बुरा जो देखन मैं चला
बुरा जो देखन मैं चला बुरा जो देखन मैं चल , बुरा न मिलिया कोय । जो दिल खोजूं आपना , मुझसे बुरा न कोय ॥ उपर्युक्त पंक्तियां कवि हृदय की एक पीड़ा है , एक अकुलाहट है , जो कहीं न कहीं उसके मन को कचोटती है । हमारे जीवन के दो ही पथ हैं । एक भलाई का और दूसरा बुराई का । हमारे धर्मग्रंथों , मनीषियों ने भलाई के पथ को सर्वश्रेष्ठ माना है । “नेकी पर चलें और बदी से डरें , ताकि हंसते हुए निकले दम” नेकी यानी भलाई और बदी माने बुराई। सभी लोग और सभी नीतिशास्त्र भलाई के रास्ते पर चलने की शिक्षा देते हैं। फिर भी हम बुराई के प्रति आकर्षित हो जाते हैं। जब इस बात पर ज़ोर डाल कर सोचते हैं , तब पता चलता है कि कोई भी व्यक्ति जानबूझ कर बुराई के रास्ते पर नहीं जाना चाहता है। हर व्यक्ति सोचता है कि मैं अच्छा इंसान बनूं , अच्छा नागरिक बनूं , सभी लोग मुझे अच्छे कार्यों के लिए जानें। फिर भी व्यक्ति अच्छा इंसान नहीं बन पाता है। अच्छा इंसान न बन पाने का मुख्य कारण यह है कि वह अपने अवगुणों पर दृष्टि नहीं डालता है , उसे अपनी बुराइयां नज़र ही नहीं आती हैं क्योंकि वह दूसरों की बुराइयों पर अपनी नज़र गड़ा...