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Showing posts from February, 2024

मैं गीत हूँ...मैं मीत हूँ

 मैं गीत हूँ...मैं मीत हूँ मैं वह गीत हूँ, जो हर पक्षी को गाता है मैं वह पत्ता हूँ, जो ज़मीन को उर्वर बनाता है मैं वह फूल हूँ, जो जग को महकाता है मैं वह वृक्ष हूँ, जो झूमता-झुकता-लहराता है मैं वो बादल हूँ, जो धरती को महकाता है मैं वह ज्वार हूँ, जो चंद्रमा को हिलाता है मैं वह धारा हूँ,  जो रेत को संवारती है मैं वह पृथ्वी हूँ,  जो सूरज को रोशन करती है मैं वो आग हूँ,  जो पत्थर से लगती है मैं वह मिट्टी हूँ, जो हाथ से आकार पाती है मैं वह नदी हूँ, जो तटों को बनाती है मैं वह मयूर हूँ, जो पंख पसार थिरकता है मैं वह राग हूँ, जो मन-मंदिर में बजता है मैं वह सागर हूँ, जो रत्नाकर कहलाता है मैं वह शब्द हूँ, जो जन-जन बोलता है मैं वह मीत हूँ, जो अपने स्नेहिल स्पर्श से कभी वृक्ष, कभी बादल, कभी आग,कभी मिट्टी, कभी नदी, कभी मयूर, कभी राग, कभी फूल, और कभी शब्द बनकर दिलों में बस जाता है॥

मेरे अंदर एक भारत बसता है

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  मेरे अंदर एक   HINDOSTA    बसता है   मेरे अंदर एक HINDOSTA  बसता है ज़िंदगी से हारकर जब उदास होती हूं मैं , तब यह प्यार देता है , दुलार देता है अपनी बाँहों में कसता है मेरे अंदर एक   HINDOSTA    बसता है।   मेरे अंदर एक पर्वत है जिसका गुरुत्व नभ को चूमता है जिसकी नस - नस अपनत्व में झूमता है अपनी बाँहों में कसता है मेरे अंदर एक   HINDOSTA    बसता है।   मेरे अंदर कुछ पवित्र नदियां हैं जो धरती के कोरे पन्नों पर लिखती हैं नित प्यार के नए गीत , और कहती हैं .... जागो , जागो , जागो , ओ मेरे मीत । मीत जो अपनी बाँहों में कसता है मेरे अंदर एक   HINDOSTA    बसता है।   मेरे अंदर मंदिर हैं , मसजिद हैं , गिरजा है जहां केवल श्रद्धा के फूल चढ़ते हैं , और सब प्यार से हिलते - मिलते हैं मेरे अंदर एक सभ्यता है , एक संस्कृति है जो जीने की राह बताती है सदियो...

लोग जो मुझमें रह गए- अनुराधा बेनीवाल

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  लोग जो मुझमें रह गए- अनुराधा बेनीवाल (यायावरी की दूसरी कड़ी ) यह ‘ आज़ादी मेरा ब्रांड ' कहने और जीने वाली अनुराधा बेनीवाल की दूसरी किताब है। यह कई यात्राओं के बाद की एक वैचारिक और रूहानी यात्रा का आख्यान है , जो यात्रा-वृत्तान्त के तयशुदा फ्रेम से बाहर छिटकते शिल्प में तयशुदा परिभाषाओं और मानकों के साँचे तोड़ते जीवन का दर्शन है। यात्राएं आपको आज़ाद करती हैं। वे आपको अपरिचित-अनजानी-अनदेखी दुनिया से परिचित कराती हैं , जिससे आपकी दुनिया बड़ी होती है और आपका हौसला भी बढ़ता है। खुद पर भरोसा भी बढ़ता है। यात्राएं आपको हदों को पार कर नई हदों तक पहुंचाती हैं। आपके दायरे का विस्तार करती हैं। यात्रा का मतलब केवल एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं है। इसका मलतब उन लोगों , संस्कृतियों , रवायतों , मसलों को देखना–समझना और उनसे जुड़ना भी है , जिनसे आप अब तक अनजान हैं। लेखिका की ये यायावरी की दूसरी कड़ी है , यानी “आज़ादी   मेरा ब्रांड” का एक्सटेंशन कह सकते है , जिसमें ये समझने में ज़रा भी दिक़्क़त नहीं होती है कि दूसरे शहर दूसरे देश के अनजाने ...

कुछ सपने बोए थे

  कुछ सपने बोए थे उसने कुछ सपने बोए थे , की ज़मीन की गुडाई थी , खेत की मुंडेर बनाई थी , बहुत    की सिंचाई थी , फिर बो दिए सपनों के बीज …..! सपने बेटे की पढाई के... बेटी की सगाई के... माँ-बाबा की दवाई के... चूड़ी भरी बीबी की कलाई के... रोंप दिए थे नन्हें पौधे  |   उम्मीद भी यही थी  – कि कल जब ये पेड़ पनपेंगे तो सपने भी जवान होंगे धीमे-धीमे परवान होंगे और मिलेंगे सुंदर फल  | सपने सब बड़े हो रहे थे आँखों के सामने खड़े हो रहे थे , कोपलें मुस्करा रही थीं नन्ही कलियाँ खिलखिला रही थी सपने बढ़ने जो लगे थे   बेटे की उम्मीद की अमराई-सी बेटी के मन की नई-नई अंगडाई-सी माँ-बाबा की आंखों में रंगीन सपनाई-सी खनकती चूड़ियों से भरी बीबी की कलाई-सी सपने हज़ार यौवन का खुमार रंग बेशुमार इंद्रधनुष बारंबार... अचानक सपने झुलसने लगे , ठंडी आग में लहकने लगे , अश्क बन आँखों से ढलकने लगे , शुष्क रेत से दरकने लगे  , आँखों आँखों में आँखों ने तब    कई बातें की थीं  , जिन सपनों में रंग भरने ...