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Showing posts from November, 2025

शिवानी की 'पूतोंवाली'

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  शिवानी की ' पूतोंवाली ' एक संक्षिप्त परंतु तीव्र उपन्यास है जो पारिवारिक बंधनों , सामाजिक अपेक्षाओं और नारी के संघर्ष को संवेदनशील भाषा में उकेरता है , इसकी शक्ति चरित्र-निर्माण और भावनात्मक सघनता में निहित है। पात्र केवल घटनाओं के वाहक नहीं , बल्कि उपन्यास की नैतिक और भावनात्मक धुरी हैं। शिवानी की यह कृति हिंदी उपन्यास परंपरा में एक छोटा, पर प्रभावी योगदान है , जिसे कई डिजिटल पुस्तकालयों और ई बुक प्लेटफार्मों पर उपलब्ध कराया गया है यह पुस्तक लगभग एक सौ बीस पृष्ठों की संक्षिप्त रचना है , जो संकुचित रूप में गहरे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रश्न उठाती है| शिवानी की नायिकाएँ अक्सर पारंपरिक सीमाओं और आत्मिक आकांक्षाओं के बीच फँसी हुई दिखती हैं। इस उपन्यास में भी मुख्य नायिका का चरित्र आंतरिक विरोधाभासों से भरा है — वह घर और समाज की अपेक्षाओं को समझती है परंतु अपनी पहचान और स्वतंत्रता की चाह भी स्पष्ट है। उसकी चुप्पियाँ और छोटे छोटे विद्रोही संकेत कहानी को भावनात्मक गहराई देते हैं ; ये संकेत पाठक को उसके भीतर के दर्द और उम्मीद दोनों से जोड़ते हैं।शिवानी के पात्रों के मन...

पल पल दिल के पास, वो रहता है...

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 पल पल दिल के पास, वो रहता है... धर्मेंद्र: एक अमर हीरो को समर्पित धर्मेंद्र का जाना सिर्फ एक अभिनेता का जाना नहीं, बल्कि एक युग का शांत हो जाना है। गाँव की मिट्टी से उठकर सिनेमा के आसमान तक पहुँचे इस कलाकार ने अपने अभिनय से नहीं, बल्कि अपनी सादगी और मानवीयता से करोड़ों दिल जीते। रोमांस से लेकर एक्शन और कॉमेडी तक—हर भूमिका में वे जीवन की सच्चाई लेकर आए। “शोले” का वीरू, “चुपके चुपके” का प्रोफेसर, “मेरा गाँव मेरा देश” का नायक—ये सारे सिर्फ किरदार नहीं, हमारी यादों का हिस्सा हैं। धर्मेंद्र चले गए, लेकिन उनका उजाला हमेशा रहेगा। हिंदी सिनेमा ने अपने लंबे सफर में कई सितारों को जन्म दिया, पर उनमें कुछ ऐसे हैं जिनकी रोशनी समय के साथ कम नहीं होती, बल्कि हर पीढ़ी की आँखों में एक नई चमक लेकर जीवित रहती है। धर्मेंद्र उन्हीं दुर्लभ सितारों में से थे, जो सिर्फ अभिनेता नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज के भावनात्मक ताने-बाने का हिस्सा बन चुके थे। उनका जाना एक ऐसी खामोशी छोड़ गया है, जिसे शब्दों में बाँध पाना मुश्किल है। वे सिर्फ पर्दे पर दिखने वाली एक छवि नहीं थे; वे एक ऐसे इंसान थे, जिनकी ग...

kindness

1. Your brain releases feel-good chemicals every time you help someone. Acts of kindness trigger the release of dopamine, serotonin, and oxytocin in your brain, creating what scientists call a “helper’s high.” This natural chemical cocktail makes you feel happier and more connected to other people without needing any external substances or expensive treatments. Start with small daily acts like holding doors or complimenting strangers. These micro-moments of kindness provide instant mood boosts that accumulate throughout your day, creating a natural antidepressant effect. 2. Kind people have stronger immune systems and live longer. Research shows that people who regularly volunteer and help others have lower rates of illness and actually live longer than those who focus primarily on themselves. Kindness appears to reduce inflammation in your body and strengthen your immune response. Make helping the people around you part of your regular routine. You don’t need to wait for special occas...

किताबें कुछ कहना चाहती हैं..(कहानी )

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किताबें कुछ कहना चाहती हैं..!(कहानी) (भाग 1) आरव शहर की भागदौड़ से थक चुका था। रिश्तों की उलझनों , करियर की दौड़ और भीतर की खालीपन ने उसे एक अजीब सी बेचैनी दे दी थी। वह कुछ दिन के लिए अपने दादा की पुरानी हवेली में चला आया—शांति की तलाश में। हवेली के एक कोने में एक पुरानी कोठरी थी , जहाँ बचपन में वह छुप-छुप कर खेला करता था। उस दिन , बरसों बाद , उसने उस कोठरी का दरवाज़ा खोला। धूल की परतों के बीच एक लकड़ी की अलमारी खड़ी थी—जैसे समय की चौकीदार। आरव ने अलमारी खोली। अंदर किताबें थीं—कुछ फटी हुई , कुछ पीली , कुछ अब भी चमकती हुई। “इतनी किताबें… और मैंने इन्हें कभी जाना ही नहीं ,” उसने बुदबुदाया। एक किताब निकाली—“मन की बात”। पहला पन्ना खोला , तो एक पुरानी चिट्ठी गिर पड़ी। “प्रिय पाठक , अगर तुमने मुझे खोला है , तो शायद तुम कुछ ढूंढ रहे हो। मैं तुम्हें तुम्हारे भीतर ले चलूँगी। बस , खुद से मत भागना।” आरव ठिठक गया। उसने पन्ने पलटना शुरू किया। हर शब्द जैसे उसके भीतर उतरता जा रहा था। “क्या मैं सच में खुद से भाग रहा हूँ ?” उसने खुद से पूछा। अगले दिन वह फिर उसी क...

अँधेरे बंद कमरे — एक भावपूर्ण समीक्षा

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 अँधेरे बंद कमरे — एक भावपूर्ण समीक्षा लेखक: मोहन राकेश विधा: उपन्यास प्रकाशक-राजकमल पेपरबैक्स मूल्य-499/-                             मोहन राकेश हिंदी साहित्य जगत के उन अग्रणी साहित्यकारों में से हैं, जिन्होंने आधुनिक यथार्थ, मानवीय संवेदनाओं और संबंधों की जटिलताओं को अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत किया। “अंधेरे बंद कमरे” उनका एक ऐसा प्रभावशाली उपन्यास है, जो न केवल मनुष्य की भीतरी उलझनों को उजागर करता है, बल्कि समाज के उस घुटनभरे वातावरण की भी व्याख्या करता है, जिसमें व्यक्ति अपनी सच्ची पहचान खो बैठता है। इस उपन्यास का केंद्रबिंदु मानव मन की आंतरिक कैद है। कहानी प्रतीकात्मक है — यहाँ “अंधेरे बंद कमरे” केवल एक भौतिक स्थान नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा और चेतना की बंद कोठरी का प्रतीक हैं। मुख्य पात्र अपने जीवन, संबंधों और समाज से असंतुष्ट है। उसके भीतर बेचैनी, असहायता और आत्मसंघर्ष की तीव्र अनुभूति है। वह चाहकर भी अपने भीतर की दीवारें तोड़ नहीं पाता। इस घुटन में उसका पूरा अस्तित्व एक अंधेरे कमरे में ...

वंदे मातरम

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  वंदे मातरम — वीरों का वंदन वंदे मातरम, तेरी माटी का हर दाना गीत हो गया, जिसने जिये, जिसने जिया — सबका धागा तुझ में सींचा गया। तू माँ है, तू शहीदों की स्याही से लिखी हुई पुस्तक, हर पन्ने पर खून का तोता, हर शब्द में उनका संघर्ष मुख। खेतों की हर लहर में उनका कदम गूंजता है, नदियों की रवानी में उनकी आवाज़ अनवरत बसती है। किले की दीवारों पर ठहरती वीर गाथाएँ बोलें, बुज़ुर्गों की दुपट्टियों में धैर्य के दीपक जले। चिरकाल से चले जो वनदेव हैं, उन्होंने शपथ ली, आज भी उनकी नज़रें सीमा पर, चौकसियाँ अनंत ली। नन्हे कदमों से बढ़ते युवा — उनके विचारों में आग, झंडे की छाया में उठता नमन, हर दिल में अभिमान काraag। वंदे मातरम — तेरा नाम वीरों की श्वास में बसा, उनकी हिम्मत, उनका बलिदान — तुझे अटूट कर गया। आओ, वचन लें हम सब मिल कर, भर दें नयी उर्जा इस धरा में, वंदे मातरम, तेरे लिये हम उठें — सत्य, सेवाभाव और प्रेम का पथ चला में।

ये कौन चित्रकार

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  ये कौन चित्रकार ये कौन चित्रकार है जिसने किरणों से सुबह रंग दी, फूलों की तासीर में चुपके से मुस्कान संग दी। किसने नदी के मृदु गीत में चाँद का दर्पण बुन डाला, पतझड़ की खामोशी में भी हर पत्ता प्रेम का सन्देश पाला। पेड़ों ने अपनी छाया में बच्चों के स्वप्न पलाये, हवा ने उनकी हँसी से आसमान के जज़्बात जलाये। पहाड़ों ने ठहराव सिखाया, नदियों ने बहना सिखाया, इंसान ने देखा और अपने भीतर का आँगन संवार लाया। बारिश ने मिट्टी को महका दिया, खुशबू से घर भर दिया, मनुष्य ने हाथ जोड़ कर माना — यही तो उसका घर-परिवार दिया। रात ने तारों के मोती मढ़े, सुबह ने उम्मीद की चादर फैलाई, प्रकृति ने हर रूप में कहा — तू मेरा साथी, तू मेरा ईनाम पाई। तो यह वही चित्रकार है जिसने जीवन को रंगों से पिरोया, हम उसके हर स्पर्श में सजे—उसके प्रेम से अपना चेहरा ढोया।

मैं फिर से छोटी हो जाऊँ

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  मैं फिर से छोटी हो जाऊँ मैं फिर से छोटी हो जाऊँ — यही ख्वाहिश-सी गूँजती है, घर की हर दीवार पर बचपन की ठिठोली लौट आती है। खिड़की से झाँककर चाँद से बातें करना, छिप-छिप कर आम चुराना, माँ की मुठ्ठी में मिली किशमिश-मीठी डाँट और गन्ने चुराना। देर से लौटूँ तो पिता की आँखों में चिंता सी झलकती, एक उँगली से दाढ़ी पर थपथपाना और चिंता प्यार में घुलती। कागज की नावों में उम्मीदें, नाले की धारा में गीत, छत पर खड़े होकर आसमान में हम दोनों का जीत। भाई की हँसी में छुपा वह सारा सहारा, जो दुनिया की नाप है, झगड़े भी जैसे खेलने की बाज़ी, अंत में बाँहों का ताप है। सफेद दीवारों पर कलियों का नक़्श, मिट्टी में सने हाथ, छोटे-छोटे कदमों की गूँज अब भी दिल के कोने में बाँध। रातों की कहानियाँ, दादाजी की दी हुई वो पुरानी छाया, माँ के आँचल की खुशबू में बचपन ने जो घर बसाया। कभी मिट्टी-पानी से रंगे बाल, कभी स्कूल की पहली क्लास, दोनों में झूलती रही खुशियों की अनकही सी आवाज़। बचपन की शरारतें-कभी उपर, कभी भीतर, कभी बेदम, कभी पावन, उन पलों का हर टुकड़ा आज भी जीवन में घुलता मधुर सावन। अगर ...

एआई बबल

 एआई बबल क्या है — और क्या यह अब फट (burst) रहा है? (एक विश्लेषणात्मक ब्लॉग — विस्तार और वर्तमान प्रभाव सहित) सारांश: पिछले कुछ वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में निवेश, स्टॉक वैल्यूएशन्स और व्यावसायिक उम्मीदें अत्यधिक तेज़ी से बढ़ीं — कुछ लोग इसे "एआई बबल" कहने लगे। इस लेख में मैं बताऊँगा कि एआई बबल का मतलब क्या है, इसके बनने के कारण कौन-कौन से रहे, किन संकेतों से पता चलता है कि बबल फट रहा है (या फट सकता है), और आज-कल इससे किस तरह के वास्तविक आर्थिक और सामाजिक प्रभाव दिख रहे हैं। लेख में हालिया डेटा, VC-रिपोर्ट्स, बड़े लेआउट/नियुक्ति और केंद्रीय बैंक-सतर्कताओं को भी उद्धृत किया गया है।  --- 1) "बबल" का मतलब क्या है — एआई बबल कैसे समझें? आमतौर पर आर्थिक-शब्दावली में “बबल” तब बनता है जब किसी सेक्टर की संपत्तियों (कंपनियों, स्टॉक्स, स्टार्टअप वैल्यूएशन्स आदि) की कीमतें उनके वास्तविक आर्थिक मूल्यों से बहुत ऊपर चली जाती हैं — और यह ध्यान या उत्साह (hype) पर आधारित होती है। "एआई बबल" का मतलब है: AI से संबंधित कंपनियों, उत्पादों और सेवाओं के ऊपर असाधारण ...

Popcorn Brain Syndrome

Popcorn Brain Syndrome परिचय दूरदर्शी और तीव्र रौशनी में चमकते स्क्रीन की दुनिया में युवा मस्तिष्क एक नए रूप की थकावट महसूस कर रहा है जिसे संक्षेप में "Popcorn Brain Syndrome" कहा जाता है। यह नाम उस तात्कालिक, बार-बार फुटने वाले और छिटपुट ध्यान की तरह की आदत से मिलता-जुलता है जिसे हम किसी बार-बार पॉपकॉर्न भुनने की आवाज से जोड़ सकते हैं। स्क्रीन पर तेज़, आकर्षक और निरंतर बदलती सूचनाओं की इतनी अधिक मात्रा से मस्तिष्क का व्यवहार बदल गया है; उसकी सहनशीलता धीमी घटनाओं, गहरे ध्यान और लंबे विचारों के लिए घटती जा रही है। आधुनिक अध्ययन और स्वास्थ्य लेखों ने यह संकेत दिया है कि लगातार स्क्रीन समय और डिजिटल ओवरस्टिमुलेशन से ध्यान, स्मृति और भावनात्मक संतुलन प्रभावित हो रहे हैं. कारण और तंत्र निरंतर त्वरित उत्तेजना स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो और गेम्स लगातार माइक्रो-रिवॉर्ड्स प्रदान करते हैं। हर नोटिफिकेशन, हर नया विंडो और हर 'लाइक' मस्तिष्क में छोटा इनाम छोड़ता है जो पुनरावृत्ति को बढ़ावा देता है। इससे दिमाग यह सीखने लगता है कि तीव्र, तात्कालिक अनुभव ही मूल्यवान ह...