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Showing posts from January, 2023

वन्दे मातरम्

    वन्दे मातरम्     वन्दे मातरम्   (   बाँग्ला : বন্দে মাতরম )   बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय   द्वारा संस्कृत बाँग्ला मिश्रित भाषा में रचित इस गीत का प्रकाशन सन्  1882 में उनके उपन्यास   आनन्द मठ   में अन्तर्निहित गीत के रूप में हुआ [2]   था। इस   उपन्यास   में यह गीत भवानन्द नाम के संन्यासी द्वारा गाया गया है। इसकी धुन   यदुनाथ भट्टाचार्य   ने बनायी थी। इस गीत को गाने में 65 सेकेंड ( 1 मिनट और 5 सेकेंड) का समय लगता है। सन् 2003 में ,  बीबीसी वर्ल्ड सर्विस   द्वारा आयोजित एक अन्तरराष्ट्रीय   सर्वेक्षण   में , जिसमें उस समय तक के सबसे मशहूर दस गीतों का चयन करने के लिये दुनिया भर से लगभग 7000 गीतों को चुना गया था और बी०बी०सी० के अनुसार 155 देशों/द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था उसमें वन्दे मातरम् शीर्ष के 10 गीतों में दूसरे स्थान पर था। [3] गीत   भारतीय संविधान के पृष्ठ 167 पर व्यौहार राममनोहर सिंहा द्वारा चित्रित वन्दे–मातरम् (सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम् ...

लोकतंत्र की 74वीं पायदान पर भी प्रासंगिक हैं गांधी

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    लोकतंत्र की 74वीं पायदान पर भी प्रासंगिक हैं गांधी   संत , महात्मा हो तुम जग के , बापू हो हम दीनों के दलितों के अभीष्ट वर-दाता , आश्रय हो गतिहीनों के आर्य अजातशत्रुता की उस परंपरा के स्वतः प्रमाण सदय बंधु तुम विरोधियों के , निर्दय स्वजन अधीनों के!   30 जनवरी को महात्मा गांधी के निर्वाण-दिवस पर उन्हें याद करने की परंपरा का निर्वहन प्रति वर्ष किया जाता है। इस वर्ष भी इस अवसर पर देश ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित कर रहा है और हाड़-मांस के उस दुबले अधनंगे फ़कीर (तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल का गांधी को दिया संबोधन) को याद कर रहा है ,  जिसके बारे में प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन का कहना था कि आने वाली पीढ़ियों को यह यकीन ही नहीं होगा कि ऐसा भी कोई व्यक्ति इस धरती पर आया था। परंतु तीन गोलियाँ खाने के गणतंत्र भारत के 73 वर्ष बीत जाने के बाद भी वे ज़िंदा हैं ,  हमारी धमनियों में रक्त के साथ बहते हैं ।दुनिया में उन्हें आज और भी अधिक प्रासंगिक माना जा रहा है ,  क्योंकि वैश्विक स्तर पर व्याप्त हिंसा ,  मतभेद ,  बेरो...

‘परीक्षा पे चर्चा’-एक सार्थक पहल

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  ‘ परीक्षा पे चर्चा ’- एक सार्थक पहल   आपके मन में परीक्षा को लेकर यह डर क्यों होता है? क्या आप पहली बार परीक्षा देने जा रहे हैं? आप सभी बहुत सारे एग्जाम दे चुके हैं।आप एक बात तय कर लीजिए की परीक्षा जीवन का एक सहज हिस्सा है। जीवन के यह छोटे-छोटे पड़ाव है जिनसे हमें गुजारना है और हम पहले गुजर भी चुके हैं। परीक्षा में शामिल होने जा रहे व परीक्षा के तनाव से ग्रस्त छात्रों की चिंता को दूर करने के लिए ‘परीक्षा पे चर्चा’ कार्यक्रम भी शुरू किया गया था। ‘परीक्षा पे चर्चा’ मनाने का उद्देश्य परीक्षाओं को एक आनंददायक गतिविधि बनाने की दिशा में अपने प्रयास को जारी रखना था। एनसीपीसीआर के मुताबिक परीक्षा एक पर्व है , एक जश्न है , जिसका उद्देश्य एक मंच पर परीक्षा के कारण होने वाले तनाव के प्रति बच्चों के दृष्टिकोण में बदलाव लाना और परीक्षा परिणाम से पहले उनकी चिंता को दूर करना था। ‘ परीक्षा पे चर्चा ’ एक ऐसी पहल है , जो हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा शुरू की गई , जिसका मुख्य उद्देश्य बोर्ड परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों की मन की बात को सुनना और उनके मन में ...

शिक्षा:आज बेटियों को सक्षम बनाने का अस्त्र

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  शिक्षा:आज बेटियों को सक्षम बनाने का अस्त्र बेटियां गुरुग्रंथ की वाणी , बेटियां वैदिक ऋचाएं हैं। जिनमें खुद भगवान बसता है , बेटियां वे वंदनाएं हैं। त्याग , तप , गुणधर्म , साहस की बेटियां गौरव कथाएं हैं। मुस्करा के पीर पीती हैं , बेटी हर्षित व्यथाएं हैं। मेलिंडा गेट्स के अनुसार , ‘ जब आप किसी लड़की को स्कूल भेजते हैं , तो इस भले काम का असर   स्थायी रहता है। यह पहल पीढ़ियों तक जनहित के तमाम कार्यों को आगे बढ़ाने का काम करती है , स्वास्थ्य से लेकर आर्थिक लाभ , लैंगिक समता और राष्ट्रीय समृद्धि तक।’दुनिया भर में लगभग 132 मिलियन लड़कियां स्कूल से बाहर हैं और भारत में लगभग 40 प्रतिशत किशोरियां स्कूल नहीं जाती हैं। दूसरे शब्दों में , यदि स्कूल नहीं जा पा रही कुल लड़कियों की एक देश के रूप में कल्पना करें , तो यह दुनिया का 10 वां सबसे बड़ा देश होगा। नीति निर्माता और सिविल सोसायटी दशकों से प्रत्येक बालिका को शिक्षित करने की ज़रूरत पर चर्चा कर रहे हैं। लेकिन लाखों लड़कियां शिक्षा के दायरे से बाहर रहने को मजबूर हैं , जबकि अध्ययनों ये पता चलता है कि लड़कियों की गुणवत्...

हम और हमारे त्योहार

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  हम और हमारे त्योहार   मेरा देश बड़ा गर्वीला , रीति-रसम-ऋतु-रंग-रंगीली॥ बरस-बरस पर आती होली , रंगों का त्यौहार अनोखा चुनरी इधर-उधर पिचकारी , गाल-भाल पर कुमकुम फूटा , दिवाली- दीपों का मेला , झिलमिल महल-कुटी-गलियारे भारत-भर में उतने दीपक , जितने जलते नभ में तारे , मन में राम , बगल में गीता , घर-घर आदर रामायण का किसी वंश का कोई मानव , अंश साझते नारायण का , जहाँ राम की जय जग बोला , बजी श्याम की वेणु सुरीली मेरा देश बड़ा गर्वीला , रीति-रसम-ऋतु-रंग-रंगीली॥ भारतीय    संस्कृति    में    व्रत ,   पर्व - त्योहार    उत्सव ,   मेले    आदि    अपना    विशेष    महत्व    रखते    हैं।    हिंदूओं    के    ही    सबसे    अधिक    त्योहार    मनाये    जाते    हैं ,   कारण    हिंदू    ऋषि - मुनियों    के    रूप    में    ...