भारत

 

भारत

– मीता गुप्ता




भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता और संस्कृति से होती है। यहाँ परंपराएँ केवल जीवित नहीं हैं, बल्कि जीवन का हिस्सा हैं। यहाँ मानवता, करुणा, सहिष्णुता और ज्ञान का संगम है। यही भावना इस कविता में निबद्ध है, जो भारत की आत्मा को शब्द देती है।

वह भूमि जहाँ गंगा बहती है, सिंधु का स्वर गूँजता है,

जहाँ हर कण में इतिहास का दीपक सदा ही पूजता है।

यहाँ जन्मी मानवता की भाषा, करुणा की वह संस्कृति,

जहाँ हर धर्म, हर जीवन में बसी है सत्य की आकृति।

 

यहाँ ऋषि-मुनि साधन करते, योग की गहराई जानें,

वेदों, उपनिषदों की वाणी, अमृत बन कर यहाँ बहाने।

कण-कण में गीता का उपदेश, रामायण का आदर्श है,

हर जन-मन में कर्म की शक्ति, और करुणा का प्रकाश है।

 

नृत्य यहाँ भावों का उत्सव, राग यहाँ मन मोह ले,

कला यहाँ आत्मा की भाषा, सुर में जीवन डोल दे।

चित्रों में अजन्ता एलोरा, भक्ति में मीरा का गान,

संवेदना बन जाती कविता, छू जाती हर हिन्दुस्तान।

 

त्योहारों की यहाँ लड़ी है, रंगों से सजी कहानी,

दीप जलें तो उमगे आशा, होली में हँसी निशानी।

संघर्षों में भी सत्य अडिग, शौर्य यहाँ का गहना है,

दुनिया बोले “वसुधैव कुटुम्बकम्” भारत का ही कहना है।

 

यहाँ तुलसी की छाया तले, श्रम को मिलता सम्मान,

यहाँ नारी है “शक्ति स्वरूपा”, घर का दीपक, ध्येय महान।

संस्कार यहाँ श्वास समान, परंपरा है जीवन गीत,

हर युग में नव चेतना जगती, भारत रहता सदा अजीत।

 

ओ मेरे भारत, तेरी माटी में सुगंध अमरता की है,

तेरे मंदिर, तेरे विज्ञान में धड़कन एकता की है।

सभ्यता तेरी सागर-सी, संस्कृति गगन समान,

तेरी कहानी है मानवता — तू है जग का सम्मान।


जय जय भारत! जय जय भारत! 

जय जय भारत! जय जय भारत!

जय जय भारत! जय जय भारत!

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