मैं और मेरा रब
मैं और मेरा रब वे दिन भी अजीब थे रोज़ सुबह एकाग्रता की मूरत बनी मैं घर से निकल पड़ती थी घर में सबको औंधे मुंह सोता छोड़कर और फिर बस्ती के बाहर निकलते थे सैर पर .... मैं और मेरा रब। कभी वह अकेला नहीं मिलता था हमारे साथ हमेशा चलती थी ...उसका थैला... उसकी साइकिल जब उससे पहले पहला मुलाकात हुई तो ऐसा लगा कि घाटियों की छतियां झुक गई हों और मैं ...मैं ऐसे अपने को सहेज कर , समेट कर , रखने लगी जैसे आंधी में एक और इकट्ठे हो जाते हैं सूखे पत्ते पर मैं सूखा पत्ता नहीं थी मुझ में बहुत सी हरीतिमा बाकी थी। यह म ैंने जाना उसी दिन उसकी भीगी बाहें अपने कंधे देखकर एक अजब सी थी पुलकन उससे मिलने पर लगता था सप्तपदी याद आ रही थी संकोच का पूरा व्याकरण उसे कंठस्थ था अच्छे परीक्षार्थी की तरह पूरे मनोबल से दोहरा रहा था वह संयम से सब पाठ सब वर्जनएं सारी की सारी नीति कथाएं पौराणिक स्थितियां डाल रही थी हम पर अक्षत। कुछ टुकड़े प्रेम की प्रचलित कथाओं...