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घर

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 मेरा तुम्हारा इक बसेरा होगा,             जहां उजालों का शहर होगा दोनों रहेंगे कबूतर से जहाँ, जिसमें न बाज़ों का डर होगा। मेरा तुम्हारा एक बसेरा होगा,     जहां मखमली नाज़ुक दीवारें होंगी कोनों में बैठी बहारें होंगी खिड़की की चौखट भी रेशम की होगी चन्दन सी लिपटी हाँ, सेहन भी होगी चंदन की खुशबू भी टपकेगी छत से कलियों का दरवाज़ा खोलेंगे झट से डोलेंगे शबनम की हवा के झोंके आँखों को छू लेंगे गर्दन भिगो के आँगन में बिखरे पड़े होंगे पत्ते नाज़ुक से हरे-पीले छिटक के पाँवों को नंगा जो करके चलेंगे चरपर की आवाज़ से वो भी बजेंगे कोयल कहेगी कि मैं हूँ सहेली मैना कहेगी नहीं तू अकेली बत्तख भी चोंचों में हंसती सी होगी बगुले कहेंगे सुनो अब उठो भी हम फिर भी पड़े होंगे आँख मूँदें गलियों की लड़ियाँ दिलों में हाँ गूंधे भूलेंगे उस पार के उस जहां को जाती कोई डगर यहां से वहाँ को  मेरा तुम्हारा एक बसेरा होगा| चाँदी के तारों से रातें बुनेंगे तो चमकीली सी सहर हम ही चुनेंगे  उजला ही उजला सवेरा होगा मेरा तुम्हारा एक बसेरा होगा आओगे थक के जो हाँ साथी मेरे का...

भारत

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  भारत – मीता गुप्ता भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता और संस्कृति से होती है। यहाँ परंपराएँ केवल जीवित नहीं हैं, बल्कि जीवन का हिस्सा हैं। यहाँ मानवता, करुणा, सहिष्णुता और ज्ञान का संगम है। यही भावना इस कविता में निबद्ध है, जो भारत की आत्मा को शब्द देती है। वह भूमि जहाँ गंगा बहती है, सिंधु का स्वर गूँजता है, जहाँ हर कण में इतिहास का दीपक सदा ही पूजता है। यहाँ जन्मी मानवता की भाषा, करुणा की वह संस्कृति, जहाँ हर धर्म, हर जीवन में बसी है सत्य की आकृति।   यहाँ ऋषि-मुनि साधन करते, योग की गहराई जानें, वेदों, उपनिषदों की वाणी, अमृत बन कर यहाँ बहाने। कण-कण में गीता का उपदेश, रामायण का आदर्श है, हर जन-मन में कर्म की शक्ति, और करुणा का प्रकाश है।   नृत्य यहाँ भावों का उत्सव, राग यहाँ मन मोह ले, कला यहाँ आत्मा की भाषा, सुर में जीवन डोल दे। चित्रों में अजन्ता एलोरा, भक्ति में मीरा का गान, संवेदना बन जाती कविता, छू जाती हर हिन्दुस्तान।   त्योहारों की यहाँ लड़ी है, रंगों से सजी कहानी, दीप...

छठ ज़रूरी है…?

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 छठ ज़रूरी है…? भारत में पर्व-त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन के दर्शन हैं। हर त्योहार किसी न किसी सामाजिक, आध्यात्मिक या पर्यावरणीय संदेश से जुड़ा हुआ है। इन्हीं में से एक है-छठ पर्व, जो भारतीय संस्कृति का वह उज्ज्वल प्रतीक है जहाँ आस्था, अनुशासन, शुद्धता और पर्यावरण के प्रति सम्मान का अद्भुत संगम दिखाई देता है। आज जब जीवन भागदौड़ और कृत्रिम सुख-सुविधाओं में उलझता जा रहा है, तब यह प्रश्न प्रासंगिक है-“छठ ज़रूरी है…?” क्यों ज़रूरी है? क्या यह केवल धार्मिक कृत्य है या हमारे अस्तित्व से जुड़ी कोई जीवन पद्धति? छठ पर्व सूर्योपासना का पर्व है। यह भारत का सबसे प्राचीन, सबसे अनुशासित और पर्यावरण-संवेदनशील पर्व माना जाता है। यह केवल बिहार, झारखंड या पूर्वी उत्तर प्रदेश का पर्व नहीं रहा, बल्कि अब पूरे भारत और विश्व में भारतीयों की पहचान का प्रतीक बन गया है। छठ में सूर्य देव और छठी मइया की पूजा की जाती है-सूर्य जो जीवनदायी ऊर्जा का स्रोत है, और छठी मइया जो मातृत्व, सुरक्षा और समृद्धि का प्रतीक हैं। इस पर्व में कोई दिखावा नहीं, कोई पंडित या भारी भरकम कर्मकांड नहीं-केवल श्रद्धा, आत्मसंयम औ...

हे सड़क

 हे सड़क हे सड़क, तुमने देर कर दी गाँव आने में, धूल रही थी रोती अपनी पहचान बचाने में। सूखे खेतों ने मांगी थी तेरी कोई छाँव, पर तू उलझी रही नगर के स्वर्णिम ठाँव। हे सड़क… तुमने देर कर दी गाँव आने में॥ बरगद बूढ़ा झुका था तेरे स्वागत हेतु, पगडंडी थी थकी, पर अब भी समर्पित प्रेतु। बालक ने आस लगाई थी, माँ ने दीप जलाया, किंतु तू ना आई, मन का चिर दीप बुझाया। हे सड़क… तू आई, पर कितनी देर से आई॥ बैलगाड़ी की चरमर थी एक मधुर गान, अब मशीनों ने छीना वो निर्मल अभिमान। काँव-काँव में खो गया गंध मिट्टी का प्यार, गाँव की गली में अब भी करती है पुकार। हे सड़क… लौट आ फिर वही सादगी लाने में॥ तू आई संग शहरों का कोलाहल लेके, लोभ के दीप, स्वार्थ के उजाले लेके। पर फिर भी तेरा स्वागत है खुले द्वार, क्योंकि अब भी कोई माँ देखे राह अपार। हे सड़क… अब मत करना देर आने में॥ अगली बार जब लौटे तू इस द्वार, ले आ संग पगचिह्न प्रेम के पुकार। न लाना अहं की धूल, न दौलत का शोर, बस ले आ सादगी, अपनापन, और ज़ोर। हे सड़क… तू जीवन है इस ग़ांव के गान में॥   बालक की उँगली से छूटी मिट्टी ने पुकारा, "चल आ अब भी, माँ की गोद में ह...

पीत पल्लव

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  एक पत्ता टूटा, गिरा जहां,  एक कविता बन गई वहां। 🌼 पीत पल्लव 🌼 पीत पल्लव हँसे डालियों पर, साँस-साँस में सुगंध घुले, पवन कहे— जागो रे जीवन, फिर से सपनों के रंग खुले। ओ रे मन, चल रे, चल, पीत पल्लव का आँचल, नव उमंगें, नव विश्वास, धरती का हर पल मंगल।। सुनहरी धूप के घेरे में, खिलता हर पात सुगंधमय, सूखी डाली ने भी गाया, जीवन फिर से चिर नवय। ओ रे मन, चल रे, चल, पीत पल्लव का आँचल, हर पीली पत्ती बोले, आशा का है यह संबल।। ऋतुराज का आया संदेशा, प्रीत फिज़ा में फिर से घोले, मन की वीणा झंकार उठी, गीत नए फिर से बोले। ओ रे मन, चल रे, चल, पीत पल्लव का आँचल, फिर से रच ले जीवन नया, हर हार में पाए सफल।। मैं गिरा डाल से तो क्या हुआ, नव किसलय में जीवित रहूंगा, नव पुष्पों, नव कलिका मध्य मैं, नव सुगंध, नव उमंग में सोहित रहूंगा । ओ रे मन, चल रे, चल, पीत पल्लव का आँचल, फिर से रच ले जीवन नया, हर हार में पाए सफल।।

हज़ारों मील लंबे रास्ते 04/12/26

         हज़ारों मील लंबे रास्ते  04/12/26 INTRO MUSIC नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता ,  एक आवाज़ ,  एक दोस्त ,  किस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत।   जी हाँ ,  आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट , ‘ यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैं ,  नए जज़्बात ,  नए किस्से ,  और कुछ पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...।   जी हाँ दोस्तों ,  आज हम बात करेंगे   यायावरी की, घूमने की, सड़कों पर घूमने की, रोड ट्रिप्स की, सड़कों की, उनकी अनकही-अनसुनी बातों की, जिन्हें हम यूँ ही नज़रअंदाज़ करते रहते हैं, पर कभी-कभी जीवन-पथ पर चलते-चलते, ये सड़कें हमसे कुछ कह जाती हैं, हमें कुछ सुना जाती हैं Music यायावरी का अपना ही मज़ा है। घूमने का शौक मुझे हमेशा से रहा , तो साल में अनेक बार देश के , विदेश के. नए-नए देशों के , नए-नए शहरों के , शहरों में बनी हुई संकरी या वृहद सड़कों के , उन सड़कों में छिपे इतिहास के , इतिहास के उन पन्नों में उन आवाजों के , जो वहाँ कभी बसती होंगी , से मैं अक्सर रूबरू होती रहती हूँ...