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बॉडी लैंग्वेज समझना भी है कला

  बॉडी लैंग्वेज समझना भी है कला बॉडी लैंग्वेज अपने आप में एक भाषा है। यह भाषा क्या है , इसे कैसे पढ़ा जा सकता है , बता रहे हैं सौरभ सुमन हमारे आस-पास कई तरह के लोग होते हैं। कुछ अपनी बात बेबाकी से रखते हैं , जबकि कुछ लोग... हमारे आस-पास कई तरह के लोग होते हैं। कुछ अपनी बात बेबाकी से रखते हैं , जबकि कुछ लोग इशारों-इशारों में बहुत कुछ कह जाते हैं। हमारे दिमाग में चलता बहुत कुछ है , लेकिन अपनी हर बात को शब्दों में बयां नहीं कर पाते। कभी-कभी हमारी बॉडी लैंग्वेज काफी कुछ बयां कर देती हैं। यह बात हर कोई आसानी से नहीं समझ पाता है। सामने वाले इंसान के भीतर चल रहे विचार , सोच और इरादों की परख कुछ ही लोगों को होती है। ऐसे लोग इंसान की मानसिकता को समझने में ज्यादा गलतियां नहीं करते। कह सकते हैं , इन्हें किताबों की तरह इंसानों को पढ़ना बखूबी आता है। क्या है बॉडी लैंग्वेज   बॉडी लैंग्वेज यानी हाव-भाव एक तरह की शारीरिक भाषा है , जिसमें शब्द तो नहीं होते , लेकिन बिना कुछ कहे अपनी बात कह जाते हैं। बॉडी लैंग्वेज एक तरह से इंसान के व्यक्तित्व का आईना होती है। जैसे किताब के हर पन्ने में ...

"स्वार्थ संकुचन है और प्रेम विस्तार"

 " स्वार्थ संकुचन है और प्रेम विस्तार" - स्वामी विवेकानंद   अक्सर सोचता हूँ रत्नाकर डाकू को वाल्मीकि किसने बनाया ? क्या महज़ आत्मग्लानि या अपराधबोध ये काम कर सकते थे ? एक झटके में एक व्यक्ति अपना स्वार्थ भूलकर सन्त बन जाये , कोई न कोई कारण तो अवश्य रहा होगा। शायद डाकू को वाल्मीकि बनाने के पीछे एक बड़ी भूमिका ' प्रेम ' की रही हो! तो फिर वाल्मीकि को महाकवि किसने बनाया ? सुमित्रानंदन पंत लिखते हैं -  ' वियोगी होगा पहला कवि / आह से उपजा होगा गान ......."   और विरह , वियोग - प्रेम की ही तो उपज हैं । तो क्रोंच पक्षी की पीड़ा देखकर वाल्मीकि का महाकवि बन जाना , प्रेम की ही उपज क्यों न मानी जाए ! तो क्या सच में   " प्रेम विस्तार है और स्वार्थ संकुचन ?"     पश्चिमी दार्शनिक Thomas Hobbes कहते हैं - मनुष्य अंततः स्वार्थी होता है , पर इसी बात को आगे बढ़ाते हैं तो स्वार्थ के 2 रूप बताते हैं   - पहला जब स्वार्थ केवल अपने तक सीमित हो और दूसरा जब स्वार्थ का विस्तार हो जाये अर्थात मेरे स्वार्थ की परिधि में समस्त जगत समा जाये। कहीं न कहीं यही विस्तारित स्वार्थ - प...