अँधेरे बंद कमरे — एक भावपूर्ण समीक्षा
अँधेरे बंद कमरे — एक भावपूर्ण समीक्षा
लेखक: मोहन राकेश
विधा: उपन्यास
प्रकाशक-राजकमल पेपरबैक्स मूल्य-499/-
मोहन राकेश हिंदी साहित्य जगत के उन अग्रणी साहित्यकारों में से हैं, जिन्होंने आधुनिक यथार्थ, मानवीय संवेदनाओं और संबंधों की जटिलताओं को अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत किया। “अंधेरे बंद कमरे” उनका एक ऐसा प्रभावशाली उपन्यास है, जो न केवल मनुष्य की भीतरी उलझनों को उजागर करता है, बल्कि समाज के उस घुटनभरे वातावरण की भी व्याख्या करता है, जिसमें व्यक्ति अपनी सच्ची पहचान खो बैठता है।
इस उपन्यास का केंद्रबिंदु मानव मन की आंतरिक कैद है। कहानी प्रतीकात्मक है — यहाँ “अंधेरे बंद कमरे” केवल एक भौतिक स्थान नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा और चेतना की बंद कोठरी का प्रतीक हैं।
मुख्य पात्र अपने जीवन, संबंधों और समाज से असंतुष्ट है। उसके भीतर बेचैनी, असहायता और आत्मसंघर्ष की तीव्र अनुभूति है। वह चाहकर भी अपने भीतर की दीवारें तोड़ नहीं पाता। इस घुटन में उसका पूरा अस्तित्व एक अंधेरे कमरे में कैद हो जाता है।
मोहन राकेश ने इस रचना में अकेलेपन, असंतोष, और आत्मविमुखता के भाव को बड़ी गहराई से चित्रित किया है। पात्रों के संवाद और मौन दोनों ही अर्थपूर्ण हैं — वे केवल बातें नहीं करते, बल्कि चुप्पी से भी बहुत कुछ कह जाते हैं।
रचना का भाव यह है कि आधुनिक मनुष्य भौतिक सुविधाओं के बावजूद अंदर से रिक्त है। वह अपने रिश्तों में, अपने घर में, यहाँ तक कि अपने भीतर भी अजनबी बन गया है।
“अंधेरा” — जीवन में व्याप्त अज्ञान, भय और भ्रम का प्रतीक है।
“बंद कमरा” — समाज और मनुष्य की आत्मिक कैद का प्रतीक है।
“प्रकाश की खोज” — सत्य, स्वतंत्रता और आत्मबोध की आकांक्षा को दर्शाती है।
इन प्रतीकों के माध्यम से लेखक ने यह दिखाया है कि मनुष्य जब तक अपने भीतर झाँकने की हिम्मत नहीं करता, तब तक वह अपने जीवन का द्वार नहीं खोल सकता।
हमेशा की तरह मोहन राकेश की भाषा अत्यंत सधी हुई और भावनाओं को उभारने वाली है। उनकी संवाद शैली संयमित, गूढ़ और यथार्थपरक है। इसमें मौन, प्रकाश और छाया — तीनों का कलात्मक उपयोग हुआ है।
“अंधेरे बंद कमरे” हमें यह सोचने पर विवश करता है कि क्या हम सचमुच स्वतंत्र हैं? क्या हमारे रिश्ते, समाज और विचार हमें जीने देते हैं या धीरे-धीरे हमें अंधेरे में धकेल देते हैं?
मोहन राकेश का संदेश स्पष्ट है — प्रकाश बाहर नहीं, भीतर जलाना होगा। जब तक हम अपने अंतर्मन की दीवारें नहीं तोड़ेंगे, तब तक हम सच्चे अर्थों में “जीवित” नहीं होंगेl यह रचना हमें भीतर झाँकने की प्रेरणा देती है और दिखाती है कि जीवन की सबसे बड़ी बंदिशें बाहर नहीं, हमारे मन के भीतर हैं।
मोहन राकेश ने इस उपन्यास में संवेदना, यथार्थ और प्रतीकात्मकता को इतने सुंदर संतुलन से पिरोया है कि यह आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है, जितनी अपने समय में थी। अवश्य पढ़ें।


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