मैं पुस्तक हूँ
मैं पुस्तक हूँ मैं विश्व की हर आवाज़ को शब्दों की स्याही में डुबोती हूँ. दिल को छूती , ज्ञान से भरपूर कई विधाओं को संजोती हूँ मैं पुस्तक हूँ! तुम्हारी चिर परिचित संगिनी , मुझे साथ ले लो शैशव , युवावस्था , प्रौढ़ जीवन के विविध रंग उकेरती हूँ हर तबके , हर संस्कृति , सभ्यता के अनुभव को समेटती हूँ मैं पुस्तक हूँ! तुम्हारी चिर परिचित संगिनी , मुझे साथ ले लो मानव , पशु-पक्षी , पर्वत नदियों संग अठखेलियाँ करती हूँ मुखौटे लगे चेहरों की भी शराफत बन रंगरेलियां रचती हूँ मैं पुस्तक हूँ! तुम्हारी चिर परिचित संगिनी , मुझे साथ ले लो उत्थान पतन की लहरें , ऐतिहासिक स्मृति से उठाती गिराती हूँ गीले रेत पर पड़े अपने ही निशाँ बनाती और फिर मिटाती हूँ मैं पुस्तक हूँ! तुम्हारी चिर परिचित संगिनी , मुझे साथ ले लो आज की , कल की , हर पल की गाथा बन जुबां में सजती हूँ सार्वभौमिक सत्य , वैज्ञानिक रहस्य का हर लम्हा बुनती हूँ मैं पुस्तक हूँ! तुम्हारी चिर परिचित संगिनी , मुझे साथ ले लो गंगोत्...