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Showing posts from May, 2020

तुम्हारे जन्मदिन पर

तुम्हारे जन्मदिन पर हँसे हवा हँसे फूल हँसे पृथ्वी जल -थल- अंतरिक्ष हँसें सितारे हँसे कूल और इनके साथ साथ … हँसो मैं हँसो तुम हँसे तुम्हारा दुकूल नहो कुछ प्रतिकूल जीवन बने अनुकूल

"पता ही नहीं चला"

" पता ही नहीं चला" ज़िन्दगी की इस आपाधापी में , कब निकली उम्र मेरी , पता ही नहीं चला , कंधे पर चढ़ते बच्चे कब , कंधे तक आ गए , पता ही नहीं चला , एक कमरे से शुरू मेरा सफर कब , बंगले तक आया , पता ही नहीं चला , साइकल के पेडल मारते हांफते ते जब , बड़ी गाड़ियों में लगे फिरने कब , पता ही नहीं चला , हरे भरे पेड़ों से भरे जंगल थे तब , कब हुए कंक्रीट के , पता ही नहीं चला , कभी थे जिम्मेदारी माँ बाप की हम , कब बच्चों के लिए हुए जिम्मेदार , पता ही नहीं चला , एक दौर था जब दिन को भी बेखबर सो जाते थे , कब रातों की उड़ गयी नींद , पता ही नहीं चला , बनेगे माँ बाप सोचकर कटता नहीं था वक़्त , कब बच्चो के बच्चे हो गए , पता ही नहीं चला , जिन काले घने बालों पे इतराते थे हम , रंगना शुरू कर दिया कब , पता ही नहीं चला , दिवाली होली मिलते थे यारों , दोस्तों , रिश्तेदारों से , कब छीन ली मोहब्बत आज के दौर ने , पता ही नहीं चला , दर दर भटके है नौकरी की खातिर खुद हम , कब करने लगे सेकड़ों नौकरी हमारे यहाँ , पता ही नहीं चला , बच्चों के लिए कमान...

तब.......जब

तब..... आशाओं के दीप , दीपों की ऊर्ध्वमुखी लौ मेरी दहलीज़ को   प्रकाशित करती , विह्वल मनःस्थिति में भी मेरे मुखमण्डल पर उजली से मुस्कान खिलती । हँसते-गाते तय कर लेती टेढ़े-मेढ़े-विचित्र से रास्तों को , कभी सुलझा लेती , कभी यूँ ही छोड़ देती उ लझनों को । पहाड़ों की ऊँचाइयाँ , सागर की गहराइयाँ , लभ्य लगने लगतीं , बहुत सरल लगने लगतीँ। जब... मेरे घर की दीवारें प्रेम से पगी ईंटों से निर्मित होतीं मेरे आँगन में   तुलसी महकती , मेरे परिवार में सब साथ मिलकर सुख-दुःख बाँटते... क्योंकि बांटना ज़रूरी है... बिन अपनों के साथ के सारी आशाएँ , सारी उपलब्धियाँ , सारे सपने , सारे अपने , सब अधूरे हैं...... सब अधूरे हैं ।

एक सपना बुन

चल बेवजह एक सपना बुन , राह बन , राह बुन! मंजिलों की दोराहों पर , क्यों तू खुद को बाँट रहा , सपनों के इस झुरमुट में , बेवजह ही खुद को काट रहा । सपना है जो , एक ही है , बाकी इस मन की चाह है , वो एक सपना जो तेरा है , वही मंजिल , वही राह है । जान भी जाए , मान भी जाए , उस सपने को , सच करने में , जाती है तो शान भी जाए , क्या तेरा ईमान भी जाए । पर तुझे उसकी परवाह नहीं , क्योंकि वो सपना तू ही है , तू हकीकत भी , तू सपना भी , जो भी है , सब तू ही है । तुझे खुद को ही पाना है , इस दुनिया में फिर लाना है , खुद ही एक सपना बन , खुद को ही सच कर जाना है । बस यही एक हकीकत है , बस तू ही तेरा ख्व़ाब है , तेरे भीतर एक खुदा है जो , वही तू , तेरा नाम है । अब एक पल को ठहर , समझ , थोड़ा जान खुद को , क्या है तू , क्या बन सकता है , तू कर सकता है , मान खुद को । फिर तेरे दिल की राह से , वो एक सपना नज़र आएगा , जिसमें तू खुद को , शांत और सम्पूर्ण पाएगा। ...

तू अपने सपने के लिए युद्ध कर

” तू अपने सपने के लिए युद्ध कर “ माना हालात प्रतिकूल हैं , रास्तों पर बिछे शूल हैं रिश्तों पे जम गई धूल है पर तू खुद अपना अवरोध न बन तू उठ …… खुद अपनी राह बना … माना सूरज अँधेरे में खो गया है …… पर रात अभी हुई नहीं , यह तो प्रभात की बेला है तेरे संग है उम्मीदें , किसने कहा तू अकेला है तू खुद अपना विहान बन , तू खुद अपना विधान बन सत्य की जीत हीं तेरा लक्ष्य हो अपने मन का धीरज , तू कभी न खो रण छोड़ने वाले होते हैं कायर तू तो परमवीर है , तू युद्ध कर – तू युद्ध कर इस युद्ध भूमि पर , तू अपनी विजयगाथा लिख जीतकर के ये जंग , तू बन जा वीर अमिट तू खुद सर्व समर्थ है , वीरता से जीने का हीं कुछ अर्थ है तू युद्ध कर – बस युद्ध कर …

कुछ सपने बोये थे

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कुछ सपने बोये थे https://www.paperturn-view.com/?pid=MjI222321 उसने कुछ सपने बोये थे , जमीन की करी गुड़ाई थी , खेत की मुंडेर बनायीं थी , बहुत   करी सिचाई थी , फिर बो दिए सपनों के बीज | सपने बेटे की पढाई के बेटी की सगाई के माँ बाबा की दवाई के चुडी भरी बीबी की कलाई के रोप दिए थे नन्हे पौधे | उम्मीद भी यही थी – की कल जब ये पेड़ पनपेंगे तो सपने भी जवान होंगे धीमे धीमे परवान होंगे और मिलेगा सुन्दर फल | सपने सब बड़े हो रहे थे आँखों के सामने खड़े हो रहे थे , कोपलें मुस्कुरा रही थी नन्ही कलियाँ खिलखिला रही थी सपने बढ़ने जो लगे थे | बेटे की उम्मीद की डोर से उडी पतंग सी , बेटी की मन में भी कई नयी नयी उमंग थी सपनों ने ली अंगडाई थी | माँ बाबा की आंखों में नए से रंगीन ख्वाब थे बीबी की कलाई में चुडियों के रंग बेशुमार थे , सपने रंग ला रहे थे | अचानक सपने बरसने लगे , ठंडी आग में झुलसने लगे , अश्क बन आँखों से ढलकने लगे , शुष्क ...