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कृतज्ञ हूं मैं

 कृतज्ञ हूं मैं जैसे आसमान की कृतज्ञ है  पृथ्वी जैसे पृथ्वी का कृतज्ञ है किसान, कृतज्ञ हूं मैं जैसे सागर का कृतज्ञ है बादल जैसे नए जीवन के लिए बादल का आभारी है नन्हा बिरवा, कृतज्ञ हूं मैं जिस तरह कृतज्ञ होता है अपने में डूबा ध्रुपदिया सात सुरों के प्रति जैसे सात सुर कृतज्ञ हैं सात हजार वर्षों की काल-यात्रा के, कृतज्ञ हूं मैं जैसे सभ्यताएं कृतज्ञ हैं नदी के प्रति जैसे मनुष्य कृतज्ञ है अपनी उस रचना के प्रति जिसे उसने ईश्वर नाम दिया है। सर्वप्रथम आभार माँ भगवती,मेरे माता-पिता,पापाजी,सभी गुरुओं का,जिन्होंने मुझे अभिव्यक्ति के लिए शब्द दिए...और मेरी लेखनी को भाव दिए....  आभार और कृतज्ञता ज्ञापित करती हूँ अक्षर,अपूर्व,अनमोल, सुशांत,राज,अम्बरीष और सुषमा यादव का, जिन्होंने मेरे पॉडकास्ट को सुंदर कलेवर देने में अनथक प्रयत्न किए और आभार मेरे सभी स्नेही दर्शकों और श्रोताओं, मेरे सभी दोस्तों, चाहे भौतिक हों या आभासी और सभी शुभाचिंतकों का, आपने मेरी आवाज़ को प्यार दिया। विशेष आभार अंतर्राष्ट्रीय ख्याति लब्ध शायर वसीम बरेलवी साहब और अंतर्राष्ट्रीय कवयित्री मधु मोहिनी उपाध्याय जी का। अगल...

जीवन संघर्षो से न घबराना मनुष्यता है

  जीवन संघर्षो से न घबराना मनुष्यता है                    कई विचारकों का मत है कि अगर हम कोई जोखिम नहीं लेते हैं ,  तो वह अपने-आप में सबसे बड़ा जोखिम है। यह सही भी है कि ज़्यादातर लोग जोखिम लेने से डरते हैं। इसकी कई वजहें होती हैं ,  लेकिन जो सबसे बड़ी वजह है ,  वह है संकल्प और विचार शक्ति की कमी ।                    कहने को तो विचार शक्ति और संकल्प का अभाव जानवरों में होता है ,  पर जब कोई इंसान बिना विचारे कोई ऐसा काम कर बैठता है ,  तो कहा जाता है कि वह तो निरा पशु हो गया है। यानी इंसान होकर भी अगर पशुओं जैसी जिंदगी जीएं ,  तो जीना क्या और मरना क्या   ?   इसीलिए वेद में कहा गया है- "   मनुर्भव ,  यानी मनुष्य बनो।  "  इसका मतलब हे कि महज इंसान के वेश में हम इंसान सही मायने में तब तक नहीं होते ,  जब तक हमारे अंदर इंसानियत के सद् गुण पैदा ...

मिला है जब से साथ तुम्हारा

 मिला है जब से साथ तुम्हारा, मन के तार झंकृत होने लगे है। जो शब्द थे अंदर दिल में मेरे, वो अब सब बाहर आने लगे हैं।। सातों स्वर अब गूंजने लगे हैं, वीणा के तार बजने लगे हैं। छोड़ दो अब कोई सुरीली तान, जो मन के झरने बहने लगे।। मायूस थी बहुत दिनों से मै, सभी वाद्य यन्त्र जंग खाएं पड़े थे। मिला है जब से साथ तुम्हारा, सभी वाद्य यंत्र अब बजने लगे हैं। बहती रहेगी ये जीवन धारा, जब तक तुम्हारा साथ रहेगा। मै भी सैदव साथ दूंगी तुम्हारा, जब तक ये सारा भूमंडल रहेगा।। छोड़ना ना कभी तुम मेरा साथ, जीवन भर रहना तुम मेरे साथ। गलती भी कभी हो जाए मुझसे, तब भी तुम निभाना मेरा साथ।। अभिषेक कुमार 'अम्बर'

तुम्हारा साथ

 तुम्हारा साथ जैसे अषाढ़ के उमस पर सावन की पहली फुहार तुम्हारा साथ जैसे सरसो की पीली चुनरी से ऋतु का श्रृंगार... तुम्हारा साथ जैसे आम की डाली पर बैठी कोयल की कूक तुम्हारा साथ जैसे प्रियतम की याद में उठती हृदय से एक हूक... तुम्हारा साथ जैसे चटकती हुई प्यास में घड़े का शीतल पानी तुम्हारा साथ जैसे शाम की उदासी में कोई गीत रूहानी... तुम्हारा साथ जैसे माँ की बातों में राजकुँवर की कहानी तुम्हारा साथ जैसे किसी छोटे से बच्चे की भोली शैतानी... तुम्हारा साथ जैसे मुँह में रख ली गई हो गुण की मीठी डली तुम्हारा साथ जैसे गमले में खिल आयी गुलाब की पहली कली... तुम्हारा साथ जैसे लोक-गीतों के संग ढोलक की थाप तुम्हारा साथ जैसे जाड़े की गुनगुनी सी धूप वाली भाप... तुम्हारा साथ जैसे पकी हुई इमली का खट्टा-मीठा स्वाद तुम्हारा साथ जैसे मंदिर में गूँज उठे शंखों का नाद... तुम्हारा साथ जैसे रामू चाचा के ठेले की बेस्ट पानी पूरी... तुम्हारा साथ जैसे अदरक वाली चाय के संग समोसे ज़रूरी... तुम्हारा साथ जैसे काजल भरी आँखों का का दर्पंण में हँसना तुम्हारा साथ जैसे भोली आशाओं का मन में हो बसना... तुम्हारा साथ जैसे पूनम...

वर्ष नव,हर्ष नव

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  वर्ष नव , हर्ष नव नए वर्ष की प्रातः सबसे अनूठी है। हो भी क्यों नहीं , आज ही तो सुबह की सबसे पहली किरण के साथ नया वर्ष हमारे घर-आंगन में , हमारे जीवन में आया है। समूची सृष्टि में विधान बनकर वही चहुं ओर छाया है। नव वर्ष के आगमन की खुशी में प्राची में उषा ने अपना प्राचीन आंचल उतार फेंका है। इसका मुख दिव्य रक्तकमल की भांति उद्भासित है और हर क्षण स्वर्ण की कांति का दसों दिशाओं में विकिरण कर रहा है। वसुंधरा के आंगन में नए सूरज का उदय हुआ है। नए सूरज की हर किरण में नई संभावनाओं की झिलमिल है , जागृत आत्माओं की अंतर्चेतना में एक एहसास , एक अनुभूति है कि जगत और जीवन में इस नए वर्ष में बहुत कुछ नया प्रस्तुत होगा। भौतिक पदार्थ एवं परिस्थितियों की अप्रत्याशित उलट-पुलट के बीच कुछ नया दिखेगा , वह आध्यात्मिक अंतर्चेतना में एक नए आलोक का अवतरण करेगा। समूची सृष्टि को अपनी स्वर्णिम किरणों से ज्योतिर्मय कर रहे आज के सूर्य का यही संदेश है। यह सूर्य दिव्य चेतना से चेतन है। इसके प्रकाश में परिस्थितियों के भविष्य स्वरूप की आध्यात्मिक अंतर्संभावनाओं की अनेक झांकियां झलक रही हैं। सर्वज्ञ चेतना मे...

नव वर्ष में होगा ‘यूँ ही कोई मिल गया’ पॉडकास्ट का डिजिटल लॉंच

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  नमस्कार दोस्तों,मैं मीता गुप्ता.....लेकर आ रही हूँ अपनी वाचिक प्रस्तुति.....'यूँ ही कोई मिल गया'.....बस चंद घंटे शेष....कल नव वर्ष के नूतन विहान में...स्नेह दीजिए....आशीर्वाद दीजिए....मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए yunhikoimilgaya.com नव वर्ष में होगा ‘यूँ ही कोई मिल गया’ पॉडकास्ट का डिजिटल लॉंच https://youtu.be/8Oc6FV2LPyA डॉ मीता गुप्ता बरेली की जानी-मानी साहित्यकार हैं। वे एक हिंदी शिक्षिका होने के साथ-साथ यूट्यूबर, ब्लॉगर, समाजसेविका भी हैं। हाल ही में उन्होंने पॉडकास्टिंग के क्षेत्र में पदार्पण करने के विषय में सोचा तो हमने उनसे भेंट कर उनसे चंद प्रश्न पूछे। सबसे पहले हम यह जानना चाहते थे कि पॉडकास्टिंग का विचार उनके मन में कैसे आया? उन्होंने ने बताया कि उन्हें हर उसे कार्य को करने में आनंद आता है, जो चुनौतीपूर्ण हो। उन्होंने अपने जीवन में शिक्षण के साथ-साथ कई साहित्यिक ऑनलाइन और ऑफलाइन परिचर्चाओं और कवि गोष्ठियों में भाग लिया, युट्यूबिंइग, ब्लॉगिंग आदि कार्य वे वर्षों से कर रही हैं, पर पॉडकास्टिंग के कार्य ने उन्हें इसलिए लुभाया क्योंकि यह उनके लिए एक नई चुनौती थी और हिं...