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ये घीबली-घीबली क्या है?

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  ये घीबली-घीबली क्या है ? ओपन एआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने ‘एक्स’ पर लिखा , “ मैंने अपना पीएफपी (प्रोफ़ाइल पिक्चर) बदल दिया है ,  लेकिन शायद कोई मुझे बेहतर बना दे।” ऑल्टमैन ने अपनी डिस्प्ले पिक्चर को घिबली-स्टाइल एआई इमेज में अपडेट किया और फिर क्या था | जल्द ही चैटजीपीटी उपयोगकर्ताओं ने मामले को अपने हाथों में ले लिया और घिबली की अपनी खुद की कल्पना की दुनिया बना ली। प्रतिष्ठित फिल्म दृश्यों से लेकर त्रासदियों तक ,  बचपन की तस्वीरों से लेकर प्रस्तावों तक सूरज के नीचे सब कुछ घिबली-फाइड हो रहा है ,  लेकिन कोई भी शिकायत नहीं कर रहा है। इस नए सोशल मीडिया ट्रेंड को ओपनएआई के जीपीटी-4 o  मॉडल द्वारा सक्षम किया गया है ,  जो एक इन-बिल्ट इमेज जेनरेशन फीचर है , जो उपयोगकर्ताओं को स्टिकर ,  संकेत ,  मीम ,  फोटो रीयलिस्टिक इमेज आदि बनाने की सुविधा देता है। हाल ही में ,  स्टूडियो घिबली-शैली की कला ऑनलाइन तेजी से वायरल हो रही है ,  जिसमें  AI- जनित छवियां इस प्रसिद्ध एनीमेशन स्टूडियो की विशिष्ट शैली की नकल कर रही हैं।  Op...

शादी के बाद करियर: उड़ान या उलझन?

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"शादी के बाद कैरियर: उड़ान या उलझन ?" सोचिए ,  एक लड़की ने अपने कैरियर के लिए दिन-रात मेहनत की ,  डिग्रियाँ लीं ,  अनुभव जुटाया और फिर ||| शादी हुई! और शादी के बाद ?  अक्सर वही होता है ,  जो पीढ़ियों से होता आया है—कैरियर या तो ठहर जाता है या धीरे-धीरे गुमनाम हो जाता है। हमारे समाज में शादी को महिलाओं के जीवन का "मील का पत्थर" माना जाता है। लेकिन सवाल यह है कि यह मील का पत्थर कैरियर की सड़क में आगे बढ़ाने का काम करता है या उस पर एक बड़ा स्पीड ब्रेकर बन जाता है ? हमारे समाज में शादी को महिलाओं के जीवन का "टर्निंग पॉइंट" माना जाता है। लेकिन सवाल यह है कि यह टर्निंग पॉइंट आगे बढ़ाने के लिए होता है या पीछे धकेलने के लिए ?  कई बार परिवार ,  समाज और खुद महिलाओं की भी यह सोच बन जाती है कि शादी के बाद कैरियर की प्राथमिकता नहीं रह जाती। कई बार महिलाओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया जाता है कि कैरियर और शादी साथ-साथ नहीं चल सकते। परिवार ,  समाज और कभी-कभी खुद महिलाएँ भी मान लेती हैं कि शादी के बाद कैरियर कम प्राथमिकता वाला हो जाता है। क्या यह...

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित "मृणालिनी"

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  बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित "मृणालिनी" उपन्यास की विस्तार से समीक्षा बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचनाएँ भारतीय साहित्य की धरोहर मानी जाती हैं , और उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक "मृणालिनी" है। यह उपन्यास उनकी लेखन यात्रा का एक महत्वपूर्ण मोड़ है , जिसे बांग्ला साहित्य में एक मील का पत्थर माना जाता है। "मृणालिनी" केवल एक प्रेमकथा नहीं है , बल्कि इसके माध्यम से बंकिम चंद्र ने समाज के विभिन्न पहलुओं को , जैसे कि सामाजिक असमानताएँ , स्त्री   सशक्तिकरण , और भारतीय राष्ट्रीयता की अवधारणा को उजागर किया है। बंकिम का उपन्यास ‘मृणालिनी’ , जिस में एक ओर साम्राज्य विस्तार हेतु मुगलों के षड्यंत्रें से संघर्षरत हिंदू राजा हेमचंद्र की गौरव गाथा है , तो दूसरी ओर उस के प्रेम में दीवानी और दर दर की ठोकरें खाती मृणालिनी की करुण कथा भी है। " मृणालिनी" का कथानक एक भावनात्मक और सामाजिक संघर्ष का दर्पण है। उपन्यास की नायिका मृणालिनी एक आदर्श भारतीय स्त्री   है , जिसे भारतीय समाज के पारंपरिक दृष्टिकोण और आदर्शों के अनुसार प्रस्तुत किया गया है। वह ए...

हर रंग कुछ कहता है

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हर रंग कुछ कहता हमसे, समझें रंगों की भाषा, अगर रंग न होते जग में,क्यों होती अभिलाषा, रंग ऊर्जा हैं, रंग अभिव्यक्ति हैं, रंग एहसास हैं, जीवन का हर रंग अपने आप में खास है| रंगों की क्या मैं बात करूं, हर रंग में छुपी कहानी, कुछ रंग है बचपन यौवन के,कुछ में दादी नानी, हर रंग कुछ कहता हमसे, सपनों में इठलाते हुए, जीवन की कसौटी पर, कभी उम्मीद जगाते हुए| खूबसूरत रंगों से भरा जीवन, हर रंग को जी लो जी भर, रूठा कोई तो मना लो उसको, गाढ़े रंगों से कर सराबोर, हर रंग कुछ कहता है, छोटे-बड़े के भेद को भूलो, रंग दो कोना-कोना मन का, मन के आकाश को छू लो| मिल-जुल कर रहें सब, उमंग और उत्साह संग, रंग नवसर्जन की नींव रखते, मानवता का अर्थ बदलते, हर रंग कुछ कहता है, हो मार्ग अवरूद्ध कितने ही, कहीं धूप-छांव रचते रंग, कहीं कृष्ण की बाँसुरी के सुर सजते| हँसना-रोना-रूठना-मनाना-दोस्ती-सुख-दुख सब, जीवन के कैनवास पर, ये होली के रंग समान, हर रंग कुछ कहता है, भरें विश्वास का रंग इसमें, आसमां में सजता इंद्रधनुष, जैसे नया स्वच्छ विहान| होली तो है एक बहाना, गुझिया की मिठास का, रंग भले ही मिट जाएं, चढ़ा रहे खुमार प्...

डिजिटल क्रांति में त्योहारों का बदलता स्वरूप

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    डिजिटल क्रांति में त्योहारों का बदलता स्वरूप   जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो। होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो! होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो , होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो , भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को , होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो! कृषि प्रधान होने के कारण हमारे देश में प्रत्येक ऋतु-परिवर्तन त्योहारों के माध्यम से हंसी-ख़ुशी मनोरंजन की बयार लेकर आता है। व्रतोत्सव , पर्व-त्यौहार और मेले है , सांस्कृतिक प्रतीक होते हैं, जिनका उद्देश्य भारतीय संस्कृति के मूल तत्वों और विचारों की रक्षा करना है। इस श्रेणी में हिंदुओं के सभी बड़े-बड़े पर्व-त्यौहार आ जाते है , जैसे-होलिका-उत्सव , दीपावली , बसन्त , श्रावणी , संक्रान्ति आदि, जिनकी आत्मा संस्कृति की रक्षा में बसी होती है। हमारे यहाँ हर दिन में एक त्यौहार होता है। अनेकता में एकता की मिसाल इन्हीं त्यौहारों-पर्वों के अवसरों   पर देखी जा सकती है। रोज़मर्रा की भागती-दौड़ती , उलझनों से भरी हुई ऊर्जा प्रधान हो चुकी , वीरान-सी बनती जा रही ज़िंदगी में ये त्यौहार ही व्य...

घर

  घर सभी धर्म-ग्रंथों से पवित्र ईश्वर और अल्लाह से बड़ा स्वर्ग से भी बढ़कर लुप्त हो चुकी महान सभ्यताओं से भी खूबसूरत मैं कहूंगी—घर!   माँ की गोद-सा गरम और नरम पिता के हाथों-सा भरापूरा कभी न भूले जा सकने वाले प्रणय-संबंध-सा अविस्मरणीय मैं कहूंगी—घर!   हवाएं जहां मंद-मंद मुस्काती हैं बदरी जहां मुक्तछंद-सी बरसती है, झूम-झूम राग गाती हैं दीवारें एक-दूजे से खिलंदड़ी करना जहाँ कभी नहीं भूलती मैं कहूंगी—घर!   सुबह जहां बच्चे-सी मासूम और शाम इंद्रधनुषी मालूम जान पड़ती है चांद पंख फैलाए जहां, जहां रोशन करता है रंगीन ख़्वाबों-सा घर दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत शब्द मैं कहूंगी—घर! नए घर में प्रवेश की बधाई! नया संग मंगलमय बना रहे! यही आशीर्वाद हमारा.. !!

मंज़िल

  कुछ अपनों को लेकर , कुछ सपनों को लेकर , मैं अपनी मंज़िल की ओर चल पड़ी , रास्ता कुछ था धुंधला सा , दूर तक नहीं था कोई अपना सा। सफ़र   काँटों से भरा था , कुछ कांटे जो मेरे अपनों ने बिछाए थे , कुछ उड़कर जाने कहां से आए थे ? कुछ को मैंने साफ किया , कुछ को मैंने माफ़ किया।   दूर तलक था अंधेरा , रोशनी का नहीं था बसेरा। अब तक नज़र आ रहा था , कहीं खोया हुआ सा सपना मेरा , मंज़िल   अभी भी साफ़ नहीं थी , रास्ता था अनजान , अनभिज्ञ मैं , जो मेरे अपने थे , कुछ दूर तक चले। कुछ अपनों ने छोड़ा साथ , पर कुछ ने अब तक पकड़ा था हाथ।   अभी भी मंज़िल   का कोई पता ना था , पूछा था माँ से एक रोज़ बचपन में , " माँ , मेरी मंज़िल   है कहां ?" माँ ने कहा था , " ज़मीन-आसमान मिलते हो जहां ।" मैं ढूँढने लगी वह जहां , ज़मीन-आसमान मिलते हो जहां .. अब रास्ता कुछ साफ हो चला था , कुछ नए लोगों का साथ मिला था , जो खुद मेरी तरह अटल थे , थे अविचल , वो भी मंज़िल की तलाश में गए थे निकाल ।   बस अब मंज़िल   दूर नहीं लगती थी , धु...