पीत पल्लव

 



एक पत्ता टूटा, गिरा जहां, 

एक कविता बन गई वहां।


🌼 पीत पल्लव 🌼


पीत पल्लव हँसे डालियों पर,

साँस-साँस में सुगंध घुले,

पवन कहे— जागो रे जीवन,

फिर से सपनों के रंग खुले।


ओ रे मन, चल रे, चल,

पीत पल्लव का आँचल,

नव उमंगें, नव विश्वास,

धरती का हर पल मंगल।।


सुनहरी धूप के घेरे में,

खिलता हर पात सुगंधमय,

सूखी डाली ने भी गाया,

जीवन फिर से चिर नवय।


ओ रे मन, चल रे, चल,

पीत पल्लव का आँचल,

हर पीली पत्ती बोले,

आशा का है यह संबल।।


ऋतुराज का आया संदेशा,

प्रीत फिज़ा में फिर से घोले,

मन की वीणा झंकार उठी,

गीत नए फिर से बोले।


ओ रे मन, चल रे, चल,

पीत पल्लव का आँचल,

फिर से रच ले जीवन नया,

हर हार में पाए सफल।।


मैं गिरा डाल से तो क्या हुआ,

नव किसलय में जीवित रहूंगा,

नव पुष्पों, नव कलिका मध्य मैं,

नव सुगंध, नव उमंग में सोहित रहूंगा ।


ओ रे मन, चल रे, चल,

पीत पल्लव का आँचल,

फिर से रच ले जीवन नया,

हर हार में पाए सफल।।

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