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विश्व हिंदी दिवस (10 जनवरी) की शुभकामनाएं

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विश्व हिंदी दिवस (10 जनवरी) की शुभकामनाएं विश्व हिंदी   दिवस प्रति वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए   जागरूकता पैदा करना तथा हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रस्तुत करना है। आइए, देखेँ, हिंदी का अंतर्राष्ट्रीय रूप-स्वरूप और सामर्थ्य कैसा है? हिंदी के   अंतर्राष्ट्रीय सामर्थ्य विषय पर चर्चा करने से पूर्व आइए , हिंदी भाषा का इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं ।हिंदी भाषा का इतिहास लगभग एक हज़ार वर्ष पुराना माना गया है। हिंदी भाषा व साहित्‍य के जानकार अपभ्रंश की अंतिम अवस्‍था ' अवहट्ठ ' से हिंदी का उद्भव स्‍वीकार करते हैं। चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने इसी अवहट्ठ को ' पुरानी हिंदी ' नाम दिया। अपभ्रंश की समाप्ति और आधुनिक भारतीय भाषाओं के जन्मकाल के समय को संक्रांतिकाल कहा जा सकता है। हिंदी का स्वरूप शौरसेनी और अर्धमागधी अपभ्रंशों से विकसित हुआ है। 1000 ई. के आसपास इसकी स्वतंत्र सत्ता का परिचय मिलने लगा था , जब अपभ्रंश भाषाएँ साहित्यिक संदर्भों में प्रयोग में आ रही थीं। यही भाषाएँ बाद में विकसित होकर आधुनिक भारतीय आर्य ...

स्वामी विवेकानंद-एक अनुकरणीय जीवन

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  स्वामी विवेकानंद-एक अनुकरणीय जीवन सर्वशक्तिमान ईश्वर ने भारत की वीरप्रसू धरा पर ऐसी महान आत्माओं को भेजा है , जिन्होंने मानवता और विश्व समुदाय के कल्याण के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया और समाज में फैली कुरीतियों को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है। ऐसी ही महान आत्मा थे-स्वामी विवेकानंद , ऐसे व्यक्तित्व , जिन्होंने अपने उच्च मर्यादापूर्ण विचारों और उत्तम कार्यों से भारत का नाम की विजय-पताका सारे विश्व में फहराई। वे एक आध्यात्मिक उपदेशक और समाज सुधारक थे | उन्होंने समाज में व्याप्त धार्मिक रीति-रिवाजों , विसंगतियों और झूठी परंपराओं को दूर करने का भरसक प्रयास किया। नरेंद्र नाथ दत्त स्वामी विवेकानंद का बचपन का नाम था। उनके शिक्षक स्वामी राम कृष्ण परमहंस ने उन्हें स्वामी विवेकानंद का नाम दिया और उसके बाद नरेंद्र नाथ दत्त दुनिया में स्वामी विवेकानंद के नाम से लोकप्रिय हुए। स्वामी विवेकानंद में , ईश्वर के लिए प्रेम और राष्ट्र के लिए प्रेम का पूर्ण अभिसरण मिलता है। वह युवाओं के लिए एक शाश्वत प्रेरणा हैं।-गुरुदेव श्री श्री रविशंकर उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था...

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल

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  सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल  सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ चलिए, आज बात करते हैं सैर करने की..पर्यटन की। भारत में पर्यटन नियोजन की शुरुआत आज़ादी के बाद हुई। भारत में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सचेत और संगठित प्रयास 1945 में किए गए थे, जब भारत सरकार के तत्कालीन शैक्षिक सलाहकार सर जॉन सार्जेंट के नेतृत्व में सरकार द्वारा एक समिति का गठन किया गया था। वैसे, मैरी जेन कॉर्बेट, जिन्हें शिकारी से पर्यावरणविद् जिम कॉर्बेट की माँ के रूप में जाना जाता है , को वस्तुतः पर्यटन गतिविधियों की जननी माना जाता है क्योंकि उन्होंने पहली बार आगंतुकों को ठहरने की सुविधा उपलब्ध करवाईं। इतिहास के पृष्ठों को पलटें तो पता चलता है कि सेल्यूकस निकेटर के राजदूत मेगस्थनीज भारत के पहले विदेशी यात्री थे। भारत ने अल-मसुदी, फा-हियान, ह्वेन-सांग, मार्को पोलो और अब्दुल रजाक आदि जैसे महान विदेशी दूतों की यात्राएं भी देखीं हैं। अवकाश, शैक्षिक, चिकित्सा, या अन्य कारणों से एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा पर्यटन कहलाता है, फिर चाहे यह देश की सीमाओं के भीतर हो या ...

न बदले बस हौसला।

  है शाश्वत परिवर्तन , पल बदला , दिनांक बदला , बदल गया वर्ष , न बदले बस हौसला।   रूप बदले , स्वरूप बदले , बदलते रहें मौसम , न बदले , बस न बदले , हमारे मन का हौसला।   अच्छे-बुरे परिवर्तन की , नई-नई चुनौतियों का , हौसले के दम पर ही , करते हैं हम सामना ।   तारीख बदलने भर से , समय नहीं बदला करता , हौसला ही है जो , समय है बदल देता।   उपलब्धियों में ढलती , कल की तमाम चुनौतियां , भविष्य की संभावनाएँ , देती हौसले को हौसला।   नया पल है , नई गति है , नया है सम्पूर्ण परिवेश , लें नया यह संकल्प , उड़ें नये हौसले संग। ........................................ मेरे अंदर एक देश बसता है । ज़िंदगी से हारकर जब उदास हो ती हूं मैं , तब यह प्यार देता है, दुलार देता है । अपनी बाँहों में कसता है । मेरे अंदर एक पर्वत है । जिसकी चोटी नभ को चूमती है जिसकी नस-नस अपनत्व में झूमती है । मेरे अंदर कुछ पवित्र नदियां हैं जो धरती के कोरे पन्नों पर लिखती हैं नित प्यार के नए गीत, और कहती हैं.... जागो, जागो, जागो, ...

देखो नूतन वर्ष है आया

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  देखो नूतन वर्ष है आया वर्ष नव , हर्ष नव , जीवन उत्कर्ष नव। नव उमंग , नव तरंग , जीवन का नव प्रसंग। नवल चाह , नवल राह , जीवन का नव प्रवाह। गीत नवल , प्रीत नवल , जीवन की रीति नवल , जीवन की नीति नवल , जीवन की जीत नवल! वास्तव में , नया वर्ष , नए संकल्पों , नए स्वप्नों और नए सृजन का ही तो साक्षी पर्व है। नव वर्ष हमें ओढ़ने का नहीं , आत्मसात कर लेने का आह्वान करता है। आत्मसात करने से जीवन की कायाकल्प हो जाती है , जबकि ओढ़ी हुई चादर तो समय के साथ हट जाती है।नए साल के संदर्भ में सोचती हूं , तो आभास होता है कि मानो साल समय के पर्यटन स्थल का वह नन्हा मार्गदर्शक है , जिसकी अंगुली थामकर हम इस पर्यटन स्थल की बारह महीने सैर करते हैं। बारहवें माह तक यह वृद्ध हो चुका होता है , तब यह हमारी अंगुली एक नए मार्गदर्शक को थमाकर हमसे विदा हो जाता है। हमारी नियति इन्हीं नन्हीं अंगुलियों के भरोसे अपनी यात्रा करने की है और इतिहास गवाह है कि शिशु कभी छलते नहीं हैं। आज जब हम इस शिशु की अंगुली थामकर अपनी यात्रा आगे बढ़ा रहे हैं , तो यह विश्वास करना चाहिए कि हमें यह शिशु वर्ष 2022 में हर्ष और उ...