शिवानी की 'पूतोंवाली'
शिवानी की ' पूतोंवाली ' एक संक्षिप्त परंतु तीव्र उपन्यास है जो पारिवारिक बंधनों , सामाजिक अपेक्षाओं और नारी के संघर्ष को संवेदनशील भाषा में उकेरता है , इसकी शक्ति चरित्र-निर्माण और भावनात्मक सघनता में निहित है। पात्र केवल घटनाओं के वाहक नहीं , बल्कि उपन्यास की नैतिक और भावनात्मक धुरी हैं। शिवानी की यह कृति हिंदी उपन्यास परंपरा में एक छोटा, पर प्रभावी योगदान है , जिसे कई डिजिटल पुस्तकालयों और ई बुक प्लेटफार्मों पर उपलब्ध कराया गया है यह पुस्तक लगभग एक सौ बीस पृष्ठों की संक्षिप्त रचना है , जो संकुचित रूप में गहरे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रश्न उठाती है| शिवानी की नायिकाएँ अक्सर पारंपरिक सीमाओं और आत्मिक आकांक्षाओं के बीच फँसी हुई दिखती हैं। इस उपन्यास में भी मुख्य नायिका का चरित्र आंतरिक विरोधाभासों से भरा है — वह घर और समाज की अपेक्षाओं को समझती है परंतु अपनी पहचान और स्वतंत्रता की चाह भी स्पष्ट है। उसकी चुप्पियाँ और छोटे छोटे विद्रोही संकेत कहानी को भावनात्मक गहराई देते हैं ; ये संकेत पाठक को उसके भीतर के दर्द और उम्मीद दोनों से जोड़ते हैं।शिवानी के पात्रों के मन...