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गिजुभाई बधेका द्वारा कृत ‘दिवास्वप्न’ ‘की समीक्षा

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  गिजुभाई बधेका द्वारा कृत ‘दिवास्वप्न’ ‘की समीक्षा   मन में तो कौतूहल तभी जाग गया था , जब केंद्रीय विद्यालय संगठन के द्वारा   गिजुभाई बधेका द्वारा कृत ‘दिवास्वप्न’ को पढ़ने के निर्देश को देखा। तुरंत ही अमेज़ॉन से इसे मंगवाया और सच कहूं तो तीन   दिनों में ही मैंने यह पुस्तक पढ़ डाली। तीन दिनों में इसलिए पढ़ डाली क्योंकि यह मेरी अंतर चेतना को जगा गई , मेरे अंतस्थ उतरकर एक शिक्षक की काल्पनिक कथा को सुनाते हुए , शिक्षा की दकियानूसी संस्कृति को नकारते हुए , परंपरा व पाठ्य पुस्तकों की सचेत अवहेलना करते हुए , बच्चों के प्रति सरस और सहज प्रयोग के रूप में ठेठ देसी अंदाज़ में समा गई। गिजुभाई बधेका गुजराती भाषा के लेखक और महान शिक्षाशास्त्री थे। बाल मनोविज्ञान और शैक्षणिक विचारों को कथा शैली में प्रस्तुत करने के वे सदैव पक्षधर रहे । उनकी किताब ‘दिवास्वप्न’ उनके अनुभवों की दुनिया है। पुस्तक के आरंभ में वे लिखते हैं- “यह किताब मेरे जीवंत अनुभवों से उपजी है और मुझे विश्वास है कि प्राणवान , क्रियावान , निष्ठावान शिक्षक अपने लिए इसे उपयोगी पाएंगे।” स्कूल कैसा हो , बच्चों के साथ व्...

असफलता का सामना कैसे करें ?

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AMRIT VICHAR 11.06.2021 असफलता का सामना कैसे करें ? किसी कार्य की सफलता या असफलता , तय किए गए लक्ष्य और हमारे द्वारा किए गए या किए जा रहे प्रयास के आधार पर तय होती है। प्रयास अच्छा होगा और पूरी जी जान से किया गया होगा , तो सफलता निश्चित है। अन्यथा हमें और प्रयास करने की ज़रूरत है। सफलता हेतु चाणक्य द्वारा कही गई बातें वर्तमान में भी उतनी ही सटीक बैठती हैं , जितनी वे तत्कालीन समाज के लिए सटीक थीं। चाणक्य नीति ग्रंथ के छठे अध्याय के 16वें श्लोक में एक श्लोक कहा गया है , जो सफलता के लिए एक मूलमंत्र है। इस मंत्र को अगर आत्मसात किया जाए , तो सफलता अवश्य मिलती है- प्रभूतंकार्यमल्पंवातन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारंभेणतत्कार्यं सिंहादेकंप्रचक्षते॥ श्लोक का अर्थ है -जिस प्रकार शेर एकाग्रता के साथ झपट्टा मारकर पूरी ताकत के साथ अपना शिकार करता है और उसकी सफलता निश्चित होती है। ठीक उसी प्रकार हमें अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए लक्ष्य पर ध्यान केंद्र‍ित कर पूरी मेहनत के साथ प्रयत्न करना चाहिए। काम चाहे छोटा हो या बड़ा हो , हमें पूरी ताकत लगाकर ही करना चाहिए , तभी कामयाबी पक्की हो जाती है। ...

सागर

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  सागर   रेतीले तट पर खड़ी हुई , मैं सम्मोहित-सी सम्‍मुख देख रही मेरी सांसे बहता पानी-सी है दृष्‍टि जहाँ तक जाती , पैरों के नीचे पानी था या अंबर उस पार उमड़ती लहरें झुक झुक करती नभ का आलिंगन । सागर झुक-झुक करता आलिंगन...।   रवि बना साक्षी एकटक देख रहा करता किरणों को न्‍योछावर। सागर की गहराई उतनी , जितने मोती , माणिक , जलचर कितनी लहरें बनती - मिटतीं लाती सिहरन । सागर झुक-झुक करता आलिंगन...।   नौकाएँ मछुआरों की लहरों की गोदी में खेलें , आती जाती लहरें तट पर पद प्रक्षालन के लगातीं मेले। सिंधु लहरें , क्‍यूँ विकल हैं , सिंधु लहरें , क्यों करती उन्मीलन । सागर झुक-झुक करता आलिंगन...।   क्या खोज में निकलीं अपने किनारों की ? नीली नीली , वेगवती , कभी आह्लादित , कभी क्रोधित उन्‍मादग्रस्‍त हो दौड़ लगातीं , उठतीं गिरतीं क्या करती हैं चिंतन ? सागर झुक-झुक करता आलिंगन...।   करती विलास , कभी उन्‍मुक्‍त हास , गुंजायमान भोर दूर कर सब विकार , श्‍वेत फेन...