कृतज्ञ हूँ मैं
कृतज्ञ हूँ मैं उस प्रभात की , जो मौन द्वार खटखटाए , अधूरी नींद , थकी आँखों में , फिर सपने बो जाए। कृतज्ञ हूँ मैं उस श्वास की , जो हर पल साथ निभाती , अनकहे बोझों के नीचे भी , जीवन-लय सिखाती। कृतज्ञ हूँ मैं उस धूप की , जो छाँव बनकर ठहरी , कठोर समय की तपती छाती पर , करुणा बनकर उतरी। कृतज्ञ हूँ मैं उन आँसुओं की , जो चुपके बह जाते हैं , भीतर जमी घनीभूत पीड़ा को , हल्का कर जाते हैं। कृतज्ञ हूँ मैं उन रिश्तों की , जो टूटकर भी जुड़ गए , खामोशी की दरारों में , विश्वास की ओर मुड़ गए। कृतज्ञ हूँ मैं उन शब्दों की , जो कहे नहीं जा पाए , पर आँखों की भाषा में , अर्थ बनकर मन पर छाए। कृतज्ञ हूँ मैं उन रातों की , जिनमें खुद से मुलाकात हुई , अकेलेपन के पलों में , आत्मा से की गहरी बात हुई। कृतज्ञ हूँ मैं उन राहों की , जिन पर हौसला साथ-साथ चला , कदम-कदम पर गिरते हुए भी , साहस दीपक जलता चला। कृतज्ञ हूँ मैं उस समय की , जो छीनकर भी दे जाता है , अहंकार का भार उतारकर , कृतज्ञता सिखलाता है। कृतज्ञ हूँ मैं उन प्रश्नों की , जिनके उत्तर देर से आए ,...