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घर

  घर सभी धर्म-ग्रंथों से पवित्र ईश्वर और अल्लाह से बड़ा स्वर्ग से भी बढ़कर लुप्त हो चुकी महान सभ्यताओं से भी खूबसूरत मैं कहूंगी—घर!   माँ की गोद-सा गरम और नरम पिता के हाथों-सा भरापूरा कभी न भूले जा सकने वाले प्रणय-संबंध-सा अविस्मरणीय मैं कहूंगी—घर!   हवाएं जहां मंद-मंद मुस्काती हैं बदरी जहां मुक्तछंद-सी बरसती है, झूम-झूम राग गाती हैं दीवारें एक-दूजे से खिलंदड़ी करना जहाँ कभी नहीं भूलती मैं कहूंगी—घर!   सुबह जहां बच्चे-सी मासूम और शाम इंद्रधनुषी मालूम जान पड़ती है चांद पंख फैलाए जहां, जहां रोशन करता है रंगीन ख़्वाबों-सा घर दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत शब्द मैं कहूंगी—घर! नए घर में प्रवेश की बधाई! नया संग मंगलमय बना रहे! यही आशीर्वाद हमारा.. !!

मंज़िल

  कुछ अपनों को लेकर , कुछ सपनों को लेकर , मैं अपनी मंज़िल की ओर चल पड़ी , रास्ता कुछ था धुंधला सा , दूर तक नहीं था कोई अपना सा। सफ़र   काँटों से भरा था , कुछ कांटे जो मेरे अपनों ने बिछाए थे , कुछ उड़कर जाने कहां से आए थे ? कुछ को मैंने साफ किया , कुछ को मैंने माफ़ किया।   दूर तलक था अंधेरा , रोशनी का नहीं था बसेरा। अब तक नज़र आ रहा था , कहीं खोया हुआ सा सपना मेरा , मंज़िल   अभी भी साफ़ नहीं थी , रास्ता था अनजान , अनभिज्ञ मैं , जो मेरे अपने थे , कुछ दूर तक चले। कुछ अपनों ने छोड़ा साथ , पर कुछ ने अब तक पकड़ा था हाथ।   अभी भी मंज़िल   का कोई पता ना था , पूछा था माँ से एक रोज़ बचपन में , " माँ , मेरी मंज़िल   है कहां ?" माँ ने कहा था , " ज़मीन-आसमान मिलते हो जहां ।" मैं ढूँढने लगी वह जहां , ज़मीन-आसमान मिलते हो जहां .. अब रास्ता कुछ साफ हो चला था , कुछ नए लोगों का साथ मिला था , जो खुद मेरी तरह अटल थे , थे अविचल , वो भी मंज़िल की तलाश में गए थे निकाल ।   बस अब मंज़िल   दूर नहीं लगती थी , धु...

‘फणीश्वरनाथ रेणु’ कृत ‘मैला आँचल’

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‘फणीश्वरनाथ रेणु’ कृत ‘मैला आँचल’ ‘फणीश्वरनाथ रेणु’ कृत ‘मैला आँचल’ को गोदान के बाद हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माना जाता है। इस उपन्यास के द्वारा ‘रेणु’ जी ने पूरे भारत के ग्रामीण जीवन का चित्रण करने की कोशिश की है। स्वयं रेणु जी के शब्दों में :- “ इसमें फूल भी हैं शूल भी है , गुलाब भी है , कीचड़ भी है , चंदन भी सुंदरता भी है , कुरूपता भी- मैं किसी से दामन बचाकर निकल नहीं पाया। कथा की सारी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ साहित्य की दहलीज पर आ खड़ा हुआ हूँ ; पता नहीं अच्छा किया या बुरा। जो भी हो , अपनी निष्ठा में कमी महसूस नहीं करता।“ हिंदी के उपन्यासों की एक खास बात उनका रोचक परिचय या भूमिका होती है। इस उपन्यास का कथानक पूर्णिया जिले के एक गाँव मेरीगंज का है । फणीश्वर नाथ ' रेणु ' द्वारा रचित ‘मैला आँचल’ कहानी का मुख्य पात्र डॉक्टर प्रशांत बनर्जी है, जो कि पटना के एक प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज से पढ़ने के बाद अनेक आकर्षक प्रस्ताव ठुकराकर मेरीगंज में मलेरिया और काला-अजर पर शोध करने के लिए आता है। डॉक्टर गाँववालों के व्यव्हार से आश्चर्यचकित है। वह रूढ़ियों ...

ऐसी बानी बोलिए…

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ऐसी बानी बोलिए…   ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोय। औरन को शीतल करै आपहूं शीतल होय।।   संत कबीर के अनुसार मीठे बोल यानी वाणी की मधुरता सुनने वाले एवम् बोलने वाले दोनों के मन को शांत करती है। यहां मात्र बोलों या वाणी की मधुरता की ही बात नहीं कही गई है , यहां शब्दों के संस्कारवान और शिष्ट होनी की बात कही गई है | यदि   आप से यह पूछा जाए कि कोई आपसे कटु वचन बोलता है , तो आपको कैसा लगता है ? स्वाभाविक है कि आपको अप्रिय लगेगा। ठीक उसी प्रकार आपके कटु वचन दूसरों को भी अप्रिय लगेंगे | स्वामी विवेकानंद के अनुसार बोलते वक्त सजग और सतर्क रहने की आवश्यकता   है , तभी वाणी में मधुरता बनी रह सकती है। यदि भाषा संतुलित हो , वाणी में मधुरता हो , तो सुनने वाले को मधुर प्रतीत होता है , उसे प्रसन्नता प्राप्त होती है। और ऐसा करने से बोलने वाले को भी शांति मिलती है। इससे संवाद करने के आशय के सार्थक बने रहने की संभावना बढ़ जाती है। परंतु संतों द्वारा कहे गए सदवचन कितने ही प्रभावी क्यों न हों , अर्थ यदि   किसी के मन को छू न सके तो व्यर्थ है। पढ़ना , सुनना , बोलना सब व्यर्थ है। ...

खिल गया दिग दिगंत

  खिल गया दिग दिगंत आ गया ऋतुराज बसंत। प्रकृति ने ली अंगड़ाई, खिल गया दिग दिगंत।। भाव नए जन्मे मन में, उल्लास भरा जीवन में। प्रकृति में नव सृजन का, दौर चला है तुरंत। खिल गया दिग दिगंत।। कूकू करती काली कोयल, नव तरुपल्लव नए फल। हरियाली दिखती चहुंओर, पतझड़ का हो गया अंत। खिल गया दिग दिगंत।। बहकी हवाएं छाई, मस्ती की बहार आई। झूम रही कली-कली खुशबू हुई अनंत। खिल गया दिग दिगंत।। सोए सपने सजाने, कामनाओं को जगाने। आज कोंपले कर रही, पतझड़ से भिड़ंत। खिल गया दिग दिगंत।। x

parenting techniques

  parenting techniques have always been adored by the new-age parents who on one hand want to inculcate traditionalism into parenting and on the other hand want their kids to be at par with modernism. Murthy's parenting advice holds both modernism and traditionalism at its core. 02/7Give them space   Just like every relationship, in the relationship between children and parents there should be respect for each other's space. There should not be congestion, clash of friction in the ideas and opinions of the two generations she says. Giving them space will give them a chance to rethink their decisions, their likings and their dislikings. In an interview she had said, if your child doesn't like certain things to eat, leave them on their own for some time, do not force them to eat. Keep the food aside and let them eat it whenever they like. Let them decide when they want to eat. 03/7Set examples   Do not force a child to follow things. Do not push your habits into...