहे हैं| ध्यान से सुना, तो पता चला कि ये आवाज़ें गंगा-तट से आ रही थीं| पास जाकर सुना, तो दोस्तों! ये तो गंगा जी के दो किनारे थे, जो आपस में बतिया रहे थे| फिर क्या था..मैं ध्यान से सुनने लगी|
MUSIC
एक किनारा बड़ी ही बेबाकी से बोला, हे मित्र! गंगा के किनारे बने-बने मैं तो उकता गया हूँ | ये चंचल लहरें दिन-भर मुझे परेशान करती हैं| मैं शांति से यहाँ रहना चाहता हूँ , ये मुझे अशांत करती रहती हैं| बिना पूछे छूती रहती हैं| मैं नहीं चाहता, फिर भी ये भिगो देती हैं| दिन हो या रात, यूँ ही कितना शोर किया करती हैं, मानो इन्होंने कसम खा रखी हो कि सदियों तक ये मेरा पीछा नहीं छोड़ेंगी | अपने साथी की बात सुनकर दूसरा किनारा मुस्करा दिया और हँस कर जवाब देने लगा, हे मित्र! तुम कुछ ज्यादा ही सोचते हो| हम पत्थर के किनारे हैं, जड़ हैं, हमारे पास कुछ भी ऐसा नहीं है, जो हमारे जीवन में खुशियां लाए| हमें तो इन लहरों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि ये रोज़ हमसे मिलने चली आती हैं, सोचो, मिलने तो आती हैं, वरना हम यूँ ही अकेले-अकेले सूखे-सूखे से रह जाते| लहरें हैं, तभी तो हमारा जीवन गतिमान है| दूसरे किनारे ने फिर बात संभाली और कहा, मत भूलो भाई, हमारा अस्तित्व गंगा की इन्हीं लहरों की वजह से है| किनारे कितनी भी टूटे-फूटे हों, लहरें फिर भी उनसे प्रेम करती हैं और गंगा के तट पर आने वाले कभी भी किनारों के खुरदुरेपन को नहीं देखते| वे प्रेम से हमारे समीप बैठते हैं, प्रतीक्षा करते हैं,किसकी? जी हाँ, लहरों की|
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उन किनारों को कभी देखा है मित्र, जिनके पास लहरें नहीं आतीं| उन उदास किनारों के पास कोई नहीं जाता.. ना रात को कोई दीपक जलाने जाता है, ना सुबह को सिर झुकाने| वे सब सदियों से लहरों की प्रतीक्षा में हैं, पर लहरों का सान्निध्य उन्हें नहीं मिलता| दूर-दूर तक सिर्फ़ सन्नाटा है, ना कोई जीव,ना कोई जीवन..तुम तो यूँ ही उदास रहते हो|
पहला किनारा कहाँ कम था अपनी बात रखने में, कहने लगा, तुम मानो या ना मानो मित्र, यह गंगा ज़रूर स्वर्ग से भी इसी चंचलता की वजह से निष्कासित की गई होगी| यहाँ धरती पर आकर भी यह चैन नहीं लेने देती हमें| आखिर क्यों बहती है गंगा?
दूसरे किनारे ने फिर अपनी बात रखी, हो सकता है मित्र, तुम सही हो, लेकिन यह भी हो सकता है कि गंगा लोगों को तृप्त करने के लिए बहती हो, लोगों की अशुद्धियां और कलंक खुद में समेटना इसे रुचिकर लगता हो, सभी को अपने प्रेम का अमृत देना चाहती हो, यह भी वजह हो सकती है ना.. !
तभी एक सुरीली सी आवाज़ सुनाई दी, आवाज़ थी या कोकिला का स्वर, अरे जड़ किनारों! बहुत देर से मैं तुम लोगों की बातें सुन रही हूँ, मैं गंगा हूँ, गंगा माँ| गंगा सदियों से बहती आई है| स्वर्ग में भी शिव के शीश पर थी और इस धरती पर भी मुझे हमेशा सम्मान से स्वीकारा गया| मुझे मान और अपमान का कतई भय नहीं है| किसी को देने या किसी से कुछ पाने की भी मेरी कोई चाह नहीं है| मेरा कोई स्वार्थ नहीं है, मैं पवित्र, निश्छल, निःशब्द बहती रही हूँ , और बहती रहूँगी| मुझे छूकर लोग सौगंध दिखाएँ, दिए जलाएँ या अपनी अशुद्धियां मुझ में छोड़ जाएँ, मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता| मानो तो मैं गंगा माँ हूँ, ना मानो तो बहता पानी| हे किनारों, तुमसे टकरा-टकराकर मेरी लहरें बिखर-बिखर जाती हैं| तुम उनसे कुछ सीखो, जब तक तुम अपने झूठे अहम से अकड़े रहोगे, तब तक जड़ ही बने रहोगे| तुम्हारे कांधों पर मेरी लहरों ने कुछ पल यदि विश्राम कर लिया, तो तुममें गुरूर आ गया, मेरे बहने पर ही सवाल उठाने लगे, मेरे बहने की गति पर ही प्रश्न करने लगे| यही तो दुर्भाग्य है नदी और नारी, दोनों का, दोनों का खूब दोहन, खूब शोषण किया जाता है| यदि कोई नदी या नारी चुपचाप बहती चलती है, तो उसकी इस खामोशी पर भी संदेह किए जाते हैं और जो वह वाचाल हो जाए, तो फिर कहना ही क्या? वह सदियों से आरोपी बनाई जाती रही है| सदियों से दूसरों के लिए बहना, सहना और फिर भी प्रेम करते जाना, यह हम ही कर सकती हैं, एक नारी कर सकती है, या मैं कर सकती हूँ क्योंकि मैं गंगा हूँ | पर तुम सोचो कि तुम कर लोगे यह सब? तो यह तुमसे ना हो पाएगा|
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क्यों ना हो पाएगा? क्योंकि तुम पत्थर हो, तुम में कोई संवेदन नहीं, संवेदना नहीं, स्पंदन नहीं, देखना, जब तुम टूटोगे एक दिन, कयामत के उस दिन, मेरे प्रेम से भी तुम नहीं पिघल पाओगे, मेरे साथ नहीं बच पाओगे, पर मैं तुम्हारे लिए ठहरूंगी नहीं ,आगे चल दूंगी क्योंकि चलने का नाम ही जीवन है| साहस है यदि तो, तुम मुझ में डूब जाओ, पिघल जाओ, तरल बन जाओ| तुम सोच रहे होंगे, कि ऐसा क्यों कह रही हूँ तुमसे, क्योंकि मैं तरल हूँ, तभी मैं प्रेम कर पाती हूँ| तुम जड़ हो, इसलिए मुझ तक कभी नहीं पहुँच पाए| तुमने जीवन में झूमना, झुकना और लहराना तो सीखा ही नहीं| इसीलिए मुझे ही आना पड़ता है तुम तक, तुम तो कभी नहीं आए मेरे पास| आज तुम्हारी बातों से मेरा मन व्यथित हुआ है|
हे जड़ किनारों, तुम यूँ ही पत्थर बनकर तरसते रहो, सदियों तक कोई लहर तुम्हें अपना ना समझे, तुम्हें छुए और दूर चली जाए और तुम..तुम उसे आवाज़ भी ना दे सको| मैं गंगा हूँ, मैं असीम से आई हूँ, एक दिन उसी असीम में ही मिल जाऊंगी मैं| मैं अपनी अनंत यात्रा पर हूँ, समझे, अब कभी ना कहना कि गंगा बहती क्यों है? और मेरी एक सलाह भी है तुम्हें, क्यों ना तुम भी तरल बन जाओ? क्यों ना तुम भी बहना सीखो? क्यों ना तुम भी संवेदनशील हो जाओ? क्यों न तुम भी प्रेममय हो जाओ, बहो ना मेरे साथ, बहो न.. !
MUSIC
दोस्तों! माँ गंगा के प्रति हम सभी की भावनाएं जुड़ी हैं, इसीलिए बहुत से अनुभव, किस्से-कहानियाँ भी होंगे| मुझे मैसेज बॉक्स में अपनी भावनाएं लिखकर प्रेषित कीजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....मेरे अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!
सुनते रहिए, हो सकता है, जाह्नवी की कहानी में आपके भी किस्से छिपे हों.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...
नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से-कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

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*************************************************************EPISODE  6

जा, जी ले अपनी ज़िंदगी 27/03/2026

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नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, एक किस्से  कहानियां सुनाने वाली आपकी मीत । लीजिए हाज़िर हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और कुछ पुरानी यादें, उसी मखमली आवाज़ के साथ...आज हम बात करने जा रहे हैं सिमरन की..और सिमरन की ज़िंदगी की.. सिमरन के रिश्तों की..आपको सिमरन तो याद है ना.. दोस्तों..

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      कल टीवी के चैनल बदलते हुए एक डायलॉग कानों में पड़ा, ‘जा सिमरन जा, जी ले अपनी ज़िंदगी’…..मैं सोचने लगी कि कहने को तो ये एक फिल्मी डायलॉग है, पर असल में गहरा अर्थ छिपा है इसमें....वैसे सोचा जाए तो हम में से कितने लोग अपनी ज़िंदगी जी पाते हैं?....कुछ लोग कहते हैं कि वे तो बस काट रहे हैं....कुछ कहते हैं कि बस कट रही है ज़िंदगी....बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जो अपने भीतर झाँकते हैं और ज़िंदगी जीने की कोशिश करते हैं यानी अपने सपनों को परवाज़ देते हैं ..

"जा सिमरन जा, जी ले अपनी ज़िंदगी" का आखिर अर्थ क्या है? भाव क्या है? मुझे तो यही समझ आता है कि किसी व्यक्ति को उसकी ज़िंदगी उसकी अपनी शर्तों पर जीने की आज़ादी। जीवन को अपनी मर्जी से जीना चाहिए और अपने सपनों को पूरा करने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहिए। यह डायलॉग स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय का प्रतीक है। इस वाक्य में सिमरन के पिता उसे स्वतंत्रता और अपनी इच्छाओं के अनुरूप जीवन जीने की अनुमति दे रहे हैं। यह एक महत्वपूर्ण और भावनात्मक क्षण है, जहाँ एक पिता अपनी बेटी को उसकी खुशियों और सपनों की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, भले ही इसका मतलब हो कि इसके लिए उसे अपनी परंपराओं से परे जाना होगा । यह संवाद आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी है। इसका अर्थ यह भी है कि खुद को पहचानो। समाज की सड़ी  गली मान्यताओं को तोड़ अपने लिए अपनी पसंद के रास्ते चुनो। जो जीर्ण  शीर्ण हो गया हो, उस प्रासाद को तो ध्वस्त होना ही होगा, नहीं तो नवनिर्माण के नए अंकुर कैसे खिलेंगे?, है न दोस्तों! बेबी स्टेप्स ही सही, स्टेप्स तो लेने होंगे न । कोई भी प्राणी हो, सब उन्मुक्तता चाहते हैं, कोई बंधन नहीं चाहता, चाहे वे सोने के ही बंधंन क्यों न हों? हम इस धरती पर आए हैं किसी निमित्त के साथ....उस निमित्त को पूरा करने के लिए जीना ज़रूरी है, और केवल जीना ही नहीं, आनंद के साथ जीना, खुद को और दूसरों को प्रेरित करना, जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना, छोटी  छोटी खुशियों का महत्व समझना। है न दोस्तों!

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पिछले दिनों एक मित्र का संदेश मिला, जिसमें उन्होंने अपनी एक समस्या साझा की थी। मित्र की समस्या को जानकर मुझे लगा कि ना जाने कितने लोग इस तरह की समस्या से गुज़र रहे होंगे और ज़िंदगी को निराशा में डुबा चुके होंगे। उन्होंने अपनी  ज़िंदगी के सुंदर सपनों के बारे में लिखा था, पर यह भी लिखा था कि जिसके साथ ये सपने देखे थे, वो अब उनकी ज़िंदगी से दूर चली गई है, कभी वापस न आने के लिए। ज़िंदगी में बहुत कुछ ऐसा घटता है, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती है। लोग मिलते है, अलग हो जाते हैं, बिछड़ जाते हैं, पुराने साथी छूटते हैं, सदा  सदा के लिए.. लेकिन कुछ समय बाद नए मिल जाते हैं, ज़िंदगी यूँ ही चलती रहती है। यह सामान्य  सी बात है, लेकिन असामान्य बात यह हुई कि मेरे मित्र अभी तक उस रिश्ते से खुद को अलग नहीं कर पा रहे हैं। जो चला गया, उसकी याद में ज़िंदगी तबाह करना और अब उसकी ख़ुशी के लिए हर वो काम करना, जो वो चाहता था। उसके सिवा किसी और को मन में न बसाना क्योंकि प्रेम तो एक बार ही होता है आदि आदि... हज़ारों बातें... अक्सर ऐसी बातें हमें अपने आसपास सुनने को मिल ही जाती हैं और ऐसे लोग भी दिख जाते हैं, जिन्होंने किसी व्यक्ति विशेष के कारण अपनी ज़िंदगी को बरबाद कर लिया हो। प्रेम जिससे था, वो मिला नहीं, तो विवाह ही नहीं किया या समाज के दबाव में आकर, कर भी लिया, तो ज़िंदगी भर अतीत से चिपके रहे और वर्तमान को दरकिनार कर दिया। सुनने में, पढ़ने में ये बातें साधारण लगती हैं, लेकिन बिलकुल भी साधारण नहीं हैं। कितने लोग हैं, जो अपने साथी के बिछड़ने के गम में या तो खुद को चोट पहुँचाते हैं या अपने साथी को चोट पहुँचाते हैं या फिर नशे के अंधेरों में खो जाते हैं। ऐसी असामान्यता पढ़े  लिखे मेच्योर लोग में भी दिखती है। अरे भई, आप बंदरिया की तरह मरे हुए बच्चे से क्यों चिपके हुए हैं? मरे हुए बच्चे यानी मरे हुए रिश्ते.... वे संबंध जिनका आपके जीवन में अब कोई अस्तित्व ही नहीं है।

दोस्तों! यहाँ एक बात और जोड़ना चाहती हूँ कि अक्सर महिलाओं को अति भावुक और अति संवेदनशील समझा जाता है तथा दलीलें दी जाती हैं कि प्रेम और रिश्तों के मामलों में महिलाएँ ज़्यादा सच्चाई के साथ जुड़ती हैं या कि महिलाएँ शिद्दत से प्रेम करती हैं और पुरुष प्रेम को यूँ ही हलके तौर पर लेता है। लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि पुरुष जब किसी के साथ खुद को जोड़ते हैं, तो वे आसानी से अपने साथी को भुला नहीं पाते, वे शिद्दत से उससे जुड़े ही रहते हैं। महिलाएँ जहाँ विवाह के बाद अपनी नई दुनिया में रम जाती हैं, वहीं पुरुष ज़िंदगी भर अपने दिल पे बोझ लिए घूमते रहते हैं। एक और फिल्म की बात करते हैं, ‘वो सात दिन’। कुछ याद आया दोस्तों?

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अब सवाल यह है कि क्या सच में प्रेम इतनी बड़ी चीज़ है कि आप खुद को मिटा दें? या जिसे प्रेम करते हैं, उसे ही मिटा दे? या फिर अपनी पूरी ज़िंदगी को ही तबाह कर डालें? या फिर उसकी ज़िंदगी को ही तबाह कर डालें? क्या खुदा ने, ईश्वर ने प्रेम इसीलिए बनाया है?

प्रेम तो एक प्रबल सकारात्मक संवेग है, जो एक बार अपने लक्ष्य को तय कर लेता है, तो दूसरे सभी लक्ष्य गौण हो जाते हैं। मनुष्य अपने उस लक्ष्य को ज़िंदगी की ज़रूरत और हितों का केंद्र बना लेता है। जैसे देश से प्रेम करना, माँ का बच्चों के प्रति स्नेह, संगीत या किसी कला के प्रति प्रेम आदि  आदि। कुछ लोग अपने प्रिय पात्र के अलावा किसी और से प्रेम नहीं कर पाते। कोई व्यक्ति  विशेष उनके लिए सबसे अहम हो जाता है, अपने प्रिय पात्र को हासिल करने के अलावा उनके जीवन का कोई लक्ष्य रहता ही नहीं। इस राह में जो भी बाधाएँ आती हैं, उन्हें वो हटा देना चाहते हैं, चाहे समाज के नियम हों या परिवार की मर्यादा। आए दिन होने वाले विवाहेतर संबंधों, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के मूल में भी यही मंशा काम करती है। परिणाम चाहे जो भी हो, लेकिन प्रेम के नाम पर ये अपराध बखूबी हो रहे हैं। है न दोस्तों!

आप जहाँ है, जिसके साथ है, उसे ही प्रेम कीजिए। यह नहीं हो सकता, तो खुद से प्रेम कीजिए। याद रखिए, प्रेम एक गहरी समझ है, एक घटना है, जो किसी भी क्षण आपकी ज़िंदगी में घट सकती है। आपके रोकने से या तर्कों से वो रुकने वाली नहीं है। वो झरने के वेग की भांति निर्बाध गति से बहती है।  हम अपने ज़िंदगी में कई बार, कई तरह का और बार  बार प्रेम करते हैं क्योंकि प्रेम हमारी ज़रूरत है, हमारे अस्तित्व की पहचान है, वह ज़मीन है, जिस पर हम पैर जमा कर खड़े होते हैं, यह हमारा विश्वास भी है, उम्मीद भी है और सपना भी।

MUSIC 

दोस्तों! हम ना तो समाज के बिना और ना ही प्रेम के बिना जीवित रह सकते हैं। जो लोग प्रेम की पवित्र भावना और समाज के बीच संतुलन बना लेते हैं, जो प्रेम को व्यापकता देते हैं, प्रेम के सही अर्थों को खोजने की कोशिश करते हैं, इसे एक व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी के रूप में लेते हैं, वे अंतर्द्वंद्वों और कुंठाओं से भी जूझ लेते हैं और अपनी व्यक्तिगत ज़रूरतों और सामाजिक सरोकारों के बीच तारतम्यता बिठा ही लेते हैं। दरअसल, सुगंध भी तो संतुलन में ही है। है न..| प्रेम को व्यापक किया जाए, मन की खिड़कियों को ज़रा खोल दिया जाए, संशय, भय, शंकाओं के परदे को हटाया जाए, जो इस पल है, उसे याद रखें, जो जा रहा है, उसे जाने दें। जो दरवाज़े पर है, उसका स्वागत करें। यह ज़िंदगी आपकी और सिर्फ़ आपकी है, और आपको अधिकार है जीने का, खुश रहने का, मुस्काने का। किसी की इतनी बिसात नहीं कि वो आपकी खुशियाँ, आपके सपने, आपकी हँसी, आपकी मुस्कान आपसे छीन सके? आप जहाँ है, ज़िंदगी वहीं है...खुशियाँ भी वहीं हैं। आप खुश रही, आप खुश होइए क्योंकि आप खुश होने के लिए ही बने हैं। आप प्रेम कीजिए क्योंकि आप प्रेम के लिए ही बने हैं। आप मुस्काइए क्योंकि आप मुस्काते हुए बहुत अच्छे लगते हैं। ज़िंदगी के हर पल को जी लीजिए, हँस लीजिए। ये सारा आसमान आपका है, क्यों न क्षितिज के उस पार घूम आइए। किसी से भी मिलिए, उससे प्यार कीजिए, खुद से प्यार कीजिए... अपने काम से भी... अपने नाम से भी... बस ज़रा  सा ही सही पर... जा सिमरन जा, जी ले अपनी ज़िंदगी.. सिर्फ़ सिमरन ही क्यों, आप  हम सभी..आइए, जी लें अपनी ज़िंदगी.. 

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मेरी ये बातें यहाँ खत्म नहीं होंगी, हों भी कैसे?आपका अधिकार है खुश होना, मुँह क्यों लटकाया है भई, एक बार मुस्करा कर इधर तो देखिए.. देखेंगे न ! सुनिएगा ज़रूर… हो सकता है, सिमरन की इस कहानी में आपकी भी कहानी छुपी हो! अपनी कहानी को मेरे साथ साझा कीजिए.. मैसेज बॉक्स में अपनी कहानी लिखिए.. मुस्कराइए.. और मुस्करा कर मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों....वही प्रीत...वही किस्से  कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC  

 

*************************************************************EPISODE  7

यूँ ही कोई दिल लुभाता नहीं 10/04/2026

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नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से  कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज मैं बात करूंगी किसी ऐसे चेहरे की, किसी ऐसी शख्सियत की, जिसकी सुंदरता को हमारा मन खोज ही लेता है, और हम कह पाते हैं कि यूँ ही नहीं दिल लुभाता कोई..

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 दोस्तों, बात किस्से  कहानियों की हो रही है, तो चलिए, आज एक सुप्रसिद्ध कहानी की बात करते हैं.. क्या आपने महान कहानीकार चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी की कहानी ‘उसने कहा था’ पढ़ी है? चलिए, मैं बताती हूँ, इस मार्मिक कहानी के बारे में, जिसकी मूल संवेदना यह है कि संसार में कुछ ऐसे निःस्वार्थी लोग होते हैं, जो किसी के कहे को पूरा करने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे देते हैं क्योंकि वह उन्हें अपनी जान से बढ़कर, प्राण से बढ़कर लगता है और क्योंकि.. क्योंकि, उसने कहा था..। कहानी लहना सिंह की है, जो अपने प्राण देकर बोधा सिंह और हजारा सिंह के प्राणों की रक्षा करता है, केवल इसलिए कि लहना सिंह सूबेदारनी के ब्रह्म मंत्र, ‘उसने कहा था’ को याद रखता है।‘रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन न जाई’,कुछ ऐसा ही उद्घोष है इस कहानी का। लहना सिंह हमारे हृदय पटल पर हमेशा के लिए अंकित हो जाता है। वह प्रेम, त्याग, बलिदान, विनोद  वृत्ति, बुद्धिमत्ता और सतर्कता आदि विविध गुणों का स्वामी है। ‘अपने लिए तो सभी जीते हैं, लेकिन जो दूसरों के लिए मरते हैं, ऐसे व्यक्ति विरले ही होते हैं, लेकिन होते अवश्य हैं।' 

ऐसा कोई कैसे सोच सकता है भला? ऐसा कोई तभी सोच सकता है, जब उसे महसूस हो कि दूसरे व्यक्ति से उसका जन्म  जन्मांतर का प्रगाढ़ रिश्ता है, कुछ जाना  सा, कुछ अनजाना  सा..जी हाँ दोस्तों! वैसे भी यूँ ही तो कोई दिल लुभाता नहीं|

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अक्सर लोगों को कहते सुना है कि फलां  फलां व्यक्ति से उनका कोई पुराना रिश्ता है, पुराना नाता है, पिछले जन्म का, या जन्म  जन्मांतर का , वरना कोई यूँ ही कैसे दिल को लुभाने लगता है। चंद हसीन मुलाकातों में रिश्ता इतना गहरा हो गया कि लगने लगा जैसे सदियों से एक  दूसरे को जानते हों। 

पिछले दिनों मेरे एक मित्र ने बताया कि उनकी ज़िंदगी में एक नया  नया रिश्ता बना है, लेकिन ऐसा लगता है कि जैसे सदियों से वे एक  दूजे को जानते हों। पहली मुलाक़ात में रूह का नाता हो गया आपस में... क्या यह संभव है? लोग तर्क देते हैं कि इतनी बड़ी दुनिया में कोई एक चेहरा ही हमें क्यों लुभाता है? ज़रुर उससे हमारा कोई पुराना नाता है। वरना कोई एक ही खास क्यों लगता? क्या है उस चेहरे में कुछ ऐसा है, जो किसी और में नहीं दिखता। कोई किसी की मुस्कान को अतुलनीय मुस्कान कहता है, कोई किसी के अंदाज़ पर फ़िदा है, कोई किसी की आँखों की गहराई में खो गया है, तो कोई किसी के गोरे रंग या सुंदर देह का दीवाना हो गया है, किसी को किसी की हँसी में सिक्कों की खनखनाहट सुनाई देती है, कोई किसी की आवाज़ में गुनगुनाहट सुनता है, तो कोई किसी की खुशबू में मदहोश हुआ जाता है... इस ख़ास किस्म की पसंद के पीछे आखिर है क्या? यानी किसी को कोई क्यों लुभाता है? और क्या यह आकर्षण रूह का संबंध या कोई रहस्य, या कोई जादू या कोई अदृश्य प्रेरणा है, कौन जाने?

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जी हाँ दोस्तों, यह भी सच है कि हम कुछ ख़ास आवाज़ों, खास चेहरों और खास रंगों के प्रति आकर्षित होते हैं। लेकिन फिर वही बात कि सौ सुंदर व्यक्तियों के बीच कोई एक ही प्रेमपात्र क्यों बन जाता है? क्यों दुनिया की भीड़ में कोई एक चेहरा ही हमें लुभाता है?  क्या कारण, क्या वजह हो सकती है, यानी सौ व्यक्तियों को अपने सामने खड़ा करके किसी एक का चुनाव किया जाए, तो सवाल उठता है कि वही क्यों?

इस के पीछे आखिर क्या रहस्य है? चलिए चर्चा करते हैं..

इस के पीछे चुनने वाले के सौंदर्यबोध के अपने मानदंड और अंतर्संबंधों के बारे में उसकी मान्यताएँ जाने  अनजाने महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सुंदरता के अपने  अपने मानदंड बन जाते हैं और वह व्यक्ति उन्हीं से मिलते जुलते रूप को पसंद करता है। किसी को हरमनप्रीत कौर लुभाती है, तो किसी को सरोजिनी नायडू। कोई मधुबाला की सुंदरता देख मुग्ध होता है, तो किसी को सुधा मूर्ति प्रभावित करती हैं। यही वजह है कि किसी को किसी की मुस्कान लुभाती है, किसी को किसी का चेहरा, किसी को किसी की बुद्धिमत्ता आकर्षित करती है, तो किसी को किसी का सेन्स ऑफ़ हयूमर, कई पुरुष या महिलाएँ गोरे रंग के प्रति आकर्षित होते हैं, तो कुछ साँवले रंग के प्रति, या सुंदर देह के प्रति, तो कोई किसी में बुद्धि, विवेक और चतुराई खोजता है। लेकिन यहाँ यह भी समझना होगा कि क्या कोई एक विशेषता हमें उसकी ओर आकर्षित करती है? जी नहीं दोस्तों! आकर्षण हमें समग्र रूप से, समग्र व्यक्तित्व से होता है। प्रेम टुकड़ों में नहीं किया जा सकता। प्रेम की पूर्णता तभी है, जब वह समग्र रूप से किया जाए।

MUSIC

यानी दोस्तों, उसका चुनाव कुछ बातों पर निर्भर होता है, ना कि एकदम साँयोगिक और किसी दैवीय या रहस्यमयी प्रेरणा पर। अक्सर लोग इस आकर्षण को रूह का नाता, पिछले जन्म का संबंध या कोई रहस्य मान बैठते हैं। शुरूआती आकर्षण और चुनाव में शारीरिक गुणों की महती भूमिका होती है, पर असली परीक्षा तो आपसी अंतःक्रियाओं यानी व्यक्तित्व के आँतरिक व्यावहारिक गुणों के परीक्षण में होती है। यह सच भी है दोस्तों, जब हमारे संबंध बनते हैं, विशेष तौर पर स्त्री और पुरुष के बीच के संबंधों में, आरंभ में शायद कहीं दैहिक आकर्षण होता हो, क्योंकि बाहरी आवरण से ही आप अंतस तक पहुँच पाते हैं, परंतु रिश्ता वही कायम रहता है, जो शारीरिक और दैहिक सुंदरता से होता हुआ मन की सुंदरता को खोज लेता है। ठीक वैसे ही जैसे प्यासा हिरण मरुभूमि में भी जलाशय ढूंढ ही लेता है, प्यासी धरती की पुकार पर मेघ बरस ही पड़ते है और सारे बंधंनों को तोड़ते हुए एक झरना सागर में मिल ही जाता है। जब रिश्ते कुछ दूर तक चल पड़ते हैं, तो उन रिश्तो में आपसी समझ, व्यवहार का संतुलन और बिना कहे एक दूसरे को समझ लेने की प्रवृत्ति पैदा होने लगती है। और यहीं हम कह पाते हैं कि यूँ ही नहीं दिल लुभाता कोई।

सार यह है कि कोई चेहरा आपको लुभा रहा है, पसंद आ रहा है, आप किसी व्यक्ति विशेष के आकर्षण में बंधे जा रहे हैं, तो आप इसे कोई नशा या जादू समझने की भूल ना करें। किसी का मिलना, आपके ज़िंदगी में उसका आना और छा जाना, आपको आकर्षित कर देना, ये महज़ संयोग मात्र हो सकता है। आप को कोई यूँ ही नहीं लुभा रहा। उस लुभाने के पीछे कोई सदियों का नाता नहीं,ना कोई रहस्मयी प्रेरणा, ना पूर्व जन्म का कोई संबंध ही है। बल्कि, उसके पीछे आपके सौंदर्य  बोध के मानदंड, आपकी अंतर्संबंधों के बारे में मान्यता और कुछ जैव रसायन। वह सौ चांदनियों की चमक, शीतलता और सुकून लेकर आपकी ज़िंदगी में आया है, और मैंने उसे सहेजा है, पसंद किया है, मुहब्बत की है, तो वे मेरी ही आँखें हैं, जिन्हें वह सुंदर दिखता है, हमें शेक्सपीयर की कही गई बात भी भूलनी नहीं चाहिए कि सुंदरता देखने वाले की आँखों में ही बसी होती है। इसलिए अब अगर कोई आपको लुभाए, तो सौ बार सोचें कि यूँ ही नहीं लुभाता कोई, आप ही ने तो उसे चुना है! है न दोस्तों! 

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बातें उसकी हो रही हैं, जिसने यूँ ही आपको नहीं लुभाया है, कुछ तो बात है उसमें, तो ऐसी बातें, और उसकी बातें तो अनंत होंगी.. कैसे विराम दूँ? आपके पास भी तो उसके किस्से होंगे, कहानियां होंगी,जो आपके दिल को भाता हो, आपको लुभाता हो, है न दोस्तों! मुझे मैसेज बॉक्स में अपनी भावनाएँ लिखकर प्रेषित कीजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, हो सकता है, मेरी इस कहानी में आपके भी किस्से छिपे हों.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

 नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से  कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

 

 

 

*************************************************************EPISODE  8

हर मुस्कराहट मुस्कान नहीं होती 24/04/2026

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से  कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, जीवन के रास्ते पर चलते  चलते हमें न जाने कितनी कहानियाँ, कितने किस्से मिल जाते हैं, इनमें से कुछ हमें हमेशा याद रह जाते हैं, है न दोस्तों! आज हम बात करेंगे मुस्कराहट की, मुस्कराहट जो सभी को प्यारी लगती है, और भोली  सी मुस्कराहट के सामने कठोर हृदय वाला व्यक्ति भी झुक जाता है। लेकिन क्या हर मुस्कराहट मुस्कान होती है? वो भी सच्ची वाली!

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‘हर मुस्कराहट मुस्कान नहीं होती’ ये एक मशहूर गीत की पंक्तियाँ हैं, जिनका संबंध हमारी भावनाओं से, संवेदनाओं से, हमारे मनुष्य होने या यूँ कहूँ, मनुष्य बने रहने से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति का मुस्कराना यह नहीं बताता कि वह वास्तव में खुश है, हो सकता है कि उसकी मुस्कराहट के पीछे कोई ऐसा दर्द या ऐसा दुख छुपा हो, जिसे दुनिया देख ही नहीं पाती।

कुछ साल पहले मैंने एक खबर पढ़ी थी, आज उसी के हवाले से बात को शुरू करती हूँ। एक भारतीय अभिनेता अचानक अमेरिका के एक शहर के रिहैबिलिटेशन सेंटर में मिले, पिछले 10 सालों से उनका कोई अता  पता नहीं था, लेकिन उनके सच्चे दोस्तों ने उन्हें ढूंढ ही निकाला और उनका इलाज करवाया। सबसे पहले तो ऐसी दोस्ती को सलाम! अगर कुछ सच्चे दोस्तों ने उनके साथ ना दिया होता, तो स्थिति और भी भयानक हो सकती थी, कोई हँसता खिलखिलाता  मुस्कराता व्यक्ति अचानक हमारे बीच से गायब हो जाता और हमें पता भी नहीं चलता। अपना देश छोड़कर वह परदेस में रिहैबिलिटेशन सेंटर में पाया जाता है, जहाँ उसके पास कोई अपना नहीं होता है । आप ही बताइए दोस्तों! क्या रिहैबिलिटेशन सेंटर के डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक किसी के मन की अतल गहराइयों में जाकर दर्द की तलहटी को छू सकते हैं? मान लिया कि वे इलाज करते हैं और मरीजों को ठीक भी करते हैं, किंतु ऐसे में सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, उन अपनों की, जो अपनत्व दे सकें, उस भावना की, जिसमें प्यार की कोमल छुअन हो, जो केवल एक प्यार करने वाला ही दूसरे को दे सकता है। डॉक्टर अपने मरीज़ के इलाज पर ध्यान देते हैं, उसी पर फोकस करते हैं, लेकिन वह प्यार, वह अपनापन, जो किसी के दिल को छू ले, दरअसल वह तो कोई अपना ही कर सकता है। जिनके बारे में मैं बात कर रही हूँ, उनको आप सभी जानते हैं। एक बहुत प्यारा  सा मुस्कराता  सा चेहरा, जिस पर भोलापन और मासूमियत छलकती थी। अरे! अभी भी याद नहीं आया, याद कीजिए ‘अर्थ’ फिल्म का कैफ़ी आज़मी का लिखा वह गीत जिसे जगजीत सिंह ने बड़ी ही सुंदरता से गाया था, किस पर फिल्माया गया था?

तुम इतना जो मुस्करा रहे हो?

क्या गम है जिसको छुपा रहे हो?

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दोस्तों! एक बात मेरी समझ नहीं आती कि क्यों लोग अपने चेहरे पर झूठी मुस्कराहट चिपकाए घूमते हैं? अंदर  अंदर रो लेना, बाहर  बाहर हँस लेना, क्या यह तरीका ठीक है? अरे भाई! दुख है, तो भाई, दुखी हो लो, इसमें क्या शर्माना? इसमें क्या संकोच करना? रोने का मन कर रहा है, तो रो लो जी भर के, क्या यह ज़रूरी है कि दुनिया के सामने एक प्लास्टिक की हँसी चिपकाई जाए? दर्द है, तो उसे महसूस किया जाए, ना कि उसे पाला जाए, प्रेम है, तो उसे भी महसूस किया जाए, उसे अनदेखा ना किया जाए। हम दर्द को भी छुपाते हैं और प्रेम को भी। 

क्या दुनिया से डर कर...?

पर हम डरते क्यों है?

आप ही बताइए दोस्तों! अपने गम को छुपा कर मुस्काएँ? क्यों?

ऐसा करके हम प्रकृति के विपरीत चलते हैं, हम दर्द में मुस्काते हैं और खुश होने पर भी खुशी को दबा लेते हैं। खुलकर हँसते नहीं, खुलकर रोते भी नहीं, हाय! लोग क्या कहेंगे? इसलिए मन की बात कभी मन से निकलती ही नहीं और फिर एक दिन, जब यह आँसू बनकर निकलती है, तब उस एक दिन ये आँसू जहर बन जाते हैं, सुनामी ले आती है, हमें भिगो  भिगो डालते हैं, हमें सराबोर कर डालते हैं।

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क्या आपका मन नहीं करता पूछने का, कि भाई तुम इतना क्यों मुस्करा दिए, कि दर्द अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया और तुम्हें इस सुंदर दुनिया से बेखबर कर दिया। नैनों ने अब मुस्कराना बंद कर दिया। तुम्हारी मुस्कराहट वह निश्छल  मुस्कान नहीं रही। यह एक चेतावनी भी है कि सुनो, यदि तुमने सच्ची सहज मुस्कान अपने होठों पर नहीं खिलाई और गम छुपा कर मुस्काते रहे, तो यह प्लास्टिक की हँसी, एक दिन बीमारी बन जाएगी।

दोस्तों! ‘प्लास्टिक की हँसी’ यानी वह हँसी, जो दिखावे के लिए या किसी दबाव के कारण होती है, जहाँ असली भावनाएँ ओट में, परदे में छिपी होती हैं। जबकि  सच्ची हँसी दिल की गहराइयों से निकलती है—बिना किसी प्रतिबंध के, बिना किसी नकाब के, बिना किसी मुखौटे के, ऐसी हँसी, जिसमें मन की खुशी छलक  छलक जाती है।

हालांकि, यह भी सोचने की बात है कि कभी  कभी जो हँसी शुरुआत में नकली लगती है, समय के साथ उसमें कुछ सच्चाई भी समा जाती है। कई बार जब हम किसी कठिन परिस्थिति में भी हँसते हैं, तो यह शुरुआत में सिर्फ़ एक तरह का ठट्ठा  मसखरा व्यवहार हो सकता है, लेकिन धीरे  धीरे वही हँसी मानसिक शांति और सामंजस्य का प्रतीक बन जाती है। दरअसल, हँसी का स्वरूप बहुत जटिल होता है—वह बाहरी भावनाओं का ही नहीं, बल्कि हमारे भीतरी संघर्षों और आत्म  विकास की कहानी बयाँ करती है।

सच्ची हँसी में वह सहजता और वह आत्मीयता होती है, जो न सिर्फ चेहरे पर बल्कि पूरे अस्तित्व में झलकती है, जबकि प्लास्टिक की हँसी में अक्सर वह गहराई नहीं होती। दरअसल जीवन में वास्तविक आनंद का आना भी एक आंतरिक प्रक्रिया है, जिसे समाज या बाहरी परिस्थितियाँ अक्सर नकाब में छुपा देती हैं।

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क्या आपने कभी महसूस किया है कि कभी  कभी हम सब के अंदर एक तरह का 'नकली' हँसने का दबाव होता है, जो कि वास्तव में हमारे भीतर के संघर्ष या अनकहे दर्द को ढकने के लिए होता है? इस विषय को और भी गहराई से समझने के लिए, यह तो बताइए कि आप किस बात को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं—वास्तविक आनंद की वह सहजता, या फिर सामाजिक अपेक्षाओं के अनुकूल हँसना?"सच्ची हँसी और प्लास्टिक हँसी में मूल अंतर उनके जन्म और अनुभव के अंदर छिपा होता है।

सच्ची हँसी दिल से निकलती है। यह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, जिसमें हम खुशी, राहत या गहरे आनंद के क्षण अनुभव करते हैं। हमारी आतंरिक अवस्था, भावनाओं का उजागर होना और शरीर में उत्पन्न होने वाले हार्मोन्स—जैसे एँडोर्फिन—इस हँसी के साथ जुड़ जाते हैं। यही वजह है कि सच्ची हँसी न केवल मन को ताज़गी और मानसिक शांति देती है, बल्कि दूसरों में भी एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। यह हँसी अनायास, बिना किसी दबाव के, और पूरी तरह से प्रामाणिक होती है।  जबकि प्लास्टिक हँसी अक्सर सामाजिक परिस्थितियों या दबाव के कारण उत्पन्न होती है। यह दिखावे की हँसी होती है, जो कभी  कभी परिस्थितियों को सहज दिखाने या किसी अनुचित स्थिति से उबरने के लिए उपयोग की जाती है। इसमें वह स्वाभाविक गर्मजोशी कहाँ, जो सच्ची हँसी में होती है।

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सच कहूँ तो दोस्तों! सच्ची हँसी हमारे दिल की गहराइयों से निकलती है और आत्मा के आनंद का प्रमाण होती है, जबकि प्लास्टिक हँसी सामाजिक अपेक्षाओं या आँतरिक भय से प्रेरित एक प्रकार का मुखौटा होती है या यूँ कह सकते हैं कि ऐसे में हम एक चेहरे पर दूसरा चेहरा लगा लेते हैं। क्या आपके जीवन में ऐसे क्षण आए हैं, जब आपने महसूस किया हो कि आपकी हँसी में सच्चाई के साथ  साथ आड़ में कुछ और भी छिपा है? हाँ, हँसी सामाजिक संबंधों पर गहरा असर डालती है। इस हँसी से निकलने वाली स्वाभाविक गर्मजोशी और आत्मीयता तुरंत ही लोगों को आपके करीब लाती है। जब हम दोस्तों या परिवार के साथ दिल खोलकर हँसते हैं, तो यह एक प्रकार का गैर  मौखिक संदेश होता है कि हम में सहानुभूति और समझदारी है, जो आपसी संबंधों को और गहरा करती है।  हँसी एक सार्वभौमिक भाषा है, जो लोगों के बीच की दीवारों को गिराती है और एक दूसरे के प्रति विश्वास की भावना को बढ़ावा देती है। तो आइए न मेरे साथ, और किसी की सच्ची मुस्कराहटों पर निसार हो जाएँ, ताकि किसी का दर्द मिटा सकें, किसी के वास्ते दिल में प्यार की गंगा बहा सकें, क्योंकि जीना इसी का तो नाम है, सही कहा न दोस्तों!

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सच  सच बताइएगा दोस्तों! आप भी तो सच्ची मुस्कान पर ही निसार होते हैं न..। ऐसे बहुत से किस्से  कहानियाँ आपके पास भी होंगी। मेरी यादों के सफ़र में मेरे हमराही बनिए। मैसेज बॉक्स में अपने विचार, अपनी भावनाएँ लिखकर भेजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, सुनाते रहिए..हो सकता है, सच्ची मुस्कान की इस कहानी में आपकी भी सच्ची हँसी छिपी हो.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से  कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

 

 

 

*************************************************************EPISODE   9

राँझा राँझा करदी.. 08/05/2026

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नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से   कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज मैं बात करूंगी सच्चे प्रेम की सबसे मार्मिक कहानी की, जो संवेदनाओं, विद्रोह, आत्म   त्याग और आध्यात्मिक प्रेम की गहराइयों को छूती है। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे, हीर और राँझा की..

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 राँझा राँझा करदी हुण मैं आपे राँझा होई

सद्दो मैनूं धीदो राँझा हीर ना आखो कोई।

दोस्तों! बुल्ले शाह ने आखिर यह क्या कह दिया? उनके शब्दों में हीर कहती है कि राँझा   राँझा करती हुई मैं खुद ही राँझा हो गई हूँ, अब सब मुझे राँझण धीदो पुकारा करें, कोई मुझे हीर कहकर न पुकारे। कहानी में एक था राँझा, जो प्रेम का देवता था, और एक थी हीर, जो सुंदरता की देवी थी। पंजाब की धरती पर दोनों का जन्म हुआ। उस समय विदेशी घोड़ों की टापों से देश की धरती उखड़ रही थी। इतिहास का ध्यान लगा था राजनीतिक उथल   पुथल की ओर, किसी का ध्यान इस ओर जाता तो जाता कैसे कि हीर को भी इतिहास के पन्नों में दर्ज कर दें। क्या हीर सचमुच थी? झंग में हीर की समाधि, जिस पर प्रति वर्ष हज़ारों श्रद्धालुओं का एकत्रित होना, इस बात की घोषणा करता है कि हीर सचमुच में थी, जी हाँ, हीर थी, इसी धरती पर, तभी तो आज भी उसके किस्से मशहूर हैं।

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झंग, जहाँ हीर का जन्म हुआ, रांझे के जन्मस्थान तख़्त हज़ारे से अस्सी मील की दूरी पर है। पास से चनाब गुज़रती है। 'चनाब' यानी 'झनां'। झनां तो आज भी हीर को याद करती होगी, उसकी लहरों के सम्मुख ही तो पहले   पहल उसने राँझा के लिए अपने हृदय के द्वार खोले थे। सोचती हूँ, कि पहली बार जब किसी लोकगीत में हीर की कथा का ज़िक्र आया होगा, तब क्या अकेली हीर को ही अमर पदवी दी गई थी? झनां नदी भी तो इसमें आई होगी। और हीर संबंधी पहला गाना अब हम कहाँ ढूँढ़ें? यह हीर की ही खासियत रही होगी कि ‘हीर’ एक गीत बनकर पंजाब की लोकधारा में बहने लगा, जैसे चनाब की लहरें, झनां की लहरें। इन गीतों में हीर को लोकमाता की पदवी दी गई, जो प्रेम, सौंदर्य और साहस की प्रतीक बनकर उभरती है। कई गीतों में तो चनाब यानी झनां को प्रेम की नदी कहा गया—

"इश्क झनां वगदी, किते डुब्ब न मरी अणजानां"

यानी “इश्क की झनां बह रही है, अरे ओ अनजान, कहीं डूब न जाना”।

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कभी झनां के तीर पर बैठकर उसके जल को निहारिए, तो शायद वह आपके कान में कुछ कह जाए, निराश होकर एक दिन रांझे ने किस तरह आँसू गिराए थे, आँसू बहाए थे, शायद झनां ही आपको बतला सके। जिस झनां ने रांझे की बंझली का गान सुना था, दिन   रात, लगातार, जिसने उसे हीर के पिता की भैंसें चराते देखा था, जिसने हीर को रांझे के लिए पकवान लाते देखा था, वह क्या आज बोल न उठेगी?

हीर और राँझा की प्रेमकथा के बार में क्या कहूँ? राँझा का असल नाम ‘धीदो’ था| उसे पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था। एक दिन उसकी भावजों ने ताना मारा कि वह काम   काज में विशेष हाथ नहीं बंटाता है, छैला बना घूमता है, जैसे उसे 'हीर' से ब्याह करना हो। बस, फिर क्या था, बस घर छोड़कर चल पड़ा वह झंग की ओर। झनां के तीर पर पहुँचा, अब किश्ती से झंग जाने का प्रश्न था। पैसा पास में था नहीं। बिना पैसे के 'लुढ्ढन' नाविक उसे ले जाने को तैयार न था। रांझे ने बंझली बजाई, लुढ्ढन की पत्नी को उस पर तरस आ गया, उसने सिफ़ारिश की, और लुढ्ढन ने रांझे को नदी के उस पार, जहाँ हीर रहती थी, पहुँचा दिया। और फिर शुरू हो गया हीर और राँझा के प्रेम का सिलसिला.. शादी तय भी हुई, पर फिर विघ्न आ गया और हीर का विवाह सैदा से कर दिया गया। हीर की विद्रोही आत्मा ने सामाजिक बंधनों को चुनौती दे डाली| दोनों के प्रेम का सैलाब देखिए, कि वह राँझा के लिए अपने परिवार, जाति और परंपरा से टकराई, परंतु उसकी एक न चल पाई। तब हीर ने प्रण कर लिया कि वह अपने ‘सत’ को कायम रखेगी। कहते हैं, हीर की सच्ची मुहब्बत को जानकार राजा के आदेश पर पिता राँझा से उसके विवाह को मान गए, पर..पर भीतर ही भीतर कपट का साँप फुंकार रहा था। राँझा बारात जुटाकर लाया, पर हीर को ज़हर दे दिया गया। ज्यों ही रांझे को यह ख़बर लगी, वह ग़श खाकर गिर गया—एक दीपक पहले ही बुझ चुका था, दूसरा भी बुझ गया। इसीलिए ‘हीर’ के कण   कण में राँझा की बंझली, उसका जोग, और “अलख निरंजन” का जाप अपनी पूरी शिद्दत के साथ समय गया, लगता है कि यह प्रेम, आध्यात्मिक प्रेम  है—जो साँसारिक नहीं, आत्मिक है।

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दोस्तों! प्रश्न यह है कि क्या किसी को यह अधिकार था कि वह हीर और राँझा के प्रेम को किसी चारदीवारी में कैद कर सके? आखिर समाज को यह अधिकार किसने दिया? भक्त गुरुदास कहते हैं—

‘राँझा हीर बखानिये,ओह पिरम पिराती।‘

यानी 'आओ हीर और राँझा का बखान करें,वे महान प्रेमी थे!'

रांझे के पास जो बंझली थी, हीर उसके राग पर मुग्ध हो उठी थी, कई लोग बंझली की प्रशंसा भी करते दिखाई देते हैं। राँझा जो कुछ भी बोलता था, जैसे वह बंझली में से होकर हीर के हृदय में उतर जाता था। बंझली से एक बार जो शब्द गुज़र जाता था, वह कविता बन जाता था, आकाश भी बंझली से थाप से नरम पड़ जाता था|

‘राँझा बजावे बंझली, सुक्का अम्बर छड्डे नरमाइयाँ।’

यानी देखो! राँझा मुरली बजा रहा है, सूखे आकाश पर नमी आती जा रही है।'

दरअसल दोस्तों! हीर और राँझा केवल दो प्रेमी नहीं, बल्कि वे प्रेम, बलिदान और सामाजिक बंधनों के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीक हैं। इन दोनों की कहानी सिर्फ एक रोमांटिक कहानी नहीं है—यह उस दौर की सामाजिक बाधाओं, जातिगत भेदभाव, और पारिवारिक दबावों के बीच सच्चे प्रेम की जीत या हार, इसका फ़ैसला मैं आप पर छोड़ती हूँ, का मार्मिक चित्रण है।

यदि यह हार है भी दोस्तों, तो भी ऐसी हार के किस्से अक्सर प्रेरणा बन जाते हैं, जो हमें बेहतर, मजबूत, और समझदार इंसान बना देते हैं। हार हमें खुद से सवाल करने पर मजबूर करती है—हम क्या कर सकते थे, क्या नहीं किया, और आगे कैसे सुधारें? गिरकर उठने से हमारा जज़्बा ही हमारे भीतर सहनशीलता बढ़ाता है। ये पाठ किसी किताब से नहीं मिलते। तो दोस्तों! जब हम हीर   राँझा की प्रेम कथा सुनते हैं, तो हार जाने के डर से जीना नहीं छोड़ते, सामाजिक बंधनों पर सवाल करना सीखते हैं, और हम अपने रास्ते या सोच को फिर से परिभाषित करते हैं। यही है हीर   राँझा की कहानी    मेरी जुबानी।

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दोस्तों! हीर   राँझा, सोहनी   महिवाल, ऐसे न जाने कितनी प्रेमगाथाएँ हमारे सामाजिक ताने   बाने में धूप   छाँव की तरह बुनी हुई हैं, गुँथी हुई है। ये हमारी भावनाओं की अभिव्यक्ति ही नहीं, बल्कि साँस्कृतिक स्मृति और सामाजिक चेतना का दस्तावेज़ भी हैं। हम सभी की भावनाओं में सबसे प्रभावशाली संवेग होता है   प्रेम, प्रेम के ऐसे बहुत से अनुभव, बहुत से किस्से   कहानियाँ आपके पास भी होंगी। मुझे मैसेज बॉक्स में अपने प्रेम से भरे किस्से प्रेषित कीजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, हो सकता है, हीर   राँझा की कहानी में आपके भी किस्से छिपे हों.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...फिर एक नए किस्से के साथ.. 

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

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*************************************************************EPISODE  10

कोई ये कैसे बताए.. 22/05/26

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नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से  कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे, तनहाई की, अकेलेपन की, एकाकीपन की! अरे भई! दुनिया लोगों की भीड़ से भरी हुई है, फिर भी तुम तनहा क्यों हो? आखिर क्या वजहें हो सकती हैं हमारे तनहा होने की, या फिर उस बेबसी की, कि बताया भी न पाएँ कि तनहा क्यों हैं?

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दोस्तों! आज मुझे कैफ़ी साहब की वह मशहूर ग़ज़ल याद आ रही है, जिसके बोल हैं   कोई ये कैसे बताए के, वो तनहा क्यों है? सच में, जब  जब यह ग़ज़ल सुनती हूँ, सोचने पर मजबूर हो जाती हूँ कि वो जो अपना था, वो ही आज किसी और का क्यों है? या फिर कि यही दुनिया है तो फिर, ऐसी ये दुनिया क्यों है?

यही होता है तो आख़िर, यही होता क्यों है?

चलिए, आज चर्चा करते हैं, मेरे एक मित्र की, जो एक दिन बड़े परेशान  हैरान से होकर मेरे पास आए और कहने लगे कि आजकल बहुत दुखी हूँ। ज़िंदगी में कुछ रास ही नहीं आ रहा, कोई रस ही नहीं रह गया। कइयों से प्रेम किया, पर  हमेशा नाकामी ही मिली। मैंने मन ही मन सोचा, कइयों से प्रेम किया!  यह क्या है? वे कहने लगे कि दर्द और दुख जैसे मेरे जीवन के हिस्से बन गए हैं, प्रेम खोजने गया था,  पर देखो न..दुख ही मिला। मैंने कहा कि अब की बार दर्द खोजने जाना, तो यकीनन प्रेम मिल जाएगा। सच ही है न दोस्तों, आप हमेशा प्रेम और खुशी ही खोजते हैं, इसलिए दर्द पीछे पड़ा रहता है, इस बार दर्द की खोज करेंगे, तो यकीनन, प्रेम मिलेगा। आप किसी का प्रेम, किसी का दर्द महसूस तो कीजिए, प्रेम खुद ब खुद खिंचा चला आएगा। दोनों मानो एक ही गाँव में, एक ही बरगद की छाँव में रहते हैं। एक को आवाज़ दो, तो दूजा संग आ जाता है। खुशी और गम, दर्द और चैन, दोनों एक दूसरे के ही हिस्से हैं, मानो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आप खुशी को अपनाने जाएँगे, तो गम खुद ही बिना बुलाए चला आएगा, जैसे दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हों। दरअसल, हम सभी सिर्फ़ खुशी चाहते हैं, खुश होना चाहते हैं, हँसना चाहते हैं। कोई भी नहीं चाहता कि उसका वास्ता आँसुओं से पड़े। हम ताउम्र खुश होने की तीव्र इच्छा में न जाने कितनों को दुखी किए जाते हैं, लेकिन यदि हम सभी के हिस्से में खुशियाँ आ गईं, तो बेचारा गम कहाँ जाएगा? वह तो एक कोने में पड़ा  पड़ा दुखी होता रहेगा न..। वह कहाँ जाकर, किस गाँव में अपना बसेरा बनाएगा? उसे भी तो अपने होने का एहसास होना चाहिए, हो सकता है यह बात आपको अनोखी लग रही हो दोस्तों! पर है तो यही सच, यकीनन यही सच है।

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दोस्तों! हम सभी दिल की बगिया में खुशियों के बीज होते हैं, दिल की ज़मीन पर सपनों के पौधे रोंपते हैं, फिर क्यों कर उनमें दुख के कांटे निकल आते हैं? हमने तो सिर्फ़ सुख, खुशी और आनंद को ही न्योता दिया था ना....ये बिन बुलाए मेहमान कहाँ से आ गए? यह ग़म, यह दर्द, यह दुख, इन्हें तो नहीं बुलाया था मैंने? फिर यह कहाँ से मेरे जीवन में चले आए? हम इन्हें देखकर दिल का दरवाजा बंद करना चाहते हैं, जबकि हमें तो इन्हें गले लगाना चाहिए। ये हमारे अतिथि हैं, मेहमान हैं, पाहुन हैं, जो एक बार ये हमारे हो गए, तो जन्मों तक हमारा साथ निभाते हैं। खुशियाँ...खुशियाँ तो हमसे फ्लर्ट करती हैं और दर्द हमसे सच्ची मोहब्बत। ये हमारे साथ चलते हैं, मीलों तक। हमारे अकेलेपन के साथी होते हैं ये आँसू, हमारी तनहाइयों को रोशन करती हैं ये यादें। बताइए, फिर कौन अपना हुआ? और कौन पराया? बेशक...यकीनन...गम ही अपना है। ज़िंदगी इतनी लंबी है कि यहाँ मीलों तक हमारा साथ निभाने धूप ही आएगी, छाँव आएगी भी तो पल दो पल, चांदनी दिखेगी तो भी क्षण भर के लिए, इसलिए आप गम से ना घबराएँ, और हाँ, हर व्यक्ति अपने जीवन में खुशियों के ही बीज होता है, कोई भी जानबूझकर दर्द उगाना नहीं चाहता, लेकिन यह खरपतवार है, जो स्वयं ही उग जाती है। है न दोस्तों!

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और हाँ दोस्तों! जब हम दूसरों के दर्द से अंजान बने रहते हैं, तब भी हम अकेले होते हैं, तनहा होते हैं, पर इतने बेखबर, इतने बेकदर, इतने बेपरवाह कैसे हो सकते हैं हम? हम देह से दूसरे को जानते हैं, पर मन से कभी जान ही नहीं पाते। हम मन की दूरी कभी तय नहीं कर पाते और हमारे आसपास के रिश्ते बिखरते जाते हैं और हम तनहा होते जाते हैं..होते जाते हैं।

 

हम तनहा इसलिए भी होते जा रहे हैं दोस्तों! क्योंकि वक्त बदल रहा है, परिस्थितियों बदल रही हैं, हम बदल रहे हैं, सब बदल रहे हैं, लेकिन जो नहीं बदला है, वह है मानव समाज और उसमें बसा हुआ प्रेम, वे संस्कार जो हमें भारतीय होने के नाते अपने पूर्वजों से मिले हैं। हमारे परिवार, जो हमारी थाती हैं, हमारी पूँजी हैं, हमारी पहचान हैं, फिर भी उन्हें छोड़कर हम आभासी दुनिया में जीना चाहते हैं, एक मायावी दुनिया में, जिसमें एक नशा है, यहाँ कोई बंदिशें नहीं, कोई शर्तें नहीं, यहाँ लोग खुद को चाहे जैसा प्रस्तुत कर सकते हैं, अपनी कमज़ोरी को छुपा सकते हैं, स्त्री हैं तो पुरुष बनकर, पुरुष हैं, तो स्त्री बनकर, उम्र दराज़ हैं, तो युवा बनकर, खुद को सिंगल बता कर लोग ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का साथ पाने का प्रयास करते हैं। यहाँ सब कुछ चलता है, झूठी फोटो, झूठी प्रोफाइल, झूठी बातें, झूठे वादे, खुद के अवगुणों को छुपा कर, अपने गुणों का बखान...और न जाने क्या  क्या? असली दुनिया के खुरदुरेपन में हमारे साथ कौन है, इसकी पहचान न करते हुए हम आभासी संसार में हर पल, हर क्षण, हर लम्हा किसी न किसी अपने को खोजते हैं।

सवाल यह बिल्कुल भी नहीं है कि रिश्ते कितने सच्चे या कितने झूठे हैं, सवाल यह है कि आखिर लोग तलाशते क्या है रिश्तों में, सच्चा प्यार, सच्ची दोस्ती, अपनापन या अकेलेपन को दूर करने के लिए सिर्फ़ टाइमपास, या खुद की तलाश? वास्तविक दुनिया से इतर आकंठ निराशा में डूबे, अवसाद और विषाद से घिरे लोगों का समूह है ये सोशल मीडिया साइट्स। रिश्ते चाहे जो भी बनाए जाएँ, ऑनलाइन या ऑफलाइन, मिट्टी तो दिल की ही लगती है न... और आँसुओं के पानी के बिना कभी कोई मूरत बन पाई है? संवेदना की मज़बूत कड़ी से ही कोई रिश्ता जन्म लेता है, उसे स्क्रॉल करके या माउस पकड़कर बनाने की कोशिश ना करें और न ही उसे मिटाने की।

याद रखिएगा दोस्तों! कि रिश्ते जीवन की रौनक होते हैं, वे हमें जीवन देते हैं, दुखों से लड़ने का हौसला देते हैं, हमें मज़बूत बनाते हैं, हमारे जीने की वजह बनते हैं। उन रिश्तों पर हम बंधन नहीं लगा सकते, हमें उन्हें सिर्फ़ खिलने देना है, ताकि वे महक सकें। हम अपना आँचल उनके लिए फैला सकते हैं, ऐसा आँचल जिसमें सिर्फ़ अपनापन हो, मुहब्बत हो,  मुरव्वत हो, इंसानियत हो। इस आँचल में यदि चिंगारियाँ दिखेंगी, तो रिश्ते कहीं बाहर छाँव की तलाश में, शांति की तलाश में भटकने लगेंगे। और हाँ दोस्तों! हम तनहा इसलिए भी होते जा रहे हैं कि हमारे जीवन में पैसों के पीछे भागा  दौड़ी, आपा  धापी बहुत अधिक है। संतोष  धन तो आज धूरि समान लगता है। इसने हमें अवसाद, विषाद, निराशा और न जाने कौन  कौन सी नकारात्मक भावनाओं से के अलावा हमें दिया ही क्या है?

MUSIC

तो चलें आज, ऐसी सभी दीवारों को आज गिरा दें, कब तक यूँ ही खामोश रहें, और सहें हम, दिल कहता है कि आज दुनिया के हर ऐसे रिवाज़ को ख़त्म कर दें, जो दीवारें खड़ी हैं, उन्हें आज गिरा दें, क्यों दिल ही दिल में सुलागें, जो मेरे लिए अच्छा है, जो तेरे लिए अच्छा है, उसे गले लगा लें, मेरे सीने में तेरी धड़कन समा जाए, और तेरी धड़कन में मेरी...हम दोनों में जब इतनी कूवत है, इतना माद्दा है, तो आओ, ये सारे फ़ासले मिटाएँ, चलो आज हर लुटे हुए घर में एक चिराग जलाएँ, टूटे  जर्जर दरवाज़ों पर दस्तक दें, जिस किसी की आस कराह रही है, उसकी मलहम  पट्टी करें, और अगर प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता, तो उसे बदलने से बचाएँ......आप क्या कहते हैं न दोस्तों!

MUSIC

बात जब तनहाई की हो, अकेलेपन की हो, एकाकीपन की हो, तो बातें ख़त्म कैसे होंगी? आप तनहा हैं, तो मैं हूँ न दोस्तों! आखिर दोस्त ही तो दोस्त के काम आता है।मुझे बताइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, हो सकता है, तनहाई की बातों के सफ़र में साथ  साथ चलते  बतियाते आपको कोई हमसफ़र मिल जाए! और फिर वही एक किस्सा बन जाए.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से  कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

*************************************************************EPISODE   11 

आप मुझे अच्छे लगने लगे 05/06/2026

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से   कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे, उस आप की, जो हमें जब अच्छा लगने लगता है, तो सौ   सौ आसमानों का रंग बदल जाता है, नदियों में लहरें हिल्लोल करने लगती है, पक्षी चहचहाने लगते है, भौंरें गुंजायमान होने लगते हैं, और हम भी हवाओं के साथ   साथ बहने लगते हैं और कह उठते हैं कि आप मुझे अच्छे लगने लगे हैं, और इसीलिए मुझे अपने सारे सपने भी सच्चे लगने लगे हैं!

MUSIC  

जी हाँ , दोस्तों! बहुत ही प्यारा गीत है, फिल्म है    ‘जीने की राह’, जिसमें नायिका बड़े ही प्यार से नायक से इस बात का मनुहार करती है कि नायक उसे अच्छा लगने लगा है, अच्छा ही नहीं, बहुत अच्छा लगने लगा है। जब नायक अच्छा लगने लगा है, तो और क्या   क्या अच्छा लगने लगा है? सबसे पहले उसने जो सपने देखे थे, जीवनसंगी को लेकर, वे सब सपने सच्चे लगने लगे हैं, और उसे अच्छे भी लगने लगे हैं, साथ ही साथ यह धरती, यह नदिया, ये किनारे, ये रातें, ये दिन, यह सुबह, यह शाम, उसे सब अच्छे लगने लगे हैं। अक्सर सोचती हूँ कि क्या ये नदियाँ, किनारे, धरती, पहाड़, आसमान, हमेशा से ही सबको अच्छे लगते हैं? यदि हाँ, तो क्यों? कौन है वह जिसके कारण ये सब अच्छे लगाने लगे हैं? मुझे लगता है कि जीवन का सारा अच्छापन और सारा सच्चापन इसी ‘आप’ की वजह से है। आखिर सोचिए, ये नदियाँ, पहाड़, किनारे, पंछी, फूल, तारे, सितारे, ये तो शाश्वत हैं, फिर इस दुनिया के सभी लोगों को ये बड़े अच्छे क्यों नहीं लगते, या यूँ कहूँ कि सबसे अच्छे क्यों नहीं लगते? मुझे तो लगता है यह दुनिया, इसकी सारी चीज़ें, तभी खूबसूरत लगती हैं, जब कोई ‘आप’ हमारी ज़िंदगी में आता है। मेरे   आपके, हम सबके जीवन में उस ‘आप’ की वजह से ही ज़िंदगी पूरी होती है और अच्छी लगने लगती है।

music 

दोस्तों! तभी तो मन झूम   झूमकर गाने लगता है कि आप मुझे अच्छे लगने लगे हैं, आप मुझे बड़े ही अच्छे लगने लगे हैं। जब जीवन में ‘आप’ हो, तो फूलों में महक बसती है, कलियों में खुशबू महकती है, पानी कल   कल करती नदियों जैसा लगता है, खुरदुरी   पथरीली धरती भी सोंधी महक देने लगती है, पेड़ों पर बैठे पंछियों की भाषा समझ में आने लगती है, मन पंछी की तरह आकाश में उड़   उड़कर क्षितिज के कोने   कोने को छूना चाहता है और फिर, अनायास आसपास पल रहे सभी रिश्ते सच्चे लगने लगते हैं। आखिर ऐसा होता क्यों है? और अचानक हमने ऐसा सोचा क्यों? हमारे मन की दहलीज़ पर जब कोई आहट होती है, जब कोई अपने कदमों के गहरे निशान बनाने लगता है दिल की ज़मीन पर, तब हमें समझ आता है कि खारा सागर भी मीठे पानी का सोता बन गया है| है न दोस्तों?

Music

दोस्तों! रात के सन्नाटों में लहरें जड़ किनारों के कानों में जा   जाकर यही फुसफुसाती होंगी ना...अरे किनारों! तुम कितने जड़ हो, बहते क्यों नहीं मेरे साथ? क्यों अभिमान से भरे हो? क्यों नहीं तरल हो जाते मेरी तरह? क्यों नहीं सरल हो जाते मेरी तरह? क्यों अहंकार में अकड़े से दिखाई देते हो हर समय? कभी झुको भी, झूमो भी, लहराओ भी! और..और फिर किसी दिन कोई किनारा चुपके से लहरों के साथ बह जाता होगा, यह कहकर कि आप मुझे अच्छे लगने लगे। किसी बड़े वृक्ष के तने से लिपटी हुई कोमल वल्लरी, कोमल लता भी तो हौले   हौले यही कहती होगी ना.. कि आप मुझे अच्छे लगने लगे। सुबह   सुबह पेड़ों की पत्तियों पर जो अनगिनत ओस की बूँदे दिखती हैं ना, कभी उन्हें ध्यान से देखिएगा, वह रात को बड़े प्रेम से लिखा गया प्रेम   पत्र लगेगा आपको..। सुबह सूरज की गर्मी के स्पर्श से ये ओस की बूँदें पिघल   पिघल कर कहती होंगी कि आप मुझे अच्छे लगने लगे।

Music

दोस्तों! ज़िंदगी की धूप हमारे जीवन में प्रेम, स्नेह, आत्मीयता को पिघलाकर, हमारे सूखेपन भर देती है, क्योंकि यह सूखापन ही हमें खुरदरा बनाता है, मार डालता है और भीतर का गीलापन, भीतर की नमी हमें ज़िंदा रखती है। जब तक हमारे मन में गीलापन नहीं होगा, तरलता नहीं होगी, सरलता नहीं होगी, मुहब्बत नहीं होगी, मुरव्वत नहीं होगी, परवाह नहीं होगी, हम किसी से जुड़ ही नहीं पाएंगे, और ना ही हमें कोई अच्छा ही लगेगा। दोस्तों! इसके लिए अहम् को गलाना पड़ेगा। अगर अहम् रहेगा, तो हम कभी भी सुंदरता को महसूस नहीं कर पाएँगे और ना ही हम कभी कह पाएँगे कि आप मुझे अच्छे लगने लगे।

इस प्यार को, स्नेह को, गीलेपन को बचा लिया यदि, तो दुनिया में इतने संदेह, इतने शक, इतने फरेब, इतना अविश्वास और इतने आतंक नहीं होंगे। हर किसी को नदियाँ, धरती, आसमान, पर्वत, फूल, पत्ते, बूटे, सभी, बड़े सुहाने, बड़े अच्छे लगने लगेंगे। इस सुंदर दुनिया को देखने के लिए सुंदर आँखें और सुंदर मन चाहिए। कहा भी गया है कि सुंदरता देखने वाले की दृष्टि में समाहित होती है। लेकिन सबसे ज़रूरी बात, एक ‘आप’ भी तो होना चाहिए। वह ‘आप’ जो हममें, आप में, आपके ज़िंदा होने का एहसास करवाए। आपके अंदर वीणा की स्वर   लहरी को जन्म दे, जिसे आप अपनी ज़िंदगी के गीत में शामिल कर सकें, जिसके आने से आपको सूरज की तपन जाड़े की गुनगुनी धूप लगे और जिसके समीप आने पर बर्फ़ भी सुलगती   पिघलती सी महसूस हो, जिसे सोचने के बाद आपकी सोच बदल जाए, मन बदल जाए। उसके होने से आपकी आँखों में चमक और होठों पर मुस्कान खिल जाए। वह ‘आप’ हम सबके पास ही है, आसपास ही है, लेकिन बात यह भी है कि क्या हमने कभी उस ‘आप’ से कहा कि दुनिया की सारी उलझनों, परेशानियों, ज़िम्मेदारियों, मजबूरियों, दुश्वारियों, दूरियों के बावजूद मुझे ज़िंदगी हसीन लगती है, सिर्फ़ इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि मुझे आप अच्छे लगने लगे हो। और हाँ..यह दौलत, यह शोहरत, ये गाड़ियाँ, ये बंगले, यह बैंक अकाउंट, सब ये दरअसल कितने झूठे हैं, सब कितने फेक हैं, सब कितने बड़े छलावा हैं, तो सच्चा क्या है? सच्ची हैं वे आँखें, वे बातें, वे शिकायतें, वे झगड़े, और...और जी हाँ...अगर आप अभी तक नहीं कह पाए हैं, तो आज कह भी दीजिए, अच्छा लगता है यह कहना भी, और सुनना भी... कि आप मुझे अच्छे लगने लगे....!

जब कोई अच्छा लगने लगता है, तो मन में एक अजीब सी हलचल होने लगती है, दिल कुछ कहने लगता है, मन बेमौसम सावन   सा भीगने लगता है, गीत बिना सुर के भी सच्चे लगने लगते हैं, दिल जैसे किसी मीठे से राज़ छुपाने लगता है। दिल बार   बार उसी इंसान की ओर खिंचने लगता है, उसकी बातें, उसकी हँसी, उसकी मौजूदगी सब कुछ खास लगने लगती है। मन में उत्सुकता, उम्मीद और थोड़ी   सी घबराहट की तरंगें उठने लगती हैं। कभी   कभी बिना किसी वजह के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है, और दिल यह सोचकर धड़कने लगता है कि अगली बार उससे कब मुलाकात होगी, जब मुलाकात होगी, तब कैसा होगा? क्या ऐसा? क्या वैसा? जब कोई अच्छा लगने लगता है...तो एक अजीब सी बात होती है—ना कोई शोर, ना कोई एलान—बस चुपचाप, किसी शाम की तरह उतर आता है वह दिल में। उसकी हँसी जैसे किसी पुराने गाने की धुन हो, जो कानों में नहीं, सीधे दिल में सुनाई देती है। उसके आने से जैसे हवा में कुछ बदल   सा जाता है—हल्की   सी ठंडक, मीठा   सा सुकून। मन पूछता है, "क्या उसे भी ऐसा ही महसूस होता होगा?" और जवाब में चेहरे पर बस एक स्मित मुस्कान होती है, जो खुद   ब   खुद होंठों से झलकने लगती है। कभी उसके नाम से दिल धड़क उठता है, और कभी उसकी एक झलक से दिन सँवर जाता है। ये एहसास... शायद प्यार नहीं, पर प्यार का पहला खत तो ज़रूर होता है, चलो खत न भी सही, खत का मज़मून तो ज़रूर है, है न दोस्तों!

MUSIC

बात जब उस ‘आप’ की हो, उसके अहसास की हो, दिल की धड़कन की हो, तो बातें ख़त्म कैसे होंगी? जिसकी वजह से आपके चेहरे पर मुस्कान आती है, आपका दिल धड़कने लगता है, उस ‘आप’ के किस्से हमें भी सुनाइए.. सुनाइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, हो सकता है, उस ‘आप’ की बातें करते   करते जीवन का सफ़र बीत जाए और फिर वे बातें ही एक किस्सा बन जाएँ.....! इसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE   12 

मत कर अभिमान रे बंदे! 19/06/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से   कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे, उस अहम की, उस अहंकार की, जो हमें उद्विग्न करता है, हम जिसे जानते   समझते तो हैं, पर जान और समझ कर भी मानने को तैयार नहीं होते, जब अति हो जाती है और उसके दुष्परिणाम सामने आने लगते हैं, तब हम सोचते तो हैं, कि क्या गलत हुआ, पर तब भी हम कभी   कभी अपनी आँखों पर पट्टी चढ़ाए बैठे रहते हैं।

MUSIC  

तेरे जैसे लाखों आए, लाखों इस माटी ने खाए

मत कर तू अभिमान रे बंदे!

झूठी तेरी शान रे!

मत कर तू अभिमान रे बंदे!

इन पंक्तियों को मैं अक्सर गुनगुनाती रहती हूँ, क्योंकि ये मुझे धरातल से जोड़े रखती हैं, याद दिलाती रहती हैं, इस खूबसूरत कायनात का मैं एक छोटा   सा जुज़ हूँ, हिस्सा हूँ, अंश हूँ, पूरी कायनात नहीं। आज फिर ये पंक्तियाँ याद आईं, क्योंकि वाकया ही कुछ ऐसा हो गया। दरअसल हुआ यह कि पिछले दिनों ट्रेन के सफ़र के दौरान एक सज्जन से मुलाकात हुई, उनसे थोड़ी बातचीत होने लगी। उन्होंने बताया कि वे उम्र का लंबा सफ़र तनहा ही काट रहे हैं| वे पेशे से लेखक हैं, ऐसा जानकर बातों में मेरी रूचि बढ़ी। बात निकल पड़ी, उनकी शिकायत थी कि प्रेम   संबंध तो बहुत बने, लेकिन वे किसी भी महिला पर भरोसा नहीं कर पाए। उन्हें कोई भी अपने योग्य लगी ही नहीं। कोई उनके शब्दों से प्रेम करती थी, कोई उनके रंग   रूप पर फ़िदा थी, तो कोई उनकी शोहरत से प्रभावित थी, उनसे प्रेम किसी ने नहीं किया। बहरहाल, वे एक महिला के साथ कुछ वर्ष रहे भी, पर फिर अलग हो गए। वे कहने लगे कि आप ही बताइए कैसे मैं इन चतुर   चालाक महिलाओं पर भरोसा कर लेता और अपनी ज़िंदगी नरक बना लेता? वे बोले, क्या आप मेरी इस दुख भरी कहानी पर भरोसा करेंगी?

मैं मुस्करा दी और मैंने कहा कि देखिए, मैं एक महिला हूँ और आप मेरे लिए अजनबी भी हैं, लेकिन मैं आपकी हर बात पर एतबार कर सकती हूँ, पर आप मुझे यह बताइए कि अपनी महिला   मित्रों और प्रेमिकाओं के साथ रहकर भी आप उन पर संदेह क्यों करते रहे? एतबार क्यों नहीं कर पाए? बोलिए? पर उनके पास इसका जवाब नहीं था। ज़ाहिर   सी बात थी कि उनका अभिमान, उनका ईगो, उनसे बहुत बड़ा था। अभिमान हमेशा आपको अकेला करता है, जबकि प्रेम और विश्वास आपके चारों ओर बस्ती बसाते हैं, फूलों की क्यारियाँ खिलाते हैं, दिल के सुराखों में गारा   मिट्टी भरकर उन्हें गढ़ते हैं| वे सज्जन तो केवल एक उदाहरण हैं, आपके   हमारे आसपास बहुत से लोग हैं, जिनमें किसी को अपने ज्ञान का अभिमान है, किसी को रूप का, किसी को दौलत का, तो किसी को शोहरत का।

क्या है यह अभिमान?

चलिए, आज इसी पर बात करते हैं, दोस्तों!

Music

दोस्तों! अभिमान हमें भीतर से हमें डराता है, वह हमें संवेदनशील नहीं होने देता, हमें पिघलने नहीं देता, हमें बरसने नहीं देता। क्या आपने कभी सोचा है, क्यों? इसलिए कि संवेदनशील होने के लिए आपको सारे आवरण हटाने होते हैं, बनावटीपन से दूर होना होता है और खुद को परत   दर   परत खोलना होता है, लेकिन अभिमान, अभिमान यह ऐसा कभी होने नहीं देता, वह हमें रोकता है, व्यक्त करने से, खुलने से, इंसान होने से, किसी के सामने अपने आप को ज़ाहिर करने से। हम हमेशा सतर्क रहते हैं, हमेशा उलझनों में घिरे रहते हैं, कोई देखने न ले, कोई जान न ले, कोई पहचान न ले, कोई चीज़ मेरे भीतर प्रवेश न कर जाए, कोई भावना छू न जाए, कोई भीतर न आ जाए। कहीं ऐसा ना हो कि कोई मेरे भीतर आकर मुझको नष्ट कर दे, मेरा वजूद खत्म कर दे, खुद को छुपाने का हुनर खूब आता है अभिमान को। अभिमानी व्यक्ति हमेशा कमज़ोर होता है, वह खतरों से घबराता है, वह जानता है कि किसी को करीब आने देने से सौ मुसीबतें आएँगी। न तो वह किसी के हृदय में प्रवेश करता है और न ही किसी को अपने हृदय के भीतर आने की अनुमति देता है। आपका क्या ख्याल है दोस्तों? ऐसा ही होता है न.. इतिहास ऐसे अभिमानी व्यक्तियों के किस्सों से अटा पड़ा है, भरा पड़ा है, है न दोस्तों!

अभिमानी व्यक्ति हमेशा एक किले के भीतर बंदी की तरह रहता है। इस किलेबंदी से उसे सुकून मिलता है, सुरक्षा का आभास होता है, वह अपने आसपास के लोगों के साथ संवाद बंद कर देता है या फिर कम कर देता है। बड़ी ताज्जुब की बात यह भी है दोस्तों, कि वह बात करना बंद करता है, उन खास लोगों से, जिन्हें वह प्रेम करता है। जैसे ही उसे प्रेम के होने का अहसास होने लगता है, वह तुरंत अपने किले में लापता हो जाता है, गुम हो जाता है, बड़े   बड़े दरवाज़ों पर बड़ी   बड़ी साँकल चढ़ाकर, वह इत्मिनान से बैठ जाता है। उसे लगता है अब बाहर की कोई भावना उस पर प्रहार नहीं कर पाएगी। यह अहंकार उसका कवच बन जाता है और वह बंदी। वह कारागृह में कैद हो जाता है, कारागृह, जिससे हम दिल कहते हैं।

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मुश्किल उस पल आती है दोस्तों, जब उन दरवाज़ों की की   होल से प्रेम झाँकने लगता है, जी हाँ, दोस्तों! प्रेम तो झाँक ही लेता है न, चाहे कितने भी पहरे हों, प्रेम अंदर प्रवेश कर ही जाता है। उषा   किरण की तरह, हौले   से, चुपके   से अपनी लालिमा लिए अपने पैर पसारने लगता है, फूट पड़ता है हॉट   स्प्रिंग की तरह, सूरज की रोशनी की तरह, एक पतली रेखा के आकार में, उस समय अभिमान घबराने लगता है, थर्राने लगता है, कुलबुलाने लगता है, अपनी सुरक्षा में इस सेंध को देखकर वह परेशान होने लगता है। आखिर मेरी सुरक्षा में सेंध लगी, तो लगी कैसे?

दोस्तों! आपको ‘अभिमान’ फिल्म याद होगी? किस प्रकार अपने झूठे अभिमान के चलते नायक नायिका को परित्यक्त करने का निर्णय ले लेता है, क्योंकि वह उसकी कला को, उसके टैलेंट को स्वीकार नहीं कर पाता, वह उसे कंट्रोल करना चाहता है, केवल अभिमान के कारण। अभिमान इतना भयभीत रहता है कि वह अपने मन रूपी सीता को, अपनी ईगो की जानकी को, लक्ष्मण   रेखा के अंदर ही रखना चाहता है। अभिमान हमेशा अकेला ही जीता है, खुद को छुपाने का करतब जानता है वह, खुद को ढकना अच्छी तरह जानता है वह। उसे प्रेम अपनी मृत्यु जैसे लगने लगती है, इसलिए अहंकारी व्यक्ति कभी प्रेमी नहीं बन पाता।

एक बड़ी सुंदर बात पढ़ी थी कहीं, कि जीवन की गहराई में उतरना है, तो असुरक्षित अनुभव करने के लिए तैयार करना होगा, तैयार रहना होगा, खतरे उठाने ही होंगे, अज्ञात में जीना ही होगा क्योंकि सुरक्षा जीवन नहीं होती। असुरक्षा में जब हम होते हैं, तो हम सदैव चुनौतियों से जूझने के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन जब हम सुरक्षित होते हैं, अपने कंफर्ट ज़ोन में होते हैं, तो हम अपने ही दायरे में फंस कर नष्ट होते जाते हैं और अपने कंफर्ट ज़ोन से बाहर हम झाँक तक नहीं पाते। अभिमानी होकर हम अपने द्वार   दरवाज़े   खिड़कियाँ   रोशनदान   झरोखे, सब बंद कर लेते हैं, जिससे हवा   खुशबू   रोशनी   मलयानिल कभी प्रवेश ही नहीं कर पाते।

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मेरे ख्याल से ऐसा जीना भी क्या जीना है, दोस्तों! इसे तो जीना नहीं कहेंगे, है न...? बल्कि इसे तो कब्र में रहना कहेंगे। समंदर इसलिए खारे होते हैं क्योंकि वे रहस्य छुपाते हैं, और  नदियाँ? नदियों के भीतर भाव बहते हैं, इसलिए वे मीठी होती है, उनके जल में मिठास होती है, वे तृप्ति देती हैं, संतुष्ट करती हैं। लेकिन समुद्र की एक बूँद भी तृप्त नहीं कर पाती। अभिमानी का समंदर एक दिन खुद ही अपनी पीड़ा के साथ खुद में डूब जाता है, घुट   घुट के मरता है वह पल   पल।

सब मेरे जैसे हैं, और मैं सभी के जैसा, बस यही भाव तो मन में रखना है, सबसे पहले हवा की खुशबू को महसूस करना होगा, उसे खुद के भीतर आने देना होगा, उसके बाद प्रेम को भीतर प्रवेश देना होगा, दरवाज़े खोल कर रखने होंगे, खिड़कियाँ खोलनी होंगी, गवाक्षों पर पड़े परदे हटाने होंगे.. फिर.. फिर देखना एक दिन प्रेम की ऊष्मा अहंकार के ग्लेशियर को धीरे   धीरे पिघला देगी, यकीनन पिघला देगी।

कितनी मीठी नदियों ने समंदर में समा जाने से ठीक पहले यही पूछा होगा, रेत ने किनारे से तड़प कर पूछा होगा, समंदर से बाहर कूद पड़ी मछली ने किसी मछुआरे से पूछा होगा, किसी ज्ञानी, किसी योगी से, किसी पगली ने पूछा होगा, मन्नत के धागों ने देव   मंदिर के देवता से, तो किसी दस्तक ने बंद दरवाज़े से पूछा होगा कि क्यों करता तू अभिमान रे बंदे? क्यों करता तू अभिमान!

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बात जब मीठी नदियों से लेकर खारे समंदर तक की हो, अपने मन के दरवाजों   खिड़कियों को खोलने की हो, दिल पर जमे ग्लेशियर को पिघलाने की हो, खुशबू को महसूस करने की हो, मन्नत के धागों से देव   मंदिर के देवता तक की हो, तो बातें होंगी अनंत, है न दोस्तों! ऐसी बातें ख़त्म कैसे होंगी? अपने कुछ किस्से हमें भी सुनाइए.. सुनाइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, हो सकता है, ये बातें करते   करते आप भी सोचने पर मजबूर जाएँ कि क्यों करता मैं अभिमान? किस पर करता मैं अभिमान? इसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE  13  

क्या कभी खुद से प्रेम किया? 03/07/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से  कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे, प्रेम की, और वह भी खुद से प्रेम की.. भला यह भी क्या बात हुई? हम तो इससे प्रेम करते हैं, उससे प्रेम करते हैं, भला अपने से, खुद से प्रेम का क्या औचित्य? आखिर क्या है आत्ममुग्ध होना? क्या यह आत्मकेंद्रित होना है? खुद से प्रेम करना.. आखिर इसका अर्थ क्या है? क्या आत्ममुग्ध या आत्मकेंद्रित होकर भी हम दूसरोंं से प्रेम कर सकते हैं? आइए, इन्हीं सब बातों पर करते हैं आज चर्चा..

MUSIC  

दोस्तों! वह गीत तो आपने ज़रूर सुना होगा..सजना है मुझे.. ज़रा उलझी लटें सँवार लूँ, हर अंग का रंग निखार लूँ, कि सजना है मुझे.. सच कहूँ, तो अपने को सजाने  सँवारने में संकोच कैसा? अक्सर लोग जब रिश्तों और संबंधों पर चर्चा करते हैं, तो खूब शिकायत करते हैं कि फलां व्यक्ति से उन्होंने बहुत प्रेम किया, उसके साथ समय नष्ट किया, मंहगे तोहफ़े दिए, पर.. पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। गोया कि किसी फायदे के लिए प्रेम किया हो? या कि ये सब बेकार की बातें हैं, कभी किसी से प्रेम करना ही नहीं चाहिए, सब धोखेबाज होते हैं, कोई किसी का नहीं, आदि  आदि। कुछेक महिलाएँ खुद से ही प्रेम करने की सलाह देती दिखाई देती हैं, कि दुनिया के सभी पुरुष बहुत बुरे हैं, इसलिए खुद से प्रेम करो और खुश रहो। तो कहीं पुरुष कहते हैं, कि महिलाएं बहुत चालाक और फ़रेबी हैं, इनसे बचो, इनसे दूर रहो, खुद में खुश रहो।

क्या सिर्फ़ खुद से प्रेम किया जा सकता है? आत्मकेंद्रित या आत्ममुग्ध होकर भी क्या आप खुश रह सकते हैं? मेरे ख्याल से सबसे ज़्यादा कुंठित तो वे ही लोग होते हैं, जो आत्ममुग्ध होते हैं और एक दिन अपनी ही कुंठाओं में डूब जाते हैं। ये आत्ममुग्ध कभी किसी से प्रेम नहीं कर पाते, वे अपनी ही चाहत के घेरे में कैद होकर रह जाते हैं, खुद तो मरते ही हैं साथ ही प्रेम को भी नष्ट कर देते हैं। मेरी एक मित्र हैं, उनसे जब मिली, तो उन्होंने बड़ी शान से मुझे कुछ तोहफ़े दिखाए, जो उनके नए प्रेमी ने उन्हें दिए थे और वे तोहफे भी दिखाए, जो उन्होंने पिछले प्रेमी से रिश्ता टूटने के बाद वापस माँग लिए थे। यह तो वस्तुओं के लेन  देन का रिश्ता हुआ, व्यापार हुआ, प्रेम कहाँ हुआ? है न दोस्तों! अगर प्रेम था, तो वो खत्म कैसे हो गया? कोई आपके बनाए साँचे में नहीं ढला, तो रिश्ता खत्म? प्रेम खत्म? कोई आपके जैसा नहीं हो सका, तो तुम कौन?

एक और उदाहरण देती हूँ, एक पुरुष मित्र हैं, जो अक्सर कहते हैं कि वे प्रेम तो कर लें, लेकिन उससे क्या ही लाभ? क्या ही फ़ायदा? हम तो खुद से प्रेम करते हैं, खुद के लिए जीते हैं। मैंने पूछा फिर भी इतने दुखी क्यों हो? जब खुद से प्रेम है, तो खुश रहो न भई, चेहरे पर मुस्कान क्यों नहीं? आँखों में से प्रेम झाँकता क्यों नहीं? हमेशा डरे  डरे से क्यों रहते हो? अशांत क्यों है मन, आनंद क्यों नहीं है जीवन में? और प्रेम  मदिरा की वह खुमारी कहाँ है? मित्र चुप थे, कोई जबाव नहीं था उनके पास। जब खुद ही रीते हो अंदर से, तो दूसरे को क्या देंगे आप? फिर लोग मंहगी वस्तुओं का लेन  देन करके प्रेम की कमी को पूरा करने लगते हैं, खुश होते हैं और वस्तुओं में प्रेम खोजने लगते हैं और कहते हैं देखो, हम कितना प्रेम करते हैं एक दूजे से, कोई किसी को कार या बंगला गिफ्ट करता है, कोई किसी को हीरे  मोती, लेकिन हीरा तो बना है, सदा के लिए.. लेकिन प्रेम..प्रेम का कहीं अता पता नहीं...फिर सदा  सदा के लिए वाली बात तो हवा में काफ़ूर हो गई|

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सच्ची बात तो यह है दोस्तों, कि लोग जानते ही नहीं कि खुद से प्रेम करने का क्या मतलब है? खुद से प्रेम करना यानी खुद को समझ लेना, खुद को जान लेना, खुद को बतला देना कि मुझे ये पसंद है, या मुझे इसकी चाह है और मैं इसे चाह कर खुश हूँ। हम जब किसी को दुःख देते हैं न, तो उससे ज़्यादा खुद दुखी होते हैं। इसके उलट हम जब किसी से प्रेम करते हैं न, तो उससे ज़्यादा खुद सुखी होते हैं। हम प्रेम अपने लिए करते हैं, हमें कोई पसंद है, हमें कोई भाता है, हम किसी को सोचते हैं, याद करते हैं और खुश हो लेते है। हमने प्रेम कर लिया, तो कर लिया, ये है हमारा प्रेम संपूर्ण रूप से।

अब दूसरा करें या न करें, प्रतिदान दे या न दे, यह उसकी समस्या है, हमारी नहीं। हमारे मन को ख़ुशी मिली, किसी को चाह कर, याद करके, तो हम डूबेंगे आनंद में, दूसरा न डूबे, तो यह  उसकी सोच है। प्रेम हमारे दिल में खिला, चंदन हमारे मन में महका, बेला हमारे हृदय में आधी रात को महकी, हम उसे महसूस करेंगे न, हम सुगंध से भर जाएँ, ना कि इस चिंता में कुंठित हो जाएँ कि वो अभी कहाँ होगा, किसके साथ होगा, मुझे याद करता है या नहीं, प्यार करता है या नहीं। इन बेकार के सवालों के जवाब नहीं मिलते कभी। उलटे इनसे आपके रिश्ते खराब होते हैं, प्रेम को समझने से पहले खुद को समझना होगा कि आखिर हम चाहते क्या हैं?

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हाँ, प्रेम एक व्यक्ति करता है, दूसरा तो उसकी चमक से चमकता है बस। चंपा कहीं ओर खिलती है, लेकिन उसकी खुशबू से कहीं दूर, बहुत दूर कोई बौरा  बौरा कर झूमने लगता है, प्रेम के अपने रहस्य हैं, यही तो शक्ति है प्रेम की, इसे ही तो समझना है बस। हम जब खुद को प्रेम से भर लेते हैं, तो हम प्रेम  पुंज हो जाते हैं, प्रेम के चुंबक हो जाते हैं। निःस्वार्थ भाव से जब साँसों की माला पे किसी का नाम सिमरा जाता है तो, इस हौले  हौले चलने वाले मनकों की गति से दूर..बहुत दूर कोई चिड़िया पंख फड़फड़ाने लगती है, यक़ीनन ये सब खुद से प्रेम के ही नतीजे हैं, हैं न दोस्तों!

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हमें अपने भीतर जो सबसे अच्छा गुण लगता है, हमें उस गुण से प्रेम करें। यदि हमें लोगों से प्रेम से बातें करना पसंद हैं, उनकी मदद करना या उनके दुःख  दर्द सुनना, तो गर्व कीजिए, अपने इस गुण पर, अपने किए पर कभी अफ़सोस मत कीजिए। हमारे पास जो था, हमने दे दिया, कोई नहीं लौटाए, तो ये उसकी समस्या है, हमारी नहीं। हमें हमारा प्रेम  कलश हमेशा भरते रहना चाहिए, जब भर जाए, तो उसे मुस्काते हुए छलकाते जाना चाहिए। आईने में खुद को देख मुस्काना सीखना होगा दोस्तों, वैसे बताइए, कभी मुस्काए हैं आप खुद को आईने में देखकर?

दोस्तों, जब तक खुद के प्रति प्रेम से नहीं भरेंगे, तब तक दूसरों से कभी प्रेम नहीं कर सकेंगे। भीतर.. बहुत भीतर से झरने फूटेंगे, तभी बाहर हरियाली होगी। शुरुआत बूँद जैसी छोटी ही क्यों न हो, लेकिन हो तो सही...। सच ही तो है भई, मेंहदी लगे हाथों से आप मेंहदी ही तो बाँटेंगे.. है न दोस्तों!

यहाँ एक और ज़िक्र भी ज़रूरी है.. अमेजन दुनिया की सबसे बड़ी नदी है, लेकिन जहाँ से वह निकलती है, वहाँ जल की एक  एक बूँद टपकती है। दो बूँदों के बीच लगभग बीस सेकंड का फ़ासला होता है, लेकिन एक  एक बूँद गिर  गिर कर अमेजन जैसी विशाल नदी बन जाती है, इतनी विशाल कि जब सागर में समाने के लिए सागर  तट पर पहुँचती है, तो सागर भी हैरान हो जाता है, परेशान हो जाता है,  उसे देख कर कि यह नदी है या मेरी तरह एक सागर?"

सच ही तो है दोस्तों, प्रेम भी तो ऐसे ही शुरू होता है बूँद  बूँद से, और कैसे अथाह होता जाता है सागर  सा... व्यक्ति  व्यक्ति से और एक दिन व्यक्ति "समस्त" से प्रेम करने लगता है। प्रेम अनंत है इसलिए एक व्यक्ति इसे संभाल ही नहीं सकता, घबरा जाता है, भय खाने लगता है, डूब जाता है और प्रेम उसे डुबो कर फिर आगे बढ़ जाता है। अब वो प्रेम नहीं, प्रार्थना बन जाता है। प्रेम कभी किसी एक व्यक्ति पर नहीं टिकता, वो फैलता जाता है, मरता नहीं हैं वह, बल्कि अपने रूप बदलता रहता है। जो प्रेम कर रहा है, वो रहे न रहे, जिसे प्रेम किया जा रहा है, वो भी रहे न रहे, लेकिन प्रेम फिर भी रहता है हमेशा...एक शाश्वती की तरह, हर परिस्थिति में, हर हाल में, हमेशा। यही तो कोशिश होनी चाहिए हमारी कि प्रेम बना रहे।

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दोस्तों! ऐसा ही होता है प्रेम! आप प्रेमवश होकर कष्ट भी उठा लेते हैं, खुद दुःख में भी डूब जाने के लिए तैयार हो जाते हैं, लेकिन प्रेम को होने देते हैं। प्रेम को खोजने आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं होती, आपको खुद के भीतर ही तो झाँकना होता है बस..। हम सभी के भीतर हमेशा प्रेम  कलश भरा रहता है, उसे बस प्रेम से छूने भर की देर होती है, वो स्वतः ही छलकने लगता है। जब भी कोई प्रेम से पुकारता है, मन को छूता है हमारे, तो प्रेम  कलश भर  भर जाता है। आप जितना उँड़ेलते हैं, वह मीठे पानी का सोता, अमृत  सदृश झरना, फिर  फिर भर आता है। पर.. पर, अक्सर हम उस कलश के ऊपर भय,शंकाओं पूर्वाग्रहों और संदेहों की साँकल चढ़ा देते हैं, ताले जड़ देते हैं, जैसे उन्मुक्त झरने के ऊपर भारी पत्थर रख दिया हो... लेकिन भीतर, बहुत भीतर फिर भी प्रेम बहता रहता है चुप  चाप, मंथर गति से, बिना कोई आवाज़ किए..। उसे बहने दीजिए न.., ऊपर आने दीजिए न.., रोकिए मत..., टोकिए मत..., छलकने दीजिए उसे, कुछ भी हो जाए, प्रेम हर हाल में जीवित रहना चाहिए। लेकिन पहली शर्त है कि पहला प्रेम खुद से हो, खुद से हो प्रेम, खुद को प्रेम से भर लीजिए फिर दूसरे से प्रेम कीजिए। व्यष्टि से समष्टि की ओर बढ़िए, फिर पूछिए खुद से, क्या कभी खुद से प्रेम किया है?

MUSIC

बात जब खुद से प्रेम करने की हो, प्रेम  कलश की हो, स्नेह  निर्झर की हो, मीठे पाने के सोते की हो, खुद के भीतर झाँकने की हो, मीठी नदियों से लेकर खारे समंदर तक की हो, अपने मन के दरवाजों  खिड़कियों को खोलने की हो, प्रेम नहीं, प्रार्थना की हो, खुशबू को महसूस करने की हो, तो बातें हैं बहुत सारी, तो यूँही ख़त्म कैसे हो जाएँगी? अपने कुछ किस्से  कहानियाँ हमें भी सुनाइए.. सुनाइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, हो सकता है, ये बातें करते  करते आप खुद से प्रेम करने के सच्चे मायने जान जाएँ, और खुद से प्रेम करने लगें, है न दोस्तों? इसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से  कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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EPISODE   14 

किताबें बहुत सी पढ़ी होगीं 17/07/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से    कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे, किताबों की, आप कहेंगे, कुछ बोरिंग हो रहा है, क्या पढ़ने   पढ़ाने की बातें लेकर बैठ गईं? पर दोस्तों, मैं आपसे यह पूछना चाहती हूँ कि क्या किताबें केवल कागज़ पर छपे अक्षरों से ही बनती है? क्या ज़िंदगी की भी कोई किताब होती है, जिसे हम पढ़ते हैं, गुनते हैं? एक शेर में शायर कहता भी तो कहता है  

किताब   ए   दिल का कोई भी पन्ना सादा नहीं होता,

निगाह उस को भी पढ़ लेती है, जो लिखा नहीं होता।

(मोहन त्रिपाठी जी)

MUSIC  

जी हाँ दोस्तों! हम ज़िंदगी भर अनगिनत किताबें पढ़ते हैं और इन किताबों में मन के प्रश्नों के उत्तर खोजते हैं, ना जाने कितनी किताबें पढ़ डाली होंगी अभी तक मैंने भी, कितनी ही किताबें पढ़ी होंगी, आपने भी, कुछ थोड़ी   थोड़ी याद रह गईं, कितनी ही पढ़ कर भूल गए। लेकिन कुछ किताबें ऐसी भी होती हैं, जो हमें ताउम्र याद रहती हैं। दोस्तों! हम सभी अपनी   अपनी ज़िंदगी जीते हैं, कोई अपने लिए जीता है, तो कोई किसी और के लिए अपना पूरा जीवन गुज़ार देता है। यह जीवन भी तो एक किताब ही है ना, जिसे हम जन्म के दिन से लिख रहे हैं और अंतिम दिन तक लिखते रहेंगे। कितने हज़ारों   लाखों शब्दों से अपने जीवन की किताब को लिख डाला, कौन जाने? कैसे लिखा? अधूरा लिखा या पूरा? खुशी लिखी या गम? कभी सोचा ही नहीं, बस लिखते ही चले गए। कभी इस किताब को पढ़ने की सोची ही नहीं, और जिस दिन पढ़ने बैठे, उस दिन किताब ही रूठ गई, बोली, अब बहुत देर हो चुकी है, अब सो जाओ तुम।

क्यों समय रहते जीवन की किताब नहीं पढ़ी हमने? भूल गए क्या? या फिर हम आलस से भर गए? अंतिम नींद से पहले हमें सारी किताब पढ़ लेनी चाहिए थी। हम रोज़ नए   नए पन्नों पर हर पल का हिसाब लिखते चले गए, बही खाते लिख   लिख कर खुश होते चले गए, लेकिन उन खातों को, इन पोथियों को कभी गलती से भी उलट   पलट कर देखा नहीं। क्या बहुत बिजी रहे? किसी दिन फ़ुरसत मिली भी तो...? फिर बड़ी कोशिशों के बाद, मशक्कत के बाद, किसी दिन फुर्सत से अगर देखने बैठे, कुछ पन्ने पलटे, तो पाया कि हमारी ज़िंदगी का पहला पन्ना हमारे जन्म से शुरू हुआ है। 

music 

रोज़ एक नई इबारत, रोज़ एक नई इमारत, बचपन की वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी, गुड्डे   गुड़िया के ब्याह और इन्हीं में रंगे   रंगे से कुछ पन्ने, कभी आम के पेड़ से कच्चे आम चुराने के आनंद से सराबोर कुछ पन्ने, कुछ आगे बढ़ें, तो युवावस्था के इंद्रधनुषी पन्ने हैं, जिनमें कहीं प्रेम का सुर्ख गुलाब है, तो कहीं पीले   नारंगी एहसासात...इंद्रधनुषी रंग, ऐसे रंग जो हमारी जवानी के रंग में रंगे थे। कहीं फागुन के रंग हैं, तो कहीं सावन की रिमझिम फुहार से भीगे पन्ने। इस किताब में कुछ पन्ने गुलाबी और थोड़े सुर्ख भी हैं, जिन पर लिखी हैं प्रेम की, इज़हार की, मिलन की इबारत, ये पन्ने इस किताब के सबसे चमकीले पन्ने हैं, जो पूरी ज़िंदगी हमें रोमांचित करते रहे, हम इन्हें बार   बार पढ़ना चाहते हैं क्योंकि प्रेम के ये पन्ने कभी बदरंग नहीं होते, ये उम्र के हर मोड़ पर हमें लुभाते हैं। इन पन्नों पे हमने अपनी सबसे सुंदर भावनाएँ दर्ज की हैं। लेकिन..लेकिन देखो तो ज़रा इस किताब की कुछ पन्ने स्याह क्यों हैं? काले   नीले   सलेटी और थोड़े बदरंग...? राख जैसे धूसर...ज़रूर ये दर्द   दुःख और पीड़ा के पन्ने होंगे, तनहाइयों के पन्ने, इंतज़ार के पन्ने, जो आँसुओं से भीग   भीग कर गल गए हैं। ज़रा ध्यान से....इन्हें ज़रा आराम से उलटना   पलटना, वरना ये चूर   चूर हो जाएँगे और चिंदी   चिंदी हो कर चारों ओर फैल जाएँगे। ये दर्द के पन्ने, हम दोबारा कभी पढ़ना नहीं चाहते। इन्हें पढ़ने से हमारा अंतर्मन दुखी होता है, हम दुख के सागर में डूब जाते हैं। ये काले   धूसर पन्ने हमें बिल्कुल नहीं सुहाते।

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चलिए, आगे बढ़ते हैं, आगे इस किताब में कुछ सतरंगी पन्ने जगमगा रहे हैं। इनमे दर्ज है, किसी की मुस्कराहट, जो कभी उसके होठों पर हमने सजाई थी, या किसी ने रख दी थी हमारे होंठों पर। ये हँसी   ख़ुशी के पन्ने....मुहब्बत के पन्ने...मुरव्वत के पन्ने...इंसानियत के पन्ने....सतरंगी   इंद्रधनुषी पन्ने......सब झूम   झूम कर मुझे बुलाते हैं...देखो न...कितने मासूम..कितने कोमल हैं ये पन्ने।

अरे यह क्या?...हमने किताब में ये कुछ पन्ने, मोड़ कर क्यों रखे हैं? ये तो शायद बिल्कुल निजी हैं, मेरे अपने पन्ने हैं, शायद इनमें मैने अपने निजी पलों को छिपा कर रखा है। ये पन्ने, मेरे गिर कर उठने का हिसाब रखते हैं, फ़र्श से अर्श की हमारी सीढ़ी की ऊँचाई पर नज़र रखते हैं, मेरे आँसू कब मेरी शक्ति बन गए, इसका ब्योरा रखते हैं, ज़िंदगी की किताब के ये पन्ने हमें जीने का हौसला देते हैं। तनहाइयों में जब कोई पास नहीं होता, तो ये हमें प्यार से थपकी देते हैं। कभी हमारे कांधे पर हाथ रख देते हैं, हमें सहारा देते हैं, कहीं जब हम फिसलने लगते हैं, गिरने लगते हैं, तो एक छोटी   सी ऊँगली का सहारा देकर ये हमें उठा लेते हैं, हमारा संबल बनते हैं और फिर हमारी आँखों से आँसुओं की गर्म धारा बहने लगती है। पर इन्हें छूना नहीं, ये बहुत ही कोमल हैं| दुनिया केवल ऊंचाई देखती है, मंज़िल देखती है, उस मंज़िल तक का सफ़र, पथरीला सफ़र किसी को दिखाई नहीं देता, उसी का हिसाब   किताब है इन पन्नों में, ये पन्ने मुझे अहंकार करने से भी रोकते हैं, मुझे जमीन पर रखने का काम भी करते हैं ये..।

music 

चलिए दोस्तों! अब अगले पन्ने पलट कर देखते हैं, पर इन पर तो कुछ लिखा ही नहीं हैं, बिल्कुल कोरे...आखिर क्यों? इन पन्नों में शायद कुछ ख़ास है.....ये पन्ने उन भावनाओं, उन ख्वाहिशों के नाम के पन्ने हैं, जिन्हें कभी व्यक्त नहीं किया जा सका, बहुत   सी अनकही बातें छुपी हैं यहाँ, बहुत   सी अनकही बातें लिखी जाएँगी यहाँ, कुछ नहीं लिखी गई हैं और कुछ लिखी हैं, पर दिखती नहीं हैं....ऐसी हैं ये बातें। इसलिए ये पन्ने आज खाली दिखाई देते हैं....संवेदनाओं के नाम लिखे गए ये पन्ने हैं...छोड़े गए हैं ये पन्ने। वैसे शब्दों में इतना सामर्थ्य है भी कहाँ कि वे किसी की भावनाओं को, संवेदनाओं को, इच्छाओं को पूरी तरह व्यक्त कर दे? सारा अनकहा इन्हीं पन्नों पर लिखा है। चाहे वे टूटी   फूटी ख्वाहिशें हों, आधे   अधूरे अरमान हों, कुछ रिश्ते हों, कुछ प्रेम भरे ख़त हों, जो कभी लिखे ही नहीं गए और अगर लिखे भी गए, तो कभी भेजे नहीं गए। कुछ आँसू, जो गालों पर ही सूख गए, कुछ अनकही बातें, जो होंठो के किनारे पर ही चिपककर रह गईं। दोस्तों! इन पन्नों को पढ़ने की नहीं, महसूसने की ज़रुरत है। इन्हें छूना मना है, आप छुए नहीं, बहुत कोमल हैं, इनके मुरझाने का डर है।

Music

दोस्तों!

ज़िंदगी की किताब कई पन्नों से पूरी है,

पर कुछ कहानियाँ हैं, जो लफ़्ज़ों में भी अधूरी हैं।

(साभार    फ़ेसबुक)

अरे! इस किताब के आख़िरी कुछ पन्ने फटे हुए से क्यों दिखते हैं? ज़रुर ये वो पन्ने होंगे, जो ज़िंदगी की किताब से हमेशा के लिए दूर हो गए होंगे। मगर उनसे अलग होने के निशान किताब पर बखूबी देखे जा सकते हैं। बहुत से रिश्ते, बहुत से नाते, बहुत से प्रिय, बहुत से अपने...जो हमसे छूट गए, जो हमसे रूठकर सदा   सदा के लिए चले गए, जिनके लिए मन आज भी तड़पता है और कहता है, कहाँ गया उसे ढूंढो....ऐसे रिश्तों के निशान अमिट होते हैं, हम इन्हें भूलना भी चाहें, तो भी दिल इन्हें भूलने नहीं देता। क्योंकि यही तो हैं वे पन्ने, जिनमें उनकी यादें बसी हुई हैं, उनके प्यार की यादें, उनके साथ की यादें, उनके रिश्तों की यादें.. यादें.. जो हमेशा तड़पाती हैं।

तो दोस्तों, ये है ज़िंदगी की किताब...हर एक की अपनी किताब होती है...अब हमें तय यह करना है कि हम इसे किस तरह संजोते हैं? पढ़ते हैं? लिखते हैं? या फिर पन्नों को फाड़ डालते हैं? हमारे दुनिया से जाने के बाद हमारे इन पन्नों को कोई प्रेम से क्यों पढ़ना चाहेगा? कुछ तो करना ही होगा। क्यों न ऐसी किताब बन जाएँ, जिसमें सूखे हुई गुलाब के फूल सदियों   सदियों तक महका करें और कहते रहें कि रहें न रहें हम, महका करेंगे बनके कली, बनके सबा बागे वफ़ा में.... है न दोस्तों..!

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तो देखा आपने, ज़िंदगी की इस किताब में असंख्य पन्ने हैं, पृष्ठ पलटते जाइए, देखिए, ज़िंदगी क्या   क्या रंग दिखाती है, सारे रंग समाए हैं इसमें। जब असंख्य रंग हैं इस किताब में, असंख्य पृष्ठ हैं इसमें, असंख्य कही   अनकही बातें, असंख्य जज़्बात, असंख्य भावनाएं, तो बातों का सिलसिला भी लंबा ही होगा न, इसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइए, अपनी कहानी, अपने किस्से। अपनी ज़िंदगी के किस्से   कहानियाँ हमें सुनाइए.. सुनाइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, यूँ ही बातें करते   करते आप अपनी ज़िंदगी की किताब के कुछ शब्द पढ़ सकें, उसे पढ़ने की फ़ुरसत निकाल सकें, क्योंकि यह बेहद ज़रूरी है, है न दोस्तों? इसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

 

*************************************************************EPISODE   15 

लव.. यू ज़िंदगी!  31/07/26

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नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से   कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे, सकारात्मकता की, पॉज़िटिविटी की, अदम्य साहस की, जिजीविषा की, क्योंकि इन्हीं के कारण हम कह पाते हैं   लव.. यू ज़िंदगी!, है न दोस्तों?

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दोस्तों! यूँ तो ज़िंदगी में अनेक लोग मिलते हैं, कुछ याद रह जाते हैं, कुछ को हम भूल जाते हैं, पर कुछ ऐसे भी होते हैं, जो हमेशा के लिए हम में समा जाते हैं, हमारे व्यक्तित्व का अंग बन जाते हैं, गाहे   बगाहे हम उन्हें याद करते रहते हैं, अक्सर उनका ज़िक्र करते हैं, और वे हमारी ज़िंदगी में, ज़िंदगी को देखने के नज़रिए में सकारात्मक, पॉज़िटिव बदलाव लाते हैं।

जी हाँ दोस्तों! आज मैं बात कर रही हूँ, एक ऐसी ही शख्सियत की, जिन्होंने सच में दुनिया को समझाया कि ज़िंदगी को प्यार कैसे किया जाता है। बात है अरुणिमा सिन्हा की, एक राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी....ट्रेन एक्सीडेंट में एक पैर गवां देने के बाद.....माउंट एवरेस्ट सम्मिट करने का संकल्प लेना...उसे पूरा करने की जद्दोजहद....क्यों?..आखिर क्यों? केवल इसलिए कि लव.. यू ज़िंदगी! यानी जीने की चाह...अदम्य साहस के साथ जिजीविषा...अहा ज़िंदगी....!! लव..यू ज़िंदगी!

आखिर क्या है यह ज़िंदगी?

क्या खेल है, आनंद है, पहेली है, नदी है या झरना है या बस..साँसों की डोर थामे उम्र के सफ़र पर बढ़ते जाना है ज़िंदगी?

यह साधना है या यातना?

सुख है या उलझाव?

आज तक ज़िंदगी का अर्थ कोई भी पूरी तरह कभी समझ ही नहीं पाया है। आप अपनी ज़िंदगी किस तरह जीना चाहते हैं? यह तय करना ज़रूरी है। आखिरकार ज़िंदगी आपकी है। यकीनन, आप जवाब देंगे    क्या ज़िंदगी को अच्छी तरह से जीने की तमन्ना है? दरअसल, ज़िंदगी एक व्यवस्था है, ऐसी व्यवस्था, जो जड़ नहीं चेतन है, स्थिर नहीं, गतिमान है। इसमें लगातार बदलाव भी होने हैं। जीवन की अर्थवत्ता हमारी जड़ों में हैं। जीवन के मंत्र ऋचाओं से लेकर संगीत के नाद तक समाहित हैं। हम इन्हें कई बार समझ लेते हैं, ग्रहण कर पाते हैं ,तो कहीं   कहीं भटक भी जाते हैं और जब   जब ऐसा होता है, ज़िंदगी की खूबसूरती गुमशुदा हो जाती है। हम केवल घर को ही देखते रहेंगे, तो बहुत पिछड़ जाएँगे और केवल बाहर को ही देखते रहेंगे, तो भी टूट जाएँगे। मकान की नींव देखे बगैर, कई मंज़िलें बना लेना खतरनाक है, पर अगर नींव मजबूत है और फिर मंज़िल नहीं बनाते, तो अकर्मण्यता है, आलस है, कामचोरी है। है न दोस्तों! केवल अपना उपकार ही नहीं, परोपकार के लिए भी जीना है। अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी जीना है। यह हमारी ज़िम्मेदारी भी है और ऋण भी, जो हमें समाज और अपनी मातृभूमि को चुकाना होता है।

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महर्षि परशुराम जी ने यही बात भगवान कृष्ण को सुदर्शन चक्र देते हुए कही थी कि वासुदेव कृष्ण, तुम बहुत माखन खा चुके, बहुत लीलाएँ कर चुके, बहुत बांसुरी बजा चुके, अब वह करो, जिसके लिए तुम धरती पर आए हो। परशुराम के ये शब्द जीवन की अपेक्षा को न केवल उद्घाटित करते हैं, बल्कि जीवन की सच्चाइयों को परत   दर   परत खोलकर रख देते हैं। हम चिंतन के हर मोड़ पर कई भ्रम पाल लेते हैं। प्रतिक्षण और हर अवसर का महत्व जिसने भी नज़रअंदाज़ किया, उसने उपलब्धि से स्वयं को दूर कर किया है। नियति एक बार एक ही मौका देती है। याद रखें, वर्तमान भविष्य से नहीं, अतीत से बनता है। सही कहा न दोस्तों!

कोई कहता है कि ज़िंदगी एक आईना है, सच   झूठ का, ग़म   ख़ुशी का, नफ़रत   प्यार का, इंसान और इंसानियत का... क्या सचमुच?

कोई कहता है कि ज़िंदगी एक कश्ती है, डूबती   उबरती लहरों के ऊपर, इठलाती   बलखाती   सी हवा से बातें करती। कोई कहता है कि ज़िंदगी एक फ़लसफ़ा है, सुख   दुख इसके दामन में खिलते   मुरझाते हैं, कभी हँसी   ठिठोली करते, कभी आँखें नम कर जाते, ना कोई तय पैमाना है इसका, ना कोई सिद्ध   सूत्र इस प्रमेय का, ये तो उतना ही है, जितना जिसने जाना, जितना जिसने पहचाना है, ना कोई इसका ओर है, ना कोई छोर, लगे ऐसे जैसे नीले अंबर में उड़ती पतंग की डोर है I

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चलिए दोस्तों, एक कहानी सुनाती हूँ…. एक जंगल में शेर और कई तरह के जानवर रहते थे   भालू, चीता, गीदड़, बाघ, हिरण, हाथी आदि। एक बार उस जंगल में भयानक आग लग गई। चारों तरफ आग की लपटें आसमान को छूने लगीं। हिरण, शेर, गीदड़ सभी जान बचा कर भागने लगे। उसी जंगल में एक पेड़ पर एक चिड़िया भी रहती थी, भयानक आग को देखकर वह घबराई  नहीं, जल्दी से उड़कर पास के तालाब पर गई और चोंच में पानी भरकर आग पर डालने लगी। चिड़िया को ऐसा करते देख कौआ उसका मज़ाक उड़ाते हुए बोला    “चिड़िया रानी,चिड़िया रानी, यह क्या कर रही हो? तुम इतनी छोटी हो और यह तुम भी जानती हो कि तुम्हारी चोंच भरे पानी से यह आग नहीं बुझने वाली है, तो फिर क्यों बार   बार प्रयास कर रही हो?” चिड़िया बोली     “मैं जानती हूँ कि मेरे अकेले और छोटे से प्रयास से यह भयानक आग नहीं बुझने वाली है, पर जिस दिन इस जंगल का इतिहास लिखा जाएगा, उस दिन तेरा नाम देखने वालों में और मेरा नाम आग बुझाने वालों में लिखा जाएगा।”

यह कहानी मैंने बचपन में पढ़ी थी और आज भी इसका एक   एक शब्द दिल में बसा है। दोस्तों, हमारी ज़िंदगी चुनौतियों का सागर है। जब तक ज़िंदगी है, छोटी   बड़ी चुनौतियाँ आती ही रहेंगी। इसलिए हमें अपने ज़िंदगी की हर चुनौती को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए क्योंकि हम सब अच्छी तरह से जानते हैं कि अगर हम ज़िंदगी   सागर में उठती   गिरती लहरों को देखकर डर गए, तो हम इसे पार कैसे करेंगे?

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।

मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।।

ज़िंदगी एक खूबसूरत एक सफ़र है। दोस्तों, अगर आपने कभी नाव में बैठकर यात्रा की होगी, तो आपने तीन तरह के लोगों को देखा होगा। एक तरह के लोग वे होते हैं, जो नदी या सागर में उठती लहरों को देखकर डर के मारे नाव में बैठते ही नहीं। दूसरी तरह के लोग वे होते हैं, जो डरते   डरते नाव में तो बैठ जाते हैं, परंतु वे जैसे   तैसे थरथराते हुए सफ़र को पूरा करते हैं, और तीसरे प्रकार के लोग वे होते हैं, जो उस सफ़र को इंजॉय करते हैं, जो उस सफ़र का मज़ा लेते हैं। सोचिए, आप किस श्रेणी में आते हैं?

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दोस्तों! बुरा वक्त कहकर नहीं आता। बुरे वक्त में भी हौसला बनाए रखिए। अब शायद आप यही सोचेंगे कि कहने और करने में बहुत फ़र्क होता है। जिस इंसान के ऊपर मुसीबत आती है, उसका दर्द सिर्फ़ वही जानता है, तो ठीक है, मैं इस बात को मानती हूँ, लेकिन जब हमारे पास दो ऑप्शनस  हों, 'लड़ो या मरो' तो फिर लड़कर क्यों न मरें? मरना तो है ही, तो हम लड़ने से पहले ही चुनौतियों के सामने घुटने क्यों टेकें? खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से इतना सक्षम क्यों न बनाएँ कि हम विषम परिस्थितियों में भी न टूटें। शायद हम बच जाएँ!

बेहतरी की कोई सीमा नहीं होती, दोस्तों! कोई भी इंसान अगर चाहे, तो वह खुद में अपनी इच्छा के अनुसार बदलाव करने में सक्षम है। अगर आपको लगता है कि आप कमज़ोर हैं, तो हानिकारक वस्तुओं का सेवन करने के बजाए पौष्टिक और शक्तिवर्धक खाद्य पदार्थों का सेवन कीजिए। रोज़ाना कसरत कीजिए, योग कीजिए, दौड़ लगाइए। कुछ भी कीजिए, लेकिन खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से मज़बूत बनाइए। अपने अंदर आत्मविश्वास पैदा कीजिए क्योंकि ज़िंदगी की कठिन चुनौतियों का सामना करने के लिए आपका स्वस्थ और फ़िट रहना अति आवश्यक है।

सपने अपने भी होते हैं और सपने सच्चे भी होते हैं, दोस्तों! अपने सपनों को अपना बनाएँ, अपने सपनों को सच्चा बनाएँ। सपनों को पूरा करने में जो आनंद आता है न, वह अतुलनीय है। अपने सपनों को पूरा करने में लगन और परिश्रम से जुट जाइए, फिर देखिएगा, कोई उन्हें पूरा होने से नहीं रोक सकता। ज़िंदगी में चाहे कितनी ही मुश्किल घड़ी क्यों न आ जाए, चाहे कितना भी बुरा वक्त क्यों ना आ जाए, कभी निराश न हों, कभी हिम्मत मत हारें और अगर हारना भी पड़े, तो बहादुरों की‌ तरह लड़कर हारें, कायरों की तरह जान गँवा कर नहीं।

उम्मीद की लौ सारे जहान को रोशन कर सकती है, दोस्तों! कभी उम्मीद का दामन न छोड़ें। और हाँ, एक बात हमेशा याद रखें, अगर आपकी ज़िंदगी में कभी ऐसा वक्त आ जाए कि आपको कोई रास्ता दिखाई न दे, हर तरफ़ अंधेरा ही अंधेरा नज़र आए, तो जल्दीबाज़ी में कोई फ़ैसला न करें। थोड़ा ठहर जाएँ, थोड़ा इंतज़ार करें, थोड़ा धैर्य रखें, थोड़ी साँसें लें गहराई से, डीप..डीप..और डीप..क्योंकि दुखों का कोहरा, चाहे कितना भी घना क्यों न हो, सूरज की किरणों को निकालने से नहीं रोक सकता। आप बस हौसला रखें, अपने ईश्वर और अपने बड़ों पर भरोसा करें और उनके प्रति कृतज्ञ रहें। स्वयं पर विश्वास बनाए रखें। आप देखेंगे कि उम्मीद की एक किरण अंधेरे को चीरते हुए धीरे   धीरे आपकी तरफ़ बढ़ रही है और सदैव याद रखिए कि आप हार मानने के लिए नहीं बने हैं, आप नई रार ठानने के लिए बने हैं, आप काल के कपाल पे लिखते और मिटाते हैं और नए गीत गाने के लिए बने हैं, और कहने के लिए बने हैं    लव यूं ज़िंदगी। सच कहा न दोस्तों!

Music

जी हाँ दोस्तों! ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है, इसका लुत्फ़ उठाइए, स्वयं के लिए जीएँ, दूसरों के लिए जीएँ, लेकिन जीएँ ज़रूर।। आप इस धरती पर किसी निमित्त के लिए आए हैं, यूँ ही मर जाने के लिए नहीं। आपको देख कर लोग कहें कि जीना हो, तो नत्थू लाल की मूंछों की तरह। हमारी बातें तो चलती ही रहेंगी, इसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइए कि आप ज़िंदगी को प्यार क्यों करते हैं, अपनी कहानी, अपने किस्से। अपनी ज़िंदगी के किस्से   कहानियाँ हमें भी शेयर कीजिए .. कीजिएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, यूँ ही बातें करते   करते आप भी कहने लगें कि लव यू ज़िंदगी.. है न दोस्तों? इसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

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EPISODE   16   

लब हिलें तो.. 14/08/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से    कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे, प्रेम की, प्रिय की मुस्कान की, उस मुस्कान के कारण हमारे आस   पास बनी खूबसूरत दुनिया की, क्योंकि जब उसके लब हिलते हैं, तब मोगरे के फूल झड़ते हैं, और सारा वातावरण मोगरे की खुशबू से खुशनुमा हो जाता है।

MUSIC  

दोस्तो! यह सच है कि किसी प्रिय की बातें, उनकी मुस्कान और उनकी भावनाएँ हमारे आस   पास एक खूबसूरत दुनिया की सृष्टि करती हैं। यह एक तरह का इज़हार है कि उसके बिना सब कुछ अधूरा है और उसके होने से ही जीवन में रंग और खुशियाँ हैं क्योंकि जब   जब उसके लब हिलते हैं, तो फूल खिलते हैं, अमावस्या में भी चाँद निकल आता है, उसकी हँसी में सवेरा हो जाता है, उसकी आँखों में ही सारा जहाँ डूब जाता है, उसकी मुस्कान से बहारें मिल जाती हैं, उसके हर लफ्ज़ में मिठास है, उसके हर ख्याल में उजास है, उसकी ख़ुशबू से सारी महफिल महक जाती है, उसकी खिलखिलाहट सारे माहौल में मिठास और खुशबू भर देती है और उसके आने पर सारा जहाँ सुगंधित और खूबसूरत हो जाता है और दिल गया उठता है    लब हिलें तो मोगरे के फूल खिलते हैं कहीं..  

पिछले दिनों  किसी काम से एक ऑफिस में जाना हुआ। जिनसे मिलना था, वे एक महिला अधिकारी थीं। जैसे ही मेरी बारी आई, मैं उनसे मिलने गई, देखा, वो तो मेंरे कॉलेज की सहेली निकली। मिलते ही हम दोनों ज़ोर   ज़ोर से हँसने लगीं। आवाज़ सुनकर कमरों में से कर्मचारी निकल कर आए। लगा कि कुछ गलत हो गया। मेरी  सहेली एकदम से चुप हो गई मानो कोई अपराध करते पकड़ी गई हो। बोली, सब सुन रहे हैं, देखो, कमरों से बाहर आ गए, इतने सालों की नौकरी में मेरी आवाज़ आज तक किसी ने नहीं सुनी थी। मैं हँस कर बोली, “क्या कब्र बना रखा है ऑफिस को? आज सभी मुर्दे कब्रों से बाहर निकल आए।” इस बात पे पूरा ऑफिस ठहाका मारकर हँस पड़ा।

मेरी दोस्त की आँखों में आँसू आ गए। वह बोली, “अपनी ही खनकती हँसी बहुत दिनों बाद सुन रही हूँ मैं। एक हँसी जिसमें रहती थी खनखनाहट, वो सिर्फ़ हँसी नहीं थी, वह एहसास थी, खनक थी, कई दिनों से कहीं गुम और चुप   सी थी वो, दबी हुई थी वो खनक न जाने किन दिशाओं में, आज तुम्हारे आने से मुस्कराहटों के साथ उभरी है फिर उन लबों पे।“ वह आगे बोली, “माँ के यहाँ जो हँसी छूट गई थी, वो बरसों बाद आज लौट आई है। इससे पहले कब खुलकर हँसी थी, याद ही नहीं।“ वे तो बोले ही जा रही थी, और मैं यह सुनकर अवाक।

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चलिए दोस्तों, एक और वाकया लेते हैं........एक विवाह समारोह में जाना हुआ, वहाँ पुरुष और महिलाएँ सभी साथ   साथ बैठे थे। सभी पुरुष समूह बना कर खूब हँसी   मज़ाक कर रहे थे, लेकिन महिलाएँ चुपचाप बैठी थीं। मुझे तो यह कुछ अटपटा   सा लगा| इतने में एक महिला ने आकर चुप्पी तोड़ी, तो सभी महिलाओं ने उसे आँखें दिखा कर चुप करवा दिया, मानो वो किसी मर्यादा को तोड़ रही हो और फिर सब शांत हो गया। किसी भी बात का, मज़ाक का कोई रिएक्शन ही नहीं। अक्सर महिलाएँ बातें तो खूब करती हैं, लेकिन उनमें हास्यबोध नहीं दिखता।

मिसेस शर्मा बहुत स्वादिष्ट खाना बनाती हैं। उस दिन उनके पति ने कहा, “आजकल तुम्हारे हाथों में वो स्वाद नहीं रहा, जो पहले था। वो झट से बोलीं    आप भी तो अब पहले जैसे नहीं रहे...। दोनों इस बात पे हँस पड़े... मिसेस शर्मा बहुत बड़ा झगड़ा कर सकती थीं, लेकिन उनके हास्य बोध ने बचा लिया।

यह उदहारण है ऐसी महिलाओं का, जो अपनी ज़िंदगी में यहाँ   वहाँ बिखरे हास्य को समेट लेती हैं। जो हँसना जानती हैं, दूसरों को हँसाना भी जानती हैं, उनमें एक कॉमन सेन्स होता है। लेकिन अफ़सोस ये कि कितनी महिलाएँ हैं इन जैसी? जो ठहाके लगाती हैं, खिलखिलाकर हँसती हैं, दिल खोल कर मुस्काती हैं और किसी उदास चेहरे पर प्यारी   सी मुस्कान सजा देती हैं।

अक्सर औरतों का हँसी, ठिठोली, ठहाकों से कोसों दूर का नाता होता है। ये स्थिति सभी जगह दिखती है, जैसे जब वे पार्टी में होती हैं, या पिकनिक में, दोस्तों की महफ़िल में, आफ़िस में  या घर में। वो सभी जगह अपने होंठों पे चुप का ताला लगाए रहती हैं, बातें चाहे कितनी भी कर लें, लेकिन हँसते हुए कम ही दिखती हैं। बहुत ज़्यादा हुआ, तो धीरे से मुस्करा देंगी, लेकिन वो भी प्लास्टिक वाली मुस्कान। वो खुद हँसना   हँसाना नहीं चाहती इसलिए दूसरों के हास्य   बोध को भी कम ही समझ पाती हैं। कभी   कभी तो उन्हें समझ ही नहीं आता कि सब किस बात पे हँस रहे हैं।

किसी महिला से पूछो कि आखिरी बार वो कब खिलखिलाकर हँसी थी, तो उसे जवाब देने में वक्त लगेगा और सोचने में भी। क्या वजह है कि महिलाएँ पुरुषों की तरह हँसती नहीं और न ही वो मज़ाक करती हैं।

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दरअसल दोस्तों! बचपन की हिदायतें पचपन तक पीछा करती हैं, बचपन से ही घुट्टी में घोल के पिलाया जाता है कि लड़कियों को धीरे   धीरे बात करनी चाहिए, मीठा बोलना चाहिए, कम बोलो, हँसो मत ज़ोर से, रास्तों पे या बाज़ार में, पब्लिक में तो बिल्कुल नहीं हँसना। मायके में हो, तो पिता और भाई के सामने मत हँसो, और ससुराल में हो तो सास   ससुर और जेठ के सामने चुप रहो, ऑफ़िस में हो तो बॉस के सामने चुप रहना... उफ़! फिर महिलाएँ हँसें तो हँसें कब ?

कब्र में जाने के बाद?

शायद वहाँ भी बंधन हों.....!!

हमारे समाज ने बचपन से ही लड़कों और लड़कियों के बीच अलग   अलग मापदंड तय किए हैं। एक लड़की से हमेशा एक निश्चित व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। उसे कभी किसी के साथ कोई मज़ाक   मस्ती नहीं करनी है, हँसना   हँसाना नहीं है क्योकिं सभ्य, शरीफ़, भद्र और सुशील संस्कारवान लड़कियों को यह सब शोभा नहीं देता। और इस तरह हमारे समाज ने सुंदर होठों से सुंदर मुस्कान छीन ली....खिलखिलाहट पर बंदिशें लगा दीं, पहरे लगा दिए।

और उन आज्ञाकारी लड़कियों ने चुपचाप शराफ़त का लबादा ओढ़ कर अपनी हँसी और अनगिनत मुस्कानों की हत्या कर दी। इसी तरह बरसों   बरस से होठों के किनारों तले कई मुस्कानें दम तोड़ती आई हैं। फिर धीरे   धीरे महिलाओं ने इसे अपने स्वभाव में शामिल कर लिया। एक तो वे वैसे ही संवेदनशील स्वभाव वाली होती हैं, अक्सर उन्हें रोने   धोने, सिसकने वाली ही समझा जाता है, ज़रा   ज़रा सी बात पे रो देना, मायके में भाइयों ने मज़ाक किया तो रो दिए, ससुराल में ननद   देवर ने छेड़ दिया, तो रो पड़े। किसी ने मोटी कह दिया या किसी ने नाटी कह दिया, तो आँसू छलक आए। ऐसे अनगिनत उदाहरण हम रोज़ अपने आसपास देखते हैं। वे किसी मज़ाक को सहजता से नहीं ले पातीं। महिलाएँ भावुक होती हैं, किसी भी मज़ाक को सहजता से नहीं ले पातीं और खुद पर हँसना तो उन्हें आता ही नहीं। वैसे भी खुद पर हँसने का हौसला हर किसी में होता भी नहीं, अक्सर पुरुष यही सोचते हैं कि भई महिलाओं से संभल कर बात करनी चाहिए, न जाने किस बात का बुरा मान जाएँ या रो पड़ें।

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दोस्तों! क्या कभी आपने ऐसी किसी महिला को देखा है, जो ज़ोर   ज़ोर से हँस रही हो और आपने उसे जज न किया हो, न ही उसने ध्यान दिया हो कि हँसते   हँसते वो कैसी दिख रही है? उसकी आँखें छोटी और दांत बाहर दिख रहे हैं? शायद ही देखा हो....महिलाएँ हमेशा अपने लुक्स को ले के सचेत रहती हैं। वो हँसते हुए भी खूबसूरत दिखना चाहती हैं। कहीं चेहरा बिगड़ न जाए, दाँत न दिखें, आँखें सिकुड़ न जाए आदि.. आदि ..इतनी तैयारियों के बाद कोई क्या ख़ाक हँसेगा? ..वो तो सिर्फ़ प्लास्टिक की हँसी हँसेगा, और फिर लोग तो बैठे ही हैं, उन्हें जज करने के लिए.... है न दोस्तों!

अगर लोग किसी ज़िंदादिल महिला को हँसते हुए देखते हैं, तो अजीब   सी शक्ल बनाते हैं, उसे घूर    घूर के देखते हैं, मानो वो कोई गुनाह कर रही हो। उसे ज़ोर   ज़ोर से हँसते देख उसे  असभ्य मान लिया जाता है, यही वजह है कि महिलाओं की मुस्कराहटें कहीं गुम हो गई हैं। सर्वेक्षणों के अनुसार पुरुषों और महिलाओं के हास्यबोध में काफ़ी अंतर होता है। महिलाओं के मुकाबले पुरुष ज्यादा हास्य उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं। यही वजह है कि हास्य कवि सम्मलेन हो या हास्य के कार्यक्रम महिलाएँ इनमें कम ही नज़र आती हैं।

तो क्या हम ये मान लें कि महिलाएँ नीरस होती हैं, बोरिंग और बुद्धू टाइप की होती हैं। जी नहीं, कतई नहीं, महिलाओं में भी हास्य की उतनी ही समझ होती है, जितनी पुरुषों में और हर महिला अपनी ज़िंदगी के साथी के रूप में ऐसे ही पुरुष की कल्पना करती है, जो हँसमुख हो, खुश दिल हो, वे भी रोते   से, चुप्पे   से साथी को कोई पसंद नहीं करती, फिर भी वो खुद गुमसुम रहती हैं, क्यों? मज़ाक नहीं करती, क्यों? ज़िंदगी को ज़िंदादिली से नहीं जीतीं, आखिर क्यों?

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दोस्तों! याद रखिएगा, घर की महिला यदि चुप या उदास रहेगी, तो उनके बच्चे भी कभी नहीं हँसेंगे। जिस घर में महिलाएँ मुस्काती नहीं, हँसती नहीं, उस घर में ख़ामोशी के साये अपना डेरा जमा लेते हैं।

हमारी ज़िंदगी में चाहे जितनी भी परेशानियाँ हों, दुःख हों, पीड़ा हो, हँसी और मुस्कान फिर भी बोई जा सकती है, उगाई जा सकती है, इसमें कोई खर्चा नहीं होता, न कोई खाद   पानी देना होता है। हँसी तो एक प्रार्थना है, जिसे आलाप से लेकर स्थाई तक पहुँचने के लिए दोहराव की ज़रूरत नहीं होती, उसे तो सिर्फ़ सम्मिलित स्वरों की, सहयोग की ज़रूरत होती है और कोई उसे जज न करे, इसकी ज़रूरत होती है।

दोस्तों! हँसी से बड़ी कोई नेमत नहीं, वरदान नहीं, इस पर तो कोई टैक्स भी नहीं, जो लोग नहीं हँसते, वो कभी ज़िंदगी का लुत्फ़ नहीं उठा पाते। हँसना   हँसाना कोई बुरी बात नहीं है ये तो एक उन्मुक्त बहता झरना है, इसे रोकना नहीं, टोकना नहीं, बहते देना है। महिलाएं सुन रही है न, आप हँसेगी, तो दुनिया हँसेगी, आप मुस्काएँगी तो सारी दुनिया मुस्काएगी। हँसी से बैर नहीं, दोस्ती कीजिए। यदि आप ऐसा करेंगी, तो सोसायटियों में चल रहे ‘लाफ़्टर क्लब’ बंद हो जाएँगे, और ये लाफ्टर क्लब आपके ही भीतर समा जाएंगे, क्यों, क्या विचार है, दोस्तों!

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जी हाँ दोस्तों! हँसी से बढ़कर खूबसूरत कुछ नहीं, इसका आनंद उठाइए, स्वयं भी हँसें और.. औरों को भी हँसाएं, क्योंकि इससे बड़ी कोई नेमत नहीं, वरदान नहीं, यह ईश्वर का आशीर्वाद है हम मनुष्यों के लिए, जानवर हँसते नहीं हैं, केवल हम हँस सकते हैं, तो क्यों न हँसें? हमारी बातें तो चलती ही रहेंगी, इसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइए कि आप की ज़िंदगी में हँसने के क्या मायने हैं? और महिलाएं सुनें, बेधड़क, बेखौफ़ होकर मुस्कराएं, यदि लोग जज करते भी हैं, तो करते रहें, क्योंकि कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना! अपनी कहानी, अपने किस्सेमें भी शेयर कीजिए .. कीजिइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, यूँ ही बातें करते   करते आप मुस्कराने लगें, खिलखिलाने लगे, और जी खोल कर हँसने लगें!.. है न दोस्तों? इसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

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EPISODE17   

आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या है? 28/08/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, जीवन की राह पर चलतेचलते अनेक लोग हमें मिलते हैं, कुछ को हम भूल जाते हैं, कुछ याद रह जाते हैं और कुछ हमें सोचने के लिए मजबूर कर जाते हैं। जैसे, मुझे याद आता है, अमित। एक दिन मेरे पास आया और बोला, मैम, मुझे लगता है कि मैं तनाव से पीड़ित हूँ, डिप्रेशन में हूँ।। बस, मैंने कह दिया, कह दिया न आपसे..। मेरे लिए.. मेरे लिए  यह एक रहस्योद्घाटन था, क्यों? क्योंकि आम तौर पर लोग ऐसी बात दूसरों के सामने ज़ोर से नहीं  कह पाते हैं, कहने की बात तो दूर, वे तो मानते ही नहीं कि उन्हें कोई परेशानी है भी। किसी को कह कर तो देखो, तुरंत जवाब आएगा मैं पागल हूँ क्या? कितनी आसानी से लोग ‘पागल’ शब्द का प्रयोग कर लेते हैं। है न दोस्तों! इसीलिए, आज हम बात करेंगे, तनाव की, डिप्रेशन की, इसकी वजहों की, इसे प्रबंधित करने के तरीकों की.. आज के समय में इस विषय से भाग ही नहीं सकते। मुझे तो लगता है कि तनाव न केवल आधुनिक जीवन का संकेत बन गया है, बल्कि यह आधुनिक जीवन का उपहार है, है न दोस्तों? चलिए, आज इसी के बारे में बातचीत करते हैं, तो चलिए, मेरे साथ बातचीत के इस सफ़र पर..

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दरअसल दोस्तों, आज के दौर की सबसे बड़ी समस्या का नाम अगर कुछ है, तो वो है तनाव। सभी रोगों का जनक, हरेक को हैरान परेशान करने वाला मर्ज़, ये हर जगह मिलता है, लेकिन इसकी कोई दवा कहीं नहीं मिलती। आज इस समस्या से संसार के लगभग अस्सी प्रतिशत लोग, जी हाँ, 80 परसेंट लोग जूझ रहे हैं। हम सभी जानते हैं कि हर रोग पहले मन में जन्म लेता है और बहुत बाद में जाकर देह पर उसका असर देखने को मिलता हैं। ये तनाव भी ऐसा ही मर्ज़ है।

उपचार के बाद अमित अपनी डायरी में लिखता हैमैं अब अपने बारे में खुलकर और ईमानदारी से बात करने लगा हूँ। मैंने बड़ी कठिनाई से यह सीखा है कि लोगों से बात करना कितना ज़रूरी है, अपने हितैषियों को यह बताना कितना महत्वपूर्ण है कि आप क्या महसूस कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात जो मैंने सीखी वह यह है कि मैं अजेय नहीं हूँ, मैं टूट सकता हूँ औरों की तरह, मैं भी औरों की तरह ही हूँ, उनसे अलग नहीं, कमज़ोरियाँ मुझमें भी हो सकती हैं, पर हाँ, मैं कोशिश ज़रूर कर सकता हूँ, कोशिश मेरे हाथ में है न..।

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दोस्तों! तनाव एक अनुक्रिया है, जिसका असर हमारे मन और देह दोनों पर पड़ता है। हमारे शरीर में मनोवैज्ञानिक यानी साइकोलॉजिकल तथा दैहिक यानी फिजियोलॉजिकल, दोनों तरह की अनुक्रियाएँ होती हैं, यानी व्यक्ति जब तनाव में होता है, तो मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से क्षुब्धता यानी डिस्टर्बेंस का अनुभव करता है। जब ये अनुक्रियाएँ मनोवैज्ञानिक हों, तो व्यक्ति बहुत परेशान हो जाता है। उसे व्यर्थ की चिंताएँ, आशंकाएँ, डर, संदेह घेरे रहते हैं। कभी उसे बहुत क्रोध आता है, तो कभी उसका व्यवहार आक्रामक हो जाता है। आशंकाएँ, चिंताएँ उसे इतना घेर लेती हैं कि वो उनसे निबटने में खुद को अक्षम पाता है। अगर ये अनुक्रियाएँ दैहिक हों, तो व्यक्ति का रक्तचाप बढ़ जाता है, पेट में गड़बड़ी, हृदयगति असामान्य, साँस की गति में परिवर्तन आदि लक्षण दिखाई देने लगते हैं इन अनुक्रियाओं के परिणामस्वरूप व्यक्ति के शरीर में शर्करा यानी शुगर की मात्रा बढ़ जाती है, हारमोन असंतुलित हो जाते हैं और कैंसर, मधुमेह आदि कई रोग जकड़ लेते हैं। इन दैहिक अनुक्रियाओं का एकमात्र उद्देश्य होता है कि किस तरह से तनाव के साथ समायोजन बिठाया जाए। चिकित्सक इनका इलाज दवाओं द्वारा करते हैं। लेकिन मन को तनाव रहित करने के लिए मनोचिकित्सकों या थेरेपिस्ट या काउंसलर की ज़रूरत होती है।

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दोस्तों, ऐसा देखा गया है कि अक्सर तनाव को नकारात्मक घटनाओं से या दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं यानी नेगेटिव इवेंट से जोड़ कर देखा जाता है जबकि सच्चाई यह है, कि तनाव सकारात्मक घटनाओं से भी होता है| उदहारण के लिए, विवाह के समय होने वाला तनाव, अच्छे पद पर पदोन्नति के लिए तनाव, बहुत बड़ा पुरस्कार या इनाम पाने पर तनाव, किसी लेखक को उसकी आने वाली नई पुस्तक को लेकर तनाव, तो किसी अभिनेता को आने वाली नई फिल्म को लेकर तनाव हो सकता है।

कभी कभी व्यक्ति को किसी व्यक्ति विशेष से तनाव होता है, और वो व्यक्ति सामने बना रहे, तो वह उसके प्रति आक्रामक हो जाता है। लेकिन कभी कभी व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि उसकी निराशा, कुंठा, हताशा का आखिर कारण क्या है? वो खोजता रहता है कि उसकी कुंठा या परेशानी का सबब क्या है? स्रोत यानी सोर्स कहाँ है? कभी जो स्रोत मिल भी जाए, तो व्यक्ति किसी कारणवश या परिस्थितिवश उस शक्तिशाली स्रोत के प्रति आक्रामक नहीं हो पाता, तो वो खुद से कमज़ोर व्यक्ति या वस्तु पर क्रोध निकालता है और तनाव कम करता है। उदहारण के लिए यदि पति पत्नी में झगड़ा होता है, तो क्रोध बच्चों पर निकाला जाता है। दफ्तर का गुस्सा, अपने बॉस का गुस्सा, घरवालों पर निकालता है और आखिर में वे बेकसूर बच्चे अपना गुस्सा घर की चीज़ों या बेज़ुबान खिलौनों को तोड़ कर, किताबों को फाड़ कर निकालते हैं। आखिर नजला तो नीचे की ओर ही बहेगा न..।

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दोस्तों, जो लोग क्रोध को व्यक्त नहीं कर पाते, वो मन में घुटते हैं और गहरे विषाद तथा भावशून्यता में चले जाते है। जब आक्रमकता दिखाने पर भी उन्हें सफलता नहीं मिलती, तो वो उस वस्तु के प्रति उदासीन हो जाते है एवं खुद को निस्सहाय सा पाते हैं और अपने में ही गुम हो जाते हैं।

कुछ लोग तनाव में आकर अपनी सबसे प्रिय चीज़ को ही चोट पहुँचाते हैं, या अपनी कोई अति प्रिय वस्तु को ही तोड़ देते हैं और बाद में फिर पछताते हैं। कुछ विशेष घटनाएँ कुछ व्यक्तियों में अधिक तनाव उत्पन्न नहीं कर पातीं, तो कुछ के लिए गहरे तनाव का कारण बनती हैं। जैसे किसी वैवाहिक संबंध की टूटन या प्रेम में असफल होना, किसी प्रिय की मृत्यु आदि ऐसी घटनाएँ हैं, जो कुछ व्यक्तियों पर गहरा असर डालती हैं, तो कुछ पर इनका कम असर होता है। कभी कभी साधारण सी घटना भी कुछ व्यक्तियों को अधिक सांवेगिक एवं दैहिक क्षति पहुँचाती है। इनके अलावा एक और महत्वपूर्ण कारक है, जो आजकल सारी दुनिया में तनाव का कारण बना हुआ है, और वो है कान्फ्लिक्ट ऑफ़ मोटिव्स यानी यानी प्रेरकों का संघर्ष यानी प्रतियोगिताओं के इस दौर में एक दूजे से आगे निकल जाने की होड़। “उसकी कमीज मेरी कमीज से ज़्यादा सफ़ेद कैसे?” की चिंता में तनाव होता है। साथ ही केंकड़े की वृत्ति को गई है हमारी, उसकी साफ़ सुथरी कमीज़ पर दाग कैसे लगाया जाए, यह उधेड़बुन भी तनाव को बढ़ाती है।

इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण कारक तनाव का है, जिसमें व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर निर्भरता दिखाता है, या उसका सुख दुःख, उसकी हँसी ख़ुशी सब दूसरे व्यक्ति पर निर्भर हो जाती है, और जब दूसरा व्यक्ति उसे सहयोग नहीं कर पाता, तो तनाव उत्पन्न होता है। ये तनाव बहुत खतरनाक भी हो सकता है, क्योंकि इसमें एक व्यक्ति की पूरी दुनिया दूसरे की हाँ और ना पर चलती है, अक्सर इस प्रकार का तनाव किसी अप्रिय घटना का कारण भी बनता है। इसके अलावा दिन प्रतिदिन की उलझनें जैसे बिजली नहीं आई, पानी नहीं आया, पार्किंग नहीं मिली या नेटवर्क नहीं है, जैसे छोटे छोटे तनाव भी व्यक्ति को परेशान करते हैं।

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दोस्तों, इन सब तनावों में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कारक कुंठा यानी फ्रस्ट्रेशन का होना है। जब व्यक्ति कोशिश करके भी किसी लक्ष्य पर पहुँचने में नाकाम रहता है, तो व्यक्ति में कुंठा उत्पन्न होती है। इनमें विभेद, पूर्वाग्रह, कार्य असंतुष्टि यानी जॉब डिससैटिसफ़क्शन, प्रिय से दूरी, प्रिय की मृत्यु आदि कारण हो सकते हैं। उसी तरह दैहिक विकलांगता, अकेलापन, अपर्याप्त आत्मनियंत्रण, ये सभी कुंठा के कारण बन जाते हैं।

तो दोस्तों, आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या है? इस मर्ज़ का कारण चाहे जो भी हो, लेकिन यह बात तय है कि यह व्यक्ति के सांवेगिक एवं दैहिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर तो ज़रुर डालता है। चिकित्सक तनाव कम करने की दवा देते हैं, लेकिन मनोविज्ञान समायोजित व्यवहार की सलाह देता है। शोध बताते हैं कि जिन व्यक्तियों में मनोवैज्ञानिक कठोरता यानी साइकोलॉजिकल हार्डनेस अधिक होती है, वे परिस्थिति के तनावपूर्ण होने पर भी परेशान नहीं होते। वे संतुलित और समायोजित व्यवहार द्वारा अपने आसपास के वातावरण, उसकी आंतरिक माँगों और उसके बीच के संघर्षों, अंतर्द्वंद्वों को नियंत्रित करना सीख लेते हैं। वे शारीरिक सीमाओं एवं अंतर्वैयक्तिक चुनौतियों, सभी को अपने मूल्यों, प्रसाधनों आदि के साथ इस तरह से व्यवस्थित कर लेते हैं कि उनका प्रभाव कम से कम हो, या न हो।

लेकिन यह इतना आसन भी नहीं है। ये समायोजन हर व्यक्ति की गति, अनुभूतियों, बौद्धिक क्षमता तथा आत्मनियंत्रण पर निर्भर करता है। जैसे ही व्यक्ति को तनाव घेरता है, वो अपने तरीके से इसे कम करने के प्रयास करता है। कुछ व्यक्ति कुछ ख़ास तरह का व्यवहार करते हैं, वो नशे में डूब जाते हैं, कुछ लोग दोस्तों का समर्थन प्राप्त करना पसंद करते हैं और समर्थन मिल जाने पर उन्हें लगता है कि अरे! ये समस्या तो उतनी गंभीर भी नहीं थी, जितना मैंने इसे समझा था।

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कभी कभी व्यक्ति तनाव के कारण अपनी इच्छाओं का दमन करता है। अपने मन की बात को किसी से न कहने का दुःख और अपनी इच्छाओं को, यादों को साझा न करने का दुःख उसे मन ही मन सालता है और तनाव देता है, फिर व्यक्ति उन समस्त यादों और इच्छाओं का दमन शुरू कर देता है, वो जानबूझ कर अपने चेतन से, मन से, उन सभी बातों को हटा देना चाहता है, जो उसके दुःख का कारण बन रही हैं, ताकि वो अपना ध्यान दूसरी तरफ लगा सके, वो विकल्प खोजता है, खुद को व्यस्त रखता है। व्यस्त रहने और अपने शौक यानी हॉबीज़ में संलग्न होने से भी तनाव कम होता है। अपने प्रियजनों के साथ समय बिताना, परिवार से साथ घूमने जाना, दोस्तों से मिलना, योग प्राणायाम मेडिटेशन आदि तनाव को दूर करने के ट्राइड और टेस्टिड तरीके हैं। अगर कहीं और जाना संभव नहीं, तो सुबह सैर पर तो जा ही सकते हैं।

तनाव को दूर करने के लिए कभी कभी व्यक्ति बौद्धिकीकरण की नीति अपनाते भी देखे गए हैं|  इसमें व्यक्ति अपने चारों और एक रक्षा प्रक्रम अपनाता है, अपना रक्षा कवच बनाता है। वो अपनी एक खोल में क़ैद रहता है और बाहरी जगत से अलगाव या निर्लिप्तता विकसित करता है। पर मेरे हिसाब से यह तरीका ठीक नहीं।

बहुत से लोग सोशल साइट्स पे जाकर अपना तनाव कम करते हैं, कुछ लोग संगीत सुनकर, कुछ लोग खुद से ही बातें करने लगते हैं। ये सभी उपाय अपना कर भी व्यक्ति तनाव से पूर्णरूप से बच तो नहीं पाता है, उसे कोई न कोई तनाव हर समय जकड़े ही रहता है, "मर्ज़ बढ़ता ही गया, ज्यों ज्यों दवा की" वाले अंदाज में, पर तनाव कम ज़रूर हो जाता है।

तनाव फिर भी कम न हो, तो किसी योग्य चिकित्सक से बात करना ही श्रेयस्कर होता है। किसी भरोसेमंद साथी या मित्र से अपनी परेशानी साझा की जा सकती है। याद रखिए दोस्तों, सहजता और सरलता आपको बहुत से तनाव से बचा सकती है। झूठ, छल, प्रपंच, ईर्ष्या और स्वार्थ हमेशा तनाव के कारण ही बनते हैं। इनसे खुद को दूर रखना होगा, कोई भी चिकित्सक आपको सिर्फ़ परामर्श और दवा ही दे सकता है, वो आपको खुश नहीं रख सकता। ख़ुशी आपको खोजती हुई कभी नहीं आती है, आपको जाना होता है उसके पास, अपने आसपास खुशियाँ तलाशनी होती हैं। इस मर्ज़ का इलाज बाहर नहीं भीतर ही मिलेगा, और दवा भी भीतर ही मिलेगी।

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और अंत में यह याद रखिएगा दोस्तों! कि आपका जीवन अनमोल है, आप खुशियाँ बांटने के लिए इस धरती पर आए हैं, और यह तभी कर पाएँगे जब आप स्वयं को तनाव रूपी कुहासे से मुक्त करेंगे और दीपक की भांति प्रकाशित होंगे।

जी हाँ दोस्तों! तनावमुक्त जीवन जीने के लिए तत्पर रहें, मनुष्य योनि से बढ़कर कोई योनि नहीं, मानव जीवन से ज़्यादा खूबसूरत कुछ भी नहीं, इसका आनंद उठाइए, स्वयं भी खुश रहिए और लोगों में खुशियाँ बाँटिए। जीवन से जुड़ी बातें हैं, ये तो चलती ही रहेंगी, इसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइए कि आप तनाव को दूर करने के लिए क्या करने जा रहे हैं? अपनी कहानी, अपने किस्से शेयर कीजिए .. कीजिइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, यूँ ही बातें करते करते आपको भी तनाव दूर करने के कुछ उपाय सूझ जाएँ और आप भी जी खोल कर जीने लग जाएँ!.. है न दोस्तों? इसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत....मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

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EPISODE  18    

पल पल दिल के पास...11/09/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे प्रेम की, प्यार की, मुहब्बत की..जी हाँ प्रेम, जो पल पल दिल के पास रहता है, यदि प्रेम न हो, फूल किसके लिए खिलेंगे? तितली किसके लिए उड़ेगी? आसमान में इंद्रधनुष किसके लिए अपनी छटा बिखेरेगा? आसमान से शबनम किसके लिए बरसेगी? फिर तो, न किसी पत्ती पे कोई ओस से प्रेम पत्र लिखा जाएगा.....न रात को चाँद को कोई चकोर ताकेगा और न ही हिरण कस्तूरी की तलाश में बन बन भटकेगा। फिर किसी चट्टान पे हरी हरी घास नहीं उगेगी, न कोई लहर किनारों को आ आ कर उसे नम करेगी। है न दोस्तों!

MUSIC  

काफ़ी पुरानी बात है, मॉरीशस की धरती पर एक विशालकाय पक्षी की प्रजाति रहा करती थी। ये पक्षी बहुत भले थे, भोले भाले थे और इंसानों के करीब आने की और करीब रहने की चाहत रखते थे। लेकिन इंसान ने उन्हें कभी समझा ही नहीं। और धीरे धीरे उसने उन्हें दुर्लभ होने के कगार तक पहुँचा दिया। इंसान की निर्ममता तो देखिए, कि उसने उस भोले पक्षी का नाम "डोडो" रख दिया.. डोडो यानी भोंदू रख दिया। डोडो पक्षी तो इस दुनिया से हमेशा के लिए चले गए, तब भी तथाकथित अकलमंद इंसानों को कोई फ़र्क नहीं पड़ा| फ़र्क पड़ा, तो एक ख़ास प्रजाति के पेड़ों पर.. डोडो के जाने के बाद उन्होंने उगना कम कर दिया। ईश्वर ने डोडो को उड़ने के लिए नहीं, इंसानों के करीब रहने के लिए ही बनाया था और वो इंसानों का प्रेम पाने के लिए ही धरती पर आया था। लेकिन हमारी तथाकथित अक्लमंदी, बेरुखी और अनदेखी से डोडो की संपूर्ण प्रजाति ही नष्ट हो गई और उसके विरह में, उसके वियोग में, एक ख़ास जाति के पेड़ों ने भी अपनी ज़िंदगी को नष्ट कर लिया। बात पहली नजर में साधारण सी लगती है दोस्तों, लेकिन इसमें गहरा दर्शन छिपा हुआ है... और कुछ चुभते सवाल भी। इस पूरे ब्रह्मांड की हर छोटी बड़ी चीज़ एक दूसरे से कनेक्टड है, गहराई से जुडी हुई है। बाहर से अलग अलग दिखने वाली चीज़ें भीतर से कहीं बहुत महीन तारों से जुडी होती हैं। छोटी सी, सामान्य सी, साधारण सी चीज़ भी उस असाधारण से जुडी है....उस परम सत्ता का अंश है। हम सभी ये बात जानते तो हैं, पर यकीन करने से गुरेज़ करते हैं।

एक छोटी सी तितली के पंख फड़फड़ाने से कहीं बहुत दूर..किसी देश में बारिश हो सकती है क्या?....कौन सी बूँद किस रेत के कण से जुड़ी है.....कौन सी कली कब किसके लिए चटकेगी….कौन जाने?

कौन किसका हिस्सा है? कौन किस कारण से जुड़ता है? कौन किस कारण से बिखरता है? टूटता है, किस कारण से मिटता है?... कौन जाने? कोई नहीं जानता! हर छोटी से छोटी घटना अपने साथ वजह लेकर, कारण लेकर जन्मती है। हमारा कोई बस नहीं है इस पर। फिर हम इसे क्यों अनदेखा करते रहते है, क्यों सहज नहीं रहते। और जो सहज, सरल और निर्मल होते हैं, उन्हें हम डोडो या भौंदू समझ लेते हैं। डोडो, जी नाम तो सुना ही होगा दोस्तों?

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क्या प्रेमिल हो जाना, प्रेमी बन जाना, दोस्ती का हाथ बढ़ा देना या किसी के करीब रहने की, संग की, साथ की चाहत करना डोडो हो जाना है? क्या यह भोंदूपन की निशानी है? क्या प्रेम करना हमारी विशेषता है, हमारा टेलेंट है, हमारा हुनर है? क्यों कर बैठते हैं हम प्रेम किसी एक से? क्या खोजते हैं हम उसमें? उसे या खुद को? क्या वो दुनिया में सबसे ज़्यादा खूबसूरत है, इसलिए? प्रसिद्ध है, इसलिए? किसी विशेष गुण के कारण? किसी ख़ास हुनर की वजह से? या हमने ही उसे पूज पूज कर देवता बना दिया है? क्या किसी घाट के गोल पत्थर को शालिग्राम कह कर पूज लिया है हमने?

प्रेम करना हमारा स्वभाव है। आत्मा की अतल गहराइयों में कहीं बहुत गहरे में सोता होगा प्रेम, ना जाने कब से, कितनी सदियों से, लेकिन कोई उसे अपनी नन्हीं सी कोमल सी छुअन से जगा जाता है। फिर क्या...? फिर तो झरना फूट पड़ता है प्रेम का। कोई आपकी उंगली पकड़ कर आपको आत्मा के भीतर, बहुत गहरे में लिए जाता है, प्रेम नगरी की सैर कराता है... आप दूसरे के माध्यम से खुद को खोजने चल पड़ते हैं, गोया वो टार्च जलाता हो और हम अपना बिखरा सामान समेटने लगते हों, सामान जैसे, यादें, सपने, अहसास आदि। यक़ीनन वो ख़ास होता है, या हम उसे "सबसे खास" बना देते हैं।

सिर्फ़ देह से जुड़कर आप कई बार चूक कर जाते हैं दोस्तों, जब कोई आपकी आत्मा को छूता है, तो आपको खुद की गहराई पता चलती है। किसी दूसरे के द्वारा ही आप अपने को जानते हो... अंतस में सचेत होते हो। गहन संबंध में ही, किसी के प्रेम में ही, आप खुद को खोज पाते हो। उस छुअन को आप सदियों तक याद रखते हो। हर प्रेम अनोखा होता है दोस्तों, उसकी प्यास अनोखी होती है, उसके अंदाज अनोखे, उसकी खोज अनोखी होती है। हम सब अपनी ही खोज में चलते जाते हैं दूर...कहीं बहुत दूर...

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सच कहूँ दोस्तों! हम खुद के लिए ही प्रेम करते हैं....खुद को खोजने के लिए। किसी को प्रेम करना हमारे हिस्से का प्रेम है। हमारा हिस्सा है और हमारा ही किस्सा भी। हमारी प्यास है और हमारा अंदाज़ भी। इसमें ईर्ष्या, उम्मीद और कुछ पाने की बात तो है ही नहीं। तो अब सवाल ये कि इस तरह से बेशर्त प्रेम करना क्या डोडो यानी भोंदू हो जाना है? जी नहीं, कतई नहीं, हम अपने प्रेम की गोंद से रिश्तों को चिपकाते हैं अपने लिए। अपनी मर्ज़ी से, हम लोगों को पसंद करते हैं, प्यार करते हैं।

अब आखिरी सवाल? जब सभी अपने प्रेम की खोज में हैं, या खुद की खोज में हैं, सभी को तलाश है, दरकार है प्रेम की, तो हर चेहरा उदास क्यों है? क्यों प्यासे हैं लोग? जबकि सागर तो कहीं आस पास ही है। फिर भी महसूस क्यों नहीं कर पाते प्रेम को, उसके आनंद को, उसकी उर्जा को, उसकी अजस्र शक्ति को? उसके उजास को?

दरअसल हमने अपने ज्ञान का, बुद्धि का कुछ ज़्यादा ही विकास कर लिया है। बहुत अक्लमंद हो गए हैं हम, इसलिए छोटी बातों में अपना कीमती समय बर्बाद करना नहीं चाहते। किसी ने क्या खूब कहा है   

अक्ल के मदरसे से उठ, इश्क के मैकदे में आ

लेकिन हमारा अहम्, हमारा अभिमान और उसका कद बहुत बड़ा है, वहाँ से प्रेम, दोस्ती जैसी चीज़ें बहुत छोटी दिखती हैं। हमने अपनी अक्ल पे परदे भी लगा रखे हैं ताकि वो सुरक्षित रहे, कोई छोटी सी चीज़ आकर उसे नष्ट न कर दे। हम जानते हैं कि जिस दिन भी किसी दरार से या "की होल" से प्रेम झाँक गया, उसी दिन हमारी सारी अक्ल, सारी अकड़ धरी की धरी रह जाएगी, सारे ठाट बाट फीके पड़ जाएँगे, अहंकार के ये प्रासाद ढह जाएँगे, इसलिए हमने अक्ल पर मोटे मोटे परदे डाल दिए। अब हम अपनी आँख, नाक, कान सब परदों में छिपा कर रखते हैं। हवा का कोई झोंका प्रेम संदेश न ले आए, कोई प्रेम पुकार हमें विचलित न कर दे, कोई फूल महक न जाए, कोई साँस हमारे दिल को धड़का न जाए। कितने सतर्क, कितने सावधान रहने लगे हैं हम... है न दोस्तों!

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अब इतनी चौकसी, इतने पहरे, इतने परदों, इतने घूँघट के बाद किसी डोडो, किसी भौंदू की मजाल कि वो तनिक भी ठहर पाए। वो तो आँखों में आँसू लिए, होठों पे बेबसी की मुस्कान लिए चुपचाप एक दिन चला ही जाएगा न। कभी कभी सोचती हूँ दोस्तों, जिस तरह से प्रेम के प्रतीक पक्षी, पेड़ और कई जीव, जिनमें अब मधुमक्खियों की बारी है, नष्ट हो रहे हैं, रूठ के जा रहे हैं बिना कुछ कहे, इनके पलायन करने का कारण आज तक कोई खोज नहीं पाया है, और न इन घटनाओं, इन नातों और संबंधों को कोई समझ ही पाया है। लेकिन एक दिन जब खोज पूरी होगी, तब तक इंसान कितना नुकसान कर चुके होंगे इस धरती का, प्रेम का, तब इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा? कहीं ऐसा न हो जाए, कि एक दिन बिना कुछ कहे, ख़ामोशी से हमारी अकलमंदी, हमारी अनदेखी, हमारे अनमनेपन, बेरुखी से आहत होकर…प्रेम ही न कहीं चला जाए डोडो पक्षी की तरह दुखी होकर।

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पर मुझे लगता है कि शायद, इंसान को उस दिन भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा, प्रेम की करुण पुकार, उसका अलविदा कह जाना, क्या हम कभी सुन पाएँगे? हमारी अकल के परदों पे तो अब कोई दस्तक सुनाई ही नहीं देती।

लेकिन प्रेम, प्रेम तो पल पल दिल के पास रहता है| प्रेम के धारी से जाने के बाद फूल किसके लिए खिलेंगे? तितली किसके लिए उड़ेगी? आसमान में इंद्रधनुष किसके लिए दिखेगा? आसमान से शबनम किसके लिए बरसेगी? न किसी पट्टी पे कोई प्रेम पत्र लिखेगा, न रात को चाँद को कोई चकोर ताकेगा और न ही कोई हिरण कस्तूरी की तलाश में बन बन भटकेगा| फिर किसी चट्टान पे हरी हरी घास नहीं उगेगी, और न ही कोई लहर किनारों को आ आ कर छू छूकर भिगोएगी|

याद रखिएगा दोस्तों, प्रेम बहुत स्वाभिमानी होता है और तुनक मिज़ाज भी। वो खुद कभी अकल के परदे पीछे नहीं छिपता, न कभी घूँघट के पट खोलता है। वो दरवाज़े पे दस्तक बन के दम तोड़ सकता है, लेकिन कभी कोई दरवाज़ा नहीं तोड़ता, वो परदों के घूँघट के बाहर सदियों तक इंतजार कर सकता है, लेकिन परदे नहीं खींचता। जब हमने लगाएँ हैं ये अहम् और अभिमान के परदे, तो हटाने भी हमें ही होगे न, भला परदों के पीछे से कभी चाँद दिखता है क्या? प्रेम छूटता है क्या...जो पल पल दिल के पास रहता हो, वह केवल उत्सर्ग जानता है, और कुछ नहीं...है न दोस्तों!

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और चलते चलते बस यही कहूँगी दोस्तों! याद रखिएगा, स्वाभिमानी प्रेम, तुनक मिज़ाज प्रेम, जैसा भी प्रेम हो, वह प्रेम है, इसलिए उसे पाने के लिए हमें अकल के परदे हटाने होंगे, घूँघट के पट खोलने होंगे, दिल के दरवाज़े पे दस्तक देनी होगी, उसे परदों के घूँघट के बाहर लाना होगा, अहम् और अभिमान के परदों हो हटाना होगा, और हटा कर उस चाँद को देखना होगा। अंत में यह याद रखिएगा दोस्तों! कि आपके लिए भी एक छोटी सी तितली कहीं पंख फड़फड़ा रही है, जिससे किसी देश में बारिश हो रही है....एक बूँद किसी रेत के कण से जुड़ रही है.....एक कली कहीं चटक रही है, केवल आपके लिए..केवल आपके लिए! प्रेम से जुड़ी बातें हैं ये, यूँ ही चलती ही रहेंगी, इसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइए अपने प्रेम की  कहानी, अपने किस्से शेयर कीजिए .. कीजिइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, मुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार कर रहे हैं न ....अगले एपिसोड का...कर रहे हैं न दोस्तों!

सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, यूँ ही बातें करते करते आपको आपका प्यार मिल जाए..है न दोस्तों? मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

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EPISODE   19      

ये कौन चित्रकार है?    25/09/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से    कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे प्रकृति की खूबसूरती की, सुंदरता की..यानी पेड़ों की फुनगी की, पत्तों पर बिछी ओस की बूँदों की, फूलों की खुशबू की, निर्बाध झरनों के तेज़ वेग से गिरते जल की, नदियों के सर्पाकार मोड़ों की.. और उनके संग   संग ही तलाशते हैं अपनी ज़िंदगी का अर्थ की! कुदरत, प्रकृति, महज हमारे जन्म और जीने के लिए ही ज़रूरी नहीं है, सोचिए, यदि हमारे आसपास प्रकृति के प्राणतत्व की उपस्थिति न हो। सोचकर देखिएगा कि आप किसी ऐसी जगह मौजूद हैं, जहाँ सबकुछ अदृश्य है, आपके पैरों तले मिट्टी नहीं, आँख के सामने धरती नहीं, पीने के लिए पानी नहीं और न बातें करने के लिए परिंदे?..ऐसी ज़िंदगी, क्या ज़िंदगी होगी? ऐसे में हम यह सोचने पर मजबूर जाते हैं कि आखिर यह चित्रकार है कौन, जिसने यह नियामत हम पर बरसाई है?

क्या कहते हैं दोस्तों!

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दोस्तों! आज की बात की शुरुआत उस महान शख्सियत को याद करते हुए....जो भारत के कण   कण में, यहाँ की मिट्टी की सोंधी खुशबू में, यहाँ की ठंडी बयार में, फ़िज़ाओं में, पत्ती   पत्ती में, डाली   डाली में, कण   कण में बसा है....आप समझ गए न...जी हाँ! मैं बात कर रही हूँ, बापू की....उन दिनों बापू पद यात्रा पर थे। वे अपने सामान में नहाने के लिए एक पत्थर रखा करते थे। एक दिन मनु बहन उनका वह पत्थर पिछले पड़ाव पर ही भूल गईं। जब बापू को इसका पता चला तो उन्होंने उन्हें वह पत्थर लाने को कहा।

यह सुनकर मनु कहने लगीं   बापू! यहीं आसपास कितने पत्थर पड़े हैं, इन्हीं में से एक उठा लेती हूँ। वहाँ जाने   आने में तो पूरे तीन घंटे लग जाएँगे। इस पर बापू ने कहा   मनु, तुम वही पत्थर लेकर आओ। यहाँ इतने पत्थर पड़े हैं, तो क्या हुआ, ये किसी   न   किसी काम तो आएँगे ही, अभी नहीं, तो पांच बरस बाद। हमें इस तरह अन्य पत्थरों को बिगाड़ने का कोई हक नहीं।

मनु तीन घंटे में वह पत्थर लेकर लौटीं। बापू ने खुश होते हुए उसे लेकर अपने थैले में रख लिया और बोले,  यों तो प्रकृति की गोद में असंख्य पत्थर बिखरे पड़े हैं, लेकिन हमें अपनी आवश्यकता के अनुसार ही उनका उपयोग करना चाहिए।

इस प्रसंग के बारे में विचार करने लगी, तो समझ आया कि हम ज़िंदगी भर जिन मूल्यों को तलाशते रहते हैं, परखते रहते हैं, उनका अर्थ खोजने की जद्दोजहद में जुटे रहते हैं, बापू ने उसे कितनी सहजता से कह दिया....कि प्रकृति से हमें अपनी आवश्यकता, अपनी ज़रूरत के अनुसार ही लेना चाहिए...उससे अधिक नहीं...और उसका दोहन तो कतई नहीं। क्या एक बात आपने कभी गौर की है कि ज़िंदगी को परखने की कोशिश में हम एक महत्वपूर्ण बात भूल जाते हैं कि ज़िंदगी की विशिष्ट परिभाषाएँ दरअसल, हमारे सामान्य होने में ही छुपी हैं। इनमें से ही एक अहम बात है   प्रकृति से, कुदरत से हमारा जुड़ाव। कुदरत का मतलब मिट्टी, पानी, पहाड़, झरने ही हैं ही, हमारी देह में, हमारे दुनियावी वजूद में शामिल पंच तत्व भी तो प्रकृति से ही मिले हैं, है न दोस्तों! और फिर, दुनिया में अगर हम मौजूद हैं, तो प्रकृति की नियामतों के बिना नहीं। क्या हम साँस ले पाएँगे? क्या रंग बिरंगे के फूलों की खुशबुओं से मुलाकात कर पाएँगे? भोजन और पानी के बगैर कैसे गुज़रेगी यह ज़िंदगी की गाड़ी? यही तो वह चित्रकार पूछता है हमसे..!

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खैर, अपने अस्तित्व से आगे निकलकर इसके अर्थ को विराट संदर्भो में तलाशें, तो हम पाएँगे कि जन्म से लेकर ज़िंदगी और फिर नश्वर संसार से अलविदा कहने तक प्रकृति हमारे साथ अलग   अलग रूपों में अपनी पूर्ण सकारात्मकता के साथ मौजूद रहती है। पहाड़ की छाती चीरकर  झरने पानी लेकर हाज़िर हैं, उनकी इस सौगात को आगे बढ़ाती हैं नदियाँ...जो फिर सागर में मिल जाती हैं। समंदरों से यही पानी सूरज तक पहुँचता है, और फिर होती है बारिश। बारिश न हो, तो खेत कैसे लहलहाएँगे? खुशबुएँ न हों, रास्ते न हों, जंगलों का नामोनिशां न हो, तो हमारे होने का, इस ज़िंदगी का क्या ही मतलब रह जाएगा? प्रकृति की हर धड़कन में कुदरत के रचयिता के श्रृंगारिक मन की खूबसूरत अभिव्यक्ति होती है। किस्म किस्म के उत्सव हैं ये भी..!

दोस्तों! मौसमों की रंगत भी कुछ कम अनूठी नहीं। जाड़े की ठिठुरन में, बारिश में भीगने की उमंग में और गर्मी में छाँव में अनिर्वचनीय सुख है। सब के सब मौसम कुछ न कुछ बयाँ करते हैं। सच कहूँ, तो प्रकृति में एक अनूठे ज्ञान की पाठशाला समाई हुई है। ज़रूरत बस इस बात की है कि हम कुदरत की स्वाभाविक उड़ान को, उसके योगदान को समझें, सराहें और पहचानें, तभी हर दिन बिना कोई विलंब किए उगने वाले सूरज को, बगैर थके उसकी परिक्रमा करने वाली पृथ्वी को और उनके पारस्परिक संबंध के कारण होने वाले बदलावों को समझ पाएँगे। हम जान पाएँगे कि वृक्ष बिना कुछ लिए हमें फल और छाया देते हैं। नदियाँ कुछ भी नहीं कहतीं, पर पानी की सौगात देती हैं। मौसम अपने रंग बिना किसी कीमत के बिखेरते हैं। हम जब प्रकृति की ओर से मिल रही सीख समझते हैं और उसे आहत नहीं करते, उसकी तरफ से आनंद की वर्षा होती है, हम उसमें भीगते रहते हैं, लेकिन जब   जब हम कारसाज़ कुदरत को आदर करना बंद कर देते हैं, तब तब हमें कई तरह के विध्वंसों का, सुनामियों का सामना करना पड़ता है।

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सोचती हूँ दोस्तों! किस   किस को निहारूं? किस   किस की कहानी सुनाऊँ? मेरी ज़िंदगी में इस चित्रकार ने किस   किस तरह से ‘अहा मोमेंट’ दिए हैं, ये विशालकाय वृक्ष, फलों से लदी उनकी शाखाएँ, वृक्ष जो राहगीरों को आश्रय देते हैं, हवाएँ  जो शीतल शांत है, समुद्र  जिसमें अद्भुत प्रवाह है, पर जो बहता अपनी ही राह है, मानो जलमाला का महाकुंभ है, कितना विचित्र, अद्भुत, मनोहर दृश्य है, पर्वत...पर्वत तो अमर अटल है, धराशील गगनचुंबीय हैं, कहता है झुके ना शीश मेरा, चक्रव्यूह   सा वह अभेद्य है। सच कहूँ दोस्तों! प्रकृति एक संपदा है, रंगों से भरी फुहार है, और इसे रचने वाला वो चित्रकार है। वो कौन? आप समझ ही गए होंगे, वो, जिसके कारण अजर   अमर यह वसुंधरा है, बस इतनी   सी इसकी कहानी है, क्या सचमुच इसकी इतनी   सी ही कहानी है? यह तो अमूल्य   अनुपम   अतुलनीय हैं, जन   जन का विश्वास है और  युगों   युगों की अमर कहानी है और यह कहानी उसे चित्रकार ने तो लिखी है!

मुझे याद आता है अपना बचपन... जब हम नानी के पास सर्दियों में जाते, रात के समय, सब कामों से फ़ारिग हो होकर, वे सब बच्चों को रज़ाई में अपने पास लिटा लेतीं। हम सब बच्चे दिन भर रात हो होने वाली इस अनोखी पाठशाला की धमाचौकड़ी का इंतज़ार करते। सारे बच्चे नानी के सुरीले गले के साथ अपने बेसुरे गले मिलाते और कभी गाते    ‘छोटी   छोटी गइया छोटे   छोटे ग्वाल, छोटौ सो मेरौ मदन गोपाल।’ कभी   ‘जमुना किनारे मेरौ गाँव, बंसी बजा के आ जइयो’ और  कभी   ‘ससुराल गेंदा फूल, सास गारी देवे, देवर समझा लेवे, ससुराल गेंदा फूल’….इन  गीतों की तो न जाने कितनी ही यादें हैं, यदि ये गीत न होते, तो छोटे ग्वालों की गैया बड़ी न हो जाती, कन्हैया कालिंदी में कैसे खेलते, माँ गंगा कहाँ बिराजतीं, चंद्रमा शिव के मस्तक की शोभा कैसे बढ़ाता, बहू अपनी सास से पानी न भरने के बहाने कैसे ढूँढती, और तो और बुंदियों के बरसने पर गोरिया का घूंघट कैसे भीगता और ससुराल गेंदा फूल कैसे बन पाता? देखा न दोस्तों! इन लोक गीतों के ज़रिए प्रकृति के अलग अलग रूपों से हमारी ज़िंदगी कितना रोमानी और दिलखुश बना दिया है....यह भी उसे चित्रकार का कमाल है दोस्तों, है न..!

कभी उषा बेला में बाल सूरज को उदित होते तो देखिए, कभी अपने प्रियतम को मधुमालती से लिपटी मुंडेर पर बुला कर तो देखिए.... तुलसी के क्यारी में सिर नवाकर, शीश झुका कर तो देखिए, गुलाब के गमले में लगी मुस्कानों के साथ मुस्करा कर तो देखिए, क्षितिज पर शाम के समय लालिमा लिए सूरज को अपनी मुट्ठी में बांधकर तो देखिए और रात्रि के समय आसमान में जुगनुओं के समान टिमटिमाते तारों को अपनी चुनरी में टाँक कर तो देखिए, इससे होगा क्या? होगा यह कि आपका सारा अहम, नाराज़गी, मन की चटकन, व्यस्तताएँ, नकारात्मक भावनाएँ, सब काफ़ूर हो जाएँगी....और आप....आप एक नटखट शरारती बच्चे के समान किलोलने लगेंगे, मृदंग की तरह बजने लगेंगे.....पतंग की अदृश्य डोर से बँधकर उड़ने लगेंगे। है न दोस्तों!

Music

और चलते   चलते बस यही कहूँगी दोस्तों! कि अच्छा हो अगर हम प्रकृति का सम्मान करना सीख लें और उसके ज़रिए मानव   मात्र की होने वाली सेवा को समझ लें। यदि ऐसा हो सका तो यकीनन, हमारी आँखों में आशा, संतोष, उम्मीद, विश्वास और खुशी के कई दीपक जल उठेंगे और हम जान ही जाएँगे कि आखिर ये कौन चित्रकार है? है न दोस्तों!.....

याद रखिएगा, यह कुदरत है, प्रकृति है, तो हम है, इसके बिना हमारा अस्तित्व ही गौण है। कुदरत की, प्रकृति की बातें हैं अनंत, और ये यूँ ही चलती रहेंगी, इसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइए कुदरत से अपने प्रेम की कहानी, अपने किस्से शेयर कीजिए..कीजिइएगा ज़रूर..मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, यूँ ही बातें करते   करते आप मेरे साथ एक बार फिर कुदरत की मेहरबानियों के लिए शुक्रिया कहें। है न दोस्तों? मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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EPISODE   20       

बहती हवा सा था वो...09/10/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और कुछ मन पर छप गईं यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे संघर्ष की, प्रयत्न की, प्रयास की और धैर्य की। सब ठीक हो जाएगा, ऐसा ही सोचकर जो भी हालात हमारे सामने हैं, जो भी वस्तुस्थितियाँ सामने आ रही हैं, उनके अतीत के कारण और हिसाब हमारे पास हैं, परंतु क्या अब हम अपने अतीत को बदल सकते हैं?... नहीं ना?... तो जो बीत गया, सो बात गई..  उसके बारे में क्यों सोचें, हमारे पास जो अभी बकाया है, जो खर्च नहीं हुआ वो अभी भी शेष है ना? वही हमारा वर्तमान है और भविष्य की संभावनाएँ भी। बात असल में दिल के बहुत करीब है। जीवन   पथ पर चलते   चलते हमें कई ऐसे लोग मिलते हैं, जो अपनी अमिट छाप आपके दिल पर छोड़ जाते हैं, ऐसे ही थे   बाबा.. बाबा, नाम तो कभी जाना ही नहीं उनका, वे बस बाबा थे, जगत बाबा, यूनिवर्सल बाबा।  

MUSIC  

मैं अक्सर उस सड़क से गुज़रा करती थी। उस सड़क पर न जाने क्या आकर्षण था? जब   जब गुज़रती, तब   तक बाईं ओर ज़रूर देखती। वैसे तो बाईं ओर ऐसा कुछ खास नहीं था, पर फिर भी वहाँ कुछ तो ऐसा था, जो मुझे आकर्षित करता। एक बड़ा   सा तंबू सड़क के किनारे लगा था, उस तंबू के बीचों   बीच सिलाई की एक पुरानी मशीन रखी थी, कुछ ज़ंक लगी, स्याह सी..और इन सबके बीच अनगिनत झुर्रियाँ लिए हुए खिचड़ी बालों वाले एक बुज़ुर्ग...एक वृद्ध, वहाँ बैठकर कुछ सिला करते, दिनभर..। तंबू के आसपास कहीं फटे हुए बैग, कहीं सिले हुए कपड़ों की गठरी, कहीं कुछ धागे और कहीं और ऐसा सामान, जो देखने में कूड़ा   करकट लगता, पड़ा रहता। साल के हर मौसम में वे बुज़ुर्ग वहीं बैठा करते सर झुकाए सिलाई मशीन की सुई में अपनी धुंधली आँखों से बड़े ही जतन से धागा डालते हुए, कुछ सिलते हुए दिखाई देते। घर में अक्सर ऐसा हो ही जाता है कि कभी कोई बैग फट गया, कभी   कभी कोई कपड़ा उधड़ गया, और ऐसी फटी हुई चीज़ों और उधड़न को संवारने का काम करते थे, वे बुज़ुर्ग। मैं अक्सर कुछ ना कुछ सिलवाने के लिए उनके पास जाया करती...वे बड़े प्यार से मुझे देखते। अक्सर टूटी हुई बेंच को दिखाकर कहते, बिटिया, यहाँ बैठ जा, अभी करके देता हूँ। मैं सोचती चारों ओर गर्म हवाएँ चल रही हैं...मैं यहाँ बैठ गई तो, तप जाऊँगी....जल जाऊँगी, पर वे, वे एक निष्काम योगी की तरह गरम हवाओं के थपेड़ों के बीच वाल्मीकि बने रहते|

मैं अक्सर बाबा को सामान देकर यह कहकर चली आती, बाबा, शाम को ले लूँगी। कई बार शाम को नहीं पहुँच पाती। दो   चार दिन बाद पहुँचती, तो बड़े ही शिकायती स्वर में बाबा कहते, तुम आई नहीं बिटिया, मैं तो राह देख रहा था। मैंने उसे दिन रात को 8:00 बजे तक मशीन नहीं बाँधी....मशीन नहीं बढ़ाई, क्योंकि मुझे लगा कि तुम आओगी।

मैं माफी मांगते हुए उनसे कहती, बाबा थोड़ा व्यस्त हो गई थी। यह सिलसिला न जाने कितने वर्षों तक चलता रहा और फिर आया वह समय....समय भी क्या कुसमय था, जिसने देश   विदेश के हर बाशिंदे को हिला कर रख दिया....कोरोना का समय। घर से बाहर निकलना, कहीं आना   जाना, सब कुछ रुक   सा गया, थम   सा गया, अब तो सूरज की रोशनी भी खिड़कियों से झाँक   झाँक कर देखा करते, कब दिन हो गया, कब रात आ गई, कब रात बीत गई और फिर भोर हो गई, ये नज़ारे अब गुम हो चुके थे, तो सड़कों की तो बात ही क्या की जाए? बड़े दिनों बाद, शायद डेढ़ साल बाद, जब जीवन थोड़ा सामान्य हुआ, हमारा बाज़ार आना   जाना शुरू हुआ, तो मैं फिर से उस सड़क से गुज़री......

Music

तंबू वही टंगा था, कहीं कपड़ों के छोटे   मोटे टुकड़े   चिथड़े वहीं पड़े थे, पर गुम थी जर्जर सिलाई की मशीन की आवाज़...गुम थे मशीन के साथ वे बुज़ुर्ग...जिनकी मद्धम आँखों में मैंने सदा जीवन देखा था....गुम थे वे बैग, जो उन्होंने ग्राहकों के लिए सिलकर तैयार करके रखे थे, गुम थी वह आत्मीयता...वह फिज़ां, वे मनुहार भरे शब्द....बिटिया, तुम आई नहीं? मैं रात को 8:00 बजे तक राह देखता रहा...मैं दुकान नहीं बढ़ाई।

फिर क्या था? आसपास पूछा, सब अनजान से चेहरे थे वहाँ, जिनकी दुकान आसपास थी, वे वहाँ नहीं थे...कुछ नए लोग थे, जिन्होंने शायद बाबा को कभी देखा भी नहीं था। मुझे बदहवास देख कोई फुसफुसाया...किसी से उड़ते   उड़ते सुना था कि वे अब नहीं रहे...वे नहीं रहे!! मैं निःशब्द हो गई। एक बार उन्होंने मुझे बताया था कि वे जालंधर के पॉलिटेक्निक के पहले बैच के विद्यार्थी थे, वहीं उन्होंने सिलाई का काम सीखा था और फिर लगभग 33 वर्ष जालंधर में ही बिजली विभाग में काम किया था। फिर अपने बेटे के साथ सपत्नीक वे मेरे शहर आ गए थे, पर मेरे शहर ने उन्हें क्या दिया? लापता का तमगा? मैंने सोचा कहाँ ढूँढू उन्हें...! पर कहाँ? वे तो बहती हवा से गुम हो गए....वे जो बिना कष्ट   श्रम से गगन को सम्हाले हुए थे, वे जो सभी प्राणियों को प्रेम   आसव पिलाकर जिलाए रहते, वे जो अपनी बाँहें पसारे शीत के कोमल झकोरों से नदी को शीतल कर देते, वे जो अपनी माया के बल पर आकाश नाप लिया करते, जिनकी आँखों में अनगिनत संभावनाओं के दीप जला करते, जिनकी अश्रुपूरित आँखों में ढेर सारी नमी बिखरती, आशीषें देतीं... अब वे कहाँ?

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दोस्तों! जीवन किसी के लिए भी आसान नहीं होता। अक्सर दिल और दिमाग के द्वंद्व चलते हैं, कहीं नौकरी की समस्या, कहीं विवाह की समस्या, कहीं विवाह नहीं हो रहा ये दुख, कहीं ये कि विवाह क्यों कर लिया? कहीं विवाह को बचाया कैसे जाए? कहीं नौकरी नहीं मिलती, तो कभी मिल गई, तो कैसे बचाई जाए, इसका तनाव, कहीं घरों में जगह नहीं, तो कहीं दिलों में जगह नहीं, कहीं घर नहीं, तो कहीं दिल ही नहीं...हज़ारों दुख, लेकिन इन सब के बीच भी जीवन खोजना पड़ता है।

ऐसे में जब दूर   दूर तक कोई राह नज़र नहीं आती, कितनी भी कोशिश कर लें, लेकिन कोई हल नहीं निकलता, ऐसे कठिन समय में परेशान व्यक्ति को केवल दो ही राहें दिखती हैं, या तो वो हालातों के सामने आत्मसमर्पण कर दे या परिस्थितियाँ जैसी हैं, उसी में चुपचाप खुद को ढाल ले। ऐसी हालत में परिवार के सदस्य भी बात करना बंद कर देते हैं, परिवार की उपेक्षा उसे सबसे ज़्यादा तोड़ती है। व्यक्ति बाहरी दुनिया का सामना तो साहस के साथ कर लेता है, लेकिन घर के भीतर का बेगानापन उसे भीतर से तोड़ देता है। ऐसी ही भयावह स्थिति में भी बाबा ज़िंदगी का परचम उठाए रहे क्योंकि वे तो बाबा थे, हम सबसे अलग.. हम सबसे इतर, हम सबसे जुदा, शायद इसी लिए वे भाते थे मुझे। वे जो काम कर रहे थे, वो कितना भी बोरिंग क्यों ना हो, मशीनी क्यों ना हो, बोझिल क्यों ना हो, फिर भी वे उसी काम को करते चले गए, धीरे   धीरे अपने कदम बढ़ाते रहे। और अंततः उसी काम के बीच, उसी सक्रियता के कुछ "मतलब" निकलने लगे, जिसके अभी तक कोई मायने नहीं थे, उसमें से ही मायने निकलने लगे। उन्होंने खुद को कभी कोल्हू का बैल नहीं माना, वे खुद को जानते थे कि वे कोल्हू के बैल नहीं, रेस के घोड़े हैं। 

वे जानते थे कि जब मानसिक उद्देलन हो, चिंताओं हों, अनिर्णय की स्थिति हों, कुछ भी समझ नहीं आ रहा हो, सारे रास्ते बंद हो गए से लगते हों, तब भी यह याद रखना होगा कि कोई न कोई रास्ता अब भी बचा है, रास्ता नहीं तो कोई खिड़की,या फिर कोई रोशनदान, या फिर कोई झिर्री..। पारिवारिक और आर्थिक तंगी और उठापटक के दिनों में भी वे प्रयास करते रहे कि अपने बिखरे टुकड़े समेटें, जैसे वे फटे बैग्स से साथ करते, ज़िंदगी के साथ बेहतर तरीके से जूझने की हिम्मत जुटाने लगे, एक   एक कदम जमा कर रखने लगे। सचमुच मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा, मसलन, जो जीर्ण   शीर्ण हो चुका है, उसे भूलकर सब कुछ फिर से नए निर्माण में जुट जाइए। दुनिया की इस धूम में आप ही कहीं गुम ना हो जाएँ, इसका भी ध्यान रखना होगा। आप जो हैं, उसे बाहर लाना ही होगा। जब आप खुद को खोज लेते हैं, तो अपने आसपास आपको बहुत से ऐसे लोग नज़र आने लगते हैं, जिन्हें आपकी ज़रूरत है, उन्हें  ढूँढ कर रोशनी में लाना होगा, उन्हें जीना सिखाना होगा, मुस्कराना सिखाना होगा, जैसा उन्होंने अपने शागिर्दों के साथ किया। शायद ऐसा ही सोचकर वे न जाने कहाँ   कहाँ के छोटे   छोटे बच्चों को अपने से जोड़ते, ‘ला यह बैग दे!’, ‘इस बैग को बराबर वाले घर में दे आ’, ‘ज़रा सुई में धागा डाल दे’ जैसे काम करवाते।

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सच कहूँ दोस्तों! वे बहती हवा से थे, उनकी मौजूदगी ताज़गी और उत्साह से भरी ऊर्जा और नए सिरे से जीने का जज़्बा जगा देती थी, उनकी यादें एक ठंडक सी आह छोड़ गई, एक मीठी खनक, लेकिन उसके बाद ख़ामोशी। उन्हें कोई बंदिश बाँध नहीं पाई, सहजता और निर्मलता उनका गुण था। भले ही मेरी उनसे जान   पहचान अल्पकालीन ही रही, पर वे अपना गहरा असर छोड़ गए, चले गए मेरे जीवन पर एक खूबसूरत छाप छोड़कर। जब   जब याद आते हैं, एक नॉस्टैल्जिक भाव जागने लगता है, जैसे कोई पुरानी याद जो दिल को छूकर चली गई हो, कोई उड़ती पतंग आँखों के सामने से लहरा कर कहीं छुप गई हो। सोचती हूँ, उन्हें ढूँढूँ, पर कहाँ?

और चलते   चलते बस यही कहूँगी दोस्तों! ‘बहती हवा सा था वो, उड़ती पतंग सा था वो ...कहाँ गया उसे  ढूँढो...

याद रखिएगा, जाने वाले कभी लौटकर नहीं आते, पर जीवन चलता रहता है, और हम उनकी यादों में ठंडक में सुकून खोजते रह जाते हैं, उनकी आवाज़ में मीठी खनक  ढूँढते रह जाते हैं। अब आप बताइए दोस्तों, कि आपकी ज़िंदगी में बहती हवा सा कौन है? कैसा है? कहाँ है? आस   पास ढूँढिए तो ज़रा! अपने प्रेम की इस कहानी को, अपने किस्से को शेयर कीजिए..कीजिइएगा ज़रूर..मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, यूँ ही बातें करते करते आपकी भी बहती हवा से ‘उस’ से मुलाकात हो जाए? है न संभव दोस्तों? मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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ये इश्क वाला लव ... 23/10/26

EPISODE 22.06/11/26 टूटे पै फिर न जुरै

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से  कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और कुछ यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे इश्क की, लव की और इश्क वाले लव की.. सही सुना आपने, इश्क वाला लव.. चलिए थोड़ा रोमानी हो जाते हैं, और डूब जाते हैं, इश्क वाले लव में..

MUSIC   

दोस्तों! न जाने इश्क आज को क्या क्या कहा जाने लगा है? इश्क सुना था, लव सुना था पर, ये इश्क वाला लव क्या है? फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर का एक गीत भर... जी नहीं। दरअसल फेसबुक, ट्विटर और वॉट्सअप जैसे एप्स ने युवाओं में प्यार की परिभाषाएँ ही बदल दी हैं। क्या यह मानें कि नई जनरेशन, नई पीढ़ी, प्यार में उठने वाले भावनाओं के ज्वार को लेकर ज़्यादा प्रैक्टिकल है? पुरानी पीढ़ी के मुकाबले ज़्यादा सजग, दूरंदेशी और हर तरह की व्यावहारिकताओं को समझने वाली। इसके बावजूद वो पुराना वाला इश्क तो हो ही रहा है, जिसे यंगस्टर्स की भाषा में, इश्क वाला लव कहा जा रहा है। अलग अलग समय के साहित्य में रोमांस को तरह तरह से पेश किया गया। कहते हैं साहित्य समाज का आईना होता है। चलिए, साहित्यकारों, शायरों, सूफी संतों, वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के नज़रिए से इश्क को समझने की कोशिश करते हैं...शायरों और साहित्यकारों ने यूँ बयाँ किया मोहब्बत को, जैसे कैफ़ी आज़मी साहब कहते हैं

 

बस एक झिझक है यही हाले दिल सुनाने में,

कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में।

बरस पड़ी थी जो रुख से नकाब उठाने में,

वो चांदनी है अभी तक गरीबखाने में ।।

इसी में इश्क की किस्मत बदल भी सकती थी,

जो वक्त बीत गया आज़माने में,

ये कहकर टूट पड़ा शाखे गुल से आखिरी फूल,

अब और देर है कितनी बहार आने में...

(साभार कैफ़ी आज़मी साहब)

इन पंक्तियों में शायर ने प्रेयसी को लेकर आशिक की फ़िक्र, मोहब्बत और तकलीफ़ को बेहद नज़ाकत के साथ पेश किया है। संवेदनशीलता तो देखिए कि आशिक अपना हाल ए दिल बयाँ करने से भी डरता है कि कहीं इस ज़िक्र से उसकी माशूका की बदनामी न हो जाए। कितनी कोमलता, कितनी मुरव्वत, कितनी मुहब्बत, तितली के पंखों सी रंग बिरंगी है यह चाह। अगर पश्चिम की खिड़की में झांकें, तो विलियम शेक्सपीयर कहते सुनाई देते हैं कि मेरी प्रेमिका की आँखें सूरज के जैसी नहीं हैं, मूंगा भी उसके होठों से ज़्यादा रंगीन है, बर्फ़ भी उससे ज़्यादा सफ़ेद है, काले बादलों का रंग भी उसके बालों से गहरा है, गुलाब भी उसके गालों से ज़्यादा कोमल हैं, लेकिन फिर भी उसकी साँसों की महक मुझे इन सबसे अच्छी लगती है। मैं उसके चेहरे को पढ़ सकता हूँ, मुझे उसमें नज़र आता है समर्पण और प्यार, जिसके लिए मैं बरसों से प्यासा था। मुझे उसकी आवाज़ में संगीत की मिठास लगती है। मैंने कभी ईश्वर को नहीं देखा, लेकिन मैं अपनी प्रेमिका में उसके दर्शन पाता हूँ। वो ज़मीन पर पैर रखती है, तो ऐसा लगता है, मानो स्वर्ग से उतर रही हो। हो सकता है कि यह सब मेरी कल्पना हो, लेकिन मैं उससे प्रेम करता हूँ, यह सच्चाई है।

 

अब बताइए, ऐसा भी इश्क होता है कहीं?

Music  

दोस्तों, अब देखें कि गुलज़ार साहब कैसे दिले गुलज़ार करते हैं?

 

नज़्म उलझी हुई है सीने में, मिसरे अटके हुए हैं होठों पर,

उड़ते फिरते हैं तितलियों की तरह, लफ्ज़ कागजों पर बैठते ही नहीं।

कब से बैठा हुआ हूँ मैं सादे कागज पर लिखकर नाम तिरा,

बस तिरा नाम ही मुकम्मल है, इससे बेहतर भी नज़्म और क्या होगी?

(साभार गुलज़ार)

 

यह इश्क की एक और इंतहा है।

प्यार..प्रेम.. इश्क..कहने को ढाई अक्षर, है न दोस्तों! मगर इज़हार करना हो, तो स्याही भी पूरी न पड़े और पन्ने खत्म हो जाएँ। सब कुछ कहने के बाद भी जाने क्यों प्रेम का इज़हार अभी भी अनकहा, अनबोला और अनलिखा है। फिर भी प्यार को ध्यान में रखकर रची गई कृतियाँ दिल के गिटार पर दीवानगी के सुर ज़रूर छेड़ती हैं, कभी तकियों को भिगोती हैं, तो कभी किसी आपबीती से जुड़कर काफी कुछ सोचने पर मजबूर कर देती हैं।

क्या प्यार अंधा होता है? प्यार करने वाले को अपनी प्रेयसी की हर बात प्यारी लगती है, इस इश्क का जादू सिर्फ़ चार मिनट में ही चल जाता है। इस आकर्षण में बड़ा योगदान हाव भाव का होता है, फिर बातचीत की गति और लहज़ा अपना असर डालता है। प्‍यार में होता है अजब सा दीवानापन, असल में जब व्यक्ति को किसी से प्यार होता है, तो उसके दिमाग में कुछ अलग ही किस्म की हलचलें होती हैं। वह सामान्य से कुछ अलग हो जाता है। इसी को शायद दीवानापन कहते हैं।

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क्या यही दीवानापन इश्क वाला लव है? मुझे तो ऐसा लगता है कि इश्क वाला लव वह है, जो हमें महकाता है, बहकाता है, फिर चाहे हमारा ‘वह’ हमारे पास हो, या दूर, इससे अंतर नहीं पड़ता, अंतर क्यों नहीं पड़ता? अरे भाई, वह हममें जो समाया है। उस खास का ज़िक्र होना यानी इत्र की शीशी का खुलना और फिर इत्र की शीशी के खुलने पर चारों ओर खुशबू का बिखरना, क्या यही खुशबू इश्क वाला लव है? क्या इश्क वाले लव का संबंध इत्र से है? ऐसे इत्र से है, ऐसी इत्र की खुशबू से है? क्या इस खुशबू के होने का कोई तर्क है? क्या कोई परमिट है इसके पास? क्यों आती है यह खुशबू? कहाँ से आती है? कहाँ चली जाती है? कब तक रुकेगी? क्या इसकी कोई समय सीमा है? क्या इसकी कोई सरहद है? क्या इसका कोई पैमाना है? क्या इसका कोई आशियाना है? कौन जाने..

यह महसूस तो होती है, उठती हुई दिखती भी है, पर जब उठती है, तो आग लगा देती है, जब बहती है, तो समंदर बहा देती है, बड़ी ही भली, बड़ी ही मासूम, बड़ी ही मीठी सी...क्या इश्क वाला लव ऐसा ही है, जैसे सपेरे की बीन, जिस तरह सपेरे की बीन बजते ही घने जंगलों से साँप निकल आते हैं, बौराए से, बलखाए से, इतराए से, बेखबर से, क्या इश्क वाला लव उन्हें खींचता है? क्या इश्क वाले लव की खुशबू रात की रानी की खुशबू से भी तेज़ होती है? क्या इश्क वाले लव की पुकार कृष्ण की बंसी की तरह है, जिसने कभी किसी को नहीं पुकारा, उसे छलिए ने तो कभी किसी को आवाज़ भी नहीं दी, पर शायद बंसी की हर लहरी में इश्क वाले लव की खुशबू बसी होगी, उसमें एक पुकार होगी, एक सच्ची पुकार जो गोपियों को खींचकर अपनी ओर ले जाती होगी। वैसे मैंने यह भी देखा है कि इश्क वाला लव पत्थरों में हँसता है, रेगिस्तान में चमकता है, समंदरों में तैरता है, चंद्रमा में छुपा रहता है, फूलों से झाँकता है, रूह को सताता है, नींदों को उड़ा ले जाता है, आँखों से छलकता है, होठों पर सिसकता है, भीड़ में भी हमें तनहा किया जाता है, पर रात के स्याह सन्नाटों में हमें आवाज़ देता है, बेचैन करता है, जब हम सो जाते हैं, तो सपनों में आकर हँसता है, जाग जाते हैं, तो रुलाता है, बाहर ढूँढेंगे, तो रो रो कर भीतर बुलाएगा, और भीतर खोजेंगे, तो बाहर हँसती हुई आवाज आएगी।

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क्या यही है इश्क वाला लव? क्यों दोस्तों? क्या यह लव किसी किताब में लिखा है, ना..ना यह किसी किताब में नहीं लिखा है कि इश्क वाला लव दरअसल है कहाँ? इसलिए इसे मोटी मोटी किताबों में मत खोजना, ना कोई मंत्र है, इसका ना कोई तंत्र है। इसका असली ज्ञानी वही है कि जो इसे खोज ले अपने भीतर। कि उसके हिस्से का इश्क वाला लव है कहाँ? ऐसा लव, जो दीवाना बना दे। और दीवानेपन में सयानेपन की ज़रूरत नहीं। बस पहचान की ज़रूरत है, उस खुशबू को पहचानने की, और इसके लिए किसी ग्रंथ को पढ़ना नहीं पड़ता, बस आँखें बंद करके अपने मन की बात सुननी होगी, मन समझते हैं न आप?

चंदन के पेड़ आग में जलाने के लिए नहीं होते, वे तो अनमोल खुशबू हैं, इश्क वाले लव जैसी खुशबू। जैसे हम इश्क वाले लव को मन में समा लेते हैं, वैसे ही हम चंदन की खुशबू को मन में समा लेते हैं। इश्क वाले लव का रिश्ता सच्चा रिश्ता होता है और सच्चे रिश्तों की खुशबू कभी नहीं जाती। वह आपका पीछा कभी नहीं छोड़ती, पत्ती पत्ती झड़ जाती है पौधों की, पंखुड़ी पंखुड़ी झड़ जाती है फूलों की, लेकिन खुशबू, यह इश्क वाले लव की खुशबू चुप नहीं होती, शांत नहीं बैठती, बशर्ते आप उसे सुन सकें, महसूस कर सकें और कह सकें कि यही है मेरा इश्क वाला लव।

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सच कहूँ दोस्तों! इश्क वाला लव कभी आत्मा को झकझोरता है, कभी आत्मा को सहलाता है। एक ओर हम टूटते हैं, तो दूसरी ओर, हम बिखर कर भी मुस्कराते हैं। दोनों ही रूपों में इश्क वाला लव एक गहरा अनुभव है—जो दिल को छूता है।

और चलते चलते बस यही कहूँगी दोस्तों! कि जब आप इश्क वाले लव में होते हैं न, तब टूटी हुई चाय की प्याली, धूल भरी हवेली या भीगी सड़क भी प्रेम की मस्ती जगाते हैं, यादों की नाज़ुक परतों में खुशबू और आवाज़ें गूँजती हैं और अंतर्मन के संवाद, खामोशी के लहज़े या अधूरे लफ़्ज़ों में भी एक मुक्कमल इश्क उभर आता है।

याद रखिएगा दोस्तों, इश्क वाला लव बार बार नहीं मिलता।  अपने आस पास ढूँढिए तो ज़रा! अपने इश्क वाले लव को, अपने किस्से को शेयर कीजिए..कीजिइएगा ज़रूर..मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, यूँ ही बातें करते करते आपको भी इश्क वाला लव हो जाए! संभव है न दोस्तों? मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

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EPISODE 22

टूटे पै फिर न जुरै 06/11/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से  कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे शादी की, जो एक साझेदारी है, गठबंधन है, आज हम बात करेंगे कम्पैटिबिलिटी की, शादी को बचाने की जद्दोजहद की और बात करेंगे टूटते रिश्तों की, बढ़ती दूरियों, अवसाद, निराशा, अकेलेपन और मानसिक तनाव की..

MUSIC   

बड़े ही प्यार से नीरज ने शादी का निमंत्रण दिया, बड़ा ही अनुग्रह, आग्रह, मनुहार और अधिकार सा लगा, जब उसने कहा, आपको तो आना ही है, मेरे लिए समय नहीं निकालेंगी? खैर, यह उसका प्यार ही था कि मैं नीरज और दीक्षा की शादी में पहुँची। प्री वेडिंग फ़ोटो सेशन से लेकर रोका, हल्दी, सगाई, बैचलर्स पार्टी, कॉकटेल, और न जाने क्या क्या? उसने मुझे सारी फोटो भेजी थीं। हर फोटो की में फ़िज़ाओं में रोमांस का खुमार दिखा। कितने खुश होते हैं सब शादियों में। जिनकी शादी हो रही है, वे भी और जो शादियों में मेहमान बन कर आते हैं, वे सब भी। खूब आनंद का, जोश का, डांस फ़्लोर पर ठुमकों का, हँसी ठिठोली का, उल्लास का माहौल रहता है। वरमाला के समय तो मानो शांत सागर में हिल्लोरें उठने लगती हैं। लगता है जीवन भर का सारा हास परिहास उसी समय संपन्न होगा। और फिर सभी वर वधू को उनके वैवाहिक जीवन के लिए शुभकामनाएँ देकर अपने अपने सब घर चले जाते हैं। जैसे हमारी हिंदी फिल्मों में भी अंत में THEY LIVED HAPPILY EVER AFTER वाली बात होती है और सभी किरदार आपस में मिल जाते हैं, सभी के विवाह हो जाते है और फिल्म का ‘दी एंड’ हो जाता है। लेकिन क्या वास्तव में दी एंड हो जाता है?

लगभग डेढ़ साल बाद नीरज का फ़ोन आया। हमेशा की तरह मैंने चहक कर पूछा,

और कैसे हो नीरज?

दीक्षा कैसी है?

बड़े दिनों बाद याद आई मेरी?

नीरज काफ़ी शांत था, उसकी आवाज़ में दर्द छलक रहा था, बोला, सोच रहा था, आपसे बात करूँ तो करूँ कैसे, हिम्मत ही नहीं हो रही थी, बात करने की।

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मैंने पूछा,

क्यों?

क्या हुआ?

सब ठीक?

वह तो मानो भरा बैठा था, फफक फफक कर रोने लगा,

बोला, हमारी शादी नहीं चली, टूट गई।

इस पर मेरी भी हिम्मत नहीं हुई कि पूछ सकूँ, कि क्या हुआ? कैसे हुआ?

इसीलिए मैं अक्सर यह सोचती हूँ कि क्या विवाह का संपन्न हो जाना या फ़िल्म का ‘दी एंड’ हो जाना ही खुशहाल जीवन की गारंटी है? यदि हाँ, तो फिर आए दिन विवाह टूट क्यों रहे हैं? क्यों वकीलों और काउंसलरों के दरवाज़े खटखटाए जा रहे हैं? पहले अपने लिए योग्य साथी की तलाश, फिर विवाह का खर्चा और फिर विवाह को बचाने की जद्दोजहद। विवाह में होने वाले खर्चे से ज़्यादा महंगा है विवाह को बचाना। टूटते रिश्ते, बढ़ती दूरियाँ, अवसाद, निराशा, अकेलापन और मानसिक तनाव का पर्याय बनकर रह गए हैं विवाह। आखिर क्यों, दोस्तों?

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इन दिनों देश विदेश में हज़ारों महिला और पुरुष अपने विवाह को बचाने या उससे छुटकारा पाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं।  क्या वे समझते हैं कि शादी एक साझेदारी है, एक गठबंधन है, एक कम्पैटिबिलिटी है जिसमें दोनों पक्ष शामिल होने का फैसला करते हैं, जिसका मतलब है कि आप दोनों एक रिश्ते में बंधे हैं, अपने कार्यों के लिए आप जवाबदेह होने के साथ साथ प्रतिबद्ध भी हैं। जब चीज़ें खराब होती हैं, तो पति या पत्नी को आईने में दिखने वाले अपने अक्स के बजाय किसी और पर दोष मढ़ना आसान लगता है। ज़िम्मेदारी लेना, ओनरशिप लेना, रिश्ते को बचाने का सबसे अच्छा तरीका है। जी हाँ, आपको उस रिश्ते को ओन करना ही होगा| जिस क्षण आप किसी रिश्ते के लिए "हाँ" कहते हैं, उस क्षण से लेकर विवाह समाप्त होने तक, जो कुछ भी होता है, उसके लिए आप ज़िम्मेदार होते हैं, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। आपको खुद को कोसने की ज़रूरत नहीं है, आपको बस इतना करना है कि चीज़ों को सुधारने से पहले खुद से झूठ बोलना बंद कर दें, अगर रिश्ते को बचाने की कोशिश करनी है तो.. , है न दोस्तों?

इसके लिए कभी कभी चुप रह जाना भी ज़रूरी है। मेरी माँ अक्सर कहा करती हैं कि एक चुप सौ को हरावे। है भी सच! विवाद के समय, झगड़े के समय आप जितना ज़्यादा बात करेंगे, वह उतना ही आग में घी का काम करेगा। घी के स्रोत को हटा दें, और आग बुझ जाएगी या कम से कम उसकी लपट तो कुछ कम हो ही जाएगी। अब इससे क्या होगा? इससे आप दोनों को संभलने और अपने विवादों को दूर करने के तरीके पर पुनर्विचार करने का समय मिलेगा। जब कोई जीवनसाथी क्रोधित या भयभीत होता है, तो उसका व्यवहार अनपेक्षित हो जाता है, ऐसे में यदि दूसरा व्यक्ति चुप रह सकता है, उस जगह से हट सकता है। जब आप सीन से ही गायब हो गए, तो विवाद कम हो सकता है। क्या उसी समय सारा फ़ैसला करना ज़रूरी है? पर होता क्या है? हमें तो अपना अहम शांत करना होता है न , अपने साथी को दंगल में हराना है न, फिर चाहे रिश्ता टूटे तो टूटे! मानो शादी नहीं डब्ल्यू  डब्ल्यू ई का कोई मैच हो..|

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जी हाँ दोस्तों! अंधड़ के गुज़र जाने के बाद बातचीत सबसे बड़ा अस्त्र है, मसले सुलझाने के लिए... आप अपने साथी के साथ बैठें, बात करें, चाय कॉफ़ी की चुस्की लें, थोड़ा घूमने चले जाएँ, दूर नहीं, तो मॉर्निंग/ईव्निंग वॉक कर लें, एक लंबी ड्राइव कैसी रहेगी? इस दौरान बात करें शांति से, समझदारी से, रिश्तों को निभाने की मंशा अगर दोनों रखते हैं, साथ रहने की इच्छा अगर दोनों रखते हैं, तो यह कारगर होगा। कहीं मैंने पढ़ा था, यहाँ ज्ञान न बाँटिए, यहाँ सब ज्ञानी हैं! जी हाँ, आप ज्ञानी हैं, इसमें क्या शक? पर आप कुछ जानने के लिए गूगल या ए आई का सहारा भी तो लेते हैं न, तो ये समझ लीजिए ये सलाह वहीं से आई है।

कई बार हम अपने आसपास के लोगों को समझ नहीं पाते हैं। हम जिनके साथ समय बिताते हैं, दिनभर बातें करते हैं, वे लोग चाहे हमारे घर के हों, या फिर हमारे दफ़्तर के या हमारे मिलने जुलने वाले, या हमारे रिश्तेदार, इनमें से बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो या तो पूर्वाग्रही ही होते हैं या फिर नकारात्मक होते हैं, जिनके द्वारा कही गईं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बातें हमें प्रभावित करती हैं और उनका असर हमारे रिश्तों पर पड़ता है। इस बात के लिए हमें सजग रहना चाहिए कि हमारे मित्र, मिलने जुलने वाले और रिश्तेदार, जिनके परिवार खुशहाल हैं, उनके साथ हम समय बिताएँ अपने विवाहित जीवन को कैसे जीना है, इसे समझें, या इसके लिए हम अपने रोल मॉडल भी बना सकते हैं, हम अपने आसपास के लोगों में सकारात्मक लोग ढूँढें। जैसी संगति होती है, वैसा ही हमारा मानसिक स्तर और मानसिक क्षितिज बन जाता है, इसे भूलना नहीं है दोस्तों! है न....।

जब विवाहित जोड़े लड़ते हैं, तो यह आसानी से “हर आदमी अपने लिए” वाली स्थिति में बदल सकता है। यह एक ढलान वाला चक्र है, जो अक्सर विनाशकारी परिणाम की ओर ले जाता है। रिश्ते को टूटने से बचाने के लिए, यदि आप चीज़ों को बदलना चाहते हैं, तो आपको अपने समझौता कौशल में सुधार करना होगा। इसकी शुरुआत थोड़े बहुत से की जा सकती है, जैसे वेज और नॉन वेज भोजन....यदि इसी को मुद्दा बनाना था, तो शादी से पहले क्यों नहीं सोचा? अगर आप अपने विवाह को बचाना चाहते हैं, तो आपको अपने रिश्ते को अपनी प्राथमिकता बनाना होगा। इसका मतलब है इसे अपने बच्चों, अपने करियर या किसी और एँगेजमेंट से ऊपर रखना होगा। आजकल ऐसा भी देखा जा रहा है कि पति पत्नी साथ साथ बैठे हैं, पर दोनों अपने अपने फोन में लगे हुए हैं। जो सामने है, वह अदृश्य है, जो अदृश्य है, आभासी है, वर्चुअल है, वह दिल में है। आपको अपने रिश्ते को अपने जीवन के अन्य सभी रिश्तों से ऊपर रखना होगा। एक दूसरे के साथ समय बिताने और एक दूसरे की भावनाओं को साझा करने से प्रेम का धागा टूटता नहीं, और न ही उसमें गाँठ पड़ती है। अरे भई, वीकेंड पर तो अलग अलग प्रोग्राम न बनाओ, एक साथ एक जगह पर साथ रहो, साथ साथ रहने से भी कभी कभी बातें बन जाती हैं, कुछ अनकही गुत्थियाँ सुलझ जाती हैं, एक दूसरे को पैमपर करना, समय देना भी तो ज़रूरी है रिश्ते में, वह गीत याद है आपको? जाने क्या तूने काही, जाने क्या मैंने सुनी, बात कुछ बन ही गई| क्या कहते हैं दोस्तों!

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आज संतोषजनक बात ये है कि ऐसी चिकित्सा विधियाँ हैं, जिनके द्वारा विवाह या टूटते रिश्तों को फिर से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। वैवाहिकी चिकित्सा एक़ तरह की समूह चिकित्सा है, जो पारिवारिक चिकित्सा के बहुत करीब है। इस चिकित्सा विधि में पति और पत्नी के बीच के पारस्परिक संबंधों को उत्तम बनाने का प्रयास किया जाता है। निस्संदेह काउंसलिंग करवाना रिश्ते को बचाने के सर्वोत्तम तरीकों में से एक है। भारत में छोटे शहरों में काउंसिलिंग के महत्व को समझने में अभी वक्त लगेगा, पर बड़े शहरों में लोग थेरेपी ले भी रहे हैं, और ठीक भी हो रहे हैं। हाँ, विदेशों में इसका खूब चलन है और लोग इस बात को छुपाते नहीं, कि वे थेरेपिस्ट से मिल रहे हैं। दोस्तों, हमें भी इन कृत्रिम दीवारों को गिराना होगा, क्योंकि अब ये अभेद्य दीवारें नहीं हैं, इन्हें कभी भी भेदा जा सकता है, गिराया जा सकता है। है न दोस्तों!

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अरे हाँ! बातों बातों में नीरज को तो भूल ही गई....आज वह खुशहाल शादीशुदा ज़िंदगी जी रहा है, दीक्षा के साथ नहीं, आकांक्षा के साथ.....दोस्तों! विवाह प्रेम के धागे से बुना एक इंद्रधनुषी कपड़ा है, इसे प्रेम से ही सहेजना होगा। ये धागा है विश्वास का है, भरोसे का है, जीवन भर का है, इसे मत तोड़ो चटकाय...

सच कहूँ दोस्तों! धरती पर कहीं दूर भी अगर कोई रिश्ता टूटता है न, तो बवंडर आ जाता है, कोई लैंडस्लाइड हो जाती है, सुनामी आ जाती है, तूफ़ान आ जाता है। और चलते चलते बस यही कहूँगी दोस्तों! रिश्तों को सहेज कर रखें, ये हमारी ज़मीन हैं, आकाश हैं, हमारी पहचान हैं, दिल का सुकून हैं और सबसे बड़ी बात, ये हमारा वजूद हैं, हमारा अस्तित्व हैं।

आपने अपने रिश्तों को कैसे सहेजा है, बताइए तो ज़रा! अपने अनुभव, अपने किस्से शेयर कीजिए..कीजिइएगा ज़रूर.. भूलना नहीं, मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, क्या पता यूँ ही बातें करते करते कुछ रिश्ते सँवर जाएँ! संभव है न दोस्तों? मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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EPISODE 23. 20/11/26

दिल चाहता है..

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे दिल की, अरे भई इसके उसके दिल की नहीं, अपने दिल की। अक्सर होता क्या है? हम इसके उसके दिल की सुनते रहते हैं, यह भूल जाते हैं, कि एक बेचारा दिल हमारे पास भी तो है, जो चाहता है कि कोई कभी उसकी भी तो सुने। तो चलिए, आज जानते हैं, कि मेरा दिल क्या चाहता है?

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मेरा दिल चाहता है कि मैं अपने ‘उस’ को देखकर कहूँ कि जब भी मैं तुम्हें देखती हूँ, तुम्हें बिखरा बिखरा सा पाती हूँ, लगता है जैसे आसमान में किसी देवदूत के गले से टूट कर गिरी हुई माला के मोती हो तुम, जो धरती पर आते आते बिखर गई है। तुम कुछ इस तरह से टूट कर गिरे, कि माला का वह धागा, उस देवदूत के गले में ही छूट गया और सभी कीमती मोती इधर उधर हो गए, जिनसे अलौकिक प्रकाश और खुशबू निकल रही है। मैं उन्हें छूने जाती हूँ, तो वे जुगनू बन जाते हैं और दर्द के स्याह अंधेरों में लुकाछिपी खेलने लगते हैं। कभी मैंने चाहा कि तुम्हें समेट लूँ अपने दोनों हाथों में, फिर से एक सुंदर माला बना दूँ, लेकिन उन्हें समेटना मेरे बस की बात नहीं। छूते ही गायब हो जाते हैं वे मोती। सुनो! ऐसा करो कि तुम खुद को समेट लो, हर मोती को सहज लो, मैं अपनी साँसों का अनमोल धागा तुम्हें दे रही हूँ। दरअसल जब मैं आई थी ना इस धरती पर, तब से यह मेरे पास बेकार ही पड़ा है। मेरे पास तो कीमती मोती भी नहीं, जिन्हें मैं इनमें पिरोकर माला बना सकूँ। अब तुम ऐसा करो, इस धागे में अपने सभी मोतियों को आहिस्ता आहिस्ता पिरो दो, यहाँ वहाँ बिखरे मोती अच्छे नहीं लगते,

देखो ज़रा आराम से,

धागे में गाँठ न पड़े

सुनो ना.... सुन रहे हो ना तुम!

Music

मेरा दिल चाहता है कि मैं कहूँ कि जो जोड़ता था आकाश को हवाओं से, जो जोड़ता था मन को कल्पनाओं से, जो जोड़ता था पानी को मिट्टी से, जो जोड़ देता था घास को तलहटी से, जो कच्चे रिश्तों को पकाता था वक्त के अलाव में, जो टूट कर भी नहीं टूटा, वह सिर्फ़ विश्वास था, जो जोड़ता रहा, मगर खुद टूटता रहा, जो दरारें भरता रहा, पर खुद भीतर से रिसता रहा, जो आज भी आसमान को गिरने नहीं देता, जो आज भी धरती को थमने नहीं देता, जो आज भी मन के दीए को बुझाने नहीं देता, वह विश्वास ही तो है। जो जोड़ता है वह भी विश्वास है और जो टूट रहा है, वह भी विश्वास है। टूटने और जोड़ने के खेल में छुपी है एक आस है। जो जोड़ता है सबको, वह भीतर से यकीनन टूटा होगा ज़रूर। जो साथ है हरदम, वह एक दिन यकीनन छूटा होगा ज़रूर। दिल के भीतर देखकर भीतर ही उसका छूट जाना, भीतर ही भीतर उसका टूट जाना, कोई नहीं देख पाता, कोई नहीं सुन पाता कि वह अब भी कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ छोड़ रहा होगा, खुद के मन की मिट्टी से कोई कोना तोड़ रहा होगा, क्या दिल यही चाहता है मेरा?

जब हम रिश्तों के गाँव बसाते हैं ना, तो एहसास की पतली गलियाँ उनके बीच खुद ब खुद बन जाती हैं। ये गाँव इन्हीं गलियों से साँस लेते हैं, गाँव के जीवित रहने में और बस्तियों के तबाह हो जाने में इन पतली संकरी गलियों का बड़ा योगदान होता है, इसलिए शायद गलियों के सिरे खुले छोड़े जाते रहे योग्य इंजीनियरों द्वारा, और बातों के सिरे खुला छोड़ देते हैं समझदार लोग। वे जुलाहे की तरह गाँठ लगाकर छुपाते नहीं, वे तो सिरे खुले छोड़ते हैं, ताकि आने जाने की सुविधा बनी रहे, ताकि जाने वाले अपने अहम, अपने स्वार्थ और अवसरवादिता का सामान लेकर कभी भी उठकर जा सकें और आने वाले कभी भी अपने अहम को भुलाकर, अहंकार को गलाकर, किसी भी सिरे से लौट सकें। सच कहूँ दोस्तों! यही तो चाहता है दिल मेरा!

जी हाँ दोस्तों! बहुत ज़रूरी है बातों के सिरे खुला रखना ताकि जीवन बचा रहे, साँसों में घुटन न हो, ताकि समझ आ सके, जिसे सही समझ कर प्यार करते रहे, वह कितना सही था और जिसे गलत समझ कर बचते रहे, क्या वह सच में गलत था? सड़कें खुली रहती हैं, तो जीवित रहती हैं और सिरे खुले रहने से जीवित रहते हैं रिश्ते। इतना खुलापन तो ज़रूरी ही है। आज के संदर्भ में, हम इस स्पेस कह सकते हैं। हर किसी को अपनी अपने स्पेस की तलाश है और स्पेस की ज़रूरत भी है। तो क्यों ना मिलकर एक दूसरे को स्पेस दें, सब की निजता का सम्मान करें। है न दोस्तों! भई, मेरा दिल तो यही चाहता है।

Music

दोस्तों! दो पहाड़ियों को सिर्फ़ पुल ही नहीं, खाइयाँ भी जोड़ती हैं, नदियों को जोड़ने का काम पुल सदियों से करते आए हैं, लेकिन पहाड़ों को जोड़ती खाइयों की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया, सोचती हूँ कि इन ऊँचे, कठोर, बदरंग और रुखे, अपने ही अभिमान में अकड़े अकड़े से पहाड़ कभी भी अपनी जगह से नहीं हिले, लेकिन उनके बीच की गहरी खाई उन्हें हमेशा जोड़े रखती है, यह जोड़ बड़ी कोमलता लिए हुए हैं, बहुत ही सरलता से, बहुत ही तरलता से जुड़े रहते हैं ये पहाड़। दोनों सिरों से स्थिर रहने के कारण अभिशप्त ज़रूर हैं ये पहाड़, ये पर्वत, लेकिन जब जब भी ये दोनों एक दूजे को दूर से देखते होंगे, उनकी धुंधलाई सी आँखों से पीड़ा के अनगिनत झरने, असंख्य तड़पती नदियाँ बहने लगती होगीं और खाई में बिखर जाती होगीं। यह खाई ही उन्हें जोड़ती है, जितनी गहरी खाई उतना गहरा प्रेम! किसने किसने देखा है यह? कौन जाने!                                 

मेरा दिल मानता है कि एक दिन ऐसा भी आएगा, जब ये ऊँचे पहाड़ अपने दुख से गल जाएँगे, अपनी पीड़ा में बह जाएँगे और उनके अविरल बहते आँसू बीच की गहरी खाई को पाट देंगे, पीर पर्वत सी हो जाएगी, पहाड़ नदी हो जाएँगे, उस दिन दो नदियाँ आपस में मिल जाएँगी और खाई पट जाएगी। इस अनोखा मिलन देखकर धरती गाएगी, नाचेगी, मुस्काएगी, लहराएगी और... और आसमान फिर इतिहास लिखने लगेगा, उस दिन दोनों पहाड़ एक दूजे का माथा चूमेंगे, उस दिन खाई भी मुस्कराएगी।

दोस्तों! कुछ रिश्ते आसमान में बने होते हैं, उनका धरती पर कोई आधार नहीं होता, इसलिए कभी समझ ही नहीं आते और ना समझ आती है ऐसी धरती, जहाँ प्रेम लिखा तो खूब गया, लेकिन कितना किया गया, कौन जाने? अध्याय तो लिखे जाने चाहिए आसमानों में, प्रेम उन्मुक्त है जहाँ, सुना है, आसमानों में कोई जेल नहीं, कोई रस्सी नहीं, कोई कानून नहीं, वहाँ ज़रूर प्रेम जीवित रहता होगा, जिन्हें धरती ने नहीं संभाला, आसमान ने उन्हें थामा है क्योंकि कहते हैं न कि आसमान का दिल बहुत बड़ा है, उसका न कोई ओर है, न कोई छोर।

Music

सुनो, मेरा दिल यह भी जानता है कि सतह पर कभी कोई युद्ध नहीं लड़ा ही नहीं जा सकता। कुशल योद्धा गहरे में उतरकर ही लड़ते हैं। जो सिर्फ़ लहरों की सुंदरता निहारने का शौक रखते थे, वे शाम को ही लहरों को निहार कर लौट गए, जो जूझने का हुनर रखते थे, उन्होंने लहरों के संग खूब कलाबाजियाँ कीं। समंदर सभी को उसकी पसंद के उपहार देता है। किसी को नमक, किसी को मोती, किसी को रेत, किसी को गरल, तो किसी को पीयूष। समस्त संसार की मीठी नदियों के दर्द को खुद में समेटे वह किस कदर थमा रहता है, कौन जाने? समंदर बाहर ही नहीं, हमारी आँखों के अंदर भी है, इस समंदर का कभी कोई किनारा क्यों नहीं मिलता? कौन जाने? कौन पता देगा कि अगर मैं उसकी आँखों के गहरे समंदर में खो जाऊँ, तो मुझे किनारा नहीं मिलेगा या नहीं, और अगर मैं खुद दर्द के समंदर में डूब जाऊँ, तब भी किनारा मिलेगा या नहीं, कौन जाने? कभी कभी मेरा दिल सोचता है कि सारी दुनिया का दर्द खुद में समेट लेने वाला, सभी को आसरा देने वाला समंदर अहोभाग्य है, परंतु समंदर को समंदर के भीतर सहारा देने कौन आएगा? उसे आसरा देने कौन आएगा? समंदर कितना अकेला है, उसमें तो न जाने कितने डूब गए, लेकिन वह कहाँ जाए कि खुद को डुबो सके? उसके किनारों पर हज़ारों को मंज़िलें मिलीं, लेकिन उसे शहर कौन देगा? उसे बसर कौन देगा? और वह तो हमेशा मुसाफ़िर का मुसाफ़िर रह जाएगा और कहता रहेगा  मुसाफ़िर हूँ यारों ना घर है ना ठिकाना, मुझे चलते जाना है, बस चलते जाना। है न दोस्तों!

Music

मेरा दिल चाहता है कि मैं तुम्हारे बिखरेपन को समेत दूँ, देवदूत के गले से टूट कर गिरी हुई माला के मोतियों को अपनी साँसों के अनमोल धागे में पिरोकर एक सुंदर सी माला बना दूँ, अलौकिक प्रकाश और अप्रतिम खुशबू वाले जुगनुओं से रोशनी चुरा लूँ, पहाड़ों और खाइयों की दूरियों को पाट दूँ, समंदरों को एक शहर दे दूँ और बातों के सिरे खुले छोड़कर रिश्तों के गाँव बसा लूँ।

सच कहूँ दोस्तों! मेरा दिल तो यही चाहता है, और आपका?

आपका दिल क्या चाहता है, बताइए तो ज़रा! अपनी चाहत, अपनी बातें, अपने किस्से शेयर तो कीजिए..कीजिएगा ज़रूर.. भूलना नहीं, मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, क्या पता यूँ ही बातें करते करते एक दिन रिश्तों के गाँव बस जाएँ!

है न दोस्तों? मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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EPISODE 24.

भेद ये गहरा, बात ज़रा-सी! 04/12/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से- कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करने जा रहे हैं, प्रेम की..आपको याद है न दोस्तों, कि मैंने पॉडकास्ट की शुरुआत ही प्रेम-रसायन की बात से की थी, क्योंकि प्रेम है, तो हम हैं। प्रेम-रसायन पर बात करते-करते मैंने यह जाना कि प्रेम का सीधा-सच्चा संबंध सुंदरता से होता है, और यह आँखों में समाया होता है और आपके आयी, आज के एपिसोड में इस भेद को जानने की कोशिश करते हैं..

Music  

पिछली रात बहुत कोहरा था, ओस भी थी। ऐसा तो होना लाज़मी है, क्योंकि सर्दियों का मौसम है। पर इस ठिठुरती ठंड में कितने लोग देख पाते हैं कि पिछली रात चुपके से आसमान ने धरती को एक प्रेम-पत्र लिख भेजा है। ओस की बूँदों से लिखा हुआ, भीगा हुआ प्रेमपत्र! दोस्तों! ये जो सुबह हम पत्तियों पे ओस देखते हैं न, ध्यान से देखिए उसे, आपको एक प्रेम-कविता नज़र आएगी उसमें। क्या आसमान सिर्फ़ पानी बरसाता है? या वह धरती को कोई संदेश देता है? क्या सागर सिर्फ़ नदियों के जुड़ने से बना है? या आसमान के आँसुओं को समेट कर चुपचाप पड़ा है? हमें ऐसा क्यों नहीं लगता? क्यों नहीं दिखता हमें? अब इसका भेद क्या है? वजह क्या है? क्या हम भीतर से सूख गए हैं? अब हमारे भीतर कोई हरापन नहीं बचा, कोई गीलापन नहीं, कोई तरलता नहीं, सब बंजर कर दिया हमने, क्या ऐसे ही हो गए हैं हम? क्या भीतर से खोखले हो गए हैं हम? क्या है खुशी, असली खुशी? ऐसी खुशी, जो हमारे अंतस को सुख देती है? शांति देती है? संतुष्टि देती है? क्या यह ख़ुशी क्षणिक होती है, पानी का बुलबुला होती है, गर्म तवे पर छुन्न से गिरती और गायब होती पानी की बूँद होती है, जो टिकती नहीं। फूलों से खुशबू की तरह उड़ क्यों जाती है? इतना सब पा लेने के बाद भी वह संतुष्टि नहीं दिखती....सच्ची मुस्कराहट नहीं खिलती हमारे चेहरे पर!

MUSIC

यूँ ही चलते-चलते एक वाकया सुनाना चाहूँगी, मेरी कॉलोनी में सड़कें हमेशा साफ़-सुथरी रहती हैं। इन हवेलीनुमा घरों के नौकर रोज़ ही घरों से कचरे की बड़ी-बड़ी पन्नियाँ उठा कर पास ही बनी झोंपड़-पट्टी के सामने फेंक आते है। फिर शुरू होता है, उस बस्ती के बच्चों का खेल..वे सब उस कचरे में से अपनी-अपनी पसंद के खिलौने खोजते हैं। एक दिन ऐसा ही हुआ। बहुत-से बच्चे उस कचरे में से अपने मतलब की चीज़ें छाँट रहे थे। एक छोटे बच्चे के हिस्से कुछ भी नहीं आया। वह बड़ी देर तक रोता रहा, फिर थक-हार कर उसने उस कचरे से एक टूटी हुई गुड़िया खोज ली और बहुत ही प्यार से उससे खेलने लगा। उस बच्चे के चेहरे पर मैंने बहुत सारा प्यार देखा, उस टूटे खिलौने के लिए। वह घंटों खुद को भुला कर उस टूटे खिलौने के साथ था। कैसी शांति और कैसा प्रेम था उसके चेहरे पर? उसके गालों पर बहते आँसू की लकीरें अब इतिहास बन चुकी थीं, गालों पर खिंची आँसुओं की धार अब सूख चुकी थी और उसके होठों पर एक पवित्र-सी मुस्कान थी। उस टूटे हुए खिलौने को पाकर उसने दोनों जहान की खुशियाँ समेत ली थीं, अपनी झोली में उसने। मैं सब देख रही थी, यह मेरे लिए घटना अभूतपूर्व थी।

Music

दोस्तों! यह सच है कि खिलौने का एहसास बच्चों को सुरक्षित महसूस करने में मदद देता है, बच्चे अपनी पसंद के खिलौने को अपने साथ रखकर आश्वस्त महसूस करते हैं, खिलौने के खेल उन्हें समृद्ध करते हैं, उनके विकास में मदद करते हैं, उनकी कल्पनाशक्ति को प्रज्वलित करते हैं, संज्ञानात्मक और मोटर कौशल में सुधार की नींव रखते हैं, वे साझा करने, सहयोग करने और संचार के महत्व को सिखाने में भी मदद करते हैं, पर.....पर दोस्तों, यह प्यारा-सा, छोटा-सा बच्चा इन सबको नहीं जानता। उसने न कभी शिक्षाशास्त्र पढ़ा, न वह  मनोविज्ञान की समझ रखता है। बस वह....वह तो खुश होना जानता है, संतुष्ट होना जानता है, और अपनी पवित्र मुस्कान से सारे क्षितिज को रंगीन कर देना जानता है। उसकी भोली-सी, प्यारी-सी मुस्कान से क्षितिज रंगीन हो चला है.. वह यह भी नहीं जानता... कितना मासूम..कितना अबोध...कितना निश्छल..।

और इधर हम तथाकथित समझदार लोग, खुश होने के लिए न जाने कितने जतन करते है, रात-दिन एक करते रहते हैं, एक-दूजे को नीचा दिखाते हैं, गिराते हैं, झूठ बोलते हैं, छलते हैं, भेष बदलते हैं, मुखौटे लगाते हैं, कवच पहनते हैं, छवि गढ़ते हैं, दूसरों की ख़ुशी छीनने से नहीं हिचकिचाते..और जब इन सबसे भी बात नहीं बनती, तो भौतिक वस्तुओं में...ऐशो-आराम की चीज़ों में....और तो और शॉपिंग में ख़ुशी तलाशते हैं। कोई अपने हवेलीनुमा मकान को देख खुश होता है, कोई अपनी लंबी-सी कार देख कर। कोई बैंक बेलेंस देख कर, तो कोई फेसबुक पर अपने पांच हजार ‘फ्रेंड्स’ देख कर। कोई अपनी रील के व्यूअर्स देखकर, तो कोई यूट्यूब के सब्सक्राइब्र्स देखकर। परंतु दोस्तों! क्या यह खुशी असली खुशी है? क्या यह खुशी हमारे अंतस को सुख देती है? शांति देती है? संतुष्टि देती है? और फिर एक बात और भी है दोस्तों! यह ख़ुशी क्षणिक होती है, पानी का बुलबुला होती है, गर्म तवे पर छुन्न से गिरती और गायब होती पानी की बूँद होती है, जो टिकती नहीं। फूलों से खुशबू की तरह उड़ क्यों जाती है? इतना सब पा लेने के बाद भी वह संतुष्टि नहीं दिखती....वह मुस्कराहट नहीं खिलती, जो उस गरीब बच्चे के चेहरे पर टूटे, बेकार से खिलौने ने खिला दी थी।

Music

आखिर भेद क्या है इसका? क्या मंत्र है इसका?

दरअसल उस बच्चे ने उस खिलौने में खुद को डुबा दिया....समा लिया.....भुला दिया। जब-जब भी हम खुद को भुला कर खुश होते हैं, वह ख़ुशी स्थायी होती है। उस ख़ुशी का अहसास जीवन भर हमारे साथ चलता है। जैसे किसी बहुत सुंदर दृश्य को देख हम खुद को भूल जाते हैं या कोई लम्हा जब हमें अपने आपसे ही जुदा कर जाता है, वह लम्हा, वह पल हम कभी नहीं भूलते, और उस पल में गुम हो जाते हैं...वे पल हमेशा हमारे साथ चलते हैं....हमारे जीवन का हिस्सा बनकर। लेकिन कैसे?

एक दिन किसी नदी के किनारे जाना हुआ। वहाँ कुछ लोग अपनी मन्नतों के दीपक सिरा रहे थे, तो कुछ अपने पाप धो-धो कर नदी को मैला किए जा रहे थे। कई उस पानी का इस्तेमाल अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कर रहे थे। बड़ा शोर मचा हुआ था चारों ओर, लेकिन...लेकिन मैंने चुपके से सुना कि लहरें किनारों से बतिया रही थीं। ज़रा ध्यान दिया तो उनकी आवाज़ें और स्पष्ट सुनाई देने लगीं। कितनी सुंदर। कितनी आज़ाद थीं ये लहरें। अपनी मर्ज़ी से आतीं और अपनी मर्ज़ी से जातीं। अहंकार से अकड़े किनारे भीग-भीग जाते, लेकिन अपनी जगह से नहीं हिलते, लहरें वापस चली जातीं। उस दिन मैंने ये जाना कि नदी का इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए करते-करते हम कितने स्वार्थी हो गए हैं कि कभी भी दो घड़ी बैठ कर उसकी सुंदरता को निहारा नहीं,...उसकी बात नहीं। कितनी ही नदियों ने कहा होगा हमसे कि मैं नदिया फिर मैं भी प्यासी... भेद ये गहरा बात ज़रा-सी।

क्या सुन पाए हम?

Music

जब-जब हम भीतर से कंगाल होते हैं न दोस्तों, हम गरीब होते हैं, खोखले होते हैं, तभी हम उस कमी को पूरा करने के लिए बाहर भटकते हैं। अपने खालीपन को लिए लिए सौ जगह भटकते हैं, लेकिन फिर भी खाली ही रहते हैं, रीते ही रहते है। जिस दिन हम खुद प्रेम से भरे होते है, उस दिन पाने के लिए नहीं देने के लिए आतुर होते हैं। जिस तरह फूल की सुगंध उसकी पहचान है, उसी तरह प्रेम की भी एक खुशबू है। जो आप के भीतर से निकल कर चारों ओर बिखरती है, बशर्ते हमारा दिमाग चालाकियों से खाली हो और मन के भीतर सौंदर्य और प्रेम भरा हो।

ख़ुशी और प्रेम पाने का भेद गहरा है। लेकिन बात ज़रा-सी ही है, जो समझ गए उन्होंने प्रेम कलश को भर लिया… नहीं तो रह गए वे रीते के रीते।

एक और बहुत सुंदर बात- आप खुद को हमेशा प्रेम से भरे रखिए। एक दिन आपका प्रेमी खोजता हुआ आपके पास चला आएगा। तो चलिए ना... आज से खुद को भीतर से महसूस करें...खुद के भीतर महसूस करें.....सौंदर्य, प्रेम और बहुत-सा प्यार...मुहब्बत...इंसानियत...मुरव्वत..और जाने क्या-क्या? और सबको बता दें, नदिया अब यह न कह सकेगी कि मैं नदिया फिर भी मैं प्यासी .....क्योंकि अब तो हम समझ गए हैं कि भेद ये गहरा ज़रूर है, पर बात है ज़रा-सी! है न दोस्तों

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अंत में यही कहना चाहूँगी दोस्तों, आइए, प्रेम का यह भेद जानें, मिलकर प्रेम के अमृत-कलश को भरें, आप अपने किस्से शेयर कीजिए..कीजिएगा ज़रूर.. भूलना नहीं, मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न.. अबकी बार आपको अगले सीज़न का इंतजार करना पड़ेगा...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, क्या पता यूँ ही बातें करते-करते असली खुशी की हमारी मृगतृष्णा, हमारी प्यास एक दिन पूरी हो जाए!

है न दोस्तों? मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले सीज़न के साथ..‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न में मेरे हमराही, मेरे हमसफ़र बनने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया..बहुत-बहुत आभार, बहुत-बहुत धन्यवाद..!

फिर मिलती हूँ दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से-कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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