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Showing posts from June, 2024

मैं और मेरा रब

  मैं और मेरा रब वे दिन भी अजीब थे रोज़ सुबह एकाग्रता की मूरत बनी मैं घर से निकल पड़ती थी घर में सबको औंधे मुंह सोता छोड़कर और फिर बस्ती के बाहर निकलते थे सैर पर .... मैं और मेरा रब। कभी वह अकेला नहीं मिलता था हमारे साथ हमेशा चलती थी ...उसका थैला... उसकी साइकिल जब उससे पहले पहला मुलाकात हुई तो ऐसा लगा कि घाटियों की छतियां झुक गई हों और मैं ...मैं ऐसे अपने को सहेज कर , समेट कर , रखने लगी जैसे आंधी में एक और इकट्ठे हो जाते हैं सूखे पत्ते पर मैं सूखा पत्ता नहीं थी मुझ में बहुत सी हरीतिमा बाकी थी। यह म ैंने जाना उसी दिन उसकी भीगी बाहें अपने कंधे देखकर एक अजब सी थी पुलकन उससे मिलने पर लगता था सप्तपदी याद आ रही थी  संकोच का पूरा व्याकरण उसे कंठस्थ था अच्छे परीक्षार्थी की तरह पूरे मनोबल से दोहरा रहा था वह संयम से सब पाठ  सब वर्जनएं सारी की सारी नीति कथाएं पौराणिक स्थितियां डाल रही थी हम पर अक्षत। कुछ टुकड़े प्रेम की प्रचलित कथाओं...

हिंदी भाषा की अंतर्राष्ट्रीय पहचान

  हिंदी भाषा की अंतर्राष्ट्रीय पहचान भाषा व्यक्ति , समाज और राष्ट्र की अस्मिता का निकष है। भाषा ही राष्ट्र संबंधी समस्त वैशिष्ट्य को स्थायित्व प्रदान करती है। भारत के संदर्भ में इस दायित्व का निर्वाह हिंदी कर रही है। इसने देश की अस्मिता की प्रतीक से ऊपर उठकर विश्व भाषा के रूप में अपनी पहचान बनाई है। हिंदी विश्व भाषा की क्षमताओं से संपन्न भाषा है हालांकि वैश्विक फलक पर मंडरिन , अंग्रेज़ी , फ्रांसीसी और स्पेनिश आदि भी विश्व भाषा के रूप में व्यवहृत होती नजर आती हैं , पर विश्व भाषा बनने की इसकी प्रक्रिया हिंदी से भिन्न है। इन भाषाओं ने 19 वीं शताब्दी के साम्राज्यवाद के आधार पर अपना प्रचार-प्रसार कर विश्व भाषा के रूप में अपनी पहचान बनाई है। इससे पहले 18 वीं सदी में ऑस्ट्रिया और हंगरी का वर्चस्व रहा। 20 वीं सदी में अमेरिका और सोवियत संघ का वर्चस्व रेखांकित किया जा सकता है। पिछली शताब्दी के पूर्वाद्ध तक भारत गुलाम रहा और इसने भाषायी दबाव झेला। लेकिन हिंदी की अस्मिता इस दबाव में भी प्रखर बनी रही। इसका समस्त श्रेय हिंदी के प्रति आत्मीयता रखने वाले उन सभी स्वतंत्रता-सेनानियों को जाता है...

पूर्णाहुति-आचार्य चतुरसेन का कीमियागिरी का इतिहास

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  पूर्णाहुति - आचार्य चतुरसेन का कीमियागिरी का इतिहास आचार्य चतुरसेन जी साहित्य की किसी एक विशिष्ट विधा तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने किशोरावस्था में कहानी और गीतिकाव्य लिखना शुरू किया , बाद में उनका साहित्य-क्षितिज फैला और वे जीवनी , संस्मरण , इतिहास , उपन्यास , नाटक तथा धार्मिक विषयों पर लिखने लगे। शास्त्रीजी साहित्यकार ही नहीं बल्कि एक कुशल चिकित्सक भी थे। वैद्य होने पर भी उनकी साहित्य-सर्जन में गहरी रुचि थी। उन्होंने राजनीति , धर्मशास्त्र , समाजशास्त्र , इतिहास और युगबोध जैसे विभिन्न विषयों पर लिखा। आचार्य चतुरसेन जी साहित्य की किसी एक विशिष्ट विधा तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने किशोरावस्था में कहानी और गीतिकाव्य लिखना शुरू किया , बाद में उनका साहित्य-क्षितिज फैला और वे जीवनी , संस्मरण , इतिहास , उपन्यास , नाटक तथा धार्मिक विषयों पर लिखने लगे। ‘वैशाली की नगरवधू’ , ‘ वयं रक्षाम’ और ‘सोमनाथ’ , ‘ गोली’ , ‘ सोना और खून’ (चार खंड) , ‘ रक्त की प्यास’ , ‘ हृदय की प्यास’ , ‘ अमर अभिलाषा’ , ‘ नरमेघ’ , ‘ अपराजिता’ , ‘ धर्मपुत्र’ , ‘ पत्थर युग के ...