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हिंदी मेरे उर बसे"

हिंदी मेरे उर बसे" आन-बान सब शान है, और हमारा गर्व। हिंदी से ही पर्व है, हिंदी सौरभ सर्व।। हिंदी हृदय गान है, मृदु गुणों की खान। आखर-आखर प्रेम है, शब्द- शब्द है ज्ञान।। बिंदिया भारत भाल की, हिंदी एक पहचान। सैर कराती विश्व की, बने किताबी यान।। प्रीत प्रेम की भूमि है, हिंदी निज अभिमान। मिला कहाँ किसको कहीं, बिन भाषा सम्मान।। वन्दन, अभिनन्दन करे, ऐसा हो गुणगान। ग्रंथन हिंदी का कर लो, तभी मिले सम्मान।। हिंदी भाषा रस भरी, रखती अलग पहचान। हिंदी वेद पुराण है, हिंदी हिन्दुस्तान।। हिंदी  की  मैं दास हूँ, करूँ मैं इसकी बात। हिंदी मेरे उर बसे, हिंदी है जज्बात ।। निज भाषा का धनी जो, वही सही धनवान। अपनी भाषा सीख कर, बनता व्यक्ति महान।। मौसम बदले रंग जब, तब बदले परिवेश। हो हिंदीमय स्वयं सब, तभी बदलता देश।। निज भाषा बिन ज्ञान का, होता कब उत्थान। अपनी भाषा में रचे, सौरभ छंद सुजान।। एक दिवस में क्यों बंधे, हिन्दी का अभियान। रचे बसे हर पल रहे, हिन्दी हिन्दुस्तान।।

त्रिभाषा सूत्र की प्रासंगिकता

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त्रिभाषा सूत्र की प्रासंगिकता शिक्षा की व्यवस्था हो चाहे व्यवस्था की शिक्षा दोनों की स्थिति में भाषा का महत्व सर्वविदित है। व्यावहारिक जीवन शैली हो चाहे अध्ययनशीलता का ककहरा सीखना हो, भाषा के बिना सब व्यर्थ है। बिना भाषा के सीखें, समझें और जानने के कुछ भी सीखना असंभव है। बात जब ककहरे की हो तो मातृकुल परिवेश की भाषा यानी मातृभाषा का महत्व स्वीकारा गया हैं। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध, आधुनिक काल के कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने निज भाषा का महत्व बताते हुए लिखा भी है कि  निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,  बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटन न हिय के सूल।  इस के साथ भारत की निज भाषा से भारतेंदु जी का तात्पर्य हिंदी सहित भारतीय भाषाओँ से रहा हैं। वे आगे लिखते भी है कि 'अंग्रेजी पढ़के जदपि, सब गुण होत प्रवीन। पै निज भाषा ज्ञान के, रहत हीन के हीन।' यानी अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषाओँ में प्राप्त शिक्षा से आप प्रवीण तो हो जाओगे किंतु सांस्कृतिक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण से हीन ही रहोगे। उसी काल में भारतेंदु जी ने मातृभाषा में शिक्षा की अवधारणा को भी साकार करने का अनुग्रह...

हिंदी शिक्षक

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"हिन्दी शिक्षकों की कमी : शिक्षा की आत्मा पर संकट" भाषा की कमजोरी से पूरे शिक्षा तन्त्र पर असर हरियाणा के विद्यालयों में अध्यापकों के सोलह हज़ार आठ सौ चालीस पद रिक्त हैं, जिनमें सर्वाधिक कमी हिन्दी विषय की है। हिन्दी केवल एक विषय नहीं बल्कि सम्पूर्ण शिक्षा की आत्मा है। भाषा की कमजोरी से गणित, विज्ञान और अन्य विषयों की समझ भी प्रभावित होती है। सरकार ने अस्थायी नियुक्तियाँ तो की हैं, पर स्थायी भर्ती की गति धीमी है। यदि शीघ्र समाधान नहीं हुआ तो शिक्षा का स्तर गिरने के साथ-साथ सांस्कृतिक जड़ों से भी दूरी बढ़ेगी। - डॉ सत्यवान सौरभ हरियाणा विधानसभा में हाल ही में प्रस्तुत आँकड़े यह चौंकाने वाले तथ्य सामने लाते हैं कि प्रदेश के चौदह हज़ार दो सौ पचानवे विद्यालयों में से सोलह हज़ार आठ सौ चालीस पद अध्यापकों के रिक्त पड़े हैं। यह केवल संख्या नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की गहरी चिन्ता का विषय है। और सबसे अधिक चिन्ताजनक तथ्य यह है कि इन रिक्तियों में सर्वाधिक पद हिन्दी विषय के अध्यापकों के हैं। हिन्दी केवल एक विषय नहीं, बल्कि सम्पूर्ण शिक्षा का आधार है। भाषा वह माध्यम है, जिसके ज़रिये ...

स्वेटर

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अक्सर मेरी माँ ऊन का कमाल करती             दो सलाइयों से एक तार बुना करती                         दो सीधा दो उल्टा कर आकार दिया करती  मेरे लिए ढेर सारा प्यार बुना करती   ऊन का गोला है, या शैतान खरगोश  पूरे घर में करता और पोषम पा खेला करता|  मां आकारों के खेलों  से पोशाक बना दिया करती     माँ मन चाहा ऊनों को आकार दिया करती              कभी ओज, कभी अतिशयोक्ति रस से शृंगार  किया करती  मेरे लिए ढेर सारा प्यार बुना करती    शृंगार का जादू  होता उसके थरथराते हाथों में              वह छोटे से पटल पर बड़े बड़े पैमाने रचा करती                              माँ के ऊनों  के खेलों  की यही  सीख अनूठी  है                ...

आखिर विद्यार्थी किस दिशा में जा रहे हैं?

  आखिर विद्यार्थी किस दिशा में जा रहे हैं ?   “ शिक्षा , संस्कार और समाज की जिम्मेदारी : बदलते विद्यार्थी -शिक्षक संबंध और सही दिशा की तलाश”   समाज का दर्पण कहलाने वाला विद्यालय आज एक गहरी चिंता का विषय बन गया है। जहाँ पहले शिक्षा का अर्थ केवल ज्ञान नहीं बल्कि संस्कार , अनुशासन और नैतिकता था , वहीं अब कुछ घटनाएँ यह सोचने पर मजबूर कर रही हैं कि हमारे विद्यार्थी   आखिर किस दिशा में जा रहे हैं। हाल ही में हरियाणा के भिवानी जिले के ढाणा लाडनपुर गाँव के राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल में हुई घटना , जहाँ एक विद्यार्थी   ने अपने ही शिक्षक पर हमला कर दिया , यह सवाल और गंभीर हो जाता है। यह घटना सिर्फ एक शिक्षक और एक विद्यार्थी   के बीच का विवाद नहीं बल्कि पूरे शिक्षा-तंत्र और समाज के लिए चेतावनी है।   भारतीय परंपरा में गुरु को ईश्वर से भी उच्च स्थान दिया गया है – गुरु ब्रह्मा , गुरु विष्णु , गुरु देवो महेश्वरः। लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि कई जगहों पर शिक्षक-विद्यार्थी   संबंधों में खटास बढ़ती जा रही है। पहले शिक्षक की डांट को भी विद्यार्थी प्...

और न जाने क्या-क्या?

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  कभी गेरू से,भीत पर लिख देती हो, शुभ लाभ ,सुहाग पूड़ा ,बाँसबीट  हारिल सुग्गा,डोली कहार कनिया वर,पान सुपारी मछली पानी,साज सिंघोरा,अहोई माता  और न जाने क्या-क्या?   अँचरा में काढ़ लेती हो,फुलवारी राम सिया,सखी सलेहर,तोता मैना मछली-मोर ,सखियाँ ,राधा-कृष्ण  और न जाने क्या-क्या? तकिए  पर,जय सिया-राम ,नमस्ते चादर पर ,पिया मिलन,चातक का जोड़ा  और न जाने क्या-क्या? परदे पर ,खेत पथार,बाग बगइचा चिरई चुनमुन,कुटिया पिसीआ,झुम्मर सोहर बोनी कटनी,दऊनि ओसऊनि,हाथी घोड़ा ऊँट बहेड़ा,और न जाने क्या-क्या? गोबर से लीपती हो ,गौर गणेश,चान सुरुज नाग नागिन,ओखरी मूसर,जांता चूल्हा हर हरवाहा,पोखर-बावड़ी  और न जाने क्या-क्या? जब तुम लिखती हो ,गेरू या गोबर से  या काढ़ रही होती हो,,बेलबूटे या लीप रही होती हो, देहरी-अंगना  तो तुम  सँजोती हो  प्रेम सँजोती हो  सपना सँजोती हो गृहस्थी सँजोती हो वन सँजोती हो प्रकृति सँजोती हो पृथ्वी  सँजोती हो नवांकुर सँजोती हो जीवन सँजोती हो परिवार और सँजोती हो पीढ़ियाँ    और न जाने क्या-क्या? क्योंकि संवाहक हो तुम ...

संचार और शिक्षा: तकनीक ने बदली शिक्षण पद्धति

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संचार और शिक्षा: तकनीक ने बदली शिक्षण पद्धति विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयंसह।   अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥ अर्थात जो व्यक्ति विद्या और अविद्या दोनों को समझता है , वह अविद्या से मृत्यु को तो पार कर सकता है, परंतु वह अमरत्व विद्या से ही प्राप्त करता है। भावार्थ यह है कि सच्ची शिक्षा केवल बाह्य ज्ञान नहीं , आत्मज्ञान भी है, जो जीवन को गहराई और दिशा देता है। शिक्षा शब्द संस्कृत भाषा की ‘शिक्ष्’ धातु में ‘अ’ प्रत्यय लगाने से बना है। ‘शिक्ष्’ का अर्थ है सीखना और सिखाना। ‘शिक्षा’ शब्द का अर्थ हुआ सीखने-सिखाने की क्रिया। इस तरह से शिक्षा का आशय ज्ञान , सदाचार , तकनीकी दक्षता आदि हासिल करने की प्रक्रिया से है। समाज एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को अपने ज्ञान का हस्तांतरण शिक्षा के माध्यम से करने का प्रयास करता है। शिक्षा एक ऐसी संस्था है , जो व्यक्ति को समाज से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है तथा समाज एवं संस्कृति की निरंतरता को बनाए रखती है। एक बच्चा शिक्षा से ही अपने समाज के आधारभूत नियमों , व्यवस्थाओं , प्रतिमानों एवं मूल्यों को सीखता है। बच्चा समाज से तभी...