शिवानी की 'पूतोंवाली'
शिवानी की 'पूतोंवाली' एक संक्षिप्त परंतु तीव्र उपन्यास है जो पारिवारिक बंधनों, सामाजिक अपेक्षाओं और नारी के संघर्ष को संवेदनशील भाषा में उकेरता है, इसकी शक्ति चरित्र-निर्माण और भावनात्मक सघनता में निहित है। पात्र केवल घटनाओं के वाहक नहीं, बल्कि उपन्यास की नैतिक और भावनात्मक धुरी हैं।
शिवानी की यह कृति हिंदी उपन्यास परंपरा में एक छोटा, पर प्रभावी योगदान है, जिसे कई डिजिटल पुस्तकालयों और ई बुक प्लेटफार्मों पर उपलब्ध कराया गया है यह पुस्तक लगभग एक सौ बीस पृष्ठों की संक्षिप्त रचना है, जो संकुचित रूप में गहरे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रश्न उठाती है| शिवानी की नायिकाएँ अक्सर पारंपरिक सीमाओं और आत्मिक आकांक्षाओं के बीच फँसी हुई दिखती हैं। इस उपन्यास में भी मुख्य नायिका का चरित्र आंतरिक विरोधाभासों से भरा है — वह घर और समाज की अपेक्षाओं को समझती है परंतु अपनी पहचान और स्वतंत्रता की चाह भी स्पष्ट है। उसकी चुप्पियाँ और छोटे छोटे विद्रोही संकेत कहानी को भावनात्मक गहराई देते हैं; ये संकेत पाठक को उसके भीतर के दर्द और उम्मीद दोनों से जोड़ते हैं।शिवानी के पात्रों के मनोवैज्ञानिक प्रेरक गहरे व्यक्तिगत अनुभव, सामाजिक दायित्व और पीढ़ीगत स्मृतियों के टकराव से बनते हैं| वे अक्सर आत्म पहचान, दायित्व भाव और भय/लज्जा के बीच झूलते हैं। शिवानी की रचनाओं में नारी मनोविज्ञान और पारिवारिक संवेदनाएँ बार बार उभरती हैं, इसलिए 'पूतोंवाली' के पात्रों के प्रेरक भी इसी परिप्रेक्ष्य में समझने योग्य हैं
उपन्यास की कथावस्तु परिवार के भीतर पीढ़ियों के बीच के तनाव, परंपरा बनाम व्यक्तिगत आकांक्षाएँ, और स्त्री पुरुष संबंधों की सूक्ष्मता को दर्शाती है। शिवानी की लेखनी में वर्णनात्मक अर्थ कम और भावनात्मक भार अधिक है| वह घटनाओं को सीधे सादे वाक्यों में इस तरह रखती हैं कि पाठक के मन में पात्रों के प्रति सहानुभूति स्वतः जाग उठती है। मुख्य पात्रों का मनोविज्ञान उपन्यास की रीढ़ है—उनके छोटे छोटे निर्णय और चुप्पियाँ कहानी को आगे बढ़ाती हैं और पाठक को भीतर तक झकझोर देती हैं।
संवादों में स्थानीयता और सहजता है, पात्रों को विश्वसनीय बनाती है। अनावश्यक विस्तार से बचकर लेखिका ने भावों को तीव्र रखा है और पात्रों के भीतर के द्वंद्व को प्राथमिकता दी है तथा छोटे किस्सों के माध्यम से बड़े सामाजिक प्रश्न उठाए गए हैं। शिवानी समाज के नियमों और व्यक्तिगत इच्छाओं के बीच के तनाव को मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करती हैं। पात्रों की जटिलता और भावनात्मक सघनता पाठक को बार बार सोचने पर मजबूर करती है कि यह उपन्यास केवल कहानी नहीं, बल्कि अनुभव है।
उपन्यास में कुछ प्रतीकात्मक वस्तुएँ और घटनाएँ बार बार लौटकर आती हैं, जो परिवार की परतों और समाज की अपेक्षाओं को दर्शाती हैं। शिवानी का दृष्टिकोण न तो कट्टर आलोचनात्मक है और न ही अंधसमर्थक| वे समझने और दिखाने के बीच संतुलन बनाए रखती हैं। इस वजह से पाठक को न केवल पात्रों के साथ जुड़ाव होता है, बल्कि अपने समाज और स्वयं से भी प्रश्न पूछने का अवसर मिलता है। कहीं कहीं कथानक की गति धीमी पड़ जाती है और कुछ उपकथाएँ अधूरी सी लगती हैं, पर यह भी उपन्यास की संक्षिप्तता और भावनात्मक फोकस का परिणाम है। निष्कर्ष: 'पूतोंवाली' एक संवेदनशील, सूक्ष्म और प्रभावशाली उपन्यास है जो छोटे रूप में बड़ी बात कहता है| यह पाठक मन को छूने वाली रचना है और हिंदी साहित्य में शिवानी की विशिष्ट शैली का सुंदर उदाहरण है।

Comments
Post a Comment