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Showing posts from July, 2023

जियो या मरो, वीर की तरह

  जियो या मरो, वीर की तरह जियो या मरो, वीर की तरह। चलो सुरभित समीर की तरह। जियो या मरो, वीर की तरह। वीरता जीवन का भूषण वीर भोग्या है वसुंधरा भीरुता जीवन का दूषण भीरु जीवित भी मरा-मरा वीर बन उठो सदा ऊँचे, न नीचे बहो नीर की तरह। जियो या मरो, वीर की तरह। भीरु संकट में रो पड़ते वीर हँस कर झेला करते वीर जन हैं विपत्तियों की सदा ही अवहेलना करते उठो तुम भी हर संकट में, वीर की तरह धीर की तरह। जियो या मरो, वीर की तरह। वीर होते गंभीर सदा वीर बलिदानी होते हैं वीर होते हैं स्वच्छ हृदय कलुष औरों का धोते हैं लक्ष-प्रति उन्मुख रहो सदा धनुष पर चढ़े तीर की तरह। जियो या मरो, वीर की तरह। वीर वाचाल नहीं होते वीर करके दिखलाते हैं वीर होते न शाब्दिक हैं भाव को वे अपनाते हैं शब्द में निहित भाव समझो, रटो मत उसे कीर की तरह। जियो या मरो वीर की तरह। देश से प्यार जिसे देश से प्यार नहीं हैं जीने का अधिकार नहीं हैं। जीने को तो पशु भी जीते अपना पेट भरा करते हैं कुछ दिन इस दुनिया में रह कर वे अन्तत: मरा करते हैं। ऐसे जीवन और मरण को, होता यह संसार नहीं है जीने का अधिकार नहीं हैं। मानव वह है स्वयं जिए जो और दूसरों ...

कारगिल दिवस (26 जुलाई) को शहीदों को नमन करते हुए कविता:

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  कारगिल दिवस (26 जुलाई) को शहीदों को नमन करते हुए कविता:   वीर जवानों के लहू से रंगी है धरा , कारगिल के शौर्य से गर्व है हमें प्यारा। हिमपात से घिरे वीरता की चोटी , खड़ी थी वहां देशभक्ति की शिखरी। दुश्मन के सामने बढ़े वीर सिंह , आँखों में चमक , हौसले का वीर रंग। धरती थम गई देखकर उनका बलिदान , पूरे राष्ट्र को जगाया उनका गर्वान। शौर्य और साहस का उदाहरण थे वे , कारगिल में जिसने दिखाया सर्वोच्च बलिदान। श्रद्धांजलि उन्हें , जिन्होंने दिया यह जीवन , हम उन्हें सदा याद करेंगे , नमन करते जीवन। उनके परिवारों को भी विनम्र श्रद्धांजलि , जिनके बलिदान ने किया नया इतिहास रचा। कारगिल के शहीदों को करें नमन हम , उनका बलिदान रहेगा सदा सर्वदा यादगार। वीरता के जज़्बे से सजी है यह धरा , कारगिल के शौर्य से गर्व है हमें प्यारा। चलो भूलें रंग-बिरंगे दिनों को , उन शहीदों को करें नमन , बजाएं वंदनाओं को। उनका सम्मान करें हम सभी एकसाथ , जागृति फैलाएं शहीदों की अमर गाथा। कारगिल के शहीदों को नमन करते हैं हम , उनका बलिदान रहेगा सदा सर्वदा यादगार। वीर जवानों के लहू से रंगी है धरा...

सावन के झूलों में तीजो की महक...

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  सावन के झूलों में तीजो की महक... राधे झूलन पधारो झुकि आए बदरा। साजो सकल सिंगार नैना सारो कजरा॥ भारत में सावन मास के महीने में झूले लगाने की परंपरा है , जो भारतीय संस्कृति और धार्मिक आदिकाल से जुड़ी हुई है। सावन मास को भोलेनाथ शिव का मास माना जाता है और इस मास में विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित की जाती हैं। झूलों की परंपरा भारतीय संस्कृति के बहुत पुराने समयों से चली आ रही है। झूले पहले से ही भारतीय देवी-देवताओं की पूजा एवं आराधना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं। झूले को ज्ञान , शक्ति , सुख-शांति एवं आनंद की प्रतीकता माना जाता है। यह अवसर भारतीय परंपरा में अन्योन्य संबंध और परिवारिक बंधनों का प्रतीक है। इसके द्वारा मान्यता और आदर्शों को प्रतिष्ठित किया जाता है और इसे भक्तों की आस्था और अदृश्य शक्तियों को प्रकट करने का माध्यम माना जाता है। यह परंपरा भारतीय समाज में सामाजिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रमुखता देती है और अभिव्यक्ति की स्थिरता और समरसता का प्रतीक है। सावन के महीने में झूले लगाने का परंपरागत रूप से भारत भर में महत्वपूर्ण स्थान है। इस मास में...

तिरंगे की यात्रा-इतिहास के झरोखे से

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  तिरंगे की यात्रा-इतिहास के झरोखे से   भारत के हृदय में बसी वीरता की धरा , तिरंगे की शान से रंगती यह धरा। सजले रंगों में चमकता ज्ञान और विज्ञान , तिरंगे की चमक से रोशन करता जगमगान। लहराता ध्वज हमारा , बलिदान की भाषा , साहस , समर्पण , त्याग की बनी इसकी प्रतिमा। श्वेत , हरा , और केसरिया रंगों का मिला जब संगम , विश्वास की दृष्टि से सारे धर्म के सम्मान। गांधी , नेहरू , भगत सिंह और सरदार के सपने इसमें बसे हैं , तिरंगे के रंगों में अमर भारतीयों की आत्मा समाई हैं। प्रत्‍येक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र का अपना एक ध्‍वज होता है। यह एक स्‍वतंत्र देश होने का संकेत है। भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज को इसके वर्तमान स्‍वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था , जो 15 अगस्‍त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्‍वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी। इसे 15 अगस्‍त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया गया और इसके पश्‍चात भारतीय गणतंत्र ने इसे अपनाया। भारत में "तिरंगे" का अर्थ भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज है। ...

सावन के झूले पड़े...

  सावन के झूले पड़े... सावन के झूले  परदेसी लौटे  जो घर का थे पथ भूले बहकी है अमराई साजन संग गोरी  झूले में जब मुसकाई बूँदों कि छम छम  झूले में थिरक रही पायल की मधुर सरगम इतराए सावन राधा रानी जब झूले  झुलाए नंद के नंदन| झूले सावन के  लेकर आए हैं  संदेशे मनभावन के|| भारत में सावन मास के महीने में झूले लगाने की परंपरा है , जो भारतीय संस्कृति और धार्मिक आदिकाल से जुड़ी हुई है। सावन मास को भोलेनाथ शिव का मास माना जाता है और इस मास में विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित की जाती हैं। झूलों की परंपरा भारतीय संस्कृति के बहुत पुराने समयों से चली आ रही है। झूले पहले से ही भारतीय देवी-देवताओं की पूजा एवं आराधना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं। झूले को ज्ञान , शक्ति , सुख-शांति एवं आनंद की प्रतीकता माना जाता है। यह अवसर भारतीय परंपरा में अन्योन्य संबंध और परिवारिक बंधनों का प्रतीक है। इसके द्वारा मान्यता और आदर्शों को प्रतिष्ठित किया जाता है और इसे भक्तों की आस्था और अदृश्य शक्तियों को प्रकट करने का माध्यम माना जाता है। यह परंपरा भारतीय समाज म...

सामाजिक सद्भाव लाने में महिलाओं की भूमिका

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  सामाजिक सद्भाव लाने में महिलाओं की भूमिका मैंने उसको जब-जब देखा , लोहा देखा , लोहे जैसा-- तपते देखा , गलते देखा , ढलते देखा , मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा! महिला एक बहुआयामी शब्द है क्योंकि यह प्यार , देखभाल , पोषण , दायित्व , शक्ति , अनंतता , मातृत्व आदि को दर्शाता है। एक महिला समाज में समाज का आईना होती है। जब इसे हाशिए पर रखा जाता है , तो समाज की अवनति होती है और यदि इसका पोषण किया जाता है , तो समाज का पोषण होता है ; अगर इसे सशक्त किया जाता है , तो समाज सशक्त होता है। महिला समाज की धुरी के समान है , जिसके बिना कुछ भी नहीं होता। वह संस्कृति की पोषक है , वही समाज की निर्मात्री है। एक माँ अपनी संतान की पहली शिक्षक है ; वह अपने बच्चों के साथ प्यार से पेश आने वाली पहली डॉक्टर है , वह अपने बच्चों के साथ खेल खेलने वाली पहली साथी है।… या यूं कहें तो , महिलाएं राष्ट्र की निर्माता होती हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव के अनुसार , मानव पूंजी में महिलाओं की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत है , जो सबसे बड़ा मानव संसाधन हैशोध से पता चला है कि बुजुर्ग महिलाएं , जो भारत म...