मैं फिर से छोटी हो जाऊँ
मैं फिर से छोटी हो जाऊँ
मैं फिर से छोटी हो जाऊँ — यही ख्वाहिश-सी गूँजती है,
घर की हर दीवार पर बचपन की ठिठोली लौट आती है।
खिड़की से झाँककर चाँद से बातें करना, छिप-छिप कर आम चुराना,
माँ की मुठ्ठी में मिली किशमिश-मीठी डाँट और गन्ने चुराना।
देर से लौटूँ तो पिता की आँखों में चिंता सी झलकती,
एक उँगली से दाढ़ी पर थपथपाना और चिंता प्यार में घुलती।
कागज की नावों में उम्मीदें, नाले की धारा में गीत,
छत पर खड़े होकर आसमान में हम दोनों का जीत।
भाई की हँसी में छुपा वह सारा सहारा, जो दुनिया की नाप है,
झगड़े भी जैसे खेलने की बाज़ी, अंत में बाँहों का ताप है।
सफेद दीवारों पर कलियों का नक़्श, मिट्टी में सने हाथ,
छोटे-छोटे कदमों की गूँज अब भी दिल के कोने में बाँध।
रातों की कहानियाँ, दादाजी की दी हुई वो पुरानी छाया,
माँ के आँचल की खुशबू में बचपन ने जो घर बसाया।
कभी मिट्टी-पानी से रंगे बाल, कभी स्कूल की पहली क्लास,
दोनों में झूलती रही खुशियों की अनकही सी आवाज़।
बचपन की शरारतें-कभी उपर, कभी भीतर, कभी बेदम, कभी पावन,
उन पलों का हर टुकड़ा आज भी जीवन में घुलता मधुर सावन।
अगर मैं फिर से छोटी हो जाऊँ तो माँ की दुलार फिर माँगूँगी,
पिता की खामोशी में वो हँसी फिर से पाना चाहूँगी।
भाई के साथ छुपकर खेलती, कोई नया राज़ रच लूँगी,
और हर शाम को फिर से वही पुरानी मुस्कान ओढ़ लूँगी।
बचपन लौट कर न आएगा, पर उसकी गज़ल हमेशा रहेगी,
घर की वे गलियाँ, मात-पिता-भाई सबकी गूँज दिल में गूँजती रहेगी।

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