किताबें कुछ कहना चाहती हैं..(कहानी )

किताबें कुछ कहना चाहती हैं..!(कहानी)

(भाग 1)


आरव शहर की भागदौड़ से थक चुका था। रिश्तों की उलझनों, करियर की दौड़ और भीतर की खालीपन ने उसे एक अजीब सी बेचैनी दे दी थी। वह कुछ दिन के लिए अपने दादा की पुरानी हवेली में चला आया—शांति की तलाश में।

हवेली के एक कोने में एक पुरानी कोठरी थी, जहाँ बचपन में वह छुप-छुप कर खेला करता था। उस दिन, बरसों बाद, उसने उस कोठरी का दरवाज़ा खोला। धूल की परतों के बीच एक लकड़ी की अलमारी खड़ी थी—जैसे समय की चौकीदार।

आरव ने अलमारी खोली। अंदर किताबें थीं—कुछ फटी हुई, कुछ पीली, कुछ अब भी चमकती हुई।

“इतनी किताबें… और मैंने इन्हें कभी जाना ही नहीं,” उसने बुदबुदाया।

एक किताब निकाली—“मन की बात”। पहला पन्ना खोला, तो एक पुरानी चिट्ठी गिर पड़ी।

“प्रिय पाठक,

अगर तुमने मुझे खोला है, तो शायद तुम कुछ ढूंढ रहे हो।

मैं तुम्हें तुम्हारे भीतर ले चलूँगी।

बस, खुद से मत भागना।”

आरव ठिठक गया। उसने पन्ने पलटना शुरू किया। हर शब्द जैसे उसके भीतर उतरता जा रहा था।

“क्या मैं सच में खुद से भाग रहा हूँ?” उसने खुद से पूछा।

अगले दिन वह फिर उसी कोठरी में गया। एक और किताब खोली—“प्रेम की परछाइयाँ”।

“प्रेम वो नहीं जो पाया जाए,

प्रेम वो है जो समझा जाए।”

आरव मुस्कराया। उसे याद आया—कभी उसने किसी को समझने की कोशिश नहीं की, बस पाने की चाह में उलझा रहा।

तीसरे दिन, दादा जी वहीं आए।

“तू इन किताबों में क्या ढूंढ रहा है बेटा?” उन्होंने पूछा।

आरव ने कहा, “शायद खुद को।”

दादा जी मुस्कराए, “किताबें वही तो करती हैं। वो हमें हमारे भीतर ले जाती हैं। बस, हम उन्हें सुनें।”

आरव ने सिर झुका लिया। अब वह हर दिन एक किताब पढ़ता, हर रात एक नई सोच के साथ सोता।

एक दिन उसने अपनी डायरी में लिखा—

“किताबें कुछ कहना चाहती थीं।

मैंने सुना, और पाया कि

जवाब बाहर नहीं, भीतर हैं।”

(भाग 2)

अब हवेली की वो कोठरी सिर्फ एक कमरा नहीं थी—वो आरव की दुनिया बन चुकी थी। हर सुबह वह एक किताब खोलता, हर रात एक विचार लिखता। किताबों ने उसे बदल दिया था। अब वह कम बोलता, ज़्यादा महसूस करता।

एक दिन दादा जी ने देखा कि आरव कुछ लिख रहा है।

“क्या लिख रहे हो बेटा?” उन्होंने पूछा।

आरव ने मुस्कराकर कहा, “शायद एक किताब। उन किताबों के बारे में जो मुझे खुद से मिलवा गईं।”

दादा जी की आँखें चमक उठीं। “तो अब तू भी कुछ कहना चाहता है?”

“हाँ,” आरव बोला, “अब मैं भी एक किताब लिखना चाहता हूँ।”

उसने अपनी डायरी का पहला पन्ना खोला और लिखा:

“मैं एक किताब हूँ।

मुझे पढ़ो, समझो, और महसूस करो।

मैं तुम्हारे भीतर की आवाज़ हूँ।”

दिन बीतते गए। आरव ने अपनी किताब का नाम रखा—“भीतर की बात”।

वह हवेली छोड़ने से पहले दादा जी को अपनी पांडुलिपि सौंप गया।

कुछ महीने बाद, शहर के एक छोटे से पुस्तक मेले में एक किताब चर्चा में थी। “भीतर की बात”—एक युवा लेखक की पहली रचना, जिसने पाठकों को खुद से मिलवाया।

एक पाठक ने उस किताब के आख़िरी पन्ने पर लिखा पाया:

“किताबें कुछ कहना चाहती थीं।

मैंने सुना, और अब मैं भी कह रहा हूँ।”

किताबें कुछ कहना चाहती हैं..॥

— जब लेखक ने अपने शब्दों को किसी की आँखों में बहते देखा

आरव की किताब एक छोटे प्रकाशक ने छापी थी। कोई बड़ा विमोचन नहीं हुआ, न ही अख़बारों में कोई चर्चा। लेकिन किताब की आत्मा सच्ची थी—और सच्चे शब्द देर से ही सही, पर पहुँचते ज़रूर हैं।

कुछ महीनों बाद, एक साहित्यिक मेले में आरव को आमंत्रित किया गया। वह मंच पर नहीं था, बस एक कोने में बैठा, अपनी किताबों की छोटी सी मेज़ सजाए।

तभी एक युवती आई—सादे कपड़े, आँखों में थकान, हाथ में “भीतर की बात”।

उसने किताब को सीने से लगाया और कहा, “आप ही आरव हैं?”

आरव ने सिर हिलाया।

उसकी आँखें भर आईं। “मैंने आपकी किताब तीन बार पढ़ी है। हर बार लगा जैसे कोई मुझे समझ रहा है… जैसे कोई मेरे भीतर की आवाज़ को शब्द दे रहा है।”

आरव कुछ कह नहीं पाया। उसकी आँखें भी नम हो गईं।

वो युवती बोली, “पृष्ठ 47 पर जो आपने लिखा है—

‘कुछ खालीपन शब्दों से नहीं, समझ से भरते हैं।’

वो पंक्ति… जैसे मेरे लिए ही लिखी गई थी।”

आरव ने पहली बार महसूस किया कि लेखक होना सिर्फ लिखना नहीं होता—कभी-कभी यह किसी टूटे हुए दिल की मरहम बन जाना होता है।

उस रात, होटल के कमरे में उसने डायरी में लिखा:

“आज मैंने अपनी किताब को किसी की आँखों में बहते देखा।

आज मैं सिर्फ लेखक नहीं, किसी की आवाज़ बन गया।”

आरव की किताब अब धीरे-धीरे पाठकों के बीच फैल रही थी—बिना शोर, बिना प्रचार, बस दिल से दिल तक।

(भाग 4)

— जब पाठक भी लेखक बन गया|

आरव की किताब “भीतर की बात” अब धीरे-धीरे उन लोगों तक पहुँच रही थी, जो खुद से संवाद करना भूल चुके थे। एक दिन, उसी युवती—अनया—का एक ईमेल आया:

“आपकी किताब ने मुझे लिखने की हिम्मत दी। क्या मैं कुछ पंक्तियाँ भेज सकती हूँ? शायद आप उन्हें पढ़ें, और बताएं कि क्या उनमें कुछ है।”

आरव ने जवाब दिया, “शब्द अगर दिल से निकले हों, तो उनमें सब कुछ होता है। भेजिए।”

अनया की पंक्तियाँ सीधी थीं, सरल थीं, लेकिन उनमें एक सच्चाई थी जो आरव को छू गई। उसने लिखा:

“मैंने खुद को अक्सर दूसरों की कहानियों में ढूँढा,

पर पहली बार लगा कि मेरी भी कोई कहानी है।”

आरव ने उसे फोन किया।

“अनया, क्या तुम कभी सोच सकती हो कि हम मिलकर कुछ लिखें?”

“मैं?” वह हँसी, “मैं तो बस एक पाठक हूँ।”

“नहीं,” आरव बोला, “अब तुम भी एक आवाज़ हो। और आवाज़ें मिलकर ही तो गूंज बनती हैं।”

इस तरह शुरू हुई एक नई किताब की यात्रा—“दो किनारे, एक धारा”।

आरव ने प्रस्ताव रखा: “हम दोनों अपने-अपने हिस्से लिखेंगे—तुम पाठक की नज़र से, मैं लेखक की। और बीच में वो संवाद होंगे, जो हमारे बीच होते हैं—जैसे दो आत्माएँ एक-दूसरे को समझने की कोशिश कर रही हों।”

अनया ने लिखा:

“मैंने किताबों को हमेशा एकतरफा सुना,

पर अब पहली बार, एक किताब मुझे सुन रही है।”

आरव ने उत्तर दिया:

“लेखक होना तब सार्थक होता है,

जब पाठक भी खुद को लेखक समझने लगे।”

वे रोज़ एक-दूसरे को टुकड़ों में लिखते—कभी एक कविता, कभी एक चिट्ठी, कभी एक चुप्पी। और धीरे-धीरे, एक किताब आकार लेने लगी, जो न तो पूरी तरह आरव की थी, न अनया की—वो दोनों की थी।

“दो किनारे, एक धारा”

एक किताब नहीं, एक संवाद थी।

जहाँ लेखक और पाठक का फ़र्क मिट गया था।

जहाँ शब्दों ने दोनों को एक-दूसरे का आईना बना दिया था।

-डॉ मीता गुप्ता, साहित्यकार


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