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Showing posts from November, 2022

शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्य

  शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्य शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की विवेचना कीजिए तथा इन दोनों उद्देश्यों में समन्वय को समझाइए।   अनुक्रम ( Contents) शिक्षा के व्यक्तिगत उद्देश्य ( Individual Aims of Education) वैयक्तिक उद्देश्यों के रूप व्यक्तिगत उद्देश्य के पक्ष में तर्क व्यक्तिगत उद्देश्य के विपक्ष में तर्क शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य ( Social Aim of Education) सामाजिक उद्देश्यों के पक्ष में तर्क सामाजिक उद्देश्यों के विपक्ष में तर्क वैयक्तिक व सामाजिक उद्देश्यों में समन्वय ( Coordination between Individual and Social Aims) Related Link Important Links शिक्षा के व्यक्तिगत उद्देश्य ( Individual Aims of Education)   प्राचीन समय में शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य को उस समय के विद्वानों का काफी समर्थन प्राप्त रहा है। आधुनिक युग में भी शिक्षा मनोविज्ञान की प्रगति के कारण इस उद्देश्य पर विशेष बल दिया जाने लगा है। आधुनिक समय में इस उद्देश्य के प्रमुख समर्थकों के नाम हैं- रूसो , फ्राबेल पेस्टालाजी , नन् आदि । नन् के अनुसार– “शिक्ष...

शब्दों के आदान-प्रदान

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शब्दों के आदान-प्रदान     संस्कृत की आधारभूत शक्ति से सम्पन्न हिंदी भाषा ने देश-दुनिया की कई भाषाओं से शब्द लिए हैं और बदले में अपने शब्द-भंडार से उन्हें समृद्ध भी किया है। मूल में संस्कृत का होना हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं के साथ जोड़ता है और संसार में एक विशिष्ट पहचान देता है। आज हिंदी पखवाड़ा के अवसर पर हमारी भाषा के इन्हीं अंत: और बाह्य संबंधों पर इस लेख के माध्यम से प्रकाश डालने का प्रयास कर रही हूँ | फ ड़ाआआआ...ककक..! की ध्वनि से मेरी नींद खुली , बालकनी में दूध का पात्र रखकर भूल गई थी , उसका आस्वादन बिल्ली ने भली प्रकार से कर लिया था। मेरी पड़ोसी महोदया गुजराती बोला करती हैं ; उन्होंने जगत मौसी कहलाने वाले उस जीव को देखा और ‘बिलाड़ी’ कहकर हंस पड़ीं। मैंने यह शब्द प्रथमत: सुना। मराठी का मांजर सुन चुकी हूं। मेरे मस्तिष्क में भाषा विज्ञान के घोड़े दौड़ना शुरू हो गए। महोदया का बिलाड़ी शब्द और मराठी का मांजर शब्द क्रमश: संस्कृत विडाल और मार्जारी से उत्पन्न हुए हैं। भाषाएं आपस में शब्द लेती-देती रहती हैं। हिंदी ने भी संस्कृत , प्राकृत , फ़ारसी , अरबी , अंग्रेज़ी , तुर्की , पश्तो ...

प्राचीन भारत में संचार के साधन

  प्राचीन भारत में संचार के साधन   कभी आपने सोचा है कि प्राचीन काल में जब न तो इंटरनेट था और न ही बिजली… तो मानव अपने संदेशों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक कैसे पहुंचाते थे ? जाहिर सी बात है उस जमाने में भी इंसान आपस में संवाद तो करता ही होगा! आजकल की तरह तब भले ही एक जगह से दूसरी जगह अपना संदेश पहुंचाना फास्ट नहीं था , लेकिन फिर भी लोगों ने अपनी जरूरत के हिसाब से संचार के अलग-अलग माध्यमों का आविष्कार कर लिया था. आज उस जमाने में लोग कैसे बिना इंटरनेट के एक दूसरे से चैटिंग करते थे इस बारे में विस्तारपूर्वक जानेंगे क्योंकि यह विकसित भारतीय संस्कृति का अभिन्न यंग है, प्रमाण है – कबूतर बनता था ‘डाकिया प्राचीन काल में जब इंटरनेट इजाद नहीं हुआ था , तब लोग कबूतर को संदेशवाहक के रूप में इस्तेमाल करते थे. इसके लिए कबूतरों को विशेष प्रकार की ट्रेनिंग दी जाती थी. कबूतरों की खासियत ये है कि वह कभी भी अपने घर का रास्ता नहीं भूलते. उन्हें कहीं भी छोड़ दो वह अपने घर पहुंच ही जाते हैं. अपने संदेश को एक छोटी सी चिठ्ठी में लिखकर लोग एक नली में रख कबूतर के पैर में बांध देते थे. फिर उसे...

PHONE ETTIQUITTES

  PHONE ETTIQUITTES Answer the call within three rings. Immediately introduce yourself. Speak clearly. Only use speakerphone when necessary. Actively listen and take notes. Use proper language.  Remain cheerful. Ask before putting someone on hold or transferring a call. Be honest if you don't know the answer. Be mindful of your volume. Check for and respond to voicemails. 1. Answer a call within three rings. If your position entails always being available to callers, you should actually be available. That means staying focused and answering calls immediately. The last thing you want to do is keep a customer waiting after a string of endless ringing or send them to voicemail when you should've been able and ready to reply. As long as you're alert and at your phone at all times — excluding breaks — this rule should be fairly simple to follow. However, we recommend responding within three rings in order give yourself enough time to get in the zone and prepare for the call. Pic...

कहां गया उसे ढूंढो

पिछले दिनों कुछ पुराने मित्रों से मुलाकात हुई। बात निकली कालेज की, हॉस्टल की; तो सभी यादें ताजा हो गईं। मैंने किसी से पूछा वो हमारा साथी अतुल शर्मा अब कहां है जो सारा दिन सबको हंसाता था? कॉलेज का सबसे होनहार लड़का जो बातों के ऐसे लच्छे बनाता कि सब हंस हंस कर पागल हो जाते। मैं उसे अक्सर कहती अतुल तुम ऐसे हंसते  हो कि कमरे ही नहीं कब्रों में सो रहे लोग भी बाहर आ जाएं। सच वो बहुत ही जिंदादिल व्यक्ति था। लेकिन उस दिन दोस्तों ने बताया की अतुल कुछ दिनों से बहुत परेशान था। उसकी नौकरी भी छूट गयी थी और वो इनदिनों नशा मुक्ति केंद्र में अपना इलाज करवा रहा है। ये सुनकर मन दुख से भर गया कि क्या हुआ होगा? कैसे हुआ ये सब? क्यों कोई तनाव में, अवसाद में ऐसे डूब जाए कि दुनिया से बेखबर हो जाए? दूसरा उदाहरण भी ऐसा ही है। मेरे घर के पास ही रहने वाले एक हिंदी के प्रोफ़ेसर, जो बेहद मिलनसार और खुशदिल इंसान थे, परिवार के भीतर होने वाले तनाव ने उन्हें तोड़ दिया और उन्होंने हालातों के सामने हार मान ली और एक दिन बिन बताए घर छोड़ दिया। हजारों ऐसे उदहारण हैं, जो हमारे आसपास हैं। जीवन किसी के लिए भी आसान नहीं है...

कुछ दिनों से माँ मेरी सोयी नहीं

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 कुछ दिनों से माँ मेरी सोयी नहीं यह बेचैन सा चेहरा यह सूनी सी मुस्कान यह डरा सा लहज़ा ये आह के निशान  ये पथराई आंखें कब से रोई नहीं  गोया कुछ दिनों से माँ मेरी सोयी नहीं वे अनसुलझे सवाल वे कराहते जवाब वह अपनों का बवाल वह परायों का अज़ाब वह पेशानी की सिमटी सिलवटें खोयी नहीं  गोया कुछ दिनों से माँ मेरी सोयी नहीं ये दर - ओ - घर के मसायल  यह नफ़रत का कोहरा  यह जिस्म-ओ-जिगर घायल  यह जेहाद का मोहरा  ये फ़रज़न्दों में अपना उसका कोई नहीं गोया कुछ दिनों से माँ मेरी सोयी नहीं  वह मन्दिर-ओ-दरगाह पर शिरकत  वह सिसकती दुआ का काफ़िला  वह दिल ओ दिमाग की मशक्कत  वह न कुबूल होने का सिलसिला वे दीवारें जो सरहदों का बोझ ढोई नहीं गोया कुछ दिनों से माँ मेरी सोयी नहीं  ये जिस्म पर पड़े खून के कतरे ये सांसों पर पड़े ज़ख्मों के दाग  ये फटे से ज़हन के चिथड़े  ये बदले की जलन और रंजिश की आग  यह खुला हुआ सीना- किसी ने उसकी आबरू बचायी नहीं  गोया कुछ दिनों से माँ मेरी सोयी नहीं  वह जन्नत की चाह में अपनों के ही लहू से खेल रहे...