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दादी अम्मा, दादी अम्मा मान जाओ....

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  दादी अम्मा , दादी अम्मा मान जाओ.... दादी अम्मा , दादी अम्मा मान जाओ....मैं जब-जब यह गीत सुनती हूं , तब-तब यह सोचने पर मजबूर हो जाती हूं कि दादी रूठी ही क्यों ? और क्या आज भी ललिता पवार की तरह झूठा गुस्सा दिखाती दादी को मनाना उतना ही सरल और सहज है ? आज परिवेश बदल चुका है , संयुक्त परिवारों का स्थान एकाकी परिवारों ने ले लिया है , जीवन की आपा-धापी इतनी अधिक हो गई है कि हर कोई बस दौड़ता दिखता है.....न जाने किस दिशा में.....या किस ओर...। इसका सबसे गंभीर प्रभाव पड़ा है , उस पीढ़ी पर , जिस पीढ़ी की दादी आज रूठी हुई है। इसी कारण आज हमारे समाज में हमारे ही बुज़ुर्ग एकाकी रहने को विवश हैं | उनके साथ उनके अपने बच्चे नहीं हैं। गावों में तो स्थिति फिर भी थोड़ी ठीक है , लेकिन शहरों में तो स्थिति बिलकुल भी विपरीत है। ज़्यादातर बुज़ुर्ग घर में अकेले ही रहते हैं , और जिनके बच्चे उनके साथ हैं , वो भी अपने अपने कामों में इस हद तक व्यस्त हैं कि उनके पास अपने माता-पिता से बात करने के लिए समय ही नहीं है। ऐसी स्थिति के लिए कौन ज़िम्मेदार है ? या क्या कारण हैं ? इस विवाद से मैं बचना चाहती हूँ , ...

आंबेडकर की थाती

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  आंबेडकर की थाती कल्पना कीजिए यदि भीमराव आंबेडकर ना होते , तो हमारा समाज कैसा होता ? क्या हमारे समाज की कुछ जातियों पर सदियों से चला आता शोषण , अत्याचार और मानवीयता बर्बरता और अपमान का स्वरूप बदल गया होता। इतिहास गवाह है कि भारतीय समाज में कितने ही सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलन हुए , कितने ही आक्रमण हुए , कितने ही विदेशियों ने इस पर शासन किया , लेकिन समाज के एक वर्ग की स्थिति उपेक्षित ही बनी रहे। उनकी और किसी का भी ध्यान नहीं गया। केवल भीमराव आंबेडकर ही इतिहास में एक ऐसे शख्स के रूप में उभरे , जिन्होंने बचपन से ही असमानता और अपमान के   दंश का न केवल अनुभव किया , वरन इसे दूर करने के लिए भी अपने मन में दृढ़ संकल्प लिया। डॉक्टर भीमराव आंबेडकर का नाम आते ही भारतीय संविधान का ज़िक्र अपने आप आ जाता है। सारी दुनिया आमतौर पर उन्हें या तो भारतीय संविधान के निर्माण में अहम भूमिका के नाते याद करती है या फिर भेदभाव वाली जाति व्यवस्था की प्रखर आलोचना करने और सामाजिक गैरबराबरी के खिलाफ आवाज उठाने वाले योद्धा के तौर पर। इन दोनों ही रूपों में डॉक्टर आंबेडकर की बेमिसाल भूमिका को कम ...

सिबलिंग दिवस पर विशेष

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सिबलिंग दिवस पर विशेष सहोदर प्रतिदवंद्विता भाई-बहन या बहनों की प्रतिद्वंद्विता ईर्ष्या या प्रतिस्पर्धा से उपजती है। यह दो या दो से अधिक बच्चों के लगभग सभी माता-पिता के लिए चिंता का विषय है। समस्याएं अक्सर दूसरे बच्चे के जन्म के ठीक बाद शुरू होती हैं । सहोदर प्रतिद्वंद्विता आमतौर पर पूरे बचपन में जारी रहती है और माता-पिता के लिए इसका सामना करना बहुत निराशाजनक और तनावपूर्ण हो सकता है। सौभाग्य से, ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं, जो माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर तरीके से साथ लाने और संघर्षों के माध्यम से सकारात्मक तरीके से काम करने में मदद करने के लिए कर सकते हैं। इसके अलावा, सबसे अधिक संभावना है कि आपके बच्चों का रिश्ता अंततः एक प्रगाढ़ रिश्ते में विकसित हो जाएगा। भाई-बहनों के साथ-साथ काम करने से आपके बच्चों में सहयोग करने और दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण को देखने में सक्षम होने जैसे महत्वपूर्ण जीवन कौशल विकसित होते हैं। सहोदर प्रतिद्वंद्विता में योगदान देने वाले कई कारक हैं: प्रत्येक बच्चा यह परिभाषित करने के लिए प्रतिस्पर्धा करता है कि वे एक व्यक्ति के रूप में कौन हैं। जैसे ही उन्हें पता चलता है कि...

मेरा प्यारा हिंदुस्तान

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 मेरा प्यारा हिंदुस्तान अमरपुरी से भी बढ़कर के जिसका गौरव-गान है तीन लोक से न्यारा अपना प्यारा हिंदुस्तान है। गंगा, यमुना सरस्वती से सिंचित जो गत-क्लेश है। सजला, सफला, शस्य-श्यामला जिसकी धरा विशेष है। ज्ञान-रश्मि जिसने बिखेर कर किया विश्व-कल्याण है- सतत-सत्य-रत, धर्म-प्राण वह अपना भारत देश है। यहीं मिला आकार ‘ज्ञेय’ को मिली नई सौग़ात है- इसके ‘दर्शन’ का प्रकाश ही युग के लिए विहान है।   वेदों के मंत्रों से गुंजित स्वर जिसका निर्भ्रांत है। प्रज्ञा की गरिमा से दीपित जग-जीवन अक्लांत है। अंधकार में डूबी संसृति को दी जिसने दृष्टि है- तपोभूमि वह जहाँ कर्म की सरिता बहती शांत है। इसकी संस्कृति शुभ्र, न आक्षेपों से धूमिल कभी हुई- अति उदात्त आदर्शों की निधियों से यह धनवान है।। योग-भोग के बीच बना संतुलन जहाँ निष्काम है। जिस धरती की आध्यात्मिकता, का शुचि रूप ललाम है। निस्पृह स्वर गीता-गायक के गूँज रहें अब भी जहाँ- कोटि-कोटि उस जन्मभूमि को श्रद्धावनत प्रणाम है। यहाँ नीति-निर्देशक तत्वों की सत्ता महनीय है- ऋषि-मुनियों का देश अमर यह भारतवर्ष महान है। क्षमा, दया, धृति के पोषण का इसी भूमि को श्...

परीक्षा के समय तनाव का दानव

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परीक्षा के समय तनाव का दानव बच्चे हंसते-खेलते ही अच्छे लगते हैं , लेकिन जैसे-जैसे परीक्षा नजदीक आने लगती है , उनके चेहरे पर तनाव दिखने लगता है। आइए , सबसे पहले जानते हैं कि बच्चों को परीक्षा के समय तनाव क्यों होता है ? परीक्षा के दिन नज़दीक आते ही बच्चों को माइल्ड और हाई , ये दो प्रकार के तनाव हो सकते है। रिसर्च के अनुसार , माइल्ड तनाव से बच्चा परीक्षा के लिए अच्छे से तैयारी करने के लिए प्रेरित होता है। वहीं , हाई तनाव होने पर चिंता और अवसाद की समस्या हो सकती है। इससे परीक्षा की तैयारी ठीक तरह से नहीं हो पाती।आइए , इसके कारणों को जानने का प्रयास करते हैं- खुद से अपेक्षा – बच्चे को खुद से ज़्यादा अपेक्षा होने लगे , तो परीक्षा का तनाव हो सकता है। वो हर विषय में अच्छा प्रदर्शन करने की चाह में अपना ज़्यादा-से-ज़्यादा समय पढ़ाई में देते हैं। इसके चलते ठीक से सोना , खाना और शारीरिक गतिविधि करना कम हो जाता है। ऐसे में तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है। पढ़ाई का भार – साल भर की पढ़ाई के बाद परीक्षा के समय पूरी किताब को फिर से पढ़ना होता है। इस समय बच्चे के ऊपर हर एक चेप्टर कवर करने का भार होता है , क्...

सहानुभूति या समानुभूति-क्या अंतर है इनमें?

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  सहानुभूति या समानुभूति-क्या अंतर है इनमें ?     सहानुभूति में हम दूसरे के दुख को पहचानकर उसे दूर करने के बारे में सोचते हैं , लेकिन खुद दुखी नहीं होते। इसमें दया करने से अपनी श्रेष्ठता का अहंकार पनपता है। समानुभूति यानी दूसरा जैसा महसूस कर रहा है , वैसा महूसस करना। इसमें संवेदना का व्यवहार नहीं , व्यवहार में संवेदना झलकती है। दोनों में संवेदना की गहराई का फर्क है। अतिशय व्यक्तिवादिता से पीड़ित जिस हिंसक समाज में हम आज जी रहे हैं , वह आक्रामक स्पर्धा को बढ़ावा देकर व्यक्ति को व्यक्ति के खिलाफ़ टकराव की स्थिति में खड़ा कर देता है। आज हम ऐसे संवेदनहीन समूह में बदलते जा रहे हैं , जहां हर ‘दूसरा’ हमारा प्रतिद्वंद्वी है , उसका सुख-दुःख हमें नहीं व्यापता। मानवीय संबंधों में बिखराव के पीछे तो यह है ही , राष्ट्रों के बीच टकराव के पीछे भी कुछ हद तक यह ज़िम्मेदार है। समानुभूति का मतलब है -‘ दूसरा जैसा महसूस कर रहा है , वैसा ही महसूस करना’। इसके लिए स्वयं को दूसरे के स्थान पर रखकर सोचना होता है। सहानुभूति में हम दूसरे के दुख को पहचानकर उसकी मदद करने की सोचते हैं। हमार...