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ईसा मसीह : एक प्रेम भरी संभावना

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  ईसा मसीह : एक प्रेम भरी संभावना ईसा मसीह और ईसाई धर्म लगभग पर्यायवाची हैं। मगर ‘ईश्वर के पुत्र’ के नाम पर , क्या हम उस असाधारण मानवता का मूलतत्व खो बैठे हैं , जिसके प्रतीक ईसा मसीह थे। क्रिसमस के मौके पर आइए याद करें कि ईसा मसीह की भावना को अपने दिल में लाने का क्या आखिर अर्थ क्या है ? जब हम ईसा मसीह की बात करते हैं , तो हम उस व्यक्ति की बात नहीं करते , जो 2000 साल पहले इस दुनिया में था , बल्कि एक खास संभावना की बात करते हैं , जो हर इंसान में मौजूद होती है। यह ज़रूरी है कि हर व्यक्ति मानवता के गुण को अपने अंदर फलने-फूलने दे , क्योंकि आजकल लोग धर्म के नाम पर अपनी मानवता को खो रहे हैं। ईसा मसीह की शिक्षा का सबसे अहम पहलू अपने-पराए का भेदभाव किए बिना , बगैर किसी पूर्वाग्रह या पक्षपात के जीवन बिताना है। तभी हम ईश्वर के साम्राज्य को जान सकते हैं। उन्होंने साफ-साफ कहा , ‘ ईश्वर का साम्राज्य कहीं ऊपर नहीं है , वह आपके अंदर ही है।’ केवल अपने शुरुआती ‘मार्केटिंग चरण’ में ईसा मसीह ने आपको ईश्वर के साम्राज्य तक ले जाने की बात की। जब काफी लोग उनके आस-पास जुट गए , तो वह पलटे और कहा , ‘ ...

MULTI LIGUAL CLASSROOMS

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  What is multilingual friendly classroom?   A multilingual classroom is a classroom with learners having more than one languages at their disposal (irrespective of level of competence), including learners from migrant backgrounds, such as first- and second-generation and newly-arrived immigrants and refugees.   Why are multilingual classrooms important? Multilingualism has been proven to help a child develop superior reading and writing skills, multilingual children have overall better analytical, social, and academic skills than their unilingual peers. This is important because it allows for fairness in class and for all pupils to gain as much out of lessons as possible. In addition, it allows pupils to embrace other cultures through learning from each other's languages an creating an inclusive learning community.   How can we use multilingualism and language diversity in the classroom? Teaching practices that tap into multilingual ways of reading...

शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्य

  शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्य शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की विवेचना कीजिए तथा इन दोनों उद्देश्यों में समन्वय को समझाइए।   अनुक्रम ( Contents) शिक्षा के व्यक्तिगत उद्देश्य ( Individual Aims of Education) वैयक्तिक उद्देश्यों के रूप व्यक्तिगत उद्देश्य के पक्ष में तर्क व्यक्तिगत उद्देश्य के विपक्ष में तर्क शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य ( Social Aim of Education) सामाजिक उद्देश्यों के पक्ष में तर्क सामाजिक उद्देश्यों के विपक्ष में तर्क वैयक्तिक व सामाजिक उद्देश्यों में समन्वय ( Coordination between Individual and Social Aims) Related Link Important Links शिक्षा के व्यक्तिगत उद्देश्य ( Individual Aims of Education)   प्राचीन समय में शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य को उस समय के विद्वानों का काफी समर्थन प्राप्त रहा है। आधुनिक युग में भी शिक्षा मनोविज्ञान की प्रगति के कारण इस उद्देश्य पर विशेष बल दिया जाने लगा है। आधुनिक समय में इस उद्देश्य के प्रमुख समर्थकों के नाम हैं- रूसो , फ्राबेल पेस्टालाजी , नन् आदि । नन् के अनुसार– “शिक्ष...

शब्दों के आदान-प्रदान

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शब्दों के आदान-प्रदान     संस्कृत की आधारभूत शक्ति से सम्पन्न हिंदी भाषा ने देश-दुनिया की कई भाषाओं से शब्द लिए हैं और बदले में अपने शब्द-भंडार से उन्हें समृद्ध भी किया है। मूल में संस्कृत का होना हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं के साथ जोड़ता है और संसार में एक विशिष्ट पहचान देता है। आज हिंदी पखवाड़ा के अवसर पर हमारी भाषा के इन्हीं अंत: और बाह्य संबंधों पर इस लेख के माध्यम से प्रकाश डालने का प्रयास कर रही हूँ | फ ड़ाआआआ...ककक..! की ध्वनि से मेरी नींद खुली , बालकनी में दूध का पात्र रखकर भूल गई थी , उसका आस्वादन बिल्ली ने भली प्रकार से कर लिया था। मेरी पड़ोसी महोदया गुजराती बोला करती हैं ; उन्होंने जगत मौसी कहलाने वाले उस जीव को देखा और ‘बिलाड़ी’ कहकर हंस पड़ीं। मैंने यह शब्द प्रथमत: सुना। मराठी का मांजर सुन चुकी हूं। मेरे मस्तिष्क में भाषा विज्ञान के घोड़े दौड़ना शुरू हो गए। महोदया का बिलाड़ी शब्द और मराठी का मांजर शब्द क्रमश: संस्कृत विडाल और मार्जारी से उत्पन्न हुए हैं। भाषाएं आपस में शब्द लेती-देती रहती हैं। हिंदी ने भी संस्कृत , प्राकृत , फ़ारसी , अरबी , अंग्रेज़ी , तुर्की , पश्तो ...

प्राचीन भारत में संचार के साधन

  प्राचीन भारत में संचार के साधन   कभी आपने सोचा है कि प्राचीन काल में जब न तो इंटरनेट था और न ही बिजली… तो मानव अपने संदेशों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक कैसे पहुंचाते थे ? जाहिर सी बात है उस जमाने में भी इंसान आपस में संवाद तो करता ही होगा! आजकल की तरह तब भले ही एक जगह से दूसरी जगह अपना संदेश पहुंचाना फास्ट नहीं था , लेकिन फिर भी लोगों ने अपनी जरूरत के हिसाब से संचार के अलग-अलग माध्यमों का आविष्कार कर लिया था. आज उस जमाने में लोग कैसे बिना इंटरनेट के एक दूसरे से चैटिंग करते थे इस बारे में विस्तारपूर्वक जानेंगे क्योंकि यह विकसित भारतीय संस्कृति का अभिन्न यंग है, प्रमाण है – कबूतर बनता था ‘डाकिया प्राचीन काल में जब इंटरनेट इजाद नहीं हुआ था , तब लोग कबूतर को संदेशवाहक के रूप में इस्तेमाल करते थे. इसके लिए कबूतरों को विशेष प्रकार की ट्रेनिंग दी जाती थी. कबूतरों की खासियत ये है कि वह कभी भी अपने घर का रास्ता नहीं भूलते. उन्हें कहीं भी छोड़ दो वह अपने घर पहुंच ही जाते हैं. अपने संदेश को एक छोटी सी चिठ्ठी में लिखकर लोग एक नली में रख कबूतर के पैर में बांध देते थे. फिर उसे...