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माई

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  माई एक दक्षिण एशियाई देश में रहने का अर्थ है , एक मां के पूर्ण विचार के साथ बड़ा होना। एक मां हमेशा देने वाली , पालन-पोषण करने वाली , त्याग करने वाली और काम करने वाली होती है। उसके दिन की शुरुआत और अंत घर की देखभाल के साथ होता है। भारत के संदर्भ में , यह धारणा जाति और वर्ग की संरचनाओं द्वारा भी परिभाषित होती प्रतीत होती है। यद्यपि उसकी स्थिति की एक राय , विवेक में निहित विचारों के आधार पर , पितृसत्ता या नारीवाद के लेंस से मोटे तौर पर देखे जाने पर अलग-अलग व्याख्याएं लेती है। यह एक जिम्मेदारी या कर्तव्य से अधिक है , जिसे मान लिया जाता है और कई मामलों में दूसरा विचार भी नहीं किया जाता है। इसे कुछ स्थितियों में उत्पीड़न के रूप में माना जा सकता है , जहां पितृसत्तात्मक संरचना द्वारा माताओं को जानबूझकर पारिवारिक बोझ तले दबा दिया जाता है। गीतांजलि श्री द्वारा लिखित ‘ माई ’ हमारे लिए एक घरेलू क्षेत्र में इन दोनों विचारों के बीच संघर्ष के कारण उत्पन्न जटिलताओं को प्रस्तुत करती है। हालांकि इससे भी अधिक यह सोचने पर मजबूर करता है कि जब हम एक मां के बारे में बात करते हैं ,...

घड़ी बोले...टिक..टिक..टिक

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  घड़ी बोले...टिक..टिक..टिक   आने वाला पल जाने वाला है हो सके तो इस में ज़िंदगी बिता दो पल जो ये जाने वाला है सच में , हमारा हर काम समय के साथ ही होता है , सुबह उठने से लेकर रात सोने तक जितने भी काम हैं , हम समय को ध्यान रखे बिना नहीं कर सकते। इस समय को नापने   का सबसे अच्छा तरीका घड़ी ही है , आज के युग में हम घड़ी के बिना जीवन कि कल्पना ही नहीं कर सकते हैं। मोबाइल घड़ी , कार घड़ी , दीवार घड़ी या कलाई घड़ी या किसी और प्रकार की घड़ी हो , घड़ी चाहे जिस रूप में हो , वो घड़ी ही है।   क्या आप जानते हैं कि घड़ी का विकास कैसे हुआ ? क्या शुरू से ही घड़ी ऐसी ही थी ? हम ये तो नहीं जानते कि जिस समय के पल-पल का हिसाब आज   घड़ी रखती है वह घड़ी के   बनने के पहले कैसे मापा जाता था , लेकिन इतना ज़रूर है कि मनुष्य को जबसे समय को समझने का बोध हुआ , तब से उसने शायद पहली बार घड़ी को सूरज के उगने और डूबने में खोजा होगा और प्रागैतिहासिक काल में कई दशकों तक मनुष्य यूं ही अपना काम करता रहा होगा। मनुष्य रात और दिन के साथ समय का आभास करता रहा और अनुमान लगाता रहा कि अब दिन ...

खून क्यों सफ़ेद हो गया?

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  खून क्यों सफ़ेद हो गया ? खून क्यों सफ़ेद हो गया ? भेद में अभेद खो गया। बंट गए शहीद , गीत कट गए , कलेजे में कटार गड़ गई। दूध में दरार पड़ गई। खेतों में बारूदी गंध , टूट गए नानक के छंद सतलुज सहम उठी , व्यथित सी बितस्ता है। वसंत से बहार झड़ गई दूध में दरार पड़ गई। माननीय पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी की ये पंक्तियां की आतंकवाद की भयावहता को स्पष्ट करने में सक्षम हैं। आतंकवाद पिछले कुछ दशकों से अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू रहा है , जिसने राष्ट्र-राज्य के राजनीतिक आचरण को सबसे अधिक प्रभावित किया है। आतंकवाद का प्रभाव वर्तमान में कई राज्यों पर गहरा है और इसके परिणामस्वरूप कई राज्यों में हिंसा , भय और तनाव का माहौल है। वर्तमान में आतंकवादी समूह उच्च तकनीकी स्रोतों से लैस हैं और शस्त्रों से संबंधित नियम इन पर लागू नहीं होते हैं। इन संगठनों के काम का दायरा निश्चित नहीं है। वे विश्व स्तर पर अपनी गतिविधियों का संचालन करते हैं और राष्ट्र-राज्यों के निर्णयों को प्रभावित करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में आतंकवाद के कारण हिंसा की घटन...