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THANK YOU

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 THANK YOU कल विश्व दृष्टि दिवस (WORLD SIGHT DAY) था| इस दृष्टि दिवस पर मेरा हार्दिक आभार डॉ अग्रवाल्स आई हॉस्पिटल चेन्नई के डॉक्टर ,डॉ आश्विन अग्रवाल को....मैं हृदय से उनका आभार व्यक्त करती हूं कि उन्होंने मुझे एक बार फिर दुनिया की रंगीनियत, इसकी खूबसूरती और जीवंतता को देखने का अवसर दिया। अनेक तथाकथित बड़े व नामी डॉक्टर्स के पास जाकर, हताश होकर या उनके यह कहने पर कि यथास्थिति रहने दो....बाद में देखेंगे, मेरा मन कहीं ना कहीं निराशा से भरने लगा था, लेकिन ऐसे में डॉक्टर पूजा किशोर, जो संयोग से मेरी भांजी भी है, ने मुझे कुछ डांटकर, कुछ प्यार से, यह सलाह दी कि मुझे चेन्नई जाकर डॉक्टर अश्विन अग्रवाल से मिलना चाहिए। सच कहूं तो, ना तो मैंने ऐसे डॉक्टर पहले कभी देखे थे और ना ही ऐसा अस्पताल....यह अस्पताल अपने आप में एक पॉज़िटिव उदाहरण है कि किस प्रकार से ना केवल मरीजों का इलाज किया जाता है, बल्कि सहजता से, उनका आदर और सम्मान सुरक्षित रखते हुए उनकी चिकित्सा की जाती है। पूरे अस्पताल का वातावरण ऐसा था, कि मानो सभी मनोयोग से, प्यार से, स्नेहिल भाव से मरीजों की सेवा करने में लगे हैं। एक ऐसी सर्जरी...

मंच पर बोलने से क्यों डरें?

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  मंच पर बोलने से क्यों डरें ?   " डर अपरिहार्य है , मुझे इसे स्वीकार करना होगा , लेकिन मैं इसे मुझे पंगु बनाने की अनुमति नहीं दे सकता।" - इसाबेल अलेंदे मंच का भय बोलने से पहले घबराहट की स्थिति है। यहां तक ​​कि सबसे अनुभवी वक्ताओं और कलाकारों को भी मंचीय भय या घबराहट का अनुभव होता है। आपके लिए यह समझना ज़रूरी है कि मंच का भय   क्या है , ताकि आप इसे पूरी तरह से दूर कर सकें। मंच का डर या प्रदर्शन की चिंता एक स्थायी भय है, जो किसी व्यक्ति में तब पैदा होता है जब उसे दर्शकों के सामने प्रदर्शन करने की आवश्यकता होती है। मंच के डर को आमतौर पर एक फोबिया के रूप में नहीं माना जाता है , बावजूद इसके कि यह लगभग सभी प्रकार के कलाकारों को अपंग करने की क्षमता रखता है। आधिकारिक तौर पर , हालांकि , इसे ग्लोसोफोबिया , या सार्वजनिक बोलने के डर के सबसेट के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है , जो स्वयं एक प्रकार का सामाजिक भय है। यह भय अचानक या धीरे-धीरे उत्पन्न हो सकता है और हल्का या गंभीर हो सकता है। मंच का भय किसे होता है ? स्कूल में बच्चों से लेकर पेशेवर अभिनेताओं तक , ज...

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा-थोड़ा

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 शहद जीने का मिला करता है थोड़ा-थोड़ा पिछले दिनों मैंने किसी बगीचे में इक बहुत बड़े वृक्ष को देखा। उस विशाल वृक्ष पर इक सुन्दर लता, यानी बेल, लिपटी हुई थी। बहुत देर तक उन्हें देखती रही और ये तय नहीं कर पायी कि कौन ज्यादा सुन्दर है। और कौन किसकी सुन्दरता बढ़ा रहा है। वृक्ष ने उस कोमल लता को अपना सानिध्य दिया है। या बेल ने खुद को वृक्ष के प्रति समर्पित कर दिया। मैंने खुद ही मान लिया कि कोई एक नहीं; बल्कि दोनों ही सुन्दर हैं। लेकिन एक दूजे की वजह से। कुछ दिनों बाद फिर से देखा तो पाया कि वृक्ष पर कोई बेल नहीं थी। बेल टूटी हुई-सी सड़क किनारे पड़ी थी। और वृक्ष भी सूना-सूना डरावना-सा लग रहा था। बगीचे के माली से पूछने पर उसने बताया की बेल को कीड़े वाला कोई पौधों का रोग हो गया था। कहीं वृक्ष भी इससे प्रभावित ना हो जाए, इसलिए बेल को ही तोड़ कर फेंक दिया गया था। मैं बहुत देर सोचती रही। माली को रोग का इलाज करना था। उसे ठीक करना था। उसने तो वृक्ष को बेल से अलग ही कर दिया। क्यों किया उसने ऐसा? दोस्तों, असल जिन्दगी में भी तो हम आजकल यही कर रहे है न? आए दिन टूटते विवाह। बढ़ते तलाक। ह्त्या, आत्महत्...

चकमक पत्थर

 चकमक पत्थर आसमान में उस रात कोई बड़ा भारी तूफान-सा उठा था। कई ग्रह इधर से उधर हो गए। तूफ़ान इतना तेज़ था कि चाँद भी कहीं जाकर छिप गया और तारे-सितारे डर से सिमट गए। शायद कोई खगोलीय घटना घटी थी। तेज आवाज के साथ इक बड़े-से पत्थर जैसी चीज धरती पर ज़बरन धकेली गयी। नियति के मजबूत हाथों ने उसे फेंक दिया मानो वो उसे शाप दे रही थी। धरती तक आते आते वो पत्थर दो टुकड़ो में बँट गया। एक टुकड़ा खारे समंदर में जाकर गिरा तो दूजे को जलते रेगिस्तान ने पनाह दी। दोनों ही अपने भाग्य के भरोसे, अपने आसमानी घर से दूर, अपने ग्रह से बहुत दूर आकर बहुत दुखी थे। यक-ब-यक हुई इस दुर्घटना से और नियति के इस खेल से वे दोनों हैरान थे। वे जहाँ गिरे वो अनजान जगह थी। न इस ग्रह (धरती) के निवासियों की भाषा उन्हें समझ आती और न यहाँ के लोग उनके ग्रह की भाषा समझते थे। दोनों नन्हें टुकड़े इस तरह अलग-अलग दिशाओं में अपना-अपना शाप काटने लगे। दोनों दिखने में साधारण पत्थर ही दिखते थे; ऊपर से मटमैले से, खुरदुरे से। उनके भीतर भी आवाज है, संगीत है, खुशबू है इस बात से धरती के सभी लोग अनजान थे। दुर्भाग्य से वो दोनों अलग-अलग स्थाओं पे ...