Posts

Showing posts from April, 2025

मैं पुस्तक हूँ

Image
  मैं पुस्तक हूँ मैं विश्व की हर आवाज़ को शब्दों की स्याही में डुबोती हूँ. दिल को छूती ,  ज्ञान से भरपूर कई विधाओं को संजोती हूँ मैं पुस्तक हूँ! तुम्हारी चिर परिचित संगिनी , मुझे साथ ले लो शैशव ,  युवावस्था ,  प्रौढ़ जीवन के विविध रंग उकेरती हूँ हर तबके ,  हर संस्कृति ,  सभ्यता के अनुभव को समेटती हूँ मैं पुस्तक हूँ! तुम्हारी चिर परिचित संगिनी , मुझे साथ ले लो मानव ,  पशु-पक्षी ,  पर्वत नदियों संग अठखेलियाँ करती हूँ मुखौटे लगे चेहरों की भी शराफत बन रंगरेलियां रचती हूँ मैं पुस्तक हूँ!   तुम्हारी चिर परिचित संगिनी , मुझे साथ ले लो उत्थान पतन की लहरें , ऐतिहासिक स्मृति से उठाती गिराती हूँ गीले रेत पर पड़े अपने ही निशाँ बनाती और फिर मिटाती हूँ मैं पुस्तक हूँ!   तुम्हारी चिर परिचित संगिनी , मुझे साथ ले लो आज की ,  कल की ,  हर पल की गाथा बन जुबां में सजती हूँ सार्वभौमिक सत्य ,  वैज्ञानिक रहस्य का हर लम्हा बुनती हूँ मैं पुस्तक हूँ!   तुम्हारी चिर परिचित संगिनी , मुझे साथ ले लो गंगोत्...

जी होता कुल्फ़ी बन जाऊँ

Image
जी करता , कुल्फ़ी    बन जाऊँ   जी करता ,  कुल्फ़ी    बन जाऊँ! श्वेतावर्णा बनकर सुख पाऊँ!   फुदक-फुदककर दूध-मलाई बन , चीनी-चाशनी में बन-ठन  , साँचे में जम-जम जाऊँ! जी करता, कुल्फ़ी बन जाऊँ!   कितना अच्छा इसका जीवन ? आज़ाद सदा इनका तन-मन! मैं भी इस-सी मिठास फैलाऊँ ! जी करता ,  कुल्फ़ी बन जाऊँ!   हर घर , हर द्वार पर खुशबू फैलाऊँ , लू-धूसरित आंधी में भी सैर कर आऊँ , इतराऊं-इठलाऊँ-सबको ललचाऊँ! जी करता, कुल्फ़ी बन जाऊँ!   रीना-मीना-आभा-आरिफ़ आओ , घर बैठे न यूँ शरमाओ , देखो , इरम-प्रतिभा-वर्षा भी आई , कुल्फ़ी माधुर्य-शीतलता लाई |   इसीलिए यह गुनती जाऊँ! जी करता, कुल्फ़ी बन जाऊँ!  

शादी की सालगिरह

 शादी की ये वाली सालगिरह आई ....  कुछ पुरानी तस्वीरें फिर से मुस्कराईं, वो पहली मुस्कान, वो हल्की सी शरमाहट,  जैसे वक्त की किताब फिर से पलट गई। साल दर साल साथ चले, कभी धूप में, कभी छांव तले, कुछ खामोशियां थीं, कुछ हँसी के मेले, कभी रूठना, कभी मनाना — सब रंग थे रिश्ते के इस खेल में। पहली लड़ाई की बात याद है? या वो पहली बार जब तुमने चाय बनाई थी? आज भी उसी चाय की खुशबू हर सुबह को खास बना जाती है। इन सालों में हमने बहुत कुछ पाया, कुछ खोया, कुछ सहेजा, कुछ संभाला, अपूर्व अक्षर को मिल कर पाला  पर सबसे कीमती तो ये साथ था — जो हर मोड़ पर हमें एक-दूजे के और करीब लाता गया। शादी का 40वां  साल शुरू होने पर, मैं सिर्फ तुम्हारा "धन्यवाद" कहना चाहती हूँ — कि तुमने हर तूफान में मेरा हाथ थामा, और हर मुस्कान में मेरी आंखों में झांका। आओ, इस नए दशक की शुरुआत करें, फिर से एक वादा करें — कि अगला हर साल, प्यार में बीते, साथ में बीते, और यूँ ही खूबसूरत बीते।

स्वाद-बेस्वाद

 वह जब भी खाना पकाती ख़ुद को पूरी तरह डुबा देती। अपने सभी स्वाद खाने में घोल देती उसके पास नमक, चीनी, मिर्च, हल्दी सब बेहिसाब था अक्सर प्याज काटने के बहाने से वह ख़ूब रो लेती और उसके भीतर का नमक आखों से बहने लगता जल्दी ही उसका नमक, चीनी, मिर्ची और हल्दी का संचय ख़तम होने लगा। "क्या बेस्वाद खाना बनाती हो। फीकी कर दी मेरी ज़िन्दगी" (वह गुस्से से चिल्लाया) "हाँ नमक कम हो गया तुम्हारी सब्जी में और ज़िन्दगी में है न? लेकिन गुंजाईश फिर भी है तुम्हारे पास ये लो नमकदानी और चीनी जितना चाहे डालो स्वादानुसार... स्वाद के विकल्प छोड़े है मैंने अब भी लेकिन सुनो... तुमने मेरी ज़िन्दगी में इतना नमक घोल दिया कि ज़हर हो गयी ज़िन्दगी अब कोई गुंजाईश भी नहीं शेष...

मन समझते हैं आप?

  मन समझते हैं आप? यकीनन वो स्त्री नहीं थी। सिर्फ और सिर्फ "मन " थी। मन से बनी, मन से जनी मन से गढ़ीऔर मन से बढ़ी। जिससे भी मिलती मन से मिलती। अपने मन से दूसरे के मन तक एक पुल बना लेने का हुनर था उसके पास। इस पुल से वो दूसरे मन तक पहुँचती थी। उन टूटे फूटे मन की दरारें भरती , मरम्मत करती। जानती थी, सोने चांदी से मरम्मत नहीं की जाती। मन की दरारें मन की मिट्टी से ही भरी जाती। उसके बनाये मन के पुल पे चलकर लोग आते जाते समय इक मुट्ठी मन की मिट्टी भी लिए जाते। फिर भी  (वो इस बात पे मुस्काती और कहती मन समझती हूँ मैं ) धीरे-धीरे मन के पुल टूटने लगे। मिट्टी की कमी से आसुओं की नमी से रिश्ते जड़ों से छूटने लगे अब वो पुल नहीं बना पाती| इतनी मिट्टी वो अकेले कहाँ से लाती? कहाँ से लाती? धीरे धीरे उसका मन बीत गया जैसे कोई मीठा कुआँ रीत गया। वो राह तकती है , कोई आता होगा साथ में इक मुट्ठी मन की मिट्टी लाता होगा।  कोई आता होगा... परंतु निगोड़ी  अब भी मुस्काती है और कहती है ओह, मन नहीं समझते न आप?

नाते पुराने हैं

Image
 नाते पुराने हैं  जो अक्सर चुप रहते हैं, अपना प्रेम और पीड़ा मन में छिपाते हैं वो सब एक दिन पहाड़ बन जाते हैं। जो कहते है सुनते है और बहते है अपने प्रेम और पीड़ा को लुटाते है वो सब एक दिन नदी बन जाते है। एक दिन नदियाँ पहाड़ों को हिला देंगी। समाधि में लीन शिव को जगा देगीं। पहाड़ों के सूखे आसूं, रेत बन झरते हैं। इन कणों से सीपियों के गर्भ पलते हैं। पहाड़ों की चुप से नदी के मन जलते हैं पहाड़ों के दुःख, पीड़ा और अवसाद पेड़ बन अपनी ही छाँव में जलते हैं सच कहती थी नदी, अहसास भी भला कभी मरते हैं। पूछ बैठा कोई पहाड़ किसी नदी से किसी दिन कितना बोलती हो, बहती हो थकती नहीं हो? कभी रोई होगी तुम ऐसी लगती तो नहीं हो नदी मुस्काई दो बूंद उसकी आखों में छलक आई। हम दोनों की पीड़ा,एक जैसी बस आसूं अलग हैं तुम्हारे आसूं सूखी रेत, तो मेरे बूंदों से तरल है। कोई "बिन कहे" पहाड़ हो जाता है मर जाता है कोई कह कह कर, बह बह कर नदी बन जाता है। दोनों के रोने के अपने बहाने हैं पहाड़ों के नदियों से नाते पुराने हैं।

इन्हेलर

 इन्हेलर  (कभी-कभी रिश्तों को बचाने के लिए हम इन्हेलर बन जाते है। कभी बरनोल, कभी डिस्प्रीन, कभी डस्टबीन, तो कभी-कभी बेसिन भी, रिश्ते फिर भी नहीं बचते) तुम मेरी इमोशनल जरुरत हो यानी साँसों की जरुरत जैसे ये इन्हेलर... तुम इन्हेलर हो मेरी तुम्हारा प्रेम ही तो भरा है इसमें। जब-जब भी मेरी सांसे टूटती है, उखड़ती हैं घुटती या अटकती है तुम झट से इन्हेलर बन जाती हो। तुम्हे खोजता हूँ इस दुनिया के घर में बदहवास सा... तुम स्पेशल हो मेरे लिए, ख़ास भी मैं इन्हेलर के बिना साँस नहीं ले सकता। वो बोली, हाँ... जानती हूँ... उस दिन से वो उस इन्हेलर को खूब संभालकर रखती और उसे कहती तू नहीं मैं ख़ास हूँ समझे? सौ बार इन्हेलर को निहारती, तो दो सौ बार खुद को आईने में देखती, इतराती... फिर एकदिन वो अचानक उसे छोड़ गया, उसका इन्हेलर भी टेबल पर ही छूट गया। उसने पूछा था एकदिन, फोन पर ये इन्हेलर तो यहीं रह गया। तुम्हारी सांसों की जरुरत... क्या परदेश में साँसों की जरुरत नहीं? ओह प्रिये, आते ही नया खरीद लिया, तुम तो जानती हो न हाँ... जानती हूँ... ...इन्हेलर के बिना तुम जी नहीं सकते।

मन की अपार शक्ति

Image
मन की अपार शक्ति मन की तुलना मुकुर के साथ दी जाती है, जो बहुत ही उपयुक्त है। मुकुर में हमारा मुख साफ तभी दिख पडे़गा, जब दर्पण निर्मल हो। वैसा ही मन भी जब किसी तरह के विकार से रहित और निर्मल होगा, तभी ‍मनन, जो मन का व्‍यापार है, भलीभाँति बन पड़ेगा। तनिक भी बाहर की चिंता का, कपट का, या   कुटिलाई की मैल मन पर संक्रमित रहे, तो उसके सूक्ष्‍म विचारों की स्‍फू‍र्ति चली जाती है। इसी कारण पहले के लोग मन पवित्र रखने के उद्देश्य से वन में जा बसते थे , प्रात: काल और साँझ को कहीं एकांत स्‍थल में स्‍वच्‍छ जलाशय के समीप बैठ मन को एकाग्र करने का अभ्‍यास करते थे। मन की प्रशंसा में यजुर्वेद संहिता की 34 अभ्‍यास में 5 ऋचाएँ हैं, जो ऐसे ही मन के संबंध में हैं जो अकलुषित , स्‍वच्‍छ और पवित्र है। जल की स्‍वच्‍छता के बारे में एक जगह कहा भी है ' स्‍वच्‍छं सज्‍जनचित्‍तवत् ' यह पानी ऐसा स्‍वच्‍छ है, जैसा सज्‍जन का मन। '' यस्मिन्‍नृच सामयजूंषि यस्मिन्‍प्रतिष्ठिता रथनाभाविचारा: । यस्मिंश्चित्‍तं सर्वमोतं प्रजानां तन्‍मे मन: शिवसंकल्‍पमस्‍तु।। सुषारथिरश्‍वानिव यन्‍मनुष्‍यान्‍ने...

स्वास्थ्य देता है समृद्धि

  स्वास्थ्य देता है समृद्धि स्वास्थ्य देता है समृद्धि, यह वाक्य केवल एक सूक्ति नहीं , बल्कि जीवन का मूलमंत्र है। स्वास्थ्य और समृद्धि का संबंध बहुआयामी है| यह वाक्य इस गहन सत्य को भी व्यक्त करता है कि शारीरिक , मानसिक , आर्थिक और सामाजिक, सभी प्रकार की समृद्धि ही वास्तविक समृद्धि है| प्रति वर्ष विश्व स्वास्थ्य दिवस 2025 विश्व स्तर पर 7 अप्रैल को मनाया जाता है, जो 1948 में स्थापित होने वाले विश्व स्वास्थ्य संगठन ( WHO) की स्थापना की वर्षगांठ भी है। यह दिन वैश्विक स्वास्थ्य मुद्दों के बारे में   जागरूकता बढ़ाने और   सरकारों , स्वास्थ्य संस्थानों , नागरिक समाज   और   व्यक्तियों   के बीच   कार्रवाई को संगठित करने   के लिए एक मंच के रूप में कार्य करता है। इस वर्ष , “ स्वस्थ शुरुआत , आशावादी भविष्य”   थीम   स्वास्थ्य और समृद्धि के अटूट संबंध को उजागर करती है| हर साल एक खास   थीम   चुनी जाती है जो   सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को   दर्शाती है । इन थीम का उद्देश्य तत्काल स्वास्थ्य चुनौतियों की ...