EPISODE-12 मत कर अभिमान रे बंदे! 19/06/26

EPISODE   12 

मत कर अभिमान रे बंदे! 19/06/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से   कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगे, उस अहम कीउस अहंकार की, जो हमें उद्विग्न करता है, हम जिसे जानते   समझते तो हैं, पर जान और समझ कर भी मानने को तैयार नहीं होते, जब अति हो जाती है और उसके दुष्परिणाम सामने आने लगते हैं, तब हम सोचते तो हैं, कि क्या गलत हुआ, पर तब भी हम कभी   कभी अपनी आँखों पर पट्टी चढ़ाए बैठे रहते हैं।

MUSIC  

तेरे जैसे लाखों आएलाखों इस माटी ने खाए

मत कर तू अभिमान रे बंदे!

झूठी तेरी शान रे!

मत कर तू अभिमान रे बंदे!

इन पंक्तियों को मैं अक्सर गुनगुनाती रहती हूँ, क्योंकि ये मुझे धरातल से जोड़े रखती हैं, याद दिलाती रहती हैं, इस खूबसूरत कायनात का मैं एक छोटा   सा जुज़ हूँ, हिस्सा हूँ, अंश हूँ, पूरी कायनात नहीं। आज फिर ये पंक्तियाँ याद आईं, क्योंकि वाकया ही कुछ ऐसा हो गया। दरअसल हुआ यह कि पिछले दिनों ट्रेन के सफ़र के दौरान एक सज्जन से मुलाकात हुई, उनसे थोड़ी बातचीत होने लगी। उन्होंने बताया कि वे उम्र का लंबा सफ़र तनहा ही काट रहे हैं| वे पेशे से लेखक हैं, ऐसा जानकर बातों में मेरी रूचि बढ़ी। बात निकल पड़ीउनकी शिकायत थी कि प्रेम   संबंध तो बहुत बनेलेकिन वे किसी भी महिला पर भरोसा नहीं कर पाए। उन्हें कोई भी अपने योग्य लगी ही नहीं। कोई उनके शब्दों से प्रेम करती थीकोई उनके रंग   रूप पर फ़िदा थीतो कोई उनकी शोहरत से प्रभावित थीउनसे प्रेम किसी ने नहीं किया। बहरहाल, वे एक महिला के साथ कुछ वर्ष रहे भीपर फिर अलग हो गए। वे कहने लगे कि आप ही बताइए कैसे मैं इन चतुर   चालाक महिलाओं पर भरोसा कर लेता और अपनी ज़िंदगी नरक बना लेतावे बोलेक्या आप मेरी इस दुख भरी कहानी पर भरोसा करेंगी?

मैं मुस्करा दी और मैंने कहा कि देखिएमैं एक महिला हूँ और आप मेरे लिए अजनबी भी हैंलेकिन मैं आपकी हर बात पर एतबार कर सकती हूँपर आप मुझे यह बताइए कि अपनी महिला   मित्रों और प्रेमिकाओं के साथ रहकर भी आप उन पर संदेह क्यों करते रहेएतबार क्यों नहीं कर पाएबोलिए? पर उनके पास इसका जवाब नहीं था। ज़ाहिर   सी बात थी कि उनका अभिमानउनका ईगोउनसे बहुत बड़ा था। अभिमान हमेशा आपको अकेला करता हैजबकि प्रेम और विश्वास आपके चारों ओर बस्ती बसाते हैंफूलों की क्यारियाँ खिलाते हैं, दिल के सुराखों में गारा   मिट्टी भरकर उन्हें गढ़ते हैं| वे सज्जन तो केवल एक उदाहरण हैंआपके   हमारे आसपास बहुत से लोग हैंजिनमें किसी को अपने ज्ञान का अभिमान हैकिसी को रूप काकिसी को दौलत का, तो किसी को शोहरत का।

क्या है यह अभिमान?

चलिएआज इसी पर बात करते हैंदोस्तों!

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दोस्तों! अभिमान हमें भीतर से हमें डराता हैवह हमें संवेदनशील नहीं होने देताहमें पिघलने नहीं देताहमें बरसने नहीं देता। क्या आपने कभी सोचा है, क्योंइसलिए कि संवेदनशील होने के लिए आपको सारे आवरण हटाने होते हैंबनावटीपन से दूर होना होता है और खुद को परत   दर   परत खोलना होता हैलेकिन अभिमानअभिमान यह ऐसा कभी होने नहीं देतावह हमें रोकता हैव्यक्त करने सेखुलने सेइंसान होने सेकिसी के सामने अपने आप को ज़ाहिर करने से। हम हमेशा सतर्क रहते हैंहमेशा उलझनों में घिरे रहते हैंकोई देखने न लेकोई जान न लेकोई पहचान न लेकोई चीज़ मेरे भीतर प्रवेश न कर जाएकोई भावना छू न जाएकोई भीतर न आ जाए। कहीं ऐसा ना हो कि कोई मेरे भीतर आकर मुझको नष्ट कर देमेरा वजूद खत्म कर देखुद को छुपाने का हुनर खूब आता है अभिमान को। अभिमानी व्यक्ति हमेशा कमज़ोर होता है, वह खतरों से घबराता हैवह जानता है कि किसी को करीब आने देने से सौ मुसीबतें आएँगी। न तो वह किसी के हृदय में प्रवेश करता है और न ही किसी को अपने हृदय के भीतर आने की अनुमति देता है। आपका क्या ख्याल है दोस्तोंऐसा ही होता है न.. इतिहास ऐसे अभिमानी व्यक्तियों के किस्सों से अटा पड़ा है, भरा पड़ा है, है न दोस्तों!

अभिमानी व्यक्ति हमेशा एक किले के भीतर बंदी की तरह रहता है। इस किलेबंदी से उसे सुकून मिलता हैसुरक्षा का आभास होता हैवह अपने आसपास के लोगों के साथ संवाद बंद कर देता है या फिर कम कर देता है। बड़ी ताज्जुब की बात यह भी है दोस्तोंकि वह बात करना बंद करता है, उन खास लोगों सेजिन्हें वह प्रेम करता है। जैसे ही उसे प्रेम के होने का अहसास होने लगता हैवह तुरंत अपने किले में लापता हो जाता है, गुम हो जाता हैबड़े   बड़े दरवाज़ों पर बड़ी   बड़ी साँकल चढ़ाकरवह इत्मिनान से बैठ जाता है। उसे लगता है अब बाहर की कोई भावना उस पर प्रहार नहीं कर पाएगी। यह अहंकार उसका कवच बन जाता है और वह बंदी। वह कारागृह में कैद हो जाता हैकारागृहजिससे हम दिल कहते हैं।

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मुश्किल उस पल आती है दोस्तोंजब उन दरवाज़ों की की   होल से प्रेम झाँकने लगता है, जी हाँदोस्तों! प्रेम तो झाँक ही लेता है नचाहे कितने भी पहरे होंप्रेम अंदर प्रवेश कर ही जाता है। उषा   किरण की तरहहौले   सेचुपके   से अपनी लालिमा लिए अपने पैर पसारने लगता हैफूट पड़ता है हॉट   स्प्रिंग की तरहसूरज की रोशनी की तरहएक पतली रेखा के आकार मेंउस समय अभिमान घबराने लगता हैथर्राने लगता हैकुलबुलाने लगता हैअपनी सुरक्षा में इस सेंध को देखकर वह परेशान होने लगता है। आखिर मेरी सुरक्षा में सेंध लगीतो लगी कैसे?

दोस्तों! आपको ‘अभिमान’ फिल्म याद होगीकिस प्रकार अपने झूठे अभिमान के चलते नायक नायिका को परित्यक्त करने का निर्णय ले लेता हैक्योंकि वह उसकी कला कोउसके टैलेंट को स्वीकार नहीं कर पातावह उसे कंट्रोल करना चाहता हैकेवल अभिमान के कारण। अभिमान इतना भयभीत रहता है कि वह अपने मन रूपी सीता कोअपनी ईगो की जानकी कोलक्ष्मण   रेखा के अंदर ही रखना चाहता है। अभिमान हमेशा अकेला ही जीता हैखुद को छुपाने का करतब जानता है वहखुद को ढकना अच्छी तरह जानता है वह। उसे प्रेम अपनी मृत्यु जैसे लगने लगती है, इसलिए अहंकारी व्यक्ति कभी प्रेमी नहीं बन पाता।

एक बड़ी सुंदर बात पढ़ी थी कहींकि जीवन की गहराई में उतरना हैतो असुरक्षित अनुभव करने के लिए तैयार करना होगातैयार रहना होगाखतरे उठाने ही होंगेअज्ञात में जीना ही होगा क्योंकि सुरक्षा जीवन नहीं होती। असुरक्षा में जब हम होते हैंतो हम सदैव चुनौतियों से जूझने के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन जब हम सुरक्षित होते हैं, अपने कंफर्ट ज़ोन में होते हैंतो हम अपने ही दायरे में फंस कर नष्ट होते जाते हैं और अपने कंफर्ट ज़ोन से बाहर हम झाँक तक नहीं पाते। अभिमानी होकर हम अपने द्वार   दरवाज़े   खिड़कियाँ   रोशनदान   झरोखे, सब बंद कर लेते हैंजिससे हवा   खुशबू   रोशनी   मलयानिल कभी प्रवेश ही नहीं कर पाते।

Music

मेरे ख्याल से ऐसा जीना भी क्या जीना है, दोस्तों! इसे तो जीना नहीं कहेंगेहै न...बल्कि इसे तो कब्र में रहना कहेंगे। समंदर इसलिए खारे होते हैं क्योंकि वे रहस्य छुपाते हैंऔर  नदियाँ? नदियों के भीतर भाव बहते हैंइसलिए वे मीठी होती हैउनके जल में मिठास होती हैवे तृप्ति देती हैंसंतुष्ट करती हैं। लेकिन समुद्र की एक बूँद भी तृप्त नहीं कर पाती। अभिमानी का समंदर एक दिन खुद ही अपनी पीड़ा के साथ खुद में डूब जाता हैघुट   घुट के मरता है वह पल   पल।

सब मेरे जैसे हैं, और मैं सभी के जैसाबस यही भाव तो मन में रखना है, सबसे पहले हवा की खुशबू को महसूस करना होगाउसे खुद के भीतर आने देना होगाउसके बाद प्रेम को भीतर प्रवेश देना होगादरवाज़े खोल कर रखने होंगे, खिड़कियाँ खोलनी होंगी, गवाक्षों पर पड़े परदे हटाने होंगे.. फिर.. फिर देखना एक दिन प्रेम की ऊष्मा अहंकार के ग्लेशियर को धीरे   धीरे पिघला देगीयकीनन पिघला देगी।

कितनी मीठी नदियों ने समंदर में समा जाने से ठीक पहले यही पूछा होगारेत ने किनारे से तड़प कर पूछा होगासमंदर से बाहर कूद पड़ी मछली ने किसी मछुआरे से पूछा होगाकिसी ज्ञानी, किसी योगी से, किसी पगली ने पूछा होगामन्नत के धागों ने देव   मंदिर के देवता से, तो किसी दस्तक ने बंद दरवाज़े से पूछा होगा कि क्यों करता तू अभिमान रे बंदेक्यों करता तू अभिमान!

MUSIC

बात जब मीठी नदियों से लेकर खारे समंदर तक की हो, अपने मन के दरवाजों   खिड़कियों को खोलने की हो, दिल पर जमे ग्लेशियर को पिघलाने की हो, खुशबू को महसूस करने की होमन्नत के धागों से देव   मंदिर के देवता तक की होतो बातें होंगी अनंत, है न दोस्तों! ऐसी बातें ख़त्म कैसे होंगीअपने कुछ किस्से हमें भी सुनाइए.. सुनाइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में भेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएहो सकता हैये बातें करते   करते आप भी सोचने पर मजबूर जाएँ कि क्यों करता मैं अभिमान? किस पर करता मैं अभिमान? इसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

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