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Showing posts from January, 2024

जीवन संघर्षो से न घबराना ही मनुष्यता है

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  जीवन संघर्षो से न घबराना ही मनुष्यता है   सच हम नहीं , सच तुम नहीं। सच है सतत संघर्ष ही। संघर्ष से हटकर जिए तो क्या जिए हम या कि तुम। जो नत हुआ वह मृत हुआ ज्यों वृन्त से झरकर कुसुम। जो पन्थ भूल रुका नहीं , जो हार देख झुका नहीं , जिसने मरण को भी लिया हो जीत है जीवन वही। सच हम नहीं , सच तुम नहीं ।                    कई विचारकों का मत है कि अगर हम कोई जोखिम नहीं लेते हैं ,  तो वह अपने-आप में सबसे बड़ा जोखिम है। यह सही भी है कि ज़्यादातर लोग जोखिम लेने से डरते हैं। इसकी कई वजहें होती हैं ,  लेकिन जो सबसे बड़ी वजह है ,  वह है संकल्प और विचार शक्ति की कमी ।                    कहने को तो विचार शक्ति और संकल्प का अभाव जानवरों में होता है ,  पर जब कोई इंसान बिना विचारे कोई ऐसा काम कर बैठता है ,  तो कहा जाता है कि वह तो निरा पशु हो गया है। यानी इंसान होकर भी अगर...

आइए,मिलकर मकर संक्रांति मनाएं

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आइए , मिलकर मकर संक्रांति मनाएं   क्या आपको बचपन में मुंह में पिघल जाने वाले तिलकूट के लड्डू याद हैं , जो आपकी नाक पर तिल की गुदगुदी लाते थे ? या कड़कड़ाती हुई अलाव के पास आराम करते हुए , धुएँ के रंग की खुशबू हवा में सर्दियों की ठंड का वादा करके गर्म दिनों की जगह ले रही होती थीं ? यही तो मकर संक्रांति का जादू है। मकर संक्रांति त्योहार के दौरान , आप आकाश में रंग-बिरंगी पतंगें देखेंगे , दादा-दादी , उनकी आँखें शरारत से चमकती हुई , अपने पोते-पोतियों को सही पतंग बाँधने में मदद करते हुए , और उनके अनुभवी हाथ सहजता से उनका मार्गदर्शन करते हुए दिखेंगे। परिवार , परंपरा और नवीकरण के वादे के धागों से बुना गया यह प्राचीन त्योहार , वर्ष में एक महत्वपूर्ण प्रतीक बनकर आता है- सर्दियों की आखिरी कंपकंपी को दूर करना और सूरज की उत्तर की ओर यात्रा को गले लगाते हुए , आने वाले उज्ज्वल दिनों की आशा में। मकर संक्रांति , मूल रूप से , सूर्य के मकर राशि में संक्रमण का प्रतीक है। "मकर" मकर राशि को संदर्भित करता है , और "संक्रांति" सूर्य की एक नई खगोलीय कक्षा में गति को दर्शाता है। यह खगोल...

आज भी प्रासंगिक हैं स्वामी विवेकानंद

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  आज भी प्रासंगिक हैं स्वामी विवेकानंद   स्वामी विवेकानंद एक ऐसे आदर्श युवा हुए हैं , जो भारत में जन्मे परंतु जिन्होंने विश्वभर के करोड़ों युवाओं को प्रेरित किया। 1893 में शिकागो धर्म संसद में दिए गए भाषण की बदौलत वे पश्चिमी जगत के लिए भारतीय दर्शन और अध्यात्मवाद के प्रकाशस्तंभ बन गए। उसके बाद से वे युवाओं के लिए एक सदाबहार प्रेरणास्रोत रहे हैं। 21 वीं सदी में जबकि भारत के युवाओं को नई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है , वे अपने दायरों से बाहर आ रहे हैं और बेहतर भविष्य की तलाश कर रहे हैं। ऐसे में स्वामी विवेकानंद उनके लिए और भी प्रासंगिक हो गए हैं। जीवन अगर सार्थक नहीं है , तो उसे सफल नहीं कहा जा सकता। युवाओं की सबसे बड़ी खोज ऐसे सार्थक जीवन की है , जो हृदय को प्रेरित , मस्तिष्क को मुक्त और आत्मा को प्रज्वलित करे। स्वामी विवेकानंद इसे अच्छी तरह समझते थे। उनके विचारों को इस चार सूत्री मंत्र के जरिए समझा जा सकता है , जिसमें सार्थक जीवन के लिए भौतिक , सामाजिक , बौद्धिक और आध्यात्मिक खोज अनिवार्य है। भौतिक खोज से उनका अभिप्राय: है - मानव शरीर की देखभाल करना और ऐसी गतिविधियों ...