घर
मेरा तुम्हारा इक बसेरा होगा, जहां उजालों का शहर होगा दोनों रहेंगे कबूतर से जहाँ, जिसमें न बाज़ों का डर होगा। मेरा तुम्हारा एक बसेरा होगा, जहां मखमली नाज़ुक दीवारें होंगी कोनों में बैठी बहारें होंगी खिड़की की चौखट भी रेशम की होगी चन्दन सी लिपटी हाँ, सेहन भी होगी चंदन की खुशबू भी टपकेगी छत से कलियों का दरवाज़ा खोलेंगे झट से डोलेंगे शबनम की हवा के झोंके आँखों को छू लेंगे गर्दन भिगो के आँगन में बिखरे पड़े होंगे पत्ते नाज़ुक से हरे-पीले छिटक के पाँवों को नंगा जो करके चलेंगे चरपर की आवाज़ से वो भी बजेंगे कोयल कहेगी कि मैं हूँ सहेली मैना कहेगी नहीं तू अकेली बत्तख भी चोंचों में हंसती सी होगी बगुले कहेंगे सुनो अब उठो भी हम फिर भी पड़े होंगे आँख मूँदें गलियों की लड़ियाँ दिलों में हाँ गूंधे भूलेंगे उस पार के उस जहां को जाती कोई डगर यहां से वहाँ को मेरा तुम्हारा एक बसेरा होगा| चाँदी के तारों से रातें बुनेंगे तो चमकीली सी सहर हम ही चुनेंगे उजला ही उजला सवेरा होगा मेरा तुम्हारा एक बसेरा होगा आओगे थक के जो हाँ साथी मेरे का...