कितनी बदल गई है हिंदी?
कितनी बदल गई है
हिंदी?
आम बोलचाल की
भाषा में शब्दों का बदलता स्वरूप
भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं
होती, बल्कि वह समाज, संस्कृति और समय के बदलाव का आईना भी होती है।
हिंदी भाषा, जो भारत की व्यापक रूप से बोली और समझी जाने वाली भाषा है, समय
के साथ निरंतर परिवर्तन के दौर से गुज़र रही है। विशेष रूप से आम बोलचाल की हिंदी
में अनेक शब्दों का स्वरूप, प्रयोग और अर्थ बदल गया है। यह बदलाव केवल
शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारी सोच, जीवनशैली और वैश्वीकरण के प्रभाव को भी
दर्शाता है।
सबसे पहले यदि हम शब्दों के स्तर पर
बदलाव देखें, तो स्पष्ट होता है कि हिंदी में अंग्रेज़ी और अन्य भाषाओं के शब्दों
का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। पहले जहाँ "दूरभाष" शब्द का प्रयोग होता था, आज
उसकी जगह "फोन" ने ले ली है। "चित्रपट" की जगह
"फिल्म", "गणक" की जगह "कंप्यूटर", "दूरदर्शन"
की जगह "टीवी" जैसे शब्द आम हो गए हैं। यह परिवर्तन केवल सुविधा के कारण
नहीं, बल्कि आधुनिकता के प्रभाव का भी परिणाम है। लोग अब सरल, छोटे
और प्रचलित शब्दों को अपनाना अधिक सहज समझते हैं।
इसी प्रकार, आज
की पीढ़ी की भाषा में "हिंग्लिश" का चलन तेजी से बढ़ा है। बातचीत में
अक्सर हिंदी और अंग्रेज़ी का मिश्रण देखने को मिलता है, जैसे—"मैंने
उसे कॉल किया", "तुमने मैसेज क्यों नहीं किया?", "आज
बहुत बिज़ी हूँ" आदि। "मैंने उसे कॉल किया" (फोन किया),"तुम
ऑनलाइन क्यों नहीं थे?""आज बहुत टेंशन है" (चिंता),"ये
काम बहुत टफ है" (कठिन),"मैं अभी मीटिंग में हूँ" (बैठक)| यह मिश्रित भाषा शहरी जीवन का एक सामान्य
हिस्सा बन चुकी है। हालांकि इससे भाषा का दायरा तो बढ़ता है, लेकिन
शुद्ध हिंदी शब्दों का प्रयोग धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।
बदलाव का एक और महत्वपूर्ण पहलू
है—शब्दों के अर्थ में परिवर्तन। कुछ शब्द ऐसे हैं जिनका अर्थ समय के साथ बदल गया
है या उनका उपयोग नए संदर्भों में होने लगा है। उदाहरण के लिए, "दोस्त"
शब्द पहले केवल मित्र के लिए प्रयुक्त होता था,
लेकिन अब यह सोशल मीडिया पर किसी भी
कनेक्शन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। "फॉलो" और "लाइक" लॉगिन
/ लॉगआउट करना,स्क्रीनशॉट लेना, स्टेटस लगाना,पोस्ट
डालना,रील बनाना ,लाइक करना, फॉलो करना, ब्लॉक करना, अनफॉलो करना,ट्रेंड करना, वायरल
होना जैसे शब्दों ने भी हिंदी के सामान्य शब्दकोष में अपनी जगह बना ली है, जिनका
प्रयोग अब केवल अंग्रेज़ी तक सीमित नहीं रहा।
तकनीकी विकास ने भी भाषा को प्रभावित
किया है। मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के आगमन के बाद नए-नए शब्द प्रचलन में आए
हैं। "डाउनलोड", "अपलोड", "स्क्रीनशॉट", "स्टेटस", "रील"
जैसे शब्द अब आम बातचीत का हिस्सा बन गए हैं। इतना ही नहीं, इन
शब्दों के साथ हिंदी क्रियाओं का प्रयोग भी होने लगा है, जैसे—"डाउनलोड
करना", "मैसेज भेजना", "पोस्ट डालना" प्रेषित करना → भेजना / सेंड करना, आमंत्रण
→ इनवाइट, अवकाश
→ छुट्टी / लीव आदि। यह
दर्शाता है कि भाषा कितनी लचीली और अनुकूलनशील होती है।
इसके अलावा, संक्षिप्तता
(brevity) की प्रवृत्ति भी भाषा में बदलाव ला रही है। आज की तेज़ रफ्तार
ज़िंदगी में लोग छोटे और जल्दी समझ में आने वाले शब्दों का प्रयोग करना पसंद करते
हैं। "क्या कर रहे हो?" की जगह "क्या कर रहे?" कहना
अधिक सामान्य हो गया है। सोशल मीडिया और चैटिंग के कारण "ओके" को
"के", "थैंक यू" को "थैंक्स" या
"थैंक्यू" और "गुड नाइट" की जगह "GN" आदि लिखना
आम बात हो गई है।
भाषा में बदलाव का एक कारण क्षेत्रीय
प्रभाव भी है। भारत जैसे बहुभाषी देश में हिंदी विभिन्न बोलियों और भाषाओं से
प्रभावित होती रहती है। अलग-अलग क्षेत्रों में बोली जाने वाली हिंदी में स्थानीय
शब्दों का समावेश हो जाता है, जिससे भाषा और भी समृद्ध होती है, लेकिन
साथ ही उसका स्वरूप भी बदलता रहता है।
भाव और शैली में बदलाव-पहले: "आप कैसे हैं?" और अब:
"क्या हाल है?" / "कैसे हो?" पहले: "कृपया प्रतीक्षा करें" और अब: "प्लीज़ वेट करें" जैसे परिवर्तन
भी देखने को मिल रहे हैं| युवाओं की बोलचाल में "सीन
क्या है?" (क्या योजना है?),"मूड
ऑफ है", "फुल
ऑन मज़ा आ गया","ये तो बहुत क्रेज़ी है","जुगाड़ कर लेंगे" या “ये तो बहुत कूल है”
जैसे प्रयोग, विशेष तौर पर युवा पीढ़ी में देखने को मिल रहे हैं|
हालांकि यह परिवर्तन स्वाभाविक और
आवश्यक है, लेकिन इसके कुछ नकारात्मक पहलू भी हैं। सबसे पहले, पाठक
की भाषा समझने की क्षमता कमजोर होती है। जब वाक्य अधूरे, मिश्रित
या व्याकरणहीन होते हैं, तो अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता। इससे पाठक भ्रमित
होता है और उसकी समझ में अस्पष्टता आ जाती है। विशेष रूप से विद्यार्थियों के लिए
यह स्थिति अधिक हानिकारक है, क्योंकि वे सही और गलत भाषा के बीच अंतर नहीं
कर पाते।
दूसरा, शुद्ध हिंदी के प्रति रुचि कम होती
जाती है। जब हर जगह हिंग्लिश या बिगड़ी हुई भाषा का प्रयोग होता है, तो
शुद्ध शब्द कठिन और अप्रचलित लगने लगते हैं। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी
"संदेश" की जगह "मैसेज" और "प्रतीक्षा" की जगह
"वेट" को ही सही मानने लगती है।
तीसरा, इससे लेखन कौशल पर नकारात्मक प्रभाव
पड़ता है। अशुद्ध भाषा के लगातार संपर्क में रहने से वर्तनी (spelling) और
व्याकरण की गलतियाँ बढ़ जाती हैं। विद्यार्थी परीक्षा या औपचारिक लेखन में भी वही
गलतियाँ दोहराने लगते हैं, जिससे उनकी अभिव्यक्ति कमजोर हो जाती है।
चौथा, भाषा की गरिमा और सांस्कृतिक पहचान को
नुकसान पहुंचता है। हिंदी केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि
भारतीय संस्कृति और परंपरा की वाहक है। जब उसमें अनावश्यक मिश्रण और विकृति बढ़ती
है, तो उसकी मौलिकता और सौंदर्य धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
अंततः, यह स्थिति हिंदी के बिगड़े हुए स्वरूप
को जन्म देती है, जहाँ भाषा न तो पूरी तरह हिंदी रह जाती है और न ही अंग्रेज़ी। वह एक
असंतुलित और अस्पष्ट रूप धारण कर लेती है।
शुद्ध हिंदी शब्दों का प्रयोग कम होने
से नई पीढ़ी उनसे अनभिज्ञ होती जा रही है। इससे भाषा की मौलिकता और समृद्धि पर
प्रभाव पड़ सकता है। साहित्यिक हिंदी और बोलचाल की हिंदी के बीच अंतर भी बढ़ता जा
रहा है, जिससे साहित्य को समझना कठिन हो सकता है।उदाहरण के तौर पर मैं एक
पॉडकस्टर हूँ, हिंदी में पॉड कास्ट करती हूँ, आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग करती
हूँ, कहीं कृत्रिम शृंगार नहीं करती, फिर भी सामान्य से शब्दों के अर्थ के लिए
संदेश आते हैं| यह देख कर लगता है कि कहीं हम भाषायी तौर पर बंजर तो नहीं होते जा
रहे? इसलिए आवश्यक है कि हम दैनिक जीवन में शुद्ध, स्पष्ट और संतुलित हिंदी का प्रयोग
करें, ताकि भाषा की शुद्धता और गरिमा बनी रहे।
इसके बावजूद, यह
कहना गलत नहीं होगा कि भाषा का बदलना उसकी जीवंतता का प्रमाण है। यदि भाषा समय के
साथ नहीं बदलेगी, तो वह अप्रासंगिक हो जाएगी। हिंदी का यह नया रूप उसे आधुनिक, लचीला
और व्यापक बना रहा है। यह बदलाव हमें यह भी सिखाता है कि हमें भाषा के मूल स्वरूप
को बनाए रखते हुए नए शब्दों और प्रयोगों को भी स्वीकार करना चाहिए।
अंततः, हिंदी भाषा का यह परिवर्तित स्वरूप
हमारे समाज के बदलते चेहरे को दर्शाता है। यह हमारी जीवनशैली, तकनीकी
प्रगति और वैश्विक संपर्क का परिणाम है।
क्या करें?
हिंदी भाषा की शुद्धता बनाए रखना आज के
समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इसके लिए कुछ सरल लेकिन प्रभावी उपाय अपनाए जा
सकते हैं—
1. शुद्ध शब्दों का प्रयोग
2. व्याकरण का ध्यान
3. अच्छी पुस्तकों का अध्ययन
4. हिंग्लिश का सीमित प्रयोग
5. लेखन और अभ्यास
6. तकनीकी माध्यमों का सही उपयोग
7. शिक्षकों और अभिभावकों की भूमिका
8. शब्दकोश का सहारा
यदि हम जागरूक होकर सही, स्पष्ट
और संतुलित हिंदी का प्रयोग करें, तो भाषा की शुद्धता और उसकी सुंदरता दोनों को
बनाए रखा जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम बदलाव को समझें भी, उसे
अपनाएँ भी, लेकिन साथ ही अपनी भाषा की जड़ों से भी जुड़े रहें। तभी हिंदी अपनी
पहचान और गरिमा को बनाए रखते हुए आगे बढ़ सकेगी।
डॉ मीता गुप्ता
शिक्षाविद,साहित्यकार,विचारक
8126671717
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