हज़ारों मील लंबे रास्ते 04/12/26
हज़ारों
मील लंबे रास्ते 04/12/26
INTRO
MUSIC
नमस्कार
दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से
कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल
गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैं, नए
जज़्बात, नए किस्से, और कुछ
पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ
दोस्तों, आज हम बात करेंगे
यायावरी
की, घूमने की, सड़कों पर घूमने की, रोड ट्रिप्स की, सड़कों की, उनकी अनकही-अनसुनी बातों
की, जिन्हें हम यूँ ही नज़रअंदाज़ करते रहते हैं, पर कभी-कभी जीवन-पथ पर चलते-चलते, ये
सड़कें हमसे कुछ कह जाती हैं, हमें कुछ सुना जाती हैं
Music
यायावरी
का अपना ही मज़ा है। घूमने का शौक मुझे हमेशा से रहा, तो साल में अनेक बार देश
के, विदेश के. नए-नए देशों के, नए-नए
शहरों के, शहरों में बनी हुई संकरी या वृहद सड़कों के,
उन सड़कों में छिपे इतिहास के, इतिहास के उन
पन्नों में उन आवाजों के, जो वहाँ कभी बसती होंगी, से मैं अक्सर रूबरू होती रहती हूँ। चाहे सर्दी हो, या
गर्मी, बरसात हो या फिर कोई और मौसम, मेरी
यात्राओं का दौर कभी रुकता नहीं। और छोटी यात्राएँ अक्सर सड़कों पर होती हैं। इन
सड़कों पर चलते हुए कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि यह सड़क आखिर जाती कहाँ होगी?
यह अपने मुसाफ़िर को अपनी मंज़िल तक पहुँचाती है, पर क्या मंज़िल तक पहुँचने पर यह सड़क खत्म हो जाती है? या फिर किसी और मंज़िल की तलाश में निकल पड़ती है? इसमें
तो न जाने कितने मोड़ हैं, कितनी नीचाइयाँ हैं, कितनी ही ऊँचाइयाँ है, कभी सर्पिणी की तरह बलखाती,
कभी कालिदास की शकुंतला के केशों के घूँघर कर की तरह, कभी सपाट, कभी गड्ढ़ों से भरी, कहीं
पथरीली, कहीं रेतीली, कहीं पगडंडी और
कहीं एक्सप्रेस हाईवे, यही तो स्वरूप है ना इन सड़कों का...
इतनी विभिन्नता लिए हुए ये सड़कें सभी मुसाफिरों को उनकी मंज़िल तक पहुँचाती है। यह
बात अलग है कि सबकी मंज़िलें अलग-अलग होती हैं, राहें
जुदा-जुदा होती हैं।
ऐसा
सोचते सोचते एक दिन मुझे ऐसा लगा कि जब-जब मैं ऐसा सोचा करती, तो कहीं कोई महीन-सी
आवाज़ मेरे कानों में पड़ती,
मैंने सोचा कि आज उस आवाज़ को सुनने के लिए रुकना ही श्रेयस्कर होगा,
सो रुक गई और ध्यान लगाकर सुनने लगी। आखिर कौन बोल रहा है?
Music
तभी
पतली-सी आवाज़ आई-मैं सड़क हूँ।
अच्छा!
तुम सड़क हो?
यह तो मैं भी जानती हूँ कि तुम सड़क हो, पर
क्या तुम्हारा यही रूप-स्वरूप है जो मुझे दिखाई देता है, कहीं
पथरीला, कहीं सपाट, कहीं ऊँचा, कहीं नीचा, कहीं इतने घूँघर, पास
हो तो चौड़ी दिखती हो, और दूर हो तो महीन, और फिर कहीं विलुप्त होती हुई...बताओ न...आज बता ही डालो, सखी!
सड़क
कुछ गंभीर होकर बोली,
तुम भी तो जीवन के सफ़र में चलते-चलते कभी दुखों, कभी सुखों, कभी आशाओं, कभी
आकांक्षाओं, कभी परेशानियों, कभी
खुशियों से रूबरू होती हो ना! ठीक वैसे ही मैं हूँ।
अच्छा!, फिर मैं
सड़क से पूछ ही बैठी, चलो ठीक है, माना
तुम्हारा जीवन और मेरा जीवन एक जैसा ,है पर यह तो बताओ जब
तेज़ रफ्तार की गाड़ियाँ, लदे-फदे ट्रक, बड़ी-बड़ी और तरह-तरह की कारें चलती हैं, यह कहूँ कि
तुम्हें रौंदती हुई चली जाती हैं, तब तुम्हें कैसा लगता होगा?
सड़क
बोली, ठीक वैसा ही लगता है बहन! जैसे किसी स्त्री की अस्मिता को उससे पूछे बिना
तार-तार कर दिया जाए, उसकी आत्मा को छलनी कर दिया जाए,
उसके रूप-स्वरूप को बिगाड़ दिया जाए, तहस-नहस
कर दिया जाए, वो कितना भी साज सिंगार करे, घूँघट से अपने को ढकने का प्रयास करे, पर तेज़ हवाओं
के झोंके न केवल उसका घूँघट उघाड़ जाए, बल्कि उसके सलीके से
बंधे हुए केशों को भी उड़ा-उड़ा कर उसके कांधों पर फैला जाए....बस ऐसा ही लगता
है.....
मैं
गहरी सोच में डूब गई....
फिर
माहौल की नज़ाकत को समझते हुए पूछ बैठी....सखी, कुछ लोग तो ऐसे भी होते हैं ना,
जो सफ़र पर निकाल कर रास्तों में हमसफ़र बना लेते हैं? चाहे उनके पाँव कितने भी थके क्यों न हों, उनके जोश
में कोई कमी नहीं आती, उनके हौसले बुलंद रहते हैं, वे नहीं जानते कि दूर टिमटिमाता चिराग उन्हें कब तक रोशनी दे पाएगा?
वे यह भी नहीं जानते कि मंज़िल मिलेगी या नहीं, दुनिया भी उन्हें टोकती है, रोकती है, पर वे झरने के वेग से आगे बढ़ते जाते हैं और अंत में.... अंत में उन्हें
सागर मिल ही जाता है।
Music
मैंने
बात आगे बढ़ाते हुए पूछा, हे सखी! तुमने कहा कि तुम कहीं नहीं जातीं, पर मैं
तो यह कहूँगी तुम न केवल शहरों और गाँव के बीच की दूरियों को कम करने के लिए सेतु
का काम करती हो, बल्कि तुम्हारे ही कारण तो गाँव शहरों को
अपनी गोदी में लेकर चलने के काबिल हो गए हैं, तुम उन दो
बिंदुओं को जोड़ती हो रेखाओं की तरह, जिन्हें कोई नहीं
जानता। तुम हमारे सुख-दुख, चिंताओं, प्रेम,
घृणा, रोज़गार-दिहाड़ी, इन
सबके लिए गाँवों से शहरों तक और एक शहर से दूसरे शहर तक जाती हो, कभी-कभी जर्जर होती इच्छाओं, आकांक्षाओं, उम्मीदों का बोझ भी उठाती हो, फिर भी उफ़्फ़ तक नहीं
करतीं। तुम्हारे सीने में दफ़न है ना जाने कितने किस्से दुनिया को जीत लेने के,
सफल-असफल अभियानों से लेकर रक्त और लाशों से पटे भीषण पलायनों के।
जब सब डर भाग रहे थे, तुम वहीं की वहीं स्थिर थीं, वैसे ही चल रही थी तुम..... भाग दौड़ की इस कोलाहल में जब सुबह के समय
तुम्हारे किनारे भीगी हुई हरी घास दिखाई देती है, तो ऐसा
लगता है कि सारी यात्राएँ पूरी हो गई हैं, यह तुम्हारा ही तो
जलवा है, हे सखी! फिर तुम उदास क्यों हो?
इतनी
बातें कहने के बाद,
मैं कुछ हिचकिचाते हुए, कुछ अपने शब्दों पर
संयम रखते हुए धीरे से बोली, सुनो सखी! एक बात और है,
सोचती हूँ पूछूँ कि ना पूछूँ, कहीं तुम बुरा
तो नहीं मान जाओगी?
सड़क
हँसकर बोली,
क्या मैंने कभी किसी बात का बुरा माना है? न
जाने कितने लोगों ने मुझे रौंदा, न जाने कितने लोगों ने मुझे,
मेरी आत्मा को, मेरे शरीर को कष्ट दिया,
क्या मैंने कभी उफ़ तक की है? क्या मैंने कभी
कोई शिकायत की है? यह सुनकर मैं बोली, हे
सखी! क्या कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जीवन भर सफ़र में रहते हैं? सड़क पर चलते हैं जीवनभर, जीवन के पथ पर तो चलते हैं,
परंतु फिर भी कहीं पहुँचते नहीं।
Music
सड़क
मुस्काई और बोली,
सही पूछा तुमने, इस दुनिया के ज़्यादातर लोग तो
ऐसे ही हैं, जिन्हें अपने लक्ष्य का पता नहीं, कहाँ जाना है?, यह कभी सोचा नहीं। बस यूँ ही सड़क के
भोथरे पत्थरों के समान कभी यहाँ लुढ़के, कभी वहाँ लुढ़के,
जहाँ पहुँच गए उसी को मंज़िल मान लिया।
यह
सुनकर मैं सकते में आ गई,
कुछ गंभीर हो गई, कुछ सोचने लगी।
मुझे
गहरी सोच में डूबा देखकर सड़क फिर बोली, क्यों बहन दुख हुआ ना? सचमुच है तो दुखी होने वाली बात, लेकिन क्या तुम उन
लोगों के लिए दुखी हो, जिन्हें अपने ही वजूद का पता नहीं,
अपनी की शक्ति का ज्ञान नहीं, अपने ही
अस्तित्व का भान नहीं?
हाँ, यह बात
बिल्कुल सच है कि मैं सभी मुसाफ़िरों को उनकी मंज़िलों तक पहुँचती हूँ, सबकी मंज़िलें अलग-अलग होती हैं, पर उनकी मंजिलों तक
उन्हें मैं ही पहुँचाती हूँ। पर बहन एक बात और भी है, मैं भी
तो जीवन भर चलती हूँ, पर पहुँचती कहीं नहीं। मेरी कोई मंज़िल
नहीं, मेरा जीवन क्या ऐसा ही निरुद्देश्य जीवन बन कर रह
जाएगा?
मैं
आगे बढ़ चुकी थी,
लेकिन मेरे बढ़ते हुए कदम फिर रुक गए और मैंने कहा, बहन! आओ मैं तुम्हें तुम्हारे जीवन का एक नया रंग, एक
नया इंद्रधनुष, एक नए क्षितिज दिखाती हूँ। वह सफ़र, जिसे तुम पूरा करवाती हो, वह सफ़र प्रेमियों को
मिलाता है, तीर्थ करवाता है, कहीं सीमा
पर बैठे हुए सैनिकों को घर ले आता है, माँ की गोद में बेटा
इसीलिए तो सिर रखकर सो पाता है, क्योंकि तुम हो। सोचो,
तुम्हारे बिना यह सफ़र कैसा होता और सड़क का ही क्यों कहूँ, ज़िंदगी का सफ़र भी कैसा होता? इसलिए बहन ना तो दुखी
होना, ना ही रोना, तुम्हारा जीवन केवल
उत्सर्ग के लिए है, परोपकार के लिए है, तुम जो करती हो, उससे तुम्हारा स्व सबमें समा गया है|
और हाँ बहन! मैंने भी आज तुमसे यही सीखा है कि परोपकार से बढ़कर कोई धर्म नहीं,
अच्छा सखी! अब चलती हूँ फिर मिलूँगी अगले सफ़र में,,,,,,
Music
और
चलते चलते बस यही कहूँगी दोस्तों! कि हजारों मील लंबे
रास्ते तुझको बुलाते..
याद
रखिएगा, यदि सड़क नहीं होती तो हमारे कितने ही सपने अधूरे रह जाते.. सड़क है, तभी तो
हम हैं, हमारा विस्तार है, रिश्ते हैं, नाते हैं| ज़रा सोचिएगा ज़रूर.. सड़क से अपने
प्रेम की इस कहानी को, अपने किस्से को शेयर
कीजिए..कीजिइएगा ज़रूर..मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, भेजिएगा
ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....
और..आप
भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!
सुनते
रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, यूँ ही बातें करते करते आपको भी सड़क की वेदना सुनाई देने लगे, ऐसा संभव है
न?सड़क मेरी आपकी, हम सबकी दोस्त है, मित्र है, सखी है, मात तुल्य
है, पिता समान है, मेरे चैनल को सब्सक्राइब
कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...
नमस्कार
दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...
END MUSIC
************************************
INTRO MUSIC
नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से
कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही
पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम
बात करने जा रहे हैं, प्रेम की..आपको याद है न दोस्तों,
कि मैंने पॉडकास्ट की शुरुआत ही प्रेम रसायन की
बात से की थी, क्योंकि प्रेम है, तो हम हैं। प्रेम रसायन पर बात करते करते मैंने
यह जाना कि प्रेम का सीधा सच्चा संबंध सुंदरता से होता है, और यह आँखों में समाया होता है और आपके आयी, आज के एपिसोड में इस भेद को जानने की कोशिश करते हैं..
Music
पिछली रात बहुत कोहरा था, ओस भी थी। ऐसा तो होना लाज़मी है, क्योंकि सर्दियों का मौसम है। पर इस ठिठुरती ठंड
में कितने लोग देख पाते हैं कि पिछली रात चुपके से आसमान ने धरती को एक प्रेम पत्र
लिख भेजा है। ओस की बूँदों से लिखा हुआ, भीगा
हुआ प्रेमपत्र! दोस्तों! ये जो सुबह हम पत्तियों पे ओस देखते हैं न, ध्यान से देखिए उसे, आपको एक प्रेम कविता नज़र आएगी उसमें। क्या आसमान सिर्फ़ पानी बरसाता है? या वह धरती को कोई संदेश देता है? क्या सागर सिर्फ़ नदियों के जुड़ने से बना है? या आसमान के आँसुओं को समेट कर चुपचाप पड़ा है?
हमें ऐसा क्यों नहीं लगता? क्यों नहीं दिखता हमें? अब
इसका भेद क्या है? वजह क्या है? क्या हम भीतर से सूख गए हैं? अब
हमारे भीतर कोई हरापन नहीं बचा, कोई
गीलापन नहीं, कोई तरलता नहीं, सब बंजर कर दिया हमने, क्या ऐसे ही हो गए हैं हम? क्या
भीतर से खोखले हो गए हैं हम? क्या
है खुशी, असली खुशी? ऐसी खुशी, जो हमारे अंतस को सुख देती है? शांति देती है? संतुष्टि
देती है? क्या यह ख़ुशी क्षणिक होती है, पानी का बुलबुला होती है, गर्म तवे पर छुन्न से गिरती और गायब होती पानी की
बूँद होती है, जो टिकती नहीं। फूलों से खुशबू की
तरह उड़ क्यों जाती है? इतना
सब पा लेने के बाद भी वह संतुष्टि नहीं दिखती....सच्ची मुस्कराहट नहीं खिलती हमारे
चेहरे पर!
यूँ ही चलते चलते एक वाकया सुनाना
चाहूँगी, मेरी कॉलोनी में सड़कें हमेशा साफ़ सुथरी
रहती हैं। इन हवेलीनुमा घरों के नौकर रोज़ ही घरों से कचरे की बड़ी बड़ी पन्नियाँ
उठा कर पास ही बनी झोंपड़ पट्टी के सामने फेंक आते है। फिर शुरू होता है, उस बस्ती के बच्चों का खेल..वे सब उस कचरे में से
अपनी अपनी पसंद के खिलौने खोजते हैं। एक दिन ऐसा ही हुआ। बहुत से बच्चे उस कचरे
में से अपने मतलब की चीज़ें छाँट रहे थे। एक छोटे बच्चे के हिस्से कुछ भी नहीं आया।
वह बड़ी देर तक रोता रहा, फिर थक
हार कर उसने उस कचरे से एक टूटी हुई गुड़िया खोज ली और बहुत ही प्यार से उससे
खेलने लगा। उस बच्चे के चेहरे पर मैंने बहुत सारा प्यार देखा, उस टूटे खिलौने के लिए। वह घंटों खुद को भुला कर
उस टूटे खिलौने के साथ था। कैसी शांति और कैसा प्रेम था उसके चेहरे पर? उसके गालों पर बहते आँसू की लकीरें अब इतिहास बन
चुकी थीं, गालों पर खिंची आँसुओं की धार अब सूख
चुकी थी और उसके होठों पर एक पवित्र सी मुस्कान थी। उस टूटे हुए खिलौने को पाकर
उसने दोनों जहान की खुशियाँ समेत ली थीं, अपनी
झोली में उसने। मैं सब देख रही थी, यह
मेरे लिए घटना अभूतपूर्व थी।
Music
दोस्तों! यह सच है कि खिलौने का
एहसास बच्चों को सुरक्षित महसूस करने में मदद देता है, बच्चे अपनी पसंद के खिलौने को अपने साथ रखकर आश्वस्त महसूस करते हैं, खिलौने के खेल उन्हें समृद्ध करते हैं, उनके विकास में मदद करते हैं, उनकी कल्पनाशक्ति को प्रज्वलित करते हैं, संज्ञानात्मक और मोटर कौशल में सुधार की नींव
रखते हैं, वे साझा करने, सहयोग करने और संचार के महत्व को सिखाने में भी
मदद करते हैं, पर.....पर दोस्तों, यह प्यारा सा, छोटा सा बच्चा इन सबको नहीं जानता। उसने न कभी शिक्षाशास्त्र पढ़ा, न वह मनोविज्ञान की समझ रखता है। बस वह....वह तो खुश होना जानता है, संतुष्ट होना जानता है, और अपनी पवित्र मुस्कान से सारे क्षितिज को रंगीन
कर देना जानता है। उसकी भोली सी, प्यारी
सी मुस्कान से क्षितिज रंगीन हो चला है.. वह यह भी नहीं जानता... कितना मासूम..कितना अबोध...कितना निश्छल..।
और इधर हम तथाकथित समझदार लोग,
खुश होने के लिए न जाने कितने जतन करते है, रात दिन एक करते रहते हैं, एक दूजे को नीचा दिखाते हैं, गिराते हैं, झूठ बोलते हैं, छलते
हैं, भेष बदलते हैं, मुखौटे लगाते हैं, कवच पहनते हैं, छवि
गढ़ते हैं, दूसरों की ख़ुशी छीनने से नहीं
हिचकिचाते..और जब इन सबसे भी बात नहीं बनती, तो भौतिक वस्तुओं में...ऐशो आराम की चीज़ों में....और तो और शॉपिंग में
ख़ुशी तलाशते हैं। कोई अपने हवेलीनुमा मकान को देख खुश होता है, कोई अपनी लंबी सी कार देख कर। कोई बैंक बेलेंस
देख कर, तो कोई फेसबुक पर अपने पांच हजार
‘फ्रेंड्स’ देख कर। कोई अपनी रील के व्यूअर्स देखकर, तो कोई यूट्यूब के सब्सक्राइब्र्स देखकर। परंतु दोस्तों! क्या यह खुशी
असली खुशी है? क्या यह खुशी हमारे अंतस को सुख देती
है? शांति देती है? संतुष्टि देती है? और फिर एक बात और भी है दोस्तों! यह ख़ुशी क्षणिक होती है, पानी का बुलबुला होती है, गर्म तवे पर छुन्न से गिरती और गायब होती पानी की
बूँद होती है, जो टिकती नहीं। फूलों से खुशबू की
तरह उड़ क्यों जाती है? इतना
सब पा लेने के बाद भी वह संतुष्टि नहीं दिखती....वह मुस्कराहट नहीं खिलती, जो उस गरीब बच्चे के चेहरे पर टूटे, बेकार से खिलौने ने खिला दी थी।
Music
आखिर भेद क्या है इसका? क्या मंत्र है इसका?
दरअसल उस बच्चे ने उस खिलौने में खुद
को डुबा दिया....समा लिया.....भुला दिया। जब जब भी हम खुद को भुला कर खुश होते हैं, वह ख़ुशी स्थायी होती है। उस ख़ुशी का अहसास जीवन
भर हमारे साथ चलता है। जैसे किसी बहुत सुंदर दृश्य को देख हम खुद को भूल जाते हैं
या कोई लम्हा जब हमें अपने आपसे ही जुदा कर जाता है, वह लम्हा, वह पल
हम कभी नहीं भूलते, और उस
पल में गुम हो जाते हैं...वे पल हमेशा हमारे साथ चलते हैं....हमारे जीवन का हिस्सा
बनकर। यूँ ही तो नहीं कहा गया है कि सुंदरता देखने वालों की आँखों में होती है।
लेकिन कैसे?
एक दिन किसी नदी के किनारे जाना हुआ।
वहाँ कुछ लोग अपनी मन्नतों के दीपक सिरा रहे थे, तो कुछ अपने पाप धो धो कर नदी को मैला किए जा रहे थे। कई उस पानी का
इस्तेमाल अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कर रहे थे। बड़ा शोर मचा हुआ था चारों
ओर, लेकिन...लेकिन मैंने चुपके से सुना
कि लहरें किनारों से बतिया रही थीं। ज़रा ध्यान दिया तो उनकी आवाज़ें और स्पष्ट
सुनाई देने लगीं। कितनी सुंदर। कितनी आज़ाद थीं ये लहरें। अपनी मर्ज़ी से आतीं और
अपनी मर्ज़ी से जातीं। अहंकार से अकड़े किनारे भीग भीग जाते, लेकिन अपनी जगह से नहीं हिलते, लहरें वापस चली जातीं। उस दिन मैंने ये जाना कि
नदी का इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए करते करते हम कितने स्वार्थी हो गए हैं कि
कभी भी दो घड़ी बैठ कर उसकी सुंदरता को निहारा नहीं,...उसकी बात नहीं। कितनी ही नदियों ने कहा होगा हमसे कि मैं नदिया फिर
मैं भी प्यासी... भेद ये गहरा बात ज़रा सी।
क्या सुन पाए हम?
Music
जब जब हम भीतर से कंगाल होते हैं न
दोस्तों, हम गरीब होते हैं, खोखले होते हैं, तभी हम उस कमी को पूरा करने के लिए बाहर भटकते हैं। अपने खालीपन को
लिए लिए सौ जगह भटकते हैं, लेकिन
फिर भी खाली ही रहते हैं, रीते
ही रहते है। जिस दिन हम खुद प्रेम से भरे होते है, उस दिन पाने के लिए नहीं देने के लिए आतुर होते हैं। जिस तरह फूल की
सुगंध उसकी पहचान है, उसी
तरह प्रेम की भी एक खुशबू है। जो आप के भीतर से निकल कर चारों ओर बिखरती है, बशर्ते हमारा दिमाग चालाकियों से खाली हो और मन
के भीतर सौंदर्य और प्रेम भरा हो।
ख़ुशी और प्रेम पाने का भेद गहरा है।
लेकिन बात ज़रा सी ही है, जो समझ
गए उन्होंने प्रेम कलश को भर लिया… नहीं तो रह गए वे रीते के रीते।
एक और बहुत सुंदर बात आप खुद को हमेशा प्रेम से भरे रखिए। एक दिन आपका
प्रेमी खोजता हुआ आपके पास चला आएगा। तो चलिए ना... आज से खुद को भीतर से महसूस
करें...खुद के भीतर महसूस करें.....सौंदर्य, प्रेम और बहुत सा प्यार...मुहब्बत...इंसानियत...मुरव्वत..और जाने क्या
क्या? और सबको बता दें, नदिया अब यह न कह सकेगी कि मैं नदिया फिर भी मैं
प्यासी .....क्योंकि अब तो हम समझ गए हैं कि भेद ये गहरा ज़रूर है, पर बात है ज़रा सी! है न दोस्तों
Music
अंत में यही कहना चाहूँगी दोस्तों,
आइए, प्रेम
का यह भेद जानें, मिलकर प्रेम के अमृत कलश को भरें,
आप अपने किस्से शेयर कीजिए..कीजिएगा ज़रूर.. भूलना
नहीं, मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए,
भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....
और..आप भी तो इंतजार करेंगे न.. अबकी
बार आपको अगले सीज़न का इंतजार करना पड़ेगा...करेंगे न दोस्तों!
सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, क्या
पता यूँ ही बातें करते करते असली खुशी की हमारी मृगतृष्णा, हमारी प्यास एक दिन पूरी हो जाए!
है न दोस्तों? मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को
सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले सीज़न के साथ..‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न में मेरे हमराही, मेरे हमसफ़र बनने के लिए आपका बहुत बहुत
शुक्रिया..बहुत बहुत आभार, बहुत बहुत
धन्यवाद..!
फिर मिलती हूँ दोस्तों!....वही
प्रीत...वही किस्से कहानियाँ लिए.....आपकी
मीत.... मैं, मीता गुप्ता...
END MUSIC
*************************************************************
Comments
Post a Comment