हे सड़क
हे सड़क
हे सड़क, तुमने देर कर दी गाँव आने में,
धूल रही थी रोती अपनी पहचान बचाने में।
सूखे खेतों ने मांगी थी तेरी कोई छाँव,
पर तू उलझी रही नगर के स्वर्णिम ठाँव।
हे सड़क… तुमने देर कर दी गाँव आने में॥
बरगद बूढ़ा झुका था तेरे स्वागत हेतु,
पगडंडी थी थकी, पर अब भी समर्पित प्रेतु।
बालक ने आस लगाई थी, माँ ने दीप जलाया,
किंतु तू ना आई, मन का चिर दीप बुझाया।
हे सड़क… तू आई, पर कितनी देर से आई॥
बैलगाड़ी की चरमर थी एक मधुर गान,
अब मशीनों ने छीना वो निर्मल अभिमान।
काँव-काँव में खो गया गंध मिट्टी का प्यार,
गाँव की गली में अब भी करती है पुकार।
हे सड़क… लौट आ फिर वही सादगी लाने में॥
तू आई संग शहरों का कोलाहल लेके,
लोभ के दीप, स्वार्थ के उजाले लेके।
पर फिर भी तेरा स्वागत है खुले द्वार,
क्योंकि अब भी कोई माँ देखे राह अपार।
हे सड़क… अब मत करना देर आने में॥
अगली बार जब लौटे तू इस द्वार,
ले आ संग पगचिह्न प्रेम के पुकार।
न लाना अहं की धूल, न दौलत का शोर,
बस ले आ सादगी, अपनापन, और ज़ोर।
हे सड़क… तू जीवन है इस ग़ांव के गान में॥
बालक की उँगली से छूटी मिट्टी ने पुकारा,
"चल आ अब भी, माँ की गोद में है तुम्हारा गुज़ारा।"
पग-पग पर समय ठिठक कर साँसें गिनता रहा,
गाँव की गली में ‘तरकश’ चाँदनी झिलमिलता रहा।
हे सड़क… तू आई, पर कितनी देर से आई॥
पर फिर भी स्वागत है, हे सड़क,
क्योंकि अब भी
किसी बेटे को अपनी माँ की चौखट तक आना बाकी है,
किसी किसान को हाट तक पहुँचना बाकी है।
पर हे सड़क, तुम देर से सही, पर आई तो हो,
अब यह धरती फिर से उम्मीदें बो रही है।
बस एक वादा करना—
जब लौटो अगली बार,
धूल न लाना अहं के,
शूल न लाना स्वार्थ के,
बस आना, आना आना..
कुछ प्यार के निशान लिए
कुछ भावों के शृंगार लिए
सपनों का संसार लिए
बाहों का हार लिए
बस आना, आना आना..॥
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