त्योहारों पर हावी होता बाज़ारवाद
त्योहारों पर हावी होता बाज़ारवाद बाज़ार मनुष्य की ज़रूरत और वस्तुओं के बीच का सेतु है। वास्तव में ज़रूरत की चीज़ों की आपूर्ति के लिए ही बाज़ार अस्तित्व में आया होगा। बाज़ार की वास्तविक धुरी लाभ नहीं , बल्कि लेन-देन , आपसी सहयोग , भाईचारा और आवश्यकता की वस्तुओं की उपलब्धता की एक भावना रही होगी। लेकिन आज बाज़ार का स्वरूप बदल गया है। आज यह ज़रूरत की चीज़ों की उपलब्धता तक ही सिमटा नहीं है , बल्कि यह केवल लाभ का केंद्र बन गया है। पुराने बाज़ार में सामाजिकता और सामूहिकता थी। लोगों के बीच परस्पर संवाद थे। परस्पर काम आप आने की चाहत थी। नए बाज़ार ने सहकारिता के इस भाव को अपदस्थ कर दिया है। आदमी बाज़ार में होते हुए भी अकेला रह गया है। पुराने बाज़ार की सामूहिकता आज बाज़ार के अकेलेपन में तब्दील हो गई है। सामूहिकता पुरानी बाज़ार का मूल चरित्र था , तो नए बाज़ार का मूल चरित्र अकेलापन हो गया है। नया बाज़ार किसी भी तरह के संवाद के बजाय चीज़ों के प्रति आक्रांत चेतना का निर्माण करता है , इसीलिए आज बाज़ार अपने संपूर्ण चरित्र में आक्रामक हो गया है। यह आक्रामकता भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के चलते आई ...