छठ ज़रूरी है…?

 छठ ज़रूरी है…?




भारत में पर्व-त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन के दर्शन हैं। हर त्योहार किसी न किसी सामाजिक, आध्यात्मिक या पर्यावरणीय संदेश से जुड़ा हुआ है। इन्हीं में से एक है-छठ पर्व, जो भारतीय संस्कृति का वह उज्ज्वल प्रतीक है जहाँ आस्था, अनुशासन, शुद्धता और पर्यावरण के प्रति सम्मान का अद्भुत संगम दिखाई देता है। आज जब जीवन भागदौड़ और कृत्रिम सुख-सुविधाओं में उलझता जा रहा है, तब यह प्रश्न प्रासंगिक है-“छठ ज़रूरी है…?” क्यों ज़रूरी है? क्या यह केवल धार्मिक कृत्य है या हमारे अस्तित्व से जुड़ी कोई जीवन पद्धति?

छठ पर्व सूर्योपासना का पर्व है। यह भारत का सबसे प्राचीन, सबसे अनुशासित और पर्यावरण-संवेदनशील पर्व माना जाता है। यह केवल बिहार, झारखंड या पूर्वी उत्तर प्रदेश का पर्व नहीं रहा, बल्कि अब पूरे भारत और विश्व में भारतीयों की पहचान का प्रतीक बन गया है। छठ में सूर्य देव और छठी मइया की पूजा की जाती है-सूर्य जो जीवनदायी ऊर्जा का स्रोत है, और छठी मइया जो मातृत्व, सुरक्षा और समृद्धि का प्रतीक हैं। इस पर्व में कोई दिखावा नहीं, कोई पंडित या भारी भरकम कर्मकांड नहीं-केवल श्रद्धा, आत्मसंयम और प्रकृति के प्रति आभार।    

छठ का सबसे बड़ा संदेश है अनुशासन और आत्मशुद्धि। व्रती (व्रत करने वाला) चार दिन तक कठोर नियमों का पालन करता है-निर्जला उपवास, शुद्धता, पवित्रता और सादगी। इसमें किसी भी प्रकार की कृत्रिमता या बनावट का स्थान नहीं। पहले दिन ‘नहाय-खाय’ से प्रारंभ होकर ‘खरना’ और फिर अर्घ्यदान तक हर चरण में आत्मसंयम और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता झलकती है। यह पर्व व्यक्ति को सिखाता है कि आध्यात्मिकता का अर्थ केवल पूजा नहीं, बल्कि स्वयं पर नियंत्रण और सदाचारपूर्ण जीवन भी है।  

छठ पर्व शायद भारत का एकमात्र त्योहार है, जो नदी, तालाब, सूर्य और मिट्टी को केंद्र में रखकर मनाया जाता है। लोग गंगा, यमुना, कोसी, घाघरा, या गाँव की छोटी पोखर तक की सफाई करते हैं, उन्हें सजाते हैं, दीप जलाते हैं। यह केवल धार्मिक कार्य नहीं-यह पर्यावरणीय चेतना का जीवंत उदाहरण है। आज जब नदियाँ प्रदूषण से कराह रही हैं, तो छठ हमें याद दिलाता है कि प्रकृति की पूजा तभी सच्ची है जब हम उसे स्वच्छ रखें।    

छठ का केंद्रबिंदु प्रायः महिलाएँ होती हैं। “छठी मइया” स्वयं मातृत्व का प्रतीक हैं, और व्रत रखने वाली महिलाएँ घर-परिवार के कल्याण के लिए स्वयं को तप में झोंक देती हैं। वे दिनभर उपवास रखती हैं, जल में खड़ी होकर अर्घ्य देती हैं, और फिर भी चेहरे पर थकान नहीं, केवल विश्वास की चमक होती है। इस पर्व में स्त्री की सहनशीलता, आस्था और ऊर्जा का अद्भुत रूप प्रदर्शित करता है। छठ केवल व्रत नहीं, बल्कि यह स्त्री के अंतर्मन की शक्ति का उत्सव भी है-जो अपने परिवार, समाज और प्रकृति को जोड़ती है।    

छठ में कोई ऊँच-नीच नहीं, कोई जाति या वर्ग भेद नहीं। सभी लोग मिलकर घाट सजाते हैं, प्रसाद बनाते हैं और सामूहिक रूप से पूजा करते हैं। यह पर्व समानता और सहयोग की भावना को प्रबल करता है। कोई गरीब हो या अमीर, सबके यहाँ ठेकुआ, गुड़, चावल, दुधिया अर्क और कद्दू-भात का स्वाद एक जैसा होता है।छठ सिखाता है कि समाज तब ही मजबूत होता है जब सभी वर्ग एक साथ खड़े हों।    

सूर्य केवल देवता नहीं, बल्कि हमारे जीवन का वैज्ञानिक आधार हैं। सूर्य की किरणें शरीर को विटामिन डी देती हैं, प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करती हैं और मानसिक स्वास्थ्य में सकारात्मक प्रभाव डालती हैं। छठ में जब व्रती सूर्यास्त और सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तो यह केवल पूजा नहीं, बल्कि प्राकृतिक ऊर्जा से जुड़ने का अभ्यास भी हैं।  

व्रत के दौरान शुद्ध आहार, उपवास और ध्यान का संयोजन शरीर को डिटॉक्स करता है और मानसिक एकाग्रता बढ़ाता है।  

इस तरह छठ आध्यात्मिकता और विज्ञान का अनोखा संगम है। छठ हमें याद दिलाता है कि आस्था का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठा और सामूहिक ज़िम्मेदारी भी है। हर घर से लोग घाट की सफाई में योगदान देते हैं, बच्चों को सिखाया जाता है कि पत्तल, मिट्टी के दीये और बाँस की सूप का उपयोग करें-यानी प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना के साथ जीएँ। आज जब प्लास्टिक, प्रदूषण और उपभोक्तावाद का दौर है, छठ हमें सिखाता है=“कम में भी संतोष, सादगी में भी सौंदर्य।” आज के युग में जब लोग तनाव, प्रदूषण और अलगाव से जूझ रहे हैं, छठ जैसे पर्व हमें मानसिक शांति और सामुदायिक जुड़ाव का अवसर देते हैं।  

यह पर्व हमें विराम लेने, स्वयं से मिलने और प्रकृति से संवाद करने का अवसर देता है।  

छठ का हर चरण हमें यह सिखाता है कि जीवन का सुख बाहरी चमक में नहीं, बल्कि आंतरिक अनुशासन और श्रद्धा में है। हम तकनीक के युग में आगे बढ़ रहे हैं, पर अगर आस्था और संस्कृति का हाथ छूट गया तो विकास अधूरा रहेगा। इसलिए आज के समाज में छठ का होना-केवल धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि मानवता, पर्यावरण और आत्मसंयम के कारण भी आवश्यक है।  

छठ ज़रूरी है क्योंकि यह हमें प्रकृति का सम्मान करना सिखाता है, क्योंकि यह स्त्री शक्ति का उत्सव है, क्योंकि यह सामाजिक एकता और अनुशासन का संदेश देता है, क्योंकि यह हमें शुद्धता, संयम और कृतज्ञता का मूल्य सिखाता है और सबसे बढ़कर, क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि ईश्वर बाहर नहीं, हमारे भीतर है, जब हम सच्चे मन से कर्म, भक्ति और सादगी को जीवन में अपनाते हैं। छठ ज़रूरी है ताकि हमारी नदियाँ जीवित रहें,  हमारी परंपराएँ साँस लेती रहें,  और हमारी भावी पीढ़ी यह समझे कि विकास का असली अर्थ केवल ऊँची इमारतें नहीं, बल्कि ऊँचा आचरण और सात्विक संस्कार हैं।  


डॉ मीता गुप्ता 

साहित्यकार

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